उत्तराखण्ड समान नागरिकता क़ानून: अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने वाला और नागरिकों के निजी जीवन में राज्यसत्ता की दखलन्दाज़ी बढ़ाने वाला पितृसत्तात्मक फ़ासीवादी क़ानून

आनन्द

गत 7 फ़रवरी को उत्तराखण्ड सरकार ने समान नागरिक संहिता विधेयक को प्रदेश की विधानसभा में पारित करवा दिया। लोकसभा चुनावों के ठीक पहले इस क़ानून को पारित करवाकर संघ परिवार ने अपने फ़ासीवादी मंसूबों को ज़ाहिर कर दिया है। यह इसी से स्पष्ट हो जाता है कि उत्तराखण्ड विधानसभा में इस क़ानून के पारित होते ही भाजपा के विधायकों ने सदन के भीतर “जय श्रीराम”, “भारत माता की जय” और “वन्दे मातरम” के नारे लगाये। जैसीकि आशंका थी, इन फ़ासीवादियों द्वारा समान नागरिक संहिता के नाम पर हिन्दू पर्सनल क़ानून के तमाम प्रावधानों को ही अल्पसंख्यकों सहित प्रदेश की समूची आबादी पर थोपने की क़वायद की जा रही है। इसे समान नागरिक संहिता कहना बेमानी है क्योंकि देश के सभी नागरिकों के लिए प्रगतिशील आधुनिक क़ानून बनाने की बजाय यह संहिता तमाम प्रतिगामी प्रावधानों का पुलिन्दा है।

इस क़ानून के समर्थकों का दावा है कि यह महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में उठाया गया क़दम है, जबकि सच्चाई यह है कि इस क़ानून के तमाम प्रावधान ऐसे हैं जो स्त्रियों को पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं देते हैं और पितृसत्तात्मक समाज को स्त्रियों की यौनिकता, उनकी निजता को नियन्त्रित करने का खुला मौक़ा देते हैं। इस क़ानून के सबसे ख़तरनाक प्रावधान ‘लिव-इन’ से जुड़े हैं जो राज्यसत्ता व समाज के रूढ़िवादी तत्वों को लोगों के निजी जीवन में दखलन्दाज़ी करने का पूरा अधिकार देते हैं। इन प्रावधानों की वजह से अन्तरधार्मिक व अन्तरजातीय सम्बन्धों पर पहरेदारी और सख़्त हो जायेगी। इन तमाम प्रतिगामी प्रावधानों को देखते हुए इस बात में शक की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है कि यह अल्पसंख्यक-विरोधी एवं स्त्री-विरोधी क़ानून आज के दौर में फ़ासीवादी शासन को क़ायम रखने का औज़ार है। इसमें क़तई आश्चर्य की बात नहीं है कि भाजपा शासित मध्य प्रदेश व गुजरात की सरकारों ने भी इस प्रकार के क़ानून बनाने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।

हिन्दू पर्सनल क़ानून को अन्य सभी धर्मों पर थोपकर मुस्लिमों को ख़ासतौर पर निशाना बनाने की साज़िश

पिछले कुछ समय से संघ परिवार द्वारा ज़ोर-शोर से समान नागरिक संहिता का मुद्दा उछालने के साथ ही धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच यह आशंका पैदा हो गयी थी कि समान नागरिक संहिता के नाम पर हिन्दू पर्सनल क़ानून के ही प्रावधानों को सभी धर्मावलम्बियों पर थोपने की कोशिश की जायेगी। उत्तराखण्ड सरकार द्वारा बनाये गये नागरिक समान संहिता क़ानून के प्रावधानों पर नज़र दौड़ाने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह आशंका बिल्कुल सही थी। इस क़ानून के तमाम प्रावधान हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 से सीधे-सीधे उधार लिये गये हैं। यह सर्वविदित है कि हिन्दू धर्म के पर्सनल क़ानूनों में तमाम सुधारों के बावजूद अभी भी ये क़ानून पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना को ही पुष्ट करते हैं और महिलाओं को पुरुषों के बराबर का दर्जा नहीं देते हैं। सच तो यह है कि कुछ मायनों में अन्य धर्मों के पर्सनल क़ानून महिलाओं को ज़्यादा अधिकार देते हैं, मसलन ईसाई, पारसी और मुस्लिम पर्सनल क़ानूनों में हिन्दू पर्सनल क़ानून की तुलना में महिलाओं को सम्पत्ति का ज़्यादा अधिकार दिया गया है। ऐसे में उत्तराखण्ड का क़ानून निर्विवाद रूप से एक प्रतिगामी क़दम है। समान नागरिक संहिता बनाने की कोई भी ईमानदार कोशिश हिन्दू पर्सनल क़ानूनों के आधार पर नहीं की जा सकती है, बल्कि ऐसी किसी भी समान नागरिक संहिता का आधार जनवाद और जेण्डर न्याय होना चाहिए। लेकिन फ़ासीवादियों से ऐसी ईमानदार कोशिश की उम्मीद करना बेमानी है।

यह आधुनिक जनवाद का तकाज़ा है कि अन्य क़ानूनों की ही तरह विवाह, तलाक, उत्तराधिकार जैसे विषयों में भी प्रगतिशील क़ानून होने चाहिए। लेकिन कोई भी समान नागरिक संहिता लागू करने से पहले देश के तमाम धार्मिक समुदायों के बीच सहमति बनाने की कोशिश किये बिना सभी समुदायों पर थोपना लोकतान्त्रिक उसूलों के ख़िलाफ़ है। सभी समुदायों को अपनी परम्पराओं का पालन करने का अधिकार होना चाहिए। हालाँकि अगर किसी समुदाय का कोई व्यक्ति इन परम्पराओं की बजाय आधुनिक तौर-तरीक़ों से विवाह या तलाक़ जैसे पर्सनल क़ानूनों के दायरे में आने वाले क्रियाकलाप करना चाहता है तो उसके लिए समान नागरिक संहिता का भी विकल्प होना चाहिए। लेकिन उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार को जनवाद के इन उसूलों की नहीं बल्कि आगामी लोकसभा चुनावों में अपने हिन्दू वोट बैंक की परवाह थी और इसीलिए आनन-फ़ानन में इस प्रतिगामी क़ानून को पारित करवाया गया। इस क़ानून का एक अल्पसंख्यक-विरोधी पहलू यह भी है कि जहाँ एक ओर अल्पसंख्यकों पर हिन्दू पर्सनल क़ानूनों के प्रावधान थोपे गये हैं वहीं दूसरी ओर हिन्दू अविभाजित परिवार जैसे प्रावधान के नाम पर हिन्दुओं को मिलने वाली रियायतों से वे महरूम रहेंगे। ग़ौरतलब है कि भारत की कराधान व्यवस्था में हिन्दू अविभाजित परिवार के प्रावधान का लाभ उठाकर धनी हिन्दू घराने हर साल करों में भारी छूट पाते हैं। संघ परिवार जब समान नागरिक संहिता का मसला उछालता है तो इस भेदभावपूर्ण प्रावधान पर शातिराना चुप्पी साध लेता है।

उत्तराखण्ड सरकार द्वारा पारित किये गये इस क़ानून के ज़रिये मुस्लिम समुदाय को मुख्य निशाना बनाया गया है क्योंकि संघ परिवार अपने हिन्दुत्ववादी प्रचारतन्त्र के ज़रिये यह झूठ फैलाता रहा है कि मुस्लिमों में बहुविवाह जैसी स्त्री-विरोधी प्रथाएँ आम बात हैं। हाल ही में ‘इण्टरनेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ़ पॉपुलेशन स्टडीज़’ द्वारा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आधार पर जारी डेटा संघ परिवार के इस झूठ का पर्दाफ़ाश करता है क्योंकि यह डेटा दिखाता है कि बहुविवाह की प्रथा केवल मुस्लिमों में नहीं बल्कि सभी धर्मावलम्बियों में प्रचलित है। यह डेटा इस सच्चाई को भी उजागर करता है मुस्लिमों सहित सभी धार्मिक समुदायों के बीच बहुविवाह की प्रथा तेज़ी से ढलान पर है। हिन्दुओं में बहुविवाह की प्रथा 1.3 प्रतिशत है जबकि मुस्लिमों के बीच इसका प्रतिशत 1.9 है। तेलंगाना, छत्तीसगढ़, आन्ध्र प्रदेश व तमिलनाडु जैसे राज्यों में हिन्दुओं में बहुविवाह का प्रतिशत मुस्लिमों से अधिक है। कुल मिलाकर हिन्दू व मुस्लिम समुदायों के बीच बहुविवाह की प्रथा के प्रचलन के सन्दर्भ में बहुत ज़्यादा अन्तर नहीं है और दोनों ही समुदायों के बीच यह अब तेज़ी से प्रचलन के बाहर हो रही है। ग़ौरतलब है बहुविवाह की प्रथा सबसे ज़्यादा आदिवासी समुदायों के बीच प्रचलित है। परन्तु उत्तराखण्ड समान नागरिक संहिता क़ानून प्रदेश में रहने वाली आदिवासी आबादी पर लागू नहीं होगा। आदिवासियों को इस क़ानून के दायरे से बाहर रखना यह भी दिखाता है कि भाजपा सरकार की मंशा वास्तव में कोई समान नागरिक संहिता लाना या महिलाओं का सशक्तीकरण नहीं बल्कि मुस्लिम-विरोधी हिन्दुत्ववादी प्रचार को तेज़ करना है।     

औरतों के लिए इन्साफ़ के नाम पर बढ़ती पितृसत्तात्मक जकड़बन्दी

उत्तराखण्ड समान नागरिक संहिता क़ानून के समर्थक इसे इस आधार पर जायज़ ठहरा रहे हैं कि इसके ज़रिये औरतों की बराबरी व इन्साफ़ की दिशा में उठाया गया क़दम है। हम ऊपर देख चुके हैं कि किस प्रकार सम्पत्ति के अधिकार जैसे मामलों में इस क़ानून में औरतों को बराबरी का दर्जा देने की बजाय हिन्दू पर्सनल क़ानून के प्रतिगामी प्रावधानों को ही समान नागरिक संहिता का हिस्सा बना दिया गया है। इसके अलावा इस क़ानून में लिव-इन सम्बन्धों के सन्दर्भ में जो प्रावधान जोड़े गये हैं वे न सिर्फ़़ नागरिकों की निजता के अधिकार के विरोधी हैं बल्कि वे घोर स्त्री-विरोधी भी हैं। 

इस क़ानून में यह प्रावधान है कि उत्तराखण्ड में यदि कोई स्त्री व पुरुष एक महीने से ज़्यादा समय से लिव-इन सम्बन्ध में रह रहे हैं तो उन्हें इस सम्बन्ध को प्रदेश के रजिस्ट्रार के यहाँ रजिस्टर कराना होगा अन्यथा उन्हें तीन महीने तक की जेल हो सकती है और रु. 10,000 तक का जुर्माना भरना पड़ सकता है। रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करने के बाद रजिस्ट्रार जाँच-पड़ताल करेगा और प्रमाणपत्र देने से पहले अन्य गवाह को बुला सकता है। यही नहीं, ऐसे किसी लिव-इन सम्बन्ध की समाप्ति पर भी राज्यसत्ता को सूचित करना होगा। इस प्रकार यह क़ानून लिव-इन सम्बन्धों को आपराधिक नज़रिये से देखता है। यही नहीं 21 वर्ष से कम आयु के दो व्यक्ति अगर लिव-इन सम्बन्ध में रहते हैं तो उनके परिजनों को भी सूचित करना होगा। यानी दो वयस्कों को साथ रहने के लिए राज्ससत्ता की मंज़ूरी लेनी होगी और अगर वे 21 साल से कम आयु के हैं तो उन्हें अपने परिजनों की भी मंज़ूरी लेनी होगी। इस प्रकार यह क़ानून लोगों के निजता के अधिकार का खुला उल्लंघन करता है और उनके निजी जीवन में राज्यसत्ता, परिजनों और यहाँ तक कि पड़ोसियों को भी दखलन्दाज़ी करने और उन्हें परेशान करने की खुली छूट देता है क्योंकि यदि कोई स्त्री व पुरुष एक महीने से ज़्यादा समय एक छत के नीचे रहते हैं तो कोई भी पड़़ोसी पुलिस को इसकी सूचना दे सकता है और उनपर आपराधिक कार्रवाई हो सकती है। इन प्रावधानों के मद्देनज़र इस क़ानून के घोर मर्दवादी चरित्र पर कोई शक नहीं रह जाता है।

इन प्रावधानों का सबसे ज़्यादा असर धर्म, जाति, भाषा व क्षेत्र के बन्धनों को तोड़कर एक साथ रहने वाले प्रेमी युगलों पर पड़ेगा क्योंकि ये वे सम्बन्ध हैं जो पितृसत्तात्मक समाज की आँखों में किरकिरी के समान होते हैं। इस क़ानून के फलस्वरूप ख़ासतौर पर महिलाओं के लिए स्वतन्त्र रूप से अपने जीवन के फ़ैसले लेना और भी कठिन हो जायेगा क्योंकि यह क़ानून पितृसत्तात्मक राज्यसत्ता व समाज को उनकी यौनिकता और उनके निजी जीवन पर नियन्त्रण करने का औजार प्रदान करता है।

इस क़ानून के समर्थकों की ओर से इसके समर्थन में तर्क यह दिया जा रहा है कि लिव-इन सम्बन्धों को औपचारिक जामा पहनाने से ऐसे सम्बन्धों के तहत होने वाले स्त्री उत्पीड़न पर रोक लगेगी क्योंकि इन सम्बन्धों के तहत होने वाली हिंसा पर नकेल कसेगी और ऐसे सम्बन्ध से बाहर निकलने के बाद स्त्री को गुज़ारा भत्ता पाना आसान होगा। लेकिन सच तो यह है कि लिव-इन सम्बन्धों के तहत होने वाली हिंसा और गुज़ारा भत्ता का अधिकार पहले से ही घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 की परिधि में आते हैं और उसके लिए ऐसे सम्बन्धों को पंजीकृत करवाना आवश्यक नहीं है। ऐसे में यह स्पष्ट है कि लिव-इन सम्बन्धों को पंजीकृत कराकर स्त्रियों को इन्साफ़ दिलाने का तर्क बकवास है।      

इसमें कोई शक नहीं है कि भाजपा सरकार ने यह प्रतिगामी क़ानून लोकसभा चुनावों के पहले अपने रूढ़िवादी हिन्दू वोट बैंक को सुदृढ़ करने के मक़सद से पारित करवाया है। यह फ़ासीवादी क़ानून अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने व स्त्रियों की यौनिकता पर काबू करने व नागरिकों के निजी जीवन में दखलन्दाज़ी करने वाली मजबूत राज्यसत्ता स्थापित करने की हिन्दुत्ववादी परियोजना का अभिन्न हिस्सा है। मज़दूर वर्ग, छात्रों, युवाओं, स्त्रियों व आम नागरिकों को इस फ़ासीवादी औज़ार का हर हाल में विरोध करना चाहिए।  

मज़दूर बिगुल, मार्च 2024


 

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