“अच्छे दिन” के कानफाड़ू शोर के बीच 2% बढ़ गयी किसानों और मज़दूरों की आत्महत्या दर!
मुनाफ़े की व्यवस्था में बर्बाद होना ही छोटे किसानों की नियति है!

मुनीश मैन्दोला

हम इस लेख में इस बात को समझने की कोशिश करेंगे कि मुख्यत: कौन सा किसान आत्महत्या कर रहा है – धनी किसान या छोटे ग़रीब किसान और क्यूँ?! राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आँकड़ों के अनुसार साल 2015 में कृषि सेक्टर से जुड़ी 12602 आत्महत्याओं में 8007 किसान थे और 4595 कृषि मज़दूर। साल 2014 में आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या 5650 और कृषि मज़दूरों की 6710 थी यानी कुल मिलाकर 12360 आत्महत्याएँ। इन आँकड़ों के अनुसार किसानों की आत्महत्या के मामले में एक साल में जहाँ 42 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई वहीं कृषि मज़दूरों की आत्महत्या की दर में 31.5 फ़ीसदी की कमी आयी है व आत्महत्या करने वाले कुल किसान व कृषि मज़दूरों की संख्या 2014 के मुक़ाबलेे 2 फ़ीसदी बढ़ गयी है। किसानों व कृषि मज़दूरों को 2014 से अलग-अलग गिना जाने लगा है। यानी कि “रामराज्य” के खोखले वादे के साथ भाजपा सरकार के सत्ता में आने के लगभग ढाई साल बाद भी किसानों व कृषि मज़दूरों की आत्महत्याओं का सिलसिला लगातार जारी है और इसमें कुल मिलाकर 2% की बढ़ोतरी ही हुई है। इससे नतीजा निकलता है कि पूँजीवादी चुनावों से मात्र सत्ता परिवर्तन होता है ना कि व्यवस्था परिवर्तन। इन चुनावों से मात्र इतना सा तय होता है कि इस बार धनी शासक वर्ग या लुटेरे वर्गों की कौन सी पार्टी (=गिरोह) शासन करेगा और आम ग़रीब जनता को इस सत्ता परिवर्तन से कुछ नहीं मिलता!

अगर हम केवल किसानों की बात करें तो किसानों की आत्महत्या के मामले में 2014 के मुक़ाबलेे 2015 में लगभग 42 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है। 3,030 मामलों के साथ महाराष्ट्र देश (37.8%) में किसानों की आत्महत्या की संख्या सबसे ज़्यादा दर्ज की गयी। तेलंगाना दूसरा था, 1,358 मामलों के साथ, और 1197 के साथ कर्नाटक तीसरे स्थान पर रहा। महाराष्ट्र के 6 जि़ले, तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक कुल किसान आत्महत्याओं की 94.1% के लिए जि़म्मेदार है। 8007 किसानों में से 3097 (38.7 फ़ीसदी) की मौत की वजह क़र्ज़ बताया गया है। 1562 (19.2 फ़ीसदी) किसानों की मौत की वजह खेती से जुड़ी अन्य समस्याओं को बताया गया है। आँकड़ों के अनुसार आत्महत्या करने वाले 73 फ़ीसदी किसानों के पास दो एकड़ या उससे कम ज़मीन थी। 2015 में जिन राज्यों में किसान आत्महत्या न के बराबर रही उनमें बिहार, पश्चिम बंगाल, गोवा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखण्ड, मिज़ोरम, नगालैण्ड और उत्तराखण्ड शामिल हैं।

अगर हम किसान व कृषि मज़दूरों को इकट्ठा लें तो इन मौतों में क़रीब 87.5 फ़ीसदी केवल देश के सात राज्यों में हुई हैं। आत्महत्या के मामले में सबसे ज़्यादा ख़राब स्थिति महाराष्ट्र की रही। राज्य में साल 2015 में 4291 किसानों ने आत्महत्या कर ली। महाराष्ट्र के बाद किसानों की आत्महत्या के सर्वाधिक मामले कर्नाटक (1569), तेलंगाना (1400), मध्य प्रदेश (1290), छत्तीसगढ़ (954), आन्ध्र प्रदेश (916) और तमिलनाडु (606) में सामने आये। महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा खेतिहर मज़दूरों की आत्महत्या के 1261 मामले सामने आये। जबकि मध्य प्रदेश में 709 और तमिलनाडु में 604 मामले सामने आये। रिपोर्ट में उन सभी को किसान माना गया है जिनके पास अपना खेत हो या लीज़ पर खेत लेकर खेती करते हैं। रिपोर्ट में उन लोगों को कृषि मज़दूर माना गया है जिनकी जीविका का आधार दूसरे खेतों पर मज़दूर के रूप में काम करना है।

इस आँकड़ों से यह साबित होता है कि केवल सूखे के कारण ये आत्महत्याएँ नहीं हो रही हैं जैसा कि नाना पाटेकर कह रहे हैं जो आजकल ज़ोर-शोर से किसानों की मदद के लिए अभियान चला रहे हैं और कह रहे हैं कि इस समस्या के लिए सरकार को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि बरसात ही बेहद कम हुई है और यही भ्रम पूँजीवादी प्रचार चैनल भी फैला रहे हैं। अगर यही सच है तो सूखा तो पिछले 2 साल से पड़ा है पर जब उसके पिछले सालों में बारिश हो भी रही थी तब भी आत्महत्याओं का ये सिलसिला नहीं रुका और सूखा तो ग़रीब किसान और धनी किसान के लिये बराबर पड़ेगा तब फिर केवल वे ग़रीब किसान ही आत्महत्या क्यों कर रहे हैं जिनके पास 2 एकड़ से कम खेत हैं जैसा कि ऊपर दिये गये आँकड़े बता रहे हैं?! और पंजाब, पश्चिमी उत्तर प्रदेश आदि में तो पानी की कोई कमी नहीं है तब फिर वहाँ से भी समय-समय पर किसानों के द्वारा आत्महत्या की ख़बरें क्यों आती रहती हैं?! यानी कि मात्र सूखा इन आत्महत्याओं के लिए ज़ि‍म्मेदार नहीं है। दूसरी बात यह कि इन आत्महत्याओं का असली कारण है मुनाफ़े के लिए की जाने वाली पूँजीवादी खेती जिसमें बाज़ार के लिए उत्पादन होता है ताकि अधिकतम सम्भव मुनाफ़ा कमाया जा सके। यही कारण है कि सबसे ज़्यादा आत्महत्याएँ देश के उन राज्यों यानी कि महाराष्ट्र, तेलंगाना, आन्ध्र प्रदेश आदि में हो रही हैं जहाँ कृषि में पूँजीवादी कि़स्म की आधुनिक कॉर्पोरेट फ़ार्मिंग हो रही है जिसके तहत कपास, गन्ना जैसी नक़दी फ़सल उगाने के लिए अमीर धनी कुलक किसान व बड़ी कम्पनियाँ ट्रैक्टर, नये उपकरण, बिजली, महँगी खाद, उर्वरक आदि की मदद से आधुनिक पूँजीवादी खेती करते हैं। मुनाफ़े के लिए पैदावार में हर कोई ज़्यादा से ज़्यादा पैदा करना चाहता है और मण्डी का ज़्यादा से ज़्यादा हिस्सा हड़पना चाहता है। अधिक मुनाफ़े के लिए धनी किसान मालिक व बड़ी कम्पनियाँ कृषि की उन्नत तकनीकें, बीज, खाद आदि पर निवेश लगातार बढ़ाते रहते हैं व अधिक बड़े स्तर पर निवेश करते हैं और इसके लिए वह क़र्ज़ा भी लेते हैं। उनके लिए क़र्ज़ा लेना कोई समस्या नहीं होती बल्कि वह आसानी से प्राप्त होने वाली राशि होती है जिसको ब्याज़ समेत चुकाकर भी वह मुनाफ़ा कमा लेते हैं। इसलिए मण्डी में आने वाले उत्पाद का बड़ा हिस्सा धनी किसानों की ओर से आता है, और जब खेती मुख्यतया मण्डी में मुनाफ़ा कमाने के लिए होने लगती है तो छोटे मालिक किसान इस होड़ में अपने आप घसीट लिये जाते हैं और धनी किसान उनको बाज़ार से खदेड़कर बाहर फेंक देते हैं। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, यही पूँजीवादी बाज़ार का अटल नियम है। ऐसे में ग़रीब और छोटे किसानों को भी मण्डी में टिके रहने के लिए कृषि पैदावार और तकनीक में पैसे लगाने की ज़रूरत होती है और इसके लिए उनको क़र्ज़ा लेना पड़ता है पर बेहद छोटे-छोटे खेतों में छोटे पैमाने पर पैदावार के कारण उनकी लागत ज़्यादा बैठती है, आमदनी भी कम होती है और उनका क़र्ज़ा चुकाना मुश्किल हो जाता है। फ़सल ख़राब होने या सूखा पड़ने से तो मात्र इतना होता है कि उनकी हालत थोड़ी और ज़्यादा ख़राब हो जाती है क्योंकि वो पहले से ही ख़राब थी! इस तरह ग़रीब और छोटे किसानों के क़र्ज़े और आत्महत्याओं की जड़ें पूरी पूँजीवादी व्यवस्था में, या कह लें कि मुनाफ़े के लिए की जाने वाली खेती में हैं। जब तक खेती मुनाफ़े के लिए होगी और जब तक खेती की ज़मीन पर धनी किसान का निजी मालिकाना रहेगा तब तक छोटे किसान मुनाफ़ा कमाने की गलाकाटू होड़ में पिछड़ते जायेंगे और बर्बाद होकर या तो मज़दूर बनेंगे या आत्महत्या करेंगे। यही आज पूरे देश में हो रहा है महाराष्ट्र, कर्नाटक से लेकर पंजाब, यूपी तक। ऊपर दिये गये आँकड़े साफ़ बता रहे हैं कि जिन 73 फ़ीसदी किसानों के पास दो एकड़ या उससे कम ज़मीन थी वही मुख्यत: आत्महत्या कर रहे हैं यानी कि मुख्यत: छोटा किसान ही मर रहा है ना कि धनी किसान! जो छोटे और निम्न मध्यम मालिक किसान हैं, वे सदियों से ज़मीन के निजी मालिकाने की भूख से चिपके रहने से पैदा हुई कूपमण्डूकता के कारण अनुभवसंगत ढंग से भी पूँजी की गति को नहीं समझ पाते और अपनी छोटी किसानी को जैसे-तैसे बचाकर खु़शहाल होने का दिवास्वप्न पाले रहते हैं। यही विभ्रम इनमें से कुछ को आत्महत्या के मुक़ाम तक पहुँचा देता है। गाँवों में पूँजीवाद के पैठने और खेती के पूँजीवादी रूपान्तरण की अनिवार्य परिणति के तौर पर छोटे मालिक किसान को उजड़कर मज़दूर ही बनना है। यही उसका पूँजीवाद में असली भविष्य है। यह पूँजीवाद की सार्वकालिक और सार्वभौमिक परिघटना है, विभिन्न कारणों से कहीं इसकी गति मन्द और कहीं तीव्र हो सकती है पर कोई भी कुछ भी करके छोटे किसान को पूँजीवाद में बर्बाद होने से नहीं बचा सकता। अमेरिका से लेकर यूरोप आदि तक के पूँजीवादी देशों का इतिहास इसी बात का साक्षी रहा है। आज इन देशों में खेती पूरी तरह आधुनिक तरीक़ों से होती है और खेती में जनसंख्या का नगण्य हिस्सा ही लगा हुआ है क्योंकि तमाम छोटे मालिक किसान ख़त्म होकर अन्य धन्धों-पेशों की ओर चले गये। पूँजीवादी बाज़ार में वही मालिक किसान टिकेगा जो भारी पूँजी निवेश वाली खेती कर सकता है। शेष छोटी किसानी को उजड़ना ही है। इन्हीं उजड़े किसानों से शहरों और गाँवों के उजरती मज़दूरों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी होती है।

इसी बात को हम दूसरे तरीक़े से भी समझ सकते हैं। ऊपर दिये गये चित्र में एनसीआरबी के अनुसार 2014 में भूस्वामित्व के अनुसार किसानों को चार श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है। पहला है, सीमान्त कृषक (1 हेक्टेयर से कम ज़मीन के मालिक), लघु कृषक (1 हेक्टेयर से ज़्यादा पर 2 हेक्टेयर से नीचे के मालिक), मध्यम किसान (2 हेक्टेयर से 10 हेक्टेयर के नीचे के मालिक) और बड़े किसान (10 हेक्टेयर से अधिक ज़मीन के मालिक)। इस चित्र को देखकर यह स्पष्ट हो जाता है कि कुल आत्महत्या करने वाले किसानों में 28% सीमान्त कृषक व 45% लघु कृषक थे जो कुल आत्महत्याओं का 73% बनता है। साथ ही हम देख सकते हैं कि मात्र 2% धनी किसानों ने आत्महत्या की। यानी कि तथ्य बता रहे हैं कि पूँजीवादी खेती करके मुख्यत: सीमान्त, छोटे किसान व निम्न मध्यम किसान बर्बाद हो रहे हैं जैसा कि हमारा विश्लेषण साबित करता है क्योंकि धनी किसानों व बड़ी कॉर्पोरेट फ़ार्मिंग की पूँजी की ताक़त के आगे वे बाज़ार में टिक ही नहीं पा रहे हैं। कृषि के संकट पर ग़ैरवर्गीय ढंग से सोचने वाले लोग प्राय: इस तथ्य को इंगित नहीं करते कि गाँवों में पूँजी संचय में भारी वृद्धि हुई है जो धनी किसान के पास है और खेती के तमाम संकटों के बावजूद महाराष्ट्र, पंजाब आदि में धनी कुलकों किसानों के पास आज भारी तादाद में ऑडी, मर्सिडीज़, बीएमडब्ल्यू जैसी गाड़ि‍याँ हैं। जब इनके घरों में शादियाँ होती हैं तो पैसा पानी की तरह बहाया जाता है। पूरे देश में गाँव के धनी तबक़े के उपभोग का स्तर लगातार काफ़ी ऊपर आया है। इस धनी किसान और पूँजीवादी कॉर्पोरेट के “अच्छे दिन” आ चुके हैं पर मुनाफ़े की गलाकाटू होड़ में धनी किसानों द्वारा बाज़ार से लतियाये जाने वाले छोटे किसान बर्बाद होकर मज़दूर बन रहे हैं या आत्महत्या कर रहे हैं। पूरे देश में मुलायम, लालू, देवीलाल, चौटाला, चौधरी चरण सिंह, महेंद्र सिंह टिकैत आदि क्षेत्रीय दल गाँव के इन्हीं धनी कुलक किसान फ़ार्मरों, शोषकों के नेता हैं जो अपने खेत पर मुनाफ़े को बढ़ाने के लिए ग़रीब खेत मज़दूरों के श्रम का जमकर नंगा शोषण करते हैं।

आँकड़ों से साफ़ है कि 2014 और 2015 में 6710 और 4595 कृषि मज़दूरों ने भी आत्महत्या की और उनका प्रतिशत भी काफ़ी है पर इसके बावजूद पी साईनाथ जैसे विद्वान कई सालों से किसान विस्थापन, कृषि ऋण, किसानों की आत्महत्या और खेती की तबाही आदि मुद्दों को उठाते रहे हैं, पर कृषि मज़दूरों के बारे में उन्होंने इतना विस्तृत लेखन कभी नहीं किया। दूरदर्शन आदि के चौपाल टाइप के कृषि‍ कार्यक्रम में भी किसान भाइयों को ही “राम राम” किया जाता है और मज़दूर भाइयों को एकदम भुला दिया जाता है। मुनाफ़े के लिए पैदा करने वाले “मालिक” किसान से इतनी हमदर्दी, पर जब वही “मालिक” किसान उजड़कर मज़दूर बनता है, और जिसकी संख्या आज देश में सबसे ज़्यादा है, तो तब सब उसे भूल जाते हैं! ऐसा वर्गदृष्टि के दोष के कारण होता है जिसके चलते पी साईनाथ टाइप मध्यवर्गीय प्राेफे़सरों, शोध अध्ययन करने वाले अध्येताओं, चिन्तकों को बड़े पैमाने पर आत्महत्या करते कृषि‍ मज़दूर नहीं दिखाई देते, पर मालिक किसान दिख जाते हैं। वर्ग समाज में ‘मानवीय संवेदनाओं’ का भी एक वर्गीय चरित्र होता है। धनी मालिकों के मरने पर हम विचलित हो जाते हैं पर मेहनतकश मज़दूरों के मरने पर हमें कुछ महसूस नहीं होता! एक वैज्ञानिक मज़दूरवर्गीय दृष्टि के अभाव में ऐसे चिन्तक किसानों की आत्महत्याओं के असली कारण की सही पड़ताल भी नहीं कर पाते, और इन आत्महत्याओं को रोकने के लिए यूटोपियन कि़स्म के हवा हवाई नुस्खे सुझाते रहते हैं। कोई कहता है कि सही तरीक़े से मुआवज़ा दे दो, सब ठीक हो जायेगा। पर यदि बेहतर दर पर मुआवज़ा दे भी दें तो भी पूँजीवादी व्यवस्था में यह वितरण अन्यायपूर्ण होता है और हर हाल में इसका लाभ उत्पादन के साधनों (ज़मीन, कृषि उपकरण आदि) के उन बड़े मालिकों को ही ज़्यादा मिलता है जो ग़रीब मज़दूर की श्रमशक्ति को निचोड़कर बाज़ार के लिए पैदा करते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि कृषि क़र्ज़ों को माफ़ कर दो। पर अगर छोटे किसानों और निम्न मध्यम किसान का ़क़र्ज़ा माफ़ भी कर दिया जाये तो इससे उनको कुछ समय के लिए ज़रा सी राहत तो मिलेगी पर ये ऊँट के मुँह में जीरे के समान होगी क्योंकि ऊपर बताये गये कारणों के चलते वे फिर भी लम्बी दूरी में धनी कुलक किसान और बड़ी पूँजीवादी कम्पनियों से मुनाफ़ा कमाने की दौड़ में पिट जायेंगे। कुछ समय बाद बाज़ार के नियमों के आगे मजबूर होकर वे फिर से क़र्ज़दार हो जायेंगे इसलिए इनकी आत्महत्याओं को रोकने के लिए क़र्ज़ा माफ़ी कोई समाधान नहीं है। सबसे आम नुस्खा कृषि उत्पादों की क़ीमत (न्यूनतम ख़रीद मूल्य) बढ़ाने और लाभकारी मूल्य को बढ़ाने का पेश किया जाता है। कृषि लागत के लगातार बढ़ते जाने और कृषि उत्पादों का लाभकारी मूल्य न मिलने पर पी सांईनाथ जैसे लोग काफ़ी चिन्ता प्रकट करते हैं। लेकिन खेती के लागत मूल्य और लाभकारी मूल्य की ख़ूब बातें करने वाले ये लोग कभी भी श्रमशक्ति के मूल्य का सवाल नहीं उठाते। पूँजीवादी व्यवस्था में, बाज़ार में यदि कृषि उत्पादों का मूल्य बढ़ता है तो उसका बोझ महँगाई के रूप में आम बहुसंख्यक मेहनतकश जनता ही चुकाती है। जनता को बाज़ार से महँगा खाना व सामान ख़रीदना पड़ता है और इससे मालिक किसानों को जो लाभ मिलता है, उससे वे अपने खेतों में काम करने वाले मज़दूरों की मज़दूरी तो क़त्तई नहीं बढ़ाते। यानी लाभकारी मूल्य का मतलब है कि आम मेहनतकश जनता के हितों की क़ीमत पर बाज़ार के लिए पैदा करने वाले किसानों को अधिक मुनाफ़ा (अधिशेष) हासिल करने का अवसर देना, इसका मतलब है अल्पमत के संकीर्ण हित के लिए बहुमत जनता के हित को कुर्बान कर देना। अब लागत मूल्य के सवाल को लें। खेती के लिए ज़रूरी चीज़ों (उर्वरक, कीटनाशक, बीज, बिजली, उपकरण आदि) के मूल्य तभी कम किये जा सकते हैं जब इनमें लगने वाली श्रमशक्ति का मूल्य कम कर दिया जाये यानी इनका उत्पादन करने वाले मज़दूरों की वास्तविक मज़दूरी घटा दी जाये, क्योंकि इनके उत्पादन में लगने वाले कच्चे माल का मूल्य तो सीधे उत्पाद के मूल्य में संक्रमित हो जाता है। यानी खेती की लागत को कम केवल पहले से ही ग़रीब मज़दूरों की मज़दूरी मारकर, उनको और कंगाल करके ही किया जा सकता है। इसलिए लाभकारी मूल्य बढ़ाने की माँग या लागत कम करने की माँग दरअसल शोषक धनी मालिक कुलक किसानों की माँग है जो ख़ुद के खेत पर श्रम नहीं करते और मज़दूर रखकर उनसे काम करवाते हैं और ऐसी माँगों से मुख्यत: इन धनी किसानों को ही लाभ होता है और जितना ज़्यादा इन धनी किसानों को लाभ मिलता है उतनी ही तेज़ी से ये छोटे किसान को बाज़ार से खदेड़कर बाहर फेंक देते हैं। इसलिए लाभकारी मूल्य बढ़ाने की या लागत कम करने की माँग सिसमोंदी और रूसी नरोदवादियों जैसी निम्न पेटी बुर्जुआ यूटोपियन माँगें हैं और यह यूटोपिया माकपा, भाकपा, लिबरेशन आदि के संशोधनवादियों और नववामपन्थी ”मुक्त चिन्तकों” को भी ख़ूब भाता है। यही नहीं जो कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी आज भी नवजनवादी क्रान्ति के पुराने स्पेस-टाइम कैप्सूल में बन्द होकर भूमि क्रान्ति की बातें करते हैं, वे भी खेती के संकट के पूँजीवादी चरित्र को नहीं समझ पाने के कारण इसी नरोदवादी पेटी बुर्जुआ यूटोपिया के शिकार बन जाते हैं। दूसरे नुस्खों में आत्महत्या रोकने के लिए बदली फ़सलें या सब्जि़याँ आदि बोने की सलाहें दी जाती हैं। पर यह भी कोई हल नहीं है। सब्जि़याँ आदि बोकर कोई एक किसान तो टिका रह सकता है पर अगर बहुत से लोग सब्जि़याँ बोने लगेंगे तो मण्डी में ज़रूरत से ज़्यादा फ़सल आ जायेगी और क़ीमतें पहले से भी ज़्यादा गिरने से फिर किसानी का एक हिस्सा तबाह हो जायेगा। यह तो पंजाब में आलू, किन्नू, यूपी में गन्ने, टमाटर आदि की फ़सल के मामले में अक्सर ही देखने को मिलता है। एक और हल ज़मीन का बँटवारा भी पेश किया जाता है। लेकिन अगर सबको बराबर-बराबर ज़मीन मिल भी गयी तब भी बाज़ार क़ब्ज़ाकर ज़्यादा से ज़्यादा मुनाफ़ा कमाने की होड़ के चलते लम्बी दूरी में कृषि में वापस ध्रुवीकरण हो जायेगा और ज़मीन, पूँजी व उत्पादन के साधन दुबारा कुछ धनी किसानों, कुलकों, फ़ार्मरों के हाथों में केन्द्रित हो जायेंगे और दूसरी ओर ग़रीब छोटे किसान उत्पादन के साधनों से वंचित होकर मज़दूरों की क़तारों में शामिल होते जायेंगे। हम फिर वहीं पहुँच जायेंगे जहाँ से शुरू किया था। इस तरह इन सभी मध्यवर्गीय नीम हक़ीमों और नुस्खेबाज़ों के पास इस समस्या का कोई स्थायी हल नहीं है, और उनके नुस्खे ज़्यादा से ज़्यादा केवल कुछ देर के लिए ही राहत दे सकते हैं लेकिन लम्बी दूरी इस समस्या से मुक्ति नहीं दिला सकते।

एनसीआरबी की रपट में यह बात भी सामने आयी है कि जिन किसानों ने 2015 में क़र्ज़ न चुका पाने के कारण ख़ुदकुशी की उनमें से 80 फ़ीसदी किसानों ने बैंकों से क़र्ज़ लिया था, न की महाजनों से। डेटा के मुताबिक़ जिन 3,000 किसानों ने 2015 में आत्महत्या की थी उनमें से 2,474 ने बैंकों या किसी माइक्रो फ़ाइनेंस कम्पनी से क़र्ज़ लिया था व क़र्ज़ के कारण किसानों की आत्महत्या 2015 में लगभग तीन गुणा बढ़ी थी। 2014 में जहाँ 1,163 किसानों ने आत्महत्या की थी वहीं 2015 में 3,097 किसानों ने आत्महत्या की। इस तथ्य से स्पष्ट है कि भारत में अब कहीं भी मुख्यत: सामन्त या सामन्ती लगान या अत्याचारी ज़मीदार के कारण किसान परेशान नहीं है बल्कि गाँव में आज खेत मज़दूर और ग़रीब छोटे किसान दोनों मुख्यत: पूँजी की मार से परेशान हैं ओर धनी किसान की पूँजी छोटे किसानों को लगातार मुनाफ़े की चूहादौड़ में धोबी-पटका देकर बाज़ार से खदेड़ रही है। पर इस बात को भूमि क्रान्ति (नवजनवादी क्रान्ति) की बात करने वाले कई क्रान्तिकारी समूह समझ ही नहीं पा रहे हैं और अतीत की क्रान्तियों के हैंगओवर से अपने आपको 21वीं शताब्दी में भी मुक्त नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए जब तक मुनाफ़े और ज़मीन के निजी मालिकाने पर टिकी समूची पूँजीवादी खेती को त्यागकर समाजवादी खेती को नहीं अपनाया जाता तब तक छोटे किसानों की आत्महत्या को भी नहीं रोका जा सकता। ये समस्या मात्र कुछ सुधार करके या नाना पाटेकर, आमिर ख़ान आदि की तरह “समाजसेवा” करके दूर नहीं हो सकती।

 

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2017

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