पूँजीवादी खेती के संकट पर सही कम्युनिस्ट दृष्टिकोण का सवाल
सम्पादकीय लापरवाही के लिए हमारी आत्मालोचना और गन्ने की खेती के संकट पर हमारा दृष्टिकोण

बिगुल सम्पादक-मण्डल

हम बेलागलपेट यह स्वीकार करते हैं कि साथी नीरज द्वारा उठायी गयी आपत्ति पूरी तरह सही है और ‘चीनी मिल-मालिकों की लूट से तबाह गन्ना किसान’ (एस. प्रताप) लेख का प्रकाशन सरासर सम्पादकीय असावधानी है, जिसके लिए हम अपनी आत्मालोचना करते हैं। हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि भारतीय कृषि के संकट पर एस. प्रताप के लेख की वर्ग अवस्थिति ‘बिगुल’ की वर्ग अवस्थिति नहीं है। ‘बिगुल’ में पहले इस मुद्दे पर प्रकाशित लेखों-टिप्पणियों से भी यह स्पष्ट है। एस. प्रताप ‘बिगुल’ के पुराने लेखक हैं, इसलिए अख़बार के ऐन प्रेस में जाते समय प्राप्त उनके लेख को जल्दबाज़ी में छपने को भेज दिया गया। लेकिन यह एक गम्भीर लापरवाही है, जिसकी ओर हमारे कुछ अन्य प्रबुद्ध सहयोगियों ने भी इंगित किया है।

हम साथी नीरज की आलोचना का स्वागत करते हैं। उक्त प्रश्न पर हमारा स्टैण्ड साथी सुखदेव और साथी नीरज के स्टैण्ड से ही समानता रखता है। फि़र भी हम ज़रूरी समझते हैं कि इस प्रश्न पर अपने दृष्टिकोण को संक्षेप में यहाँ प्रस्तुत करें। हमने अपनी बात, राजनीतिक अर्थशास्त्र की ठेठ शब्दावली और हवालों से भरसक बचते हुए, सीधी-सरल भाषा में कहने की कोशिश की है ताकि ‘बिगुल’ के आम पाठकों को भी मामले की तह तक जाने में दिक्क़त न हो। इसलिए लेख थोड़ा लम्बा हो गया है और पाठकों से थोड़े धीरज की माँग करता है।

लाभकारी मूल्य और लागत मूल्य के सवाल, पूँजीवादी व्यवस्था में छोटी किसानी की स्थिति, भारत में मँझोले और छोटे किसानों की नियति, भूमि-प्रश्न (खेती-बाड़ी से जुड़े सवाल) पर सही कम्युनिस्ट दृष्टिकोण और सही नारे तथा इनसे सम्बन्धित कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आन्दोलन के भटकाव पर हम ‘बिगुल’ में लगातार सामग्री देने की ज़रूरत शिद्दत के साथ महसूस करते हैं। नीरज और सुखदेव जैसे साथी इसमें विशेष भूमिका निभा सकते हैं। इस बारे में मार्क्सवादी राजनीतिक अर्थशास्त्र क्या कहता है, यह सीधी-सादी भाषा में ‘बिगुल’ के पाठकों को बताने की सख़्त ज़रूरत है। भविष्य में हमारी कोशिश रहेगी कि ऐसी सामग्री ‘बिगुल’ में लगातार प्रकाशित हो। साथी एस. प्रताप के लेख, उस पर साथी नीरज की टिप्पणी और इस सम्पादकीय टिप्पणी पर भी हम बहस के लिए लेख-टिप्पणियाँ आमन्त्रित करते हैं।

लाभकारी मूल्य की माँग और छोटे-मँझोले किसान

1.लाभकारी मूल्य का सवाल अपने वर्ग-सार की दृष्टि से पूरी तरह से धनी किसानों-कुलकों-पूँजीवादी किसानों की माँग है, जो मुनाफ़े के लिए पैदा करते हैं। यह देहाती इलाक़े का पूँजीपति वर्ग है जो शोषण और शासन में पूरे देश के स्तर पर औद्योगिक पूँजीपति वर्ग का छोटा साझीदार है। लाभकारी मूल्य का आन्दोलन मूलतः छोटे और बड़े लुटेरे शासक वर्गों के बीच की लड़ाई है, इसके ज़रिये पूँजीवादी भूस्वामी-फ़ार्मर-धनी किसान देश स्तर पर संचित अधिशेष (सरप्लस) में अपना हिस्सा बढ़ाने की माँग करते हैं। चूँकि उद्योग में मुनाफ़े की दर लगातार बढ़ाते जाने की सम्भावना खेती की अपेक्षा हमेशा ही बहुत अधिक होती है और चूँकि लूट के बड़े हिस्सेदार वित्तीय एवं औद्योगिक पूँजीपति वर्ग और साम्राज्यवादी भी हमेशा ही पूँजीवादी संकट का ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा लूट के छोटे साझीदार-धनी किसानों पर थोपने की कोशिश करते रहते हैं, इसलिए इनके बीच खींचतान चलती ही रहती है। धनी किसान लाभकारी मूल्य की, सब्सिडी की, ब्याज की रियायती दर की करों में छूट की और रियायती दर पर बिजली आदि की माँग करते रहते हैं। सभी पूँजीवादी देशों में वर्ग-ध्रुवीकरण को रोकने और संकट को विस्फ़ोटक होने की स्थिति टालने के लिए पूरी खेती के नाम पर ऐसी रियायतें दी भी जाती हैं, लेकिन पूँजीवादी उत्पादन प्रणाली की स्वतन्त्र अन्दरूनी गति से, संकट बढ़ने पर ये रियायतें नाकाफ़ी हो जाती हैं और मन्दी की मार झेलता औद्योगिक पूँजीपति वर्ग इन्हें ख़त्म करने के लिए भी दबाव बनाता है। संक्षेप में, लाभकारी मूल्य की माँग हो या उत्पादन-लागत घटाने की अथवा आम कृषि सब्सिडी की माँग – ये सभी गाँव के ग़रीबों की शोषक और पूरे देश के मेहनतकशों के शोषण की साझीदार, धनी किसान आबादी की माँगें हैं। किसी भी सूरत में, एक कम्युनिस्ट छोटे-मँझोले मालिक किसानों को लाभकारी मूल्य के आन्दोलन के साथ खड़ा होने का सुझाव नहीं दे सकता।

2. पूँजीवादी समाज में छोटे और मँझोले मालिक किसान प्रायः इस भ्रम के शिकार रहते हैं कि यदि बाज़ार में उनके द्वारा उत्पादित चीज़ों की बेहतर क़ीमत मिल जाये तो उनकी हालत कुछ बेहतर हो सकती है। कम्युनिस्ट प्रचार हर हाल में उनके इस भ्रम के विरुद्ध संघर्ष करता है। वह उन्हें लगातार यह बताने की कोशिश करता है कि बाज़ार में अधिक मुनाफ़ा कमाने वाला हर हाल में कम मुनाफ़ा  कमाने वाले को पीछे छोड़ता ही जायेगा, हर हाल में बड़ी पूँजी छोटी पूँजी को खा जायेगी। एक नौबत ऐसी आनी ही है कि छोटे किसानों और अधिसंख्य मँझोले किसानों के पास बीज, खाद, पानी, कीटनाशक आदि के लिए रक़म के लाले पड़ जायें। उन्हें बैंकों या महाजनों से क़र्ज़ लेने, अपनी ज़मीन धनी किसान को रेहन या पट्टे पर देने और दूसरे के खेतों में या उद्योगों में जाकर मज़दूरी करने के बावजूद कंगाल होकर मज़दूरों की जमात में शामिल होना ही है। पूँजीवाद के अन्तर्गत यह उनकी अनिवार्य नियति है।

3. छोटे किसान अपने खेतों में मज़दूर न लगाकर, स्वयं दिन-रात हड्डीतोड़ श्रम करते हैं और फि़र भी उन्हें अक्सर, ज़िन्दा रहने के लिए दूसरे के खेत में या अन्य कहीं मेहनत-मज़दूरी करनी पड़ती है। इन सबके बावजूद उनकी खेती लागत पूँजी के अभाव और कम रक़बे के कारण पिछड़ती चली जाती है और जल्दी ही ज़मीन का उनके हाथ से निकल जाना एकदम निश्चित लगने लगता है। इस नाते वे मुनाफ़ा कमाकर धनी बनने के भ्रम से जल्दी मुक्त हो जाते हैं। लेकिन चूँकि पूँजीवादीकरण की धीमी रफ़्तार हमारे देश में अब तक उन्हें धीमी गति से ही तबाह करती रही है और चूँकि हमारे यहाँ चुनावी नक़ली कम्युनिस्टों के साथ ही, मति के मारे क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट भी छोटे किसानों को उनकी वास्तविक स्थिति बताने के बजाय उनके बीच ज़मीन की भूख बढ़ाने वाला प्रचार एवं आन्दोलन कार्य ही करते रहे हैं, इसलिए आज स्थिति यह है कि छोटे किसानों का एक हिस्सा भी सर्वहारा वर्ग के साथ खड़ा होकर समाजवाद की लड़ाई लड़ने की बजाय लाभकारी मूल्य की लड़ाई में शामिलबाजा बन जा रहा है।

4. मँझोले किसानों का मामला थोड़ा अलग है। चूँकि यह वर्ग अपने खेत में थोड़े-बहुत मज़दूर लगाकर भी काम कराता है और उनके अतिरिक्त श्रम को हड़पकर मुनाफ़ा कमाता है इसलिए एक मालिक के रूप में तरक़्क़ी करके धनी हो जाने का भ्रम इसके भीतर अधिक होता है और अधिक दिनों तक बना रहता है। इन मँझोले किसानों का एक छोटा-सा ऊपरी हिस्सा तरक्क़ी करके धनी किसानों की जमात में शामिल होता रहता है, इसलिए इससे प्रेरित होकर नीचे का बहुत बड़ा हिस्सा लाटरी खेलने जैसी मानसिकता में खेती से मुनाफ़ा  कमाकर धनी हो जाने का सपना पाले हुए दाँव लगाता रहता है। इसकी स्थिति ‘साँप-छछूँदर’ वाली होती है। कम्युनिस्ट इनके भ्रम को तोड़कर इन्हें लगातार यह बताने की कोशिश करते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्था में धनी बनने का वहम पाले हुए वे लगातार परेशान रहेंगे, कि मुनाफ़ा  कमाने की होड़ में उन्हें बड़ी पूँजीवालों के हाथों तबाह होना ही है, कि यदि थोड़ा बहुत बेहतर दाम मिल भी जाये तो उन्नत खेती में धनी किसानों से मुक़ाबलतन पीछे छूटकर उन्हें कंगाल होना ही है, इसलिए उनके सामने बेहतरी का एकमात्र रास्ता यह है कि वे गाँव और शहर के मज़दूरों के साथ मिलकर समाजवाद के लिए लड़ें, मुनाफ़ा ख़ोरी की व्यवस्था के ख़िलाफ़ लड़ें, रोज़गार और जीने की बुनियादी सुविधाओं की गारण्टी हक़ के तौर पर हासिल करने के लिए लड़ें तथा खेती पर काम करने वाले लोगों के सामूहिक मालिकाने की व्यवस्था के लिए लड़ें। कम्युनिस्ट इन मँझोले मिल्की किसानों के बीच समाजवादी सहकारी, सामूहिक और राजकीय खेती के बारे में लगातार बताते हैं और उनकी ग़लतफ़हमियों को दूर करके भरोसा पैदा करने की कोशिश करते हैं। कुछ साथी कहते हैं कि यह नामुमकिन है, इससे मँझोले किसान और भड़क उठेंगे। इस पर हमारा कहना है कि पहले वे ऐसा प्रचार करके तो देखें! ऐसा प्रचार वास्तव में कभी किया ही नहीं गया, अतः पहले से ही डरना बेबुनियाद है। दूसरी बात यह कि ऐसा करते हुए हम इस सच्चाई को मानकर चलते हैं कि फ़ैसलाकुन घड़ी में भी मँझोले मालिकों का एक हिस्सा ही मज़दूर क्रान्ति के साथ आयेगा और वह भी ढुलमुल रहेगा। एक दूसरा हिस्सा फि़र भी शासक जमातों का ही पक्ष लेगा। लेकिन साथ ही, तीसरी बात यह भी है कि आज पूँजीवादीकरण की तेज़़ रफ़्तार दो छोरों के बीच इतना तेज़-तीखा बँटवारा कर रही है कि मँझोले किसानों की आबादी आने वाले दिनों में और अधिक सिकुड़ जायेगी और गाँवों-शहरों की सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा आबादी ही मुक़ाबलतन अधिक होगी (यह आज ही पचास फ़ीसदी के आसपास पहुँच रही है)। वर्ग-संघर्ष में मज़दूर वर्ग के हितों की चिन्ता के बग़ैर इस ढुलमुल दोस्त (मँझोले किसान) को ही लेकर ज़्यादातर कम्युनिस्ट परेशान और पस्त हैं तो भला क्या ताज्जुब की बात है! वे तो धनी किसानों तक के दुखों पर बुक्का फ़ाड़कर रो रहे हैं। ‘बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना’ तो सुना था पर दुश्मन के ग़म में दुबले होने की यह दास्तान तो एक अजूबा ही है!

5. सामाजिक-आर्थिक ढाँचे की गति एवं दिशा को वैज्ञानिक-ऐतिहासिक पड़ताल की दृष्टि से देखें तो पूँजीवाद के अन्तर्गत बड़ी पूँजी के हाथों छोटी पूँजी की तबाही, बड़े मालिकों के हाथों छोटे मालिकों की तबाही, उद्योगों की बनिस्पत खेती का पिछड़ते जाना, खेती में पूँजीवादी संकट उद्योगों से अधिक होना, वर्गों का तीव्र ध्रुवीकरण और मँझोले किसानों के बड़े हिस्से का तबाह होकर सर्वहारा-अर्द्धसर्वहारा क़तारों में शामिल होना अनिवार्य है। जो होना ही है, उसके बारे में भ्रम पैदा करना हमारा काम नहीं है। इसे टालकर पूँजीवाद की उमर लम्बी करना भी हमारा काम नहीं। और वस्तुपरक नज़रिये से यदि देखें तो यह इतिहास को आगे ले जाने वाली ही एक चीज़़ है। उद्योग हो या खेती, बड़े पैमाने का पूँजीवादी उत्पादन भारी मेहनतकश आबादी के संकेन्द्रित, एकजुट, लामबन्द और संगठित होने के अनुकूल हालात तैयार करता है, बीच की ढुलमुल आबादी को सिकोड़कर छोटा कर देता है और उसे भी फ़ैसलाकुन (इस पार या उस पार) बनाता है, और इस तरह समाजवादी क्रान्ति के लिए अनुकूल माहौल बनाता है। कोई कम्युनिस्ट भला क्यों चाहेगा कि गन्ना, तम्बाकू, आलू-प्याज़ या अनाज का लाभकारी मूल्य माँगने वाले या उत्पादन-लागत घटाकर खेती को लाभदायी बनाने की माँग करने वाले धनी किसानों के पहलू में या पिछवाड़े छोटे किसान थोड़ी देर के लिए भी खड़े हों और इस तरह उनकी ताक़त बढ़ाने, इस व्यवस्था की उम्र और अपने भरम की उम्र लम्बी करने का काम करें! तर्क यह भी दिया जा सकता है कि यह मालिक वर्गों के बीच का अन्तरविरोध बढ़ाने वाला रणकौशल (टैक्टिक) है। लेकिन यह ग़लत है। व्यवस्था का अन्तरविरोध या संकट बढ़ाने के बजाय यह बीच में खड़े एक मिल्की वर्ग (मँझोले किसान) को विरोधी पाले में धकेलने का और एक मेहनतकश जमात (ग़रीब किसान) की वर्ग-चेतना को बढ़ाने के बजाय भोथरा बनाकर सर्वहारा वर्ग की लड़ाई को कमज़ोर बनाने का काम करता है तथा जनता के ही एक हिस्से को उसके दूसरे हिस्से के ख़िलाफ़ (और दुश्मन के साथ) खड़ा कर देता है। लाभकारी मूल्य की माँग हो या लागत घटाने की माँग – इससे यदि छोटी किसानी को बचाये रखने का भ्रम पलता-बढ़ता है तो यह क्रान्ति-विरोधी है। नरोदवादी यही भ्रम पालते-पोसते थे जिसके ख़िलाफ़ लेनिन ने काफ़ी कुछ लिखा है। कहने का मतलब यह भी नहीं कि हम पूँजी के हाथों छोटे किसानों की तबाही का डागा-बाजा बजाकर स्वागत करते हैं क्योंकि यह क्रान्ति के लिए अनुकूल है। यह पूँजीवाद का काम है, पूँजीवाद के हाथों छोटे मालिकों की तबाही और वर्ग-ध्रुवीकरण होना ही है। यह हमारे चाहने न चाहने की, हमारी ख़ुशी या ग़म की बात ही नहीं है। हमारा काम है जनता को यह बताना कि पूँजीवाद में यही होगा, अतः वह किसी मुग़ालते में न रहे। जल्दी से जल्दी ख़ामख़याली से निजात पाना ही उसके हक़ में है। और रास्ता एक ही है, वह है समाजवाद का रास्ता। छोटे किसानों की तबाही के बारे में लिखते हुए उसके कारणों को बताना, पूँजीवाद को ‘एक्सपोज़’ करना और उसके ख़िलाफ़ नफ़रत की आग भड़काना हमारा असली काम होना चाहिए।

लाभकारी मूल्य की मृग मरीचिका: एक पोस्टमार्टम

6. अब ज़रा सीधी-सादी भाषा में लाभकारी मूल्य और लागत मूल्य वाले मसले की भी जाँच-पड़ताल कर ली जाये। पहले लाभकारी मूल्य को लें। मान लीजिये कि गन्ना-किसानों को चीनी मिल-मालिकों से गन्ने की बेहतर क़ीमत मिल ही जाती है। तो पहली नज़र में इतना तो एक आम आदमी भी समझ जाता है कि चीनी की बढ़ी क़ीमत के रूप में इसका बोझ बाज़ार से चीनी ख़रीदकर खाने वाली जनता पर पड़ता है। मिल-मालिकों, व्यापारियों और सरकार को बस एक बहाने भर की देर होती है और वे वास्तविक भरपाई से बहुत अधिक खसोट लेते हैं। पर बात इससे कहीं बहुत अधिक है। अपने उत्पाद की बेहतर क़ीमत मिलने से धनी किसान के पास जो रक़म आती है, उसका धेला भी उसके खेत में काम करने वाले मज़दूरों की मज़दूरी बढ़ाने पर वह मर्ज़ी से नहीं ख़र्च करता। इसका इस्तेमाल वह और अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए पूँजी के रूप में करेगा। इस पैसे से या तो वह कुछ और तबाहहाल छोटे किसानों की ज़मीन ख़रीदकर उन्हें सड़क पर धकेलेगा या फि़र उन्नत बीज आदि के साथ और अधिक उन्नत मशीनें इस्तेमाल करके पूँजी-सघन खेती करेगा तथा कम मज़दूरों से काम लेकर उनके और अधिक अतिरिक्त श्रम का दोहन करेगा तथा शेष मज़दूरों को बेकार कर देगा। इससे बाज़ार में श्रम-शक्ति की क़ीमत गिरेगी, मज़दूरों की मोल-तोल की क्षमता और घट जायेगी और कठिन से कठिन हालात में कम से कम मज़दूरी देकर उनसे काम लेना आसानतर हो जायेगा।

इसके अतिरिक्त बेहतर मूल्य से हासिल रक़म को आटा चक्की, राइस मिल, आरा मशीन, डेयरी, पोल्ट्री आदि में लगाकर या शेयर ख़रीदकर धनी किसान अपनी आर्थिक स्थिति को अधिक मज़बूत बना लेगा। उधर छोटे किसान के साथ बस इतना ही हो सकेगा कि वह रोज़मर्रा की छोटी-मोटी ज़रूरतों के लिए थोड़ी अधिक नक़दी पा जायेगा, महाजन या बैंक की क़र्ज़ की कुछेक अधिक बकाया किस्तें चुका देगा, वग़ैरह-वग़ैरह। अपनी छोटी खेती के चलते बेहतर क़ीमत भी उसे इतनी अधिक रक़म नहीं दे सकती कि वह उन्नत मशीनें ले ले या किसी भी तरह से खेती उन्नत कर ले या कुछ और ज़मीन ले ले। उसे अपनी भारी आबादी से धनी किसान को आन्दोलन में ताक़त देने के बाद, बस थोड़ी-सी राहत मिल पाती है और साथ ही उसकी ख़ामख़याली की उम्र थोड़ी और बढ़ जाती है। इस तरह वह मज़दूर वर्ग और देश की आम आबादी के ख़िलाफ़ मोहरे के रूप में बहुत सस्ते में इस्तेमाल हो जाता है। उधर मिल-मालिक गन्ने का जो अधिक मूल्य देता है तो अपना मुनाफ़ा  घटाकर नहीं देता। पूँजीवादी उत्पादन का तर्क इसकी इजाज़त नहीं देता। कोई भी पूँजीपति ऐसा नहीं करता। ऐसा करके वह दूसरे पूँजीपतियों से गलाकाटू प्रतियोगिता में टिका भी नहीं रह सकता। ऐसी सूरत में वह लाज़िमी तौर पर अपने मज़दूरों का शोषण बढ़ा देता है। यदि वह बड़ा पूँजीपति हुआ तो अपने अन्य उद्योगों से उगाही गयी पूँजी के सहारे (या वित्तीय संस्थानों के सहारे) उन्नत मशीनें लगाकर मज़दूरों के एक हिस्से की छँटनी करके कम मज़दूरों को और अधिक निचोड़ेगा। या फि़र चीनी मिल मज़दूर आन्दोलन की कमज़ोर स्थिति का फ़ायदा  उठाकर वह ज़्यादा से ज़्यादा मज़दूरों से दिहाड़ी पर, ठेके पर अथवा कैज़ुअल एवं टेम्परेरी के रूप में काम लेकर, पहले से मौजूद रही-सही सुविधाओं (दवा-इलाज, कैण्टीन, वर्दी आदि) में कटौती करके, वेतन बढ़ोत्तरी-बोनस आदि को रोककर और काम के घण्टे बढ़ाकर गन्ने की बढ़ी हुई क़ीमत देने से हुए ‘नुक़सान’ से कई गुना अधिक की भरपाई करने की कोशिश करेगा। इसके साथ ही वह सरकार से तरह-तरह की सब्सिडी और प्रत्यक्ष करों में रियायत के लिए दबाव बनायेगा। सब्सिडी की वह रक़म जनता चुकायेगी और पूँजीपतियों को दी गयी प्रत्यक्ष कर की हर रियायत व्यापक आबादी से लिये जाने वाले परोक्ष कर में बढ़ोत्तरी से पूरी की जायेगी। एक ओर चीनी पर से सब्सिडी हटाकर उसे पूरी तरह से खुले बाज़ार में बेचकर जनता की कमर दोहरी की जायेगी और दूसरी ओर कारख़ाना मालिक को तरह-तरह की रियायतें व सब्सिडी दे दी जायेगी। इसके अतिरिक्त चीनी मिल-मालिक लाभकारी मूल्य की माँग के आन्दोलन की आड़ लेकर कारख़ाना बन्द करके अपनी पूँजी खुले-छिपे निकालकर (मशीनें, ज़मीन आदि बेचकर) अन्य अधिक लाभकारी उद्योग में निवेश कर सकता है और ‘बेरोज़गारों की रिज़र्व आर्मी’ में कुछ और बढ़ोत्तरी करके बाज़ार में श्रम-शक्ति की क़ीमत और अधिक गिराने का काम कर सकता है (यह हो भी रहा है)। यह भी हो सकता है कि लाभकारी मूल्य के आन्दोलन से गोदामों में पहले से ही भरी चीनी के चलते बाज़ार में क़ीमतें गिरने से रोकने के लिए मिल-मालिकों को उत्पादन कुछ समय तक रोकने का एक बहाना भी मिल जाये (इस बार यह हुआ भी है)। लुब्बेलुआब यह कि किसी भी रूप में लाभकारी मूल्य की माँग धनी किसान और मिल-मालिकों के बीच का मुद्दा है और इस माँग के पूरा होने पर धनी किसान को तो लाभ होगा ही, मिल-मालिक भी घाटे में नहीं होगा और हर हाल में मार पड़नी है मज़दूरों पर और आम जनता पर, तथा छोटे किसानों को मिलनी है ओस चाटने जितनी राहत और उनके वहम को मिलनी है थोड़ी और उम्र! अतः साथी एस. प्रताप का यह सुझाव एकदम ग़लत है कि छोटे किसानों को “फ़सल का वाजिब मूल्य पाने के लिए भी मिलों पर लगातार दबाव बनाये रखने की रणनीति अख़्तियार करनी चाहिए।”

क्या लागत-मूल्य घटाने की माँग छोटे-मँझोले किसानों के हक़में है

7. अब लागत मूल्य घटाने के सवाल को लिया जाये। एस. प्रताप का यह सुझाव भी, कि “…किसान आन्दोलन की मुख्य माँग लागत मूल्य कम करने पर ही केन्द्रित होनी चाहिए”, हमें एक ग़लत समझ से उपजा हुआ लगता है। दरअसल, यह माँग भी अपने वर्ग-सार की दृष्टि से धनी किसानों की ही माँग है और यह भी छोटे किसानों को परोक्षतः मज़दूर वर्ग के ख़िलाफ़ दुश्मन के पक्ष में ले जाकर खड़ा कर देने वाली माँग है। ज़्यादातर लोगों को ऊपरी तौर पर यह लग सकता है कि चूँकि गन्ने का मूल्य बढ़ने पर चीनी भी महँगी हो जायेगी अतः व्यापक आबादी के हित के ख़िलाफ़ होने से गन्ने के लाभकारी मूल्य की माँग ग़लत है और चूँकि लागत मूल्य कम करने का मतलब होगा बिजली, उर्वरक, कीटनाशक, बीज, मशीनें आदि-आदि की क़ीमत कम करना और ये चीज़ें बड़े कारख़ानेदार पैदा करते हैं, अतः यह सही नारा है क्योंकि यह जनता के मुख्य दुश्मन के ख़िलाफ़ धनी किसानों की ताक़त को भी ला खड़ा कर देगा और यदि वे नहीं आयेंगे तो धनी किसानों से अलग छोटे-मँझोले किसानों (यानी मज़दूर के मित्र वर्गों) का एक स्वतन्त्र आन्दोलन खड़ा हो जायेगा। लेकिन यह सोच एकदम ग़लत है। यह बहुपरती नासमझी का द्योतक है। किसान खेती में जो पूँजी लगाता है, उसका एक हिस्सा ट्रैक्टर आदि कृषि उपकरणों की ख़रीद व रखरखाव, डीजल, बिजली, पानी, खाद, बीज, कीटनाशक आदि (अचल पूँजी) पर ख़र्च होता है और दूसरा हिस्सा श्रम-शक्ति (चल पूँजी) पर ख़र्च होता है। अचल पूँजी वाला हिस्सा (तत्काल या किश्तों में) उत्पादित माल में संक्रमित हो जाता है। जो श्रम-शक्ति पर ख़र्च होने वाली चल पूँजी होती है, उसी का मूल्य श्रम की प्रक्रिया में बढ़ता है और नतीजतन अतिरिक्त मूल्य का सृजन होता है। यानी यदि अचल पूँजी घटती है और उसी अनुपात में फ़सल की क़ीमत नहीं घटती तो यह सीधे-सीधे कृषि उत्पादों के उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी होगी। यानी लागत मूल्य घटाने का तर्क सिर्फ़ यहीं तक जा सकता है कि किसान श्रम-शक्ति पर होने वाले ख़र्च को घटाये, यानी अपने खेतों पर काम करने वाले उजरती मज़दूरों को और अधिक निचोड़े। (इस भ्रान्ति के पीछे दरअसल भोंड़े अर्थशास्त्रियों वाली यह सोच काम करती है माल का मूल्य इसके उत्पादन में लगी लागत से, यानी उत्पादन के साधनों के मूल्य और मज़दूरी से तय होता है, जबकि मार्क्सवादी अर्थशास्त्र यह सिद्ध कर चुका है कि मूर्त श्रम मालों के उपयोग मूल्य का और अमूर्त श्रम उनके विनिमय मूल्य का निर्माण करता है, यानी श्रम ही मूल्य का एकमात्र स्रोत है। थोड़ी देर के लिए यह मान लें कि उद्योगपति किसानों के किसी आन्दोलन की माँग मानकर ट्रैक्टर, खाद, कीटनाशक, डीज़ल, बिजली आदि की क़ीमत कम कर दें और किसी तरह से धोखाधड़ी करके यह घटोत्तरी कृषि-उत्पादों के मूल्य में संक्रमित न होने दी जाये। तो ऐसी सूरत में अर्थशास्त्र का सामान्य विद्यार्थी भी यह जानता है कि उत्पादों के सस्ते होने से पूँजीपति का मुनाफ़ा कम नहीं होता, बल्कि इसकी क़ीमत भी कारख़ाने में काम करने वाले मज़दूरों को ही चुकानी पड़ती है। पूँजीपति उन्नत तकनोलॉजी लाकर मज़दूरों की कम संख्या से उतने ही समय में ज़्यादा माल उत्पादित करता है और इस प्रक्रिया में उसके द्वारा कमाये जाने वाले सापेक्षिक अतिरिक्त मूल्य में बढ़ोत्तरी के साथ ही मज़दूरों की एक भारी आबादी सड़कों पर धकेल दी जाती है। पूँजीपति द्वारा बनायी जाने वाली चीज़ें क्यों बाज़ार में सस्ती हो जाती हैं और उसके द्वारा कमाया जाने वाला मुनाफ़ा  भी बढ़ जाता है, इस प्रक्रिया को नहीं समझने से ही किसी के दिमाग़ में कृषि के लागत मूल्य को घटाने वाला उपरोक्त तर्क आ सकता है! और सबसे बड़ी बात यह कि यदि ऐसा हो भी जाये और इससे धनी किसानों का मुनाफ़ा  बढ़ भी जाये, तो छोटे किसानों को इससे भला क्या हासिल होगा? उनकी अन्ततोगत्वा तबाही का निश्चित भविष्य थोड़ा और आगे खिसक जायेगा, उन्हें थोड़ी राहत मिल जायेगी और उनके भ्रम की उम्र थोड़ी और बढ़ जायेगी। तब उन्हें यह समझा पाना थोड़ा और दुश्वार हो जायेगा कि पूँजीवादी खेती पशुवत जीवन से अधिक उन्हें कुछ और नहीं दे सकती और उनके सामने एकमात्र रास्ता है – मज़दूरों के पक्ष में खड़ा होकर “समूची आज़ादी और समूची ज़मीन (यानी काम करने वालों के हाथों में सत्ता और सभी कारख़ानों की ही तरह सारी ज़मीन पर भी काम करने वालों का सामूहिक मालिकाना) के लिए संघर्ष करना। साथी एस. प्रताप ने छोटे किसानों को “धनी किसानों के दायरे से स्वतन्त्र अपनी नयी राह खोजने की दिशा में” आगे बढ़ने के प्रति जो विश्वास जताया है, वह नयी राह भी वस्तुतः एक पूँजीवादी राह ही है और इस राह की सोच छोटी किसानी अर्थव्यवस्था को बचाये रखने की मासूम मानवतावादी चिन्ता से जन्मी एक नरोदवादी क़िस्म की सोच ही है।

8. इसके अतिरिक्त साथी एस. प्रताप का पूरा लेख एक वर्गोपरि नज़रिये की झलक देता है। धनी किसानों की मुनाफ़ा ख़ोरी को इंगित करते हुए भी लेख से उनके संकट के प्रति हमदर्दी की बू आती है। चीनी मिल-मालिकों की लूट से धनी किसान तबाह नहीं है बल्कि कुछ अधिशेष में अपना हिस्सा बढ़ाने के लिए लड़ रहा है (और यदि एक हद तक तबाह है भी तो सर्वहारा के हरावल की चिन्ता का यह विषय नहीं)। छोटे-मँझोले गन्ना किसान यदि तबाह हो रहे हैं तो मिल-मालिकों के अतिरिक्त धानी किसानों के हाथों भी तबाह हो रहे हैं। धनी किसानों के अलावा धनी हो जाने का वहम पाले हुए मँझोले किसान भी हमारी हमदर्दी के नहीं बल्कि आँख खोल देने वाली दो-टूक आलोचना के ही हक़दार हैं। बीच में खड़े और लगातार ढुलमुल इस वर्ग के एक हिस्से को भी खरी सच्चाई बताकर ही सर्वहारा वर्ग अपने पक्ष में ला सकता है। हमारी अविस्थिति हर प्रश्न पर, हर हाल में मज़दूर वर्ग और समाजवाद के पक्ष में खड़ा होकर सोचने की ही होनी चाहिए।


बिगुल, जनवरी 2003


 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन

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