मौजूदा दौर के किसान आन्दोलन और स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट
लागू करने का सवाल

अनु राठी

पिछले कुछ समय से देश के अलगअलग हिस्सों में किसान आन्दोलन उठते रहे हैं। हाल में राजस्थान के सीकर और कई अन्य ज़िलों में हुए किसान आन्दोलन की भी काफ़ी चर्चा है। इस आन्दोलन की माँगों  और उसके अचानक समाप्त होने की परिस्थितियांे परमज़दूर बिगुलके अगले अंक में हम रिपोर्ट देंगे। इन सभी किसान आन्दोलनों की एक प्रमुख माँग रही है स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करना।  इस सवाल पर हमें रोहतक, हरियााणा में रहने वालेमज़दर बिगुल‘  के नियमित पाठक अनु राठी का एक पत्र प्राप्त हुआ है जिसमें कुछ महत्वपूर्ण सवाल उठाये गये हैं।सम्पादक

प्रिय सम्पादक महोदय आज किसान आन्दोलनों की सरगर्मियाँ कई जगहों पर चल रही हैं। क़रीब 13 दिन की ज़द्दोजहद के बाद हाल ही में राजस्थान में चल रहा आन्दोलन थमा ही है। भाजपा द्वारा उत्तरप्रदेश में किसानों के क़र्ज़े माफ़ करना भी सुर्ख़ियों में रहा भले ही किसका कितना क़र्ज़ माफ़ हुआ तथा राजनीतिक अर्थशास्त्र के दृष्टिकोण से इसका व्यापक परिप्रेक्ष्य क्या है यह एक अलग सवाल है। तमिलनाडू, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली देहात तक में समय-ब-समय किसानों के विभिन्न मुद्दों को लेकर संगठन और पार्टियाँ सक्रि‍य रहती हैं। हमारे यहाँ पर जवान और किसान दो ऐसी समूहवाचक संज्ञाएँ हैं जिनके नाम पर जन-भावनाओं का काफ़ी दोहन किया जाता रहा है। उक्त दोनों ही मामलों में वर्गों में बँटे हुए समाज को ध्यान में रखते हुए नहीं बल्कि पूरी तरह से “वर्ग निरपेक्ष रहकर की जाने वाली चर्चा” हावी रहती है। निश्चय ही इन दोनों समूहों के अन्दर झाँककर देखा जाये या थोड़ी भी पड़ताल की जाये तो दोनों में ही बँटवारा साफ़-साफ़ दिखाई देगा। फ़िलहाल मैं किसान समूह पर ही अपनी कुछ बात साझा करना चाहूँगा। मैं ख़ुद पुश्तैनी तौर पर खेती-किसानी करने वाले जाट किसान परिवार में पैदा हुआ हूँ। बड़े-बूढ़े बताते हैं कि औपनिवेशिक गुलामी और हरित क्रान्ति से पहले तक हमारे इलाक़े के किसानों की काफ़ी बड़ी आबादी के आर्थिक हालात बेहद कमज़ोर थे, किन्तु आज यानी हरित क्रान्ति के बाद भी बहुत छोटा हिस्सा ही समृद्ध होकर उभरा है व बड़ा हिस्सा आज भी फाके करने को मजबूर है, लेकिन यह बात भी उल्लेखनीय है कि पहले और आज भी सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक स्थिति की तुलना दलित जातियों से की जाये तो निश्चित तौर पर किसानी में लगी जातियाँ इक्कीस ही पड़ती हैं। और वर्गीय तौर पर सिर्फ़ किसान जातियों की पड़ताल करने पर वर्ग ध्रुवीकरण को बड़ी ही आसानी से रेखांकित किया जा सकता है यानी किसान जातियों का छोटा हिस्सा धन-धान्य से सम्पन्न और बड़े हिस्से के आर्थिक हालात खस्ता। आज के पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पंजाब और हरियाणा का इलाक़ा ‘यूनियनिस्ट पार्टी’ (जिसके प्रमुख नेता सर फ़ाज़िल हुसैन, सर छोटूराम और सर सिकन्दर हैयात ख़ान थे, ज्ञात हो इन तीनों को ही सर की उपाधि से अंग्रेज़ों ने नवाज़ा था!) की राजनीति का क्षेत्र रहा है। यूनियनिस्ट पार्टी की नीतियाँ और कांग्रेस के साथ इसके अन्तर्विरोध अलग से चर्चा का विषय हैं, किन्तु उस दौर में हमारे इलाक़े में निश्चित तौर पर साहूकारों के चंगुल से व्यापक किसान आबादी को एक हद तक आज़ादी मिली, किन्तु उत्पादकता बेहद कम होने के कारण तथा पैसे के अभाव में किसानों को परजीवी वर्गों के चंगुल में दोबारा पहुँच ही जाना होता था। लगभग पूरे भारत में ही क्रान्तिकारी तरीक़े से भूमि सुधार लागू नहीं हो सके। भूमि से सम्बन्धित अंग्रेज़ों द्वारा लागू की गयी ज़मींदारी, रैयतवाड़ी और महालवाड़ी व्यवस्थाओं की अपनी अलग-अलग विशिष्टताएँ हैं जोकि अलग से चर्चा का विषय हैं। औपनिवेशिक समाज में जातीय बँटवारे से इतर यदि वर्गीय स्थिति को देखा जाये तो साहूकारों, सूदखोरों, जैलदारों, नम्बरदारों, आढ़तियों, व्यापारियों और पेशेवरों का अच्छा-ख़ासा हिस्सा ऐसा था जिसके वर्गीय हित आम किसान आबादी से अलग थे तथा इनमें आज की किसान जातियों के लोग भी शामिल थे। इसके बाद पार्टियों के तौर पर जनता पार्टी, नेशनल लोकदल, अकाली दल, व्यक्तियों के तौर पर चौधरी चरण सिंह, चौधरी देवीलाल और कृषि के सन्दर्भ में हरित क्रान्ति का दौरे-दौरा आया। अब तो किसान जातियों के अन्दर का वर्गीय ध्रुवीकरण और भी तेज़ हो गया। किसानों के बीच में एक छोटा-सा ऐसा सम्पन्न वर्ग उभरकर सामने आया जो ख़ुद लगकर खेती नहीं करता किन्तु जिसके पास विस्तृत कृषियोग्य भूमि है, कृषि करने के लिए ट्रैक्टर-कम्बाइन और अन्य मशीनें हैं तथा खाद-बीज और मज़दूरों की श्रम शक्ति ख़रीदने यानी खेत मज़दूरों को काम पर लगाने के लिए पर्याप्त पूँजी है। इस हिस्से के लिए खेती आज भी फ़ायदेमन्द सौदा है तथा आज के समय मौजूद किसानों के तमाम संगठन, कर्ज़ माफ़ करवाने, लाभकारी मूल्य बढ़वाने, लागत मूल्य घटवाने की बात करने वाली विभिन्न रंगों की यूनियनें किसानों के इसी हिस्से की नुमाइन्दगी करती हैं। किसानों के बीच एक बड़ा वर्ग ऐसा है, जिसके पास बहुत छोटी जोत यानी थोड़ी-सी कृषियोग्य भूमि रह गयी है। केवल कृषि पर निर्भर रहकर इस हिस्से के लिए गुज़ारा ही बेहद कठिन है। दाल-रोटी चलाने के लिए परिवार के किसी-न-किसी को कृषि छोड़ नौकरी की तलाश में निकलना पड़ता है या फिर कोई और धन्धा जमाना पड़ता है।

हमारा इलाक़ा देश का वह क्षेत्र है जहाँ पर ‘उत्तम खेती; मध्यम व्यापार, नक़द चाकरी; भीख द्वार’ कहावत दशकों तक चलती रही, किन्तु आज स्थिति यह है कि बेटे हेतु चपड़ासी की नौकरी के लिए ही एक ग़रीब किसान अपनी ज़मीन का टुकड़ा गहने रखने (रेहन पर रखने) या फिर बेचने तक के लिए तैयार बैठा है। पर्याप्त पूँजी और संसाधन नहीं होने के कारण न केवल कृषि बल्कि सामूहिक चरागाहों के समाप्त हो जाने के साथ ही छोटे पैमाने का पशुपालन भी इस हिस्से के लिए घाटे का सौदा बन चुका है। सहकारी समितियों, बैंकों से लेकर सूदखोरों के क़र्ज़ तले किसानों का यही हिस्सा दबा रहता है। किसानों के इस हिस्से की असल माँगों को उठाने वाला व सही तौर पर इनके आर्थिक-राजनीतिक हितों की नुमाइन्दगी करने वाला नेतृत्व नदारद है। जाने-अनजाने में यह हिस्सा धनी किसानों की माँगों पर होने वाली रैलियों में सिर पर कफ़न बाँधकर चलता है तथा व्यापक नज़रिये से देखा जाये तो इसे उनमें कुछ भी हासिल नहीं होता। किसानों की इसी बहुसंख्या के बीच के लोग आत्महत्याएँ करने को विवश होते हैं तथा यही हिस्सा है जो क़र्ज़ माफ़ी के झुनझुने के लिए, स्वामीनाथन रिपोर्ट को लागू करवाने, लाभकारी मूल्य हासिल करने आदि जैसी माँगों पर सत्ता की लाठियों-गोलियों का सामना करता है। इतना ही नहीं आरक्षण जैसे फ़र्ज़ी मुद्दों पर भी ग़रीब किसानों का यही हिस्सा अन्य जातियों के ग़रीबों के साथ सिरफुट्टौवल करता है। कृषि जोत के आकार और किसानों में विभेदीकरण से सम्बन्धित व्यापक आँकड़ों के साथ बात न भी की जाये तब भी उपरोक्त ज़मीनी हक़ीक़त से मुँह नहीं चुराया जा सकता।

अब आते हैं स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट पर। सन 2004 में तत्कालीन कांग्रेस नीत यूपीए/संप्रग सरकार के कार्यकाल में मोनकोम्पू साम्बासिवन स्वामीनाथन की अध्यक्षता में अनाज की आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए तथा किसानों की आर्थिक हालत को बेहतर करने के मक़सद से ‘नेशनल कमीशन ऑन फॉर्म्स’ का गठन किया गया था। इस आयोग ने अपनी पाँच रिपोर्टें पेश की थीं। आयोग ने अन्तिम और पाँचवीं रिपोर्ट सरकार को 4 अक्टूबर 2006 को सौंपी थी। आयोग द्वारा की गयी सिफ़ारिशों में किसान आत्महत्याओं के समाधान, राज्य स्तरीय किसान आयोग बनाने, सेहत सुविधाओं से लेकर वित्त-बीमा की स्थिति सुनिश्चित करने पर ज़ोर दिया गया था। एक सिफ़ारिश यह भी थी – जिसे किसानों के “रहनुमाओं” द्वारा क़र्ज़ माफ़ी के बाद आज सबसे ज़ोरदार ढंग से उठाया जाता है – कि सरकारों द्वारा ‘न्यूनतम समर्थन मूल्य’ (‘एमएसपी’) औसत लागत से 50 प्रतिशत अधिक होना चाहिए।

प्रकृति की तरह मानव समाज में भी कुछ सुनिश्चित नियम काम करते हैं। भले ही हम उन नियमों को जानते हों या फिर उनसे अनजान हों, किन्तु वे नियम अपने क्रिया-व्यापार में लगे रहते हैं। जिस तरह समन्दर के बारे में कहा जाता है कि ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है’ उसी तरह से पूँजीवादी समाज में भी बड़ी पूँजी हमेशा छोटी पूँजी को निगलती है। पूँजी संकेन्द्रण पूँजीवादी समाज की आम प्रवृत्ति है। भावनाओं के ज्वार में बहने की बजाय यदि तर्क को थोड़ी तवज्जो दी जाये तो छोटी पूँजी का उजड़ना आज नहीं तो कल निश्चित है। आज के समय पूँजी निवेश करके की जाने वाली खेती और छोटे पैमाने की खेती-किसानी के सन्दर्भ में भी यह बात उतनी ही सच है। अन्नदाता किसान की छवि को एक तरफ़ रखकर सोचने पर पता चलेगा कि कृषि भी एक व्यवसाय है तथा आज की पूँजीवादी व्यवस्था में इसका उद्देश्य भी मुनाफ़ा कमाना ही है। बड़ी पूँजी, उन्नत मशीनों, आधुनिक खाद-बीज और श्रम शक्ति को ख़रीदकर उत्पादन में लगाने की कुव्वत रखने वाले धनी किसान या राजनीतिक अर्थशास्त्र की भाषा में जिन्हें ‘कुलक फ़ार्मर’ कहा जाता है अधिक मुनाफ़ा कमाने की स्थिति में होते हैं, जबकि छोटी जोत व सीमित संसाधनों वाले ग़रीब किसान बाज़ार की दौड़ में कहीं पीछे रह जाते हैं। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति भी आ जाती है कि ज़मीन का संकेन्द्रण धनी किसान के पक्ष में हो जाता है यानी ग़रीब किसानों की ज़मीन ख़रीदे जाने, रेहन आदि के रूप में धनी किसान के पास पहुँच जाती है। कृषि कर्म से किसी भी रूप में ज़रा भी ताल्लुक रखने वाले व्यक्ति के लिए यह बात कोई नयी नहीं है।

लाभकारी मूल्य बढ़ाने की बात की जाती है तो यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि ग़रीब किसानों का बहुत बड़ा हिस्सा ऐसा है जोकि बाज़ार में बेचता कम है, जबकि बाज़ार से ख़रीदता ज़्यादा है। उदाहरण के लिए हमारी तरफ़ का दो एकड़ का एक किसान अपनी ज़रूरतानुसार अनाज रखकर यदि बाज़ार या मण्डी में साल भर में 50 मन यानी 20 क्विण्टल गेहूँ और 10 मन यानी 4 क्विण्टल बाजरा भले ही बेच लेगा, किन्तु उसे साल-भर बाज़ार से चीनी, चाय पत्ती, तम्बाकू, रिफ़ाइण्ड-सरसों तेल, पशुओं के लिए खल-बिनोला, फ़ल-साग़-सब्ज़ी, दाल-चावल, सूती वस्त्र इत्यादि तो ख़रीदने ही पड़ेंगे और बहुत सारे औद्योगिक उत्पाद में भी कच्चे माल के तौर पर कृषि उत्पाद का ही इस्तेमाल होता है। और ध्यान देने योग्य बात यह है कि ख़रीदी जाने वाली वस्तुओं (कृषि उत्पाद) का कुल मूल्य बाज़ार में बेची जाने कृषि उपज से कहीं ज़्यादा ही बैठेगा! फिर यदि फ़सलों के दाम बढ़ेंगे यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य बढ़ेगा तो सभी फ़सलों का ही बढ़ेगा। ठीक इसीलिए ग़रीब किसान के लिए लाभकारी मूल्य की माँग एक घाटे का सौदा है। जबकि धनी किसान के मामले में स्थिति अलग होगी। यदि इसी इलाक़े का एक 20 एकड़ वाला किसान 400 क्विण्टल गेहूँ और 80 क्विण्टल बाजरा मण्डी में बेचेगा तो उसके लिए स्थिति मुनाफ़े वाली होगी, क्योंकि वह जितनी उपज बाज़ार में बेचता है, उससे बहुत कम ही ख़रीदता है। फिर बड़ी पूँजी होने के कारण इस वर्ग के पास कृषि में निवेश करने के विकल्प भी अधिक होते हैं। और कृषि-कार्य में सिर्फ़ किसान तो लगे नहीं होते, बल्कि बहुत बड़ा खेत मज़दूरी करने वाला तबक़ा भी कृषि कार्य से जुड़ा होता है, उसे तो सब कुछ बाज़ार से ख़रीदना ही पड़ता है। और तमाम किसान यूनियनें और किसान संगठन खेत मज़दूरों की माँगों का तो कभी ज़िक्र ही नहीं करते, बहुत बार सिर्फ़ नाम-भर ही लेते हैं। फ़सलों के दाम बढ़ते हैं या फिर बढ़ाये जाते हैं तो उसका सीधा फ़ायदा धनी किसानों, आढ़तियों (कमीशन एजेण्टों), व्यापारियों के पूरे वर्ग को ही होता है। फिर यदि इसी बात को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो समाज में सर्वहाराओं के रूप में बहुसंख्यक हिस्सा ऐसे मज़दूरों का है जिनके पास अपनी मानसिक और शारीरिक श्रम शक्ति बेचने के अलावा कुछ है ही नहीं। जिन्हें बाज़ार से सबकुछ ख़रीदना ही पड़ता है। यदि महँगाई बढ़ेगी तो इसी वर्ग की जेब पर तो डाका डलेगा, सरकार में बैठे नेतागण या फिर किसानों की “रहनुमाई” करने वाले अपने घर से थोड़ा न कुछ दे देंगे! अब खुल्लम-खुल्ला धनी किसानों की राजनीति करने वालों के बारे में तो कहा ही क्या जाये, किन्तु ग़रीब किसानों व मज़दूरों का नाम लेने वाली यूनियनों और पार्टियों के बारे में ज़रूर सोचा जाना चाहिए कि वे किस वर्ग के पक्ष में खड़े हैं।

क़र्ज़ माफ़ी के मामले में भी यही चीज़ लागू होती है। स्वामीनाथन आयोग की सिफ़ारिशें पेश किये जाने के बाद से ही यदि देखा जाये तो कई बार अलग-अलग मौक़ों पर बिजली बिलों से लेकर, क़र्ज़ माफ़ होते रहे हैं किन्तु ग़रीब किसान फिर-फिर क़र्ज़ के बोझ तले ख़ुद को दबा हुआ पाते हैं। 30 दिसम्बर 2016 को जारी की गयी ‘एनसीआरबी’ के आँकड़ों के अनुसार ही साल 2015 में 12,602 किसानों और खेत मज़दूरों ने आत्महत्याएँ की थीं जो कि साल 2014 में हुई आत्महत्याओं में 2 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी थी। और क़र्ज़ केवल ग़रीब किसान ही नहीं लेते, बल्कि धनी किसान भी लेते हैं जिसे वे माफ़ी के दौरान सीधे तौर पर निगल जाते हैं और शुद्ध मुनाफ़ा कमाते हैं। क़र्ज़ माफ़ी का टोना-टोटका और झाड़-फूँक तात्कालिक तौर पर भले ही राहत देती प्रतीत होती हो, किन्तु दूरगामी तौर पर यह भी छलावा-मात्र ही है। पूँजीवादी व्यवस्था की गतिकी ही ऐसी है कि इसमें ग़रीब किसानों की हालत बद से बदतर होती जाती है तथा इनका एक हिस्सा लगातार उजड़कर उजरती मज़दूर यानी अपनी मेहनत बेचकर ज़िन्दा रहने वाले मज़दूर वर्ग में शामिल होता रहता है। फिर क़र्ज़ में दी जाने वाली राशि भी सरकारें जनता से ही निचोड़ती हैं।

अब आते हैं इस बात पर कि ग़रीब किसान फिर क्या करें? उपरोक्त बातचीत का मूल मक़सद इस बात की तरफ़ केवल इशारा-भर करना था कि पूँजीवादी व्यवस्था में ग़रीब किसान आबादी का कोई भविष्य नहीं है, क्योंकि इस व्यवस्था में उजड़ना ही उनकी नियति है। यही सच है चाहे इस सच्चाई को हँसकर स्वीकार किया जाये चाहे फिर रोकर! धनी किसानों की माँगों को उठाने वाले नेतृत्व की तरफ़ ताकने और उनकी माँगों के लिए लड़ने-मरने की बजाय इतिहास-बोध के साथ और दूरगामी तौर पर विचार किया जाना चाहिए और तर्क के आधार पर सही-ग़लत का फै़सला होना चाहिए। न केवल तात्कालिक तौर पर बल्कि दूरगामी तौर पर भी ग़रीब किसानों के हित केवल और केवल मज़दूर वर्ग के साथ जुड़े हुए हैं। बेरोज़गारी, महँगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, पानी जैसे मुद्दे ही असल में सही मुद्दे हैं जिन पर एकजुट होकर ग़रीब किसानों को मज़दूर वर्ग के साथ मिलकर व्यापक आन्दोलन खड़े करने चाहिए। दूरगामी तौर पर भी ग़रीब किसानों के हित समाजवाद के साथ यानी ऐसी व्यवस्था के साथ जुड़े हुए हैं, जोकि निजी सम्पत्ति की बजाय सामूहिक सम्पत्ति की धारणा पर आधारित हो तथा जिसमें शोषण के सभी रूपों और गै़र-बराबरी के पूर्ण ख़ात्मे की तरफ़ समाज क़दम बढ़ाता है।

 

मज़दूर बिगुल,सितम्‍बर 2017

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