ख़ूबसूरत चमड़ी का बदसूरत धन्धा

इनजिन्दर

लगातार तीखे होते जा रहे आर्थिक ध्रुवीकरण के कारण जहाँ मेहनतकश जनता की ज़िन्दगी के दर्द बढ़ते जा रहे हैं, वहाँ औरतों के हालात तो इससे कहीं भयंकर होते जा रहे हैं। क्योंकि जहाँ औरतों की बहुसंख्यक आबादी ग़रीबी का सन्ताप झेल रही है। इसके साथ-साथ उसे इस मर्द-प्रधान समाज में औरत होने का सन्ताप भी भोगना पड़ रहा है। यानी वे ग़रीबी और औरत होने के द्वन्द की चक्की में लगातार ऐसी पिसती हैं कि उनकी हालत को शब्दों में बयान करना भी मुश्किल है। क्योंकि मुनाफ़े पर टिकी इस नरभक्षी पूँजीवादी व्यवस्था ने जीती-जागती औरत को महज़ एक वस्तु में बदलकर रख दिया है, जिसे बाक़ी वस्तुओं की तरह ख़रीदा और बेचा जा सकता है और उसके साथ हर तरह का अमानवीय व्यवहार किया जा सकता है।

औरतों के साथ होते इस अमानवीय व्यवहार की अनेकों घटनाएँ हमारे सामने होती रहती हैं। अब ये तथ्य सामने आये हैं कि अमीरों की सुन्दरता बढ़ाने के लिए नेपाल के गाँवों में से ग़रीब परिवारों की लड़कियों को एजेण्ट ख़रीदकर भारत ले आते हैं, जहाँ उनको बेहोश करके उनके शरीर के कुछ हिस्सों की चमड़ी उतार ली जाती है। इसके बदले उन्हें महज़ दस से पन्द्रह हज़ार रुपये दिये जाते हैं और आगे यह चमड़ी बहुत ऊँची क़ीमतों पर बेची जाती है। चमड़ी उतारने के बाद इन लड़कियों को मुम्बई, कलकत्ता और दिल्ली जैसे महानगरों में देह-व्यापार के धन्धे में धकेल दिया जाता है। जहाँ सोलह-सोलह, सत्रह-सत्रह वर्ष की इन नन्हीं कलियों के सारे अरमान एक-एक करके टूट जाते हैं। जब उन्हें कागज़ के टुकड़े के बदले वहशी दरिन्दों के आगे फेंक दिया जाता है, जिनका कसूर सिर्फ़ इतना ही होता है कि उनके ग़रीब माँ-बाप ने उन्हें इस धरती पर जन्म दिया।

इन कोठों पर से भाग निकलने या आत्मरक्षा का कोई भी रास्ता इनके पास नहीं होता। क्योंकि अगर कोई लड़की भागने की कोशिश करती पकड़ी जाये तो उसको अपनी जान से हाथ धोने पड़ जाते हैं और उसको जानवरों की तरह मारकर गटर में फेंक दिया जाता है ताकि और कोई लड़की ऐसा करने की हिम्मत न कर सके। लेकिन फिर भी बहुत सारी औरतें इस नर्कभरी ज़िन्दगी से निजात हासिल करने के लिए भागने की कोशिश करती हैं ताकि वह इंसानों जैसी ज़िन्दगी जी सके, लेकिन वहाँ दलालों की सख्त पहरेदारी उन्हें ऐसा करने का कोई मौक़ा नहीं देती। एक लड़की का कहना था कि कई लड़कियाँ तो इस ज़िन्दगी से दुखी होकर आत्महत्या भी कर लेती हैं।

सुशीला थापा नाम की एक लड़की के मुताबिक़़ वह इस धन्धे की ज़िन्दगी से बहुत जल्दी दुखी हो गयी थी और वह बहुत चुस्ती से दलालों को चकमा देकर तीन वर्षों बाद भागने में सफल हो गयी थी। लेकिन जब वह अपने गाँव सिन्धूपाल चौंक गयी, जो कि काठमाण्डू से लगभग 75 किलोमीटर दूर है, तो उसके गाँव के कुछ लोगों ने अपनी झूठी इज़्ज़त के लिए इस लड़की को अपने गाँव में रखने से इन्कार कर दिया। कोई और रास्ता न होने के कारण उसने मौत जैसी ज़िन्दगी को फिर गले लगा लिया। वह किसी एजेण्ट के ज़रिये अपने पेट की आग बुझाने के लिए दुबारा देह-व्यापार के धन्धे में शामिल हो गयी। जहाँ रहना उसे एक पल भी अच्छा नहीं लगता, वहाँ वह सारी ज़िन्दगी बिताने के लिए मज़बूर हो गयी। उसका कहना है कि वह अपनी मौत का इन्तज़ार कर रही है। बस ख़ुद मरा नहीं जाता, लेकिन यहाँ की ज़िन्दगी और मौत में कोई अन्तर नहीं है।

चमड़ी की तस्करी में शामिल एजेण्ट का कहना है कि इन नेपाली लड़कियों की चमड़ी गोरे रंग की होने के कारण दुनिया-भर में बहुत ऊँची क़ीमतों पर बिकती है। जो अमीरों की, ख़ास करके अमीर औरतों की सुन्दरता बढ़ाने के लिए प्लास्टिक सर्जरी करने और छातियाँ बड़ी करने आदि के कामों में इस्तेमाल की जाती है।

एक और कोमल नाम की लड़की ने बताया कि अपनी चमड़ी बेचने के कारण बेशक कुछ पैसे इकट्ठा तो हमें ज़रूर मिल जाते हैं, लेकिन इसके बाद हमें बहुत नुक़सान होता है। क्योंकि फिर हमारे पास कोई अच्छा ग्राहक नहीं आता, जो ग्राहक आते हैं वे हमारे शरीर पर दाग़ देखकर या तो हमारे पास रुकना पसन्द नहीं करते या फिर बहुत थोड़े पैसे देकर हमें अपनी हवस का शिकार बनाते हैं। वे हमारे साथ पशुओं जैसा व्यवहार करते हैं, बल्कि हमसे उम्मीद करते हैं कि हम उनके साथ प्रेमिकाओं जैसा व्यवहार करें, कुत्ते!

देह व्यापार के धन्धे के साथ मानवीय चमड़ी की तस्करी का यह धन्धा आजकल ज़ोरो-शोरों पर चल रहा है और लगातार बढ़ता जा रहा है। वर्ष 2002 से लेकर अब तक इस धन्धे में 70 फ़ीसदी की वृद्धि हुई है और बहुत ज़्यादा लोग इस धन्धे में शामिल हो चुके हैं। ऐसे ही अमानवीय धन्धों को रोकने के लिए सरकारों के क़ानून का मुँह पूरी तरह बन्द है।

दरअसल अमीरों की सुन्दरता को बढ़ाने के लिए ग़रीब औरतों की ज़िन्दगी को बदसूरत करना इस पूँजीवादी व्यवस्था के लिए कोई हैरानीजनक बात नहीं, बल्कि आज पूरी पूँजीवादी व्यवस्था ही मुट्ठी-भर पूँजीपतियों की ज़िन्दगी को ख़ूबसूरत बनाने के लिए करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी को बदसूरत बना रहा है। इसलिए ज़रूरत है कि आज मेहनतकश लोगों और नौजवानों को लामबन्द करके समाजवादी व्यवस्था की स्थापना करने के लिए तैयार किया जाये जिसमें ऐसी अमानवीयताओं से छुटकारा पाया जा सके।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2017

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