बवाना औद्योगिक क्षेत्र में हड़ताली मज़दूरों का दमन

भारत

पिछली 3 मार्च को उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के बवाना औद्योगिक क्षेत्र में ‘बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन’ द्वारा हड़ताल का आह्वान किया गया था। साथ ही मज़दूरों से ‘भगतसिंह जन अधिकार यात्रा’ के समापन कार्यक्रम के तहत जन्तर-मन्तर चलने की अपील भी की गयी थी, जहाँ देशभर से मज़दूर, छात्र अपनी माँगों को लेकर एकजुट हो रहे थे। हड़ताल का दिल्ली पुलिस द्वारा बर्बर दमन किया गया और यूनियन के कार्यकर्ताओं व मज़दूरों के साथ मारपीट की गयी और उन्हें तिहाड़ जेल तक भेजा गया। इसपर हम आगे बात करेंगे। 3 मार्च की हड़ताल के लिए पूरे इलाक़े में यूनियन द्वारा पर्चा वितरण, पोस्टरिंग से लेकर मज़दूर बैठकों का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों मज़दूर शामिल हुए थे। औद्योगिक इलाक़े हड़ताल को सफल बनाने की अपील करते हुए यूनियन के नेतृत्व में बड़ी रैलियाँ भी निकाली गयी।

आइए, एक बार हड़ताल की पृष्ठभूमि पर नज़र डाल लेते हैं, जिस कारण मज़दूरों से हड़ताल करने की अपील की गयी थी। ज्ञात हो कि बवाना के पाँच सेक्टरों में लगभग 14,000 फैक्ट्रियाँ हैं, जिसमें क़रीब दो लाख तक मज़दूर काम करते हैं। सब जानते ही हैं कि आज बवाना से लेकर दिल्ली की किसी भी फैक्ट्री में कोई श्रम क़ानून लागू नहीं होता। कहने के लिए कुछ महीनों पहले केजरीवाल ने न्यूनतम वेतन में वृद्धि की है और अकुशल मज़दूर का वेतन अब 17,234 रुपये से शुरू है और कुशल मज़दूर का वेतन 20,903 रुपये। लेकिन हमेशा की तरह ये आँकड़े सिर्फ़़ काग़ज़ों की ही शोभा बढ़ा रहे हैं। ई.एस.आई-पी.एफ. तो मुश्किल से ही किसी फैक्ट्री में मिलता है। सच्चाई यह है कि लोहे, प्लास्टिक, लकड़ी से बनने वाले सामान, कपड़े, मिठाई, श्रृंगार, आदि बनाने वाली किसी भी फैक्ट्री में काम करने वाला मज़दूर हो या सामानों को ढोने वाला मज़दूर, कोई भी महीने का औसतन आठ से दस हज़ार रुपये से ज़्यादा नहीं कमा पाता है। महिला मज़दूरों को पुरुषों के बराबर काम करने के बावजूद औसतन छह या सात हज़ार रुपये से ज़्यादा वेतन नहीं मिलता। आये-दिन फैक्ट्रियों में आग लगने की घटनाएँ सामने आती हैं। 2018 में पटाखा फैक्ट्री में आग लगने से लेकर ये सिलसिला आजतक जारी है और बवाना से लेकर अलीपुर, नरेला, वज़ीरपुर और देश भर में मज़दूर जलकर मर रहे हैं।

वर्ष 2015 में जारी आँकड़े के अनुसार आईएलओ का अनुमान है कि दुनियाभर में लगभग 23 लाख महिलाएँ और पुरुष हर साल काम से सम्बन्धित दुर्घटनाओं या बीमारियों का शिकार होते हैं; यह हर दिन 6000 से अधिक मौतों के बराबर है। दिल्ली पुलिस के मुताबिक़, पिछले पाँच साल में सिर्फ़़ राजधानी में 663 फैक्ट्री दुर्घटनाएँ दर्ज की गयीं, जिनमें 245 लोगों की मौत हो गयी। इन दुर्घटनाओं के सम्बन्ध में केवल 84 लोगों को गिरफ़्तार किया गया। एक केन्द्रीय मन्त्री ने 2021 में संसद को बताया कि पाँच वर्षों में कारख़ानों, बन्दरगाहों, खदानों और निर्माण स्थलों पर काम करते समय कम से कम 6,500 श्रमिकों की मृत्यु हुई है। ये आँकड़े केवल रजिस्टर्ड कार्यस्थलों के हैं, जबकि बवाना में तो कई फैक्ट्रियाँ रजिस्टर्ड ही नहीं है, ऐसे इलाक़े में मरने वालों की कोई गिनती ही नहीं होती। हर जगह काम के दौरान फैक्ट्री के दरवाज़े में ताला इस कदर लटका होता है जैसे कि हम मालिक की सम्पत्ति चोरी कर कहीं भागने वाले हों। ऐसे में यदि फैक्ट्री के अन्दर आग लगती हो या कोई दुर्घटना होती हो तो हम बाहर भी नहीं भाग सकते। इस तरह की घटना कई जगहों पर घट चुकी है, जब आग के बाद गेट पर ताले लटके होने की वजह से फैक्ट्री के अन्दर ही मज़दूर जलकर ख़त्म हो गये।

श्रम क़ानूनों को लागू करने, फैक्ट्रियों में सुरक्षा के पुख़्ता इन्तज़ाम करने जैसी बुनियादी माँगों को लेकर मज़दूर हड़ताल पर गये थे। 3 मार्च के दिन सुबह से ही हड़ताली टोलियाँ पूरे बवाना इलाक़े में मज़दूरों को एकजुट कर काम बन्द करके हड़ताल में शामिल होने की अपील कर रही थीं। हड़ताल का असर ख़ासतौर पर सेक्टर-5 में था, जहाँ 90 प्रतिशत कारख़ाने बन्द थे और हज़ारों मज़दूर हड़ताल रैली में शामिल थे। अन्य सेक्टर में हड़ताल आंशिक तौर पर सफल रही। इसी सफलता ने मालिकों के अन्दर ख़ौफ़ पैदा किया और तुरन्त पुलिस हड़ताल को रोकने के लिए हरकत में आ गयी। सबसे पहले सेक्टर-3 में पुलिस ने मज़दूरों को रैली निकालने से रोका और जब मज़दूर जन्तर-मन्तर जाने के लिए निकल रहे थे, गाड़ी को रोककर उन्हें इलाक़े से बाहर जाने के लिए मना कर दिया गया। इसके बाद मज़दूरों ने सेक्टर-3 में ही हड़ताल सभा शुरू कर दी।

सबसे अधिक मालिक व पुलिस सेक्टर-5 के मज़दूरों से घबराए थे। लगातार मालिकों द्वारा दवाब बनाये जाने के कारण पुलिस बार-बार रैली को रोकने की कोशिश कर रही थी, पर मज़दूरों व यूनियन ने रैली जारी रखी। यहाँ भी जब मज़दूर जन्तर-मन्तर के लिए गाड़ी में निकलकर रहे थे, गाड़ी को रोककर पुलिस ने लाठीचार्ज करना शुरू कर दिया। महिला मज़दूरों तक को पुरुष पुलिसवालों ने पीटा और उनके साथ गाली-गलौच की। वहीं पर यूनियन के कार्यकर्ताओं के साथ भी पुलिस ने मारपीट की। इसके बाद मज़दूरों से भरी पूरी गाड़ी को लेकर पुलिस नरेला बॉर्डर पर छोड़कर आयी, ताकि मज़दूर दुबारा हड़ताल या सभा न कर सकें। इस दौरान यूनियन के 5 कार्यकर्ताओं जिसमें बवाना औद्योगिक क्षेत्र मज़दूर यूनियन के संयोजक भारत, आशीष व अंकित, मिराज, अंश को गिरफ़्तार किया। इसके अलावा 3 मज़दूरों (विकास कुमार, विकास झा, कमल किशोर) को भी गिरफ़्तार किया गया। गिरफ़्तार किये जाने के दौरान सभी के साथ मारपीट की गयी और चौकी में ले जाने के बाद सभी पुलिस वालों द्वारा मिलकर इन्हें पीटा गया और इसके बाद एक-एक कर अलग से ले जाकर सबको पीटा गया। इस पूरी मारपीट में आशीष और अंकित के कान के पर्दे फट गये और सबको चोटें आयी हैं। मारपीट के सबूत को छिपाने के लिए पुलिसवालों ने सबकी झूठी एमएलसी भी बनवायी। इसके बाद सभी साथियों पर 107/51 की धारा लगायी गयी और कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ आठों साथियों को तिहाड़ जेल भेज दिया गया। हालाँकि जनदबाव के चलते सभी साथियों को 5 मार्च को ज़मानत मिल गयी। यूनियन द्वारा मारपीट करने वाले सभी पुलिसवालों के खिलाफ़ क़ानूनी कारवाई की जा रही है।

साथियों के जेल से छूटने के अगले ही दिन पूरे इलाक़े में रैली निकाली गयी और सभा की गयी। इसमें यह स्पष्ट कर दिया गया कि यूनियन पुलिस व मालिकों के किसी भी दमन के आगे झुकेगी नहीं और आने वाले समय में मालिकों की हर चाल का मुंहतोड़ जवाब देगी। साथ ही मज़दूरों से भी अपील की गयी कि अधिक से अधिक संख्या में यूनियन की सदस्यता लें क्योंकि अकेले मज़दूर को तोड़ना मालिक के लिए बहुत आसान है, पर यूनियन की ताक़त से मालिक भी डरता है। 3 मार्च की कारवाई भी दिखलाती है कि मालिक व प्रशासन मज़दूरों की एकजुटता से कितना डरते हैं।

3 मार्च की हड़ताल ने साबित कर दिया कि मज़दूरों के अन्दर का ग़ुस्सा लावा बनकर धधक रहा है और यह सही रास्ता अख़्तियार करे तो आने वाले दिनों में यह ज्वालामुखी ज़रूर फूटेगा। साथ ही पुलिस और मालिकों का दमनकारी चेहरा भी मज़दूरों के सामने आ गया। साथ ही इस हड़ताल से यह बात और भी पुख़्ता हो गयी कि आज के दौर में मालिकों को झुकाने के लिए इलाक़ाई व सेक्टरगत यूनियन की ज़रूरत है, जो सभी मज़दूरों की लड़ाई को एक साथ लड़ सके। आने वाले दिनों में मालिकों व सरकार के खिलाफ़ इस लड़ाई को और मज़बूत किया जायेगा।

मोदी सरकार और बवाना के मालिकों से यूनियन ने ये निम्न माँगें रखी हैं, जिनपर आगे संघर्ष जारी रहेगा :

  1. आज की महँगाई के हिसाब से न्यूनतम वेतन 25,000 रुपये प्रति महीना लागू किया जाये। सभी श्रम क़ानूनों को सख़्ती से लागू किया जाये। इसे लागू न करने वाले मालिक पर कठोर कारवाई की जाये।
  2. कारख़ानों में सुरक्षा के पुख़्ता इन्तज़ाम किये जायें। मज़दूरों को सुरक्षा के सभी उपकरण मुहैया करवाये जायें। इसमें लापरवाही बरतने पर किसी फैक्ट्री में हादसा होता है तो मालिक के ऊपर कठोर कार्रवाई हो।
  3. ठेका प्रथा को ख़त्म किया जाये। नियमित प्रकृति यानी रोज़ होने वाले कामों के लिए पक्की बहाली की जाये।
  4. काम के घण्टे 6 किये जायें!

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2024


 

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