फ़ासीवाद के धुँआसे के बीच गुज़रा एक और साल
नये साल में मज़दूर वर्ग के सामने खड़ा चुनौतियों का पहाड़

संपादक मंडल

नये साल में आम तौर पर शुभकामनाएँ दी जाती हैं। लेकिन ‘मज़दूर बिगुल’ के पाठकों को जैसे ही हम नये साल की शुभकामनाएँ देने को अग्रसर होते हैं, वैसे ही हमारी आँखों के सामने से गोरखपुर के सरकारी अस्पताल के उन बच्चों की नन्हीं लाशें गुज़रती हैं जो ऑक्सीजन की कमी की वजह से इस नये साल को देखने से वंचित रह गये। हमें झारखण्ड के सिमडेगा जि़ले की 11 वर्षीय बच्ची सन्तोषी कुमारी की मार्मिक चीख़ें सुनायी पड़ती हैं जो आधार कार्ड न होने की वजह से भात-भात कहते हुए इस दुनिया से चल बसी। हमें राजसमन्द में एक फ़ासिस्ट दरिन्दे के हाथों मरने वाले मुसलमान दिहाड़ी मज़दूर की चीत्कार भी सुनायी पड़ती हैं। हमें लुधियाना में एक फ़ैक्टरी की ढही इमारत के मलबे में धँसे मज़दूरों की बेजान शक्लें याद आती हैं। हमें याद आते हैं उन दर्जनों निस्सहाय लोगों के चेहरे जो मुम्बई के एलफिंस्टोन रेलवे स्टेशन में हुई भगदड़ में फँस गये थे। हमें याद आती हैं धर्म की आड़ में चल रहे बाबाओं के घिनौने धन्धों की शिकार मासूम माहिलाएँ! हमें फ़िलिस्तीन के उन जाँबाज किशोर-किशोरियों की बेबसी भी महसूस होती है जिनकी नौजवानी की दहलीज़ ज़ायनवादी ज़ालिमों की सलाखों के पीछे क़ैद हो गयीं। ऐसे में नये साल के मौक़े पर शुभकामनाएँ देने की औपचारिकता निभाने की बजाय हमें ज़्यादा मुनासिब यह लगता है कि हम बात करें चुनौतियों के उस पहाड़ की जिसकी उँचाई समय बीतने की साथ बढ़ती ही जा रही है; और हम बात करें उन रणनीतियों की जिनके ज़रिये चुनौतियों के इस पहाड़ को लाँघा जा सकता है। लेकिन आइए पहले गुज़रे साल देश और दुनिया में हुए अहम घटनाक्रमों पर एक सरसरी नज़र दौड़ा ली जाये।
राष्ट्रीय पटल पर बीते साल के अहम घटनाक्रम
वर्ष 2017 में फ़ासीवाद की उन्मादपूर्ण विजययात्रा आम जनजीवन को रौंदते हुए आगे बढ़ी। पहले उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, गोवा, मणिपुर और फिर साल के अन्त में गुजरात व हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने जीत हासिल की। इन जीतों के परिणामस्वरूप अब देश की 67.78 फ़ीसदी आबादी और 78.08 फ़ीसदी भू-क्षेत्र वाले 19 राज्यों में भाजपा और उसके सहयोगी दलों की सरकारें बन चुकी हैं। नोटबन्दी और जीएसटी जैसी घोर जनविरोधी नीतियों और अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत के बावजूद फ़ासिस्टों की चुनावी जीत फ़ासीवाद की गिरफ़्त में आ चुके भारतीय समाज की त्रासद दास्तान तो बयान कर ही रही है, लेकिन साथ ही साथ इस प्रक्रिया में स्वतन्त्र और निष्पक्ष होने का दावा करने वाली भारत के बुर्जुआ लोकतन्त्र की तमाम संस्थाओं – न्यायपालिका, मीडिया, चुनाव आयोग, सिविल सोसाइटी आदि – का खोखलापन भी उजागर होता जा रहा है।
मुनाफ़े की गिरती दर से परेशान भारत के पूँजीपति वर्ग द्वारा प्रायोजित फ़ासीवाद के इस उन्मादी विजय जुलूस में मध्य वर्ग के सफ़ेदपोशों से लेकर, छुटभैया व्यापारियों, दलालों, सट्टेबाज़ों, कमीशनखोरों और गाँवों के कुलकों-फ़ार्मरों के साथ ही साथ मज़दूर वर्ग के विमानवीकृत लम्पट हिस्से को साफ़ देखा जा सकता है। फ़ासीवाद का यही वह सामाजिक आधार है जिसमें से निकली भीड़ कभी अलवर में गौरक्षा के नाम पर पहलू खान को पीट-पीटकर मार देती है तो कभी ग़ाज़ियाबाद-मथुरा शटल ट्रेन की सीट को लेकर हुए विवाद में जुनैद का क़त्ल कर देती है। फ़ासीवाद के इसी सामाजिक आधार से राजसमन्द में शम्भूनाथ जैसा दरिन्दा भी निकलता है जो लव ज़िहाद की अफ़वाह पर अफ़राजुल नामक दिहाड़ी मज़दूर को कुल्हाड़ी से काटकर उसकी लाश को जलाता है और उसकी वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल करता है। शम्भूनाथ के समर्थन में उदयपुर में उत्पात मचाते हुए अदालत पर भगवा पताका फहराने वाली उन्मादी भीड़ भी फ़ासिस्टोंे के इसी सामाजिक आधार का हिस्सा है। और फ़ासीवाद के इसी सामाजिक आधार से आते हैं वे लोग जिन्हें कटते और जलते हुए इंसान की वीभत्स वीडियो का लुत्फ़ उठाते हुए उसे वायरल करने में ज़रा भी हिचक नहीं होती। इसी सामाजिक आधार की बदौलत बेंगलूरू में फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ मुखर पत्रकार गौरी लंकेश की नृशंस हत्या कर दी जाती है और सोशल मीडिया पर उसका सरेआम जश्न मनाया जाता है।
कहने की ज़रूरत नहीं कि ये सबकुछ पूरी तरह से स्वूत:स्फूर्त ढंग से नहीं हो रहा है। संघ परिवार का संगठित अफ़वाह तन्त्र, जिसमें व्हाट्सएप, सोशल-मीडिया, ब्लॉग-वेबसाइटों से लेकर मुख्यधारा की प्रिण्ट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया शामिल है, पूरे समाज की पोर-पोर में साम्प्रदायिकता और नफ़रत का ज़हर फैलाने में लगातार सक्रिय है। ‘फ़ेक न्यूज़’ की परिघटना पहले से मौजूद थी, लेकिन उसने पिछले साल भयावह रूप अख्त़ियार कर लिया क्योंकि फ़ेक न्यूज़ की वजह से साम्प्रदायिक तनाव भड़क रहे हैं और लोगों की जानें तक जा रही हैं। स्पष्ट है कि भारत के फ़ासीवादियों ने न सिर्फ़़ जर्मनी और इटली के अपने पूर्वजों से प्रेरणा ली है बल्कि उनसे सबक़ भी लिया है और इसीलिए वे नंगे रूप में तानाशाही और जनसंहार करने की बजाय बुर्जुआ लोकतन्त्र का खोल बरक़रार रखते हुए बारीकी से पूरे समाज में नफ़रत के बीज बो रहे हैं। पूरे समाज में ख़ौफ़ व आतंक फैलाने के लिए अब उन्हें गैस चैम्बर व कन्सनट्रेशन कैम्प बनाने की ज़रूरत नहीं है, वे इस काम को बर्बर ढंग से चुनिन्दा योजनाबद्ध हत्याएँ करके अपनी जघन्य करतूतों की वीडियो बनाकर अल्पसंख्यक और उत्पीड़ित तबक़ों एवं संवेदनशील नागरिकों के दिलों में ख़ौफ़ और आतंक का माहौल लगातार बना रहे हैं।
वर्ष 2017 में फ़ासीवादियों की आक्रामकता बढ़ने का एक अहम कारण अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर मोदी सरकार का फिसड्डीपन रहा है। अब तमाम बुर्जुआ अर्थशास्त्री भी यह मानने लगे हैं कि नोटबन्दी और जीएसटी के क्रियान्वयन ने विश्वव्यापी मन्दी की वजह से पहले से ही लचर भारतीय अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी है। कृषि क्षेत्र का संकट पिछले साल और गहरा गया जिसका नतीजा देश के विभिन्न हिस्सों में किसानों के आन्दोलन में तेज़ी के रूप में सामने आया। मध्य प्रदेश के मन्दसौर में तो किसानों का आन्दोलन इतना उग्र हो गया कि उसे कुचलने के लिए पुलिस को गोलियाँ चलानी पड़ी जिसमें आधा दर्जन लोग मारे गये। हालाँकि कुछ सरकारों ने क़र्ज़ माफ़ी के टोटके के सहारे कृषि संकट को टालने की कोशिश की, लेकिन समय बीतने के साथ ही साथ पूँजीवादी खेती-बाड़ी के संकट से निजात पाने में इस टोटके की अक्षमता जगज़ाहिर हो गयी। इसके अतिरिक्त नोटबन्दी और जीएसटी की वजह से समूचा अनौपचारिक क्षेत्र ठप्प पड़ गया जिसकी वजह से पिछले वर्ष भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर और निर्यात में भी गिरावट देखने को मिली और साथ ही बेरोज़गारी की दर तेज़ हुई। नवउदारवाद की चौथाई सदी में कुलाँचे मारने वाले आईटी सेक्टर पर भी पिछले साल मन्दी और छँटनी के काले बादल छाये रहे। उधर बड़े-बड़े कॉरपोरेट घरानों द्वारा दसियों लाख करोड़ रुपये के क़र्ज़ का भुगतान न करने की वजह से बैंकों की हालत भी गुज़रे साल बद से बदतर हुई। आने वाले दिनों में भी अर्थव्यवस्था में कोई विचारणीय सुधार होने के कोई आसार नहीं नज़र आ रहे हैं। रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर वाई.वी. रेड्डी ने हाल ही में यह बयान दिया है कि नोटबन्दी और जीएसटी से हुए नुक़सान से पूरी तरह उबरने में अर्थव्यवस्था को अभी दो वर्ष से भी अधिक का समय लगेगा। मॉर्गन स्टैनली जैसे साम्राज्यवादी थिंकटैंक भी भारतीय अर्थव्यवस्था की खस्ता हालत पर आँसू बहा रहे हैं। ऐेसे में ज़ाहिर है कि 2019 के आम चुनावों के मद्देनज़र जं़जीर में बँधे फ़ासिस्ट कुत्ते की जं़जीर को थोड़ा और ढीला किया जाना तय है। योगी आदित्यनाथ जैसे अपराधी को देश से सबसे बड़े सूबे का मुख्यमन्त्री बनाकर और कई राज्यों में संघ के स्वयं सेवकों काे मुख्यमन्त्री पद सौंपकर संघ परिवार ने अपनी मंशा साफ़ ज़ाहिर कर दी है।
नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा की फ़ासीवादी सरकार ने देशी-विदेशी पूँजीपतियों की शह पर मज़दूर वर्ग के अधिकारों की डाकेजनी के लिए बीते साल एक अहम विधेयक लोकसभा में प्रस्तुत किया। मज़दूरी संहिता विधेयक (कोड ऑफ़ वेजेज़ बिल) 2017 नामक इस विधेयक में मज़दूरों की मज़दूरी कम करने, ओवरटाइम की व्यवस्था ख़त्म करने, मालिकों को बोनस से छुटकारा दिलाने, ट्रेड यूनियन की कार्रवाइयों पर रोक लगाने, फ़ैक्टरियों के निरीक्षण में ढील देने और न्यूनतम मज़दूरी न देने पर मालिकों के ख़िलाफ़ कार्रवाई पर रोक लगाने सहित ढेरों मज़दूर-विरोधी प्रावधान हैं जिन्हें श्रम-सुधारों के नाम पर प्रस्तावित किया गया है। ख़ुद को मज़दूर नम्बर वन कहने वाले नरेन्द्र मोदी के पूँजीपरस्त और घोर मज़दूर-विरोधी चरित्र का यह नमूना मात्र है। आने वाले दिनों में मज़दूरों के रहे-सहे हक़ों-हूकूक को छीनने की भी पूरी तैयारी चल रही है।
अल्पसंख्यकों, मज़दूरों, छोटे-मझौले किसानों के हितों पर हमलों के साथ ही गुज़रे साल महिलाओं, दलितों और आदिवासियों पर होने वाली वहशियाना हिंसा का सिलसिला बदस्तूर जारी रहा। इसके अतिरिक्त मुनाफ़े की बेलगाम हवस में पूँजीवादी तन्त्र ने समाज की रगों के साथ ही साथ आबोहवा में भी ज़हर घोलने का काम तेज़ रफ़्तार से आगे बढ़ाया जिसका नतीजा पिछले साल जाड़े की शुरुआत में अभूतपूर्व सघनता वाले ‘स्मॉग’ के रूप में सामने आया। फ़ासीवाद के दमघोंटू माहौल में इस देश में हर संवेदनशील और न्यायशील इंसान का जीना पहले ही दूभर हो गया था; जाड़े के मौसम में राजधानी व आस-पास के इलाक़ों में रहने वाली आम मेहनतकश आबादी का साँस लेना भी दूभर होता जा रहा है।
अन्तरराष्ट्रीय पटल पर बीते साल के मुख्य घटनाक्रम
अन्तरराष्ट्रीय पटल पर पिछले साल साम्राज्यवाद के अन्तरविरोधों के तीखे होने के लक्षण साफ़ दिखायी दिये। ट्रम्प की अगुवाई में अमेरिकी साम्राज्यवाद ने बौराये हाथी की तरह दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपनी आक्रामकता दिखाने की कोशिश की। अमेरिका की बौखलाहट भरी आक्रामकता अफ़गानिस्तान में ‘मदर ऑफ़ ऑल बॉम्ब्स’ गिराने से लेकर उत्तर कोरिया पर हमले की धमकी व ईरान के ख़िलाफ़ बयानबाजी में साफ़ नज़र आयी। हालाँकि विश्व पटल पर रूस और चीन की साम्राज्यवादी धुरी के उभार से उपजी अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा में अमेरिकी साम्राज्यवाद के समीकरण बिगड़ते नज़र आये जिसकी वजह से उसकी बौखलाहट भी बढ़ती गयी। सीरिया में रूस के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप की बदौलत बशर अल-असद की सरकार पिछले साल स्थिर होती नज़र आयी। यही नहीं, समूचे मध्यपूर्व में इरान-सीरिया-हिजबुल्ला की धुरी का पलड़ा अमेरिका के अरब सहयोगियों की अपेक्षा भारी नज़र आया। इसकी एक बानगी लेबनान के प्रधानमन्त्री साद अल-हरीरी के इस्तीफ़े के रूप में देखने में आयी जिसने सऊदी अरब की यात्रा के दौरान ही अपना इस्तीफ़ा देते हुए कहा कि हिजबुल्ला ने लेबनॉन में राज्य के भीतर एक और राज्य बना लिया है और ईरान उसके देश में अव्यवस्था और विनाश फैला रहा है। उधर इराक़ में भी ईरान का दबदबा बढ़ता जा रहा है जो अमेरिका और अरब के हुक़्मरानों की चिन्ता का सबब है। इन हालातों में सऊदी अरब के हुक़्मरानों की इज़रायल से क़रीबी भी बढ़ती जा रही है जिससे अरब देशों की जनता का अपने हुक़्मरानों के ख़िलाफ़ आक्रोश बढ़ता दिखा। मध्य-पूर्व में अमेरिकी साम्राज्यवाद के समीकरण बिगड़ते देख ट्रम्प ने साल के अन्त में यरूशलम को इज़रायल की राजधानी के रूप में मान्यता देकर एक बड़ा दाँव खेला; हालाँकि इस मामले में संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी साम्राज्यवादी पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गये। गुज़रे साल के अन्तिम दिनों में ईरान में भी बेहिसाब महँगाई और मुल्लाओं की सत्ता के ख़िलाफ़ एक जनउभार देखने में आया जिससे यह स्पष्ट है कि भविष्य में मध्यपूर्व के समूचे इलाक़े की अस्थिरता और बढ़ने वाली है जो उस क्षेत्र में बड़े बदलावों की पूर्वपीठिका तैयार करेगी।
पिछले साल जहाँ एक ओर ट्रम्प ने संरक्षणवादी नीतियों की दिशा में क़दम उठाये वहीं चीन ने विश्व साम्राज्यवादी व्यवस्था की अगली क़तार में शामिल होने की अपनी महत्वाकांक्षा जगज़ाहिर की। मई के महीने में चीन की राजधानी बीजिंग में सम्पन्न ‘वन बेल्ट वन रोड’ शिखर सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने विश्व के मुक्त व्यापार में चीन की नैतिक और व्यावहारिक नेतृत्वकारी क्षमता का दावा किया। उससे पहले जनवरी में डावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की बैठक में भी जिनपिंग ने भूमण्डलीकरण के दौर में चीन द्वारा विश्व पूँजीवाद की रहनुमाई करने का दावा ठोंका था। साल के अन्त में दिये गये अपने भाषण में भी जिनपिंग ने यह दावा किया कि भविष्य में सभी अन्तरराष्ट्रीय मुद्दों पर चीन की बात का वज़न होगा और यह कि चीन ‘बेल्ट और रोड’ पहल को तेज़ी से आगे बढ़ाने के लिए प्रतिबद्ध है। ग़ौरतलब है कि ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना के तहत चीन समूचे मध्य एशिया से होते हुए यूरोप तक सड़क, रेलमार्ग, तेल और प्राकृतिक गैस पाइपलाइनों का तानाबाना खड़ा करने और एशिया व प्रशान्त के क्षेत्र में शिपिंग लेन का समुद्र आधारित नेटवर्क और बन्दरगाह के विकास की महत्वाकांक्षा रखता है जिसका विस्तार दक्षिण व दक्षिण-पूर्व एशिया से होते हुए पूर्वी अफ़्रीका और उत्तरी भूमध्य सागर तक होगा। पिछले कुछ दशकों में चीन में हुए तीव्र पूँजीवादी विकास, पूँजी के निर्यात और सैन्य शक्ति में हुए विस्तार को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि चीन न सिर्फ़़ साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा रखता है बल्कि वो तेज़ी से वो क्षमता भी अर्जित करता जा रहा है। आज चीन और रूस अकेले दम पर भले ही अमेरिका को टक्कर दे पायें, परन्तु चीन और रूस का गठबन्धन निश्चय ही साम्राज्यवाद की एक नयी धुरी बनकर उभरा है जिसकी वजह से आने वाले दिनों में अन्तरसाम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा और तीखे रूप में सामने आयेगी।
कैसे लाँघा जा सकता है चुनौतियों का पहाड़?
वैसे तो विश्व पूँजीवाद के संकट के दौर में दुनिया के विभिन्न हिस्सों में धुर दक्षिणपन्थी ताक़तों का उभार हो रहा है, लेकिन भारत में जो दक्षिणपन्थी उभार देखने में आ रहा है उसे सच्चे अर्थों में फ़ासीवादी उभार कहा जा सकता है क्योंकि इसका नेतृत्व हिन्दुत्व की फ़ासीवादी विचारधारा से लैस एक कॉडर आधारित संगठन कर रहा है और इसके पीछे व्यापक सामाजिक आधार वाला एक प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन है। ऐसे में जो वामपन्थी और प्रगतिशील भद्रजन अभी भी केवल चुनावी जोड़-जुगाड़ के सहारे फ़ासीवाद को परास्त करने के दिवास्वप्न देख रहे हैं वे विभ्रम का कुहरा और घना करने का काम कर रहे हैं। इतिहास गवाह है कि फ़ासीवाद को फ़ैसलाकुन शिकस्त उसके सबसे बड़े शत्रु यानी मज़दूर वर्ग की संगठित ताक़त ही दे सकती है। और ये फ़ैसलाकुन शिकस्त संसद के चण्डूखाने में नहीं बल्कि सड़कों पर आरपार की लड़ाई के ज़रिये ही दी जा सकती है। दंगाइयों और उपद्रवियों के फ़ासिस्ट गिरोह को मानवतावादी राग अलाप कर या तार्किक दलीलों के ज़रिये नहीं समझाया जा सकता है। ज़ाहिर है कि कॉडर आधारित फ़ासिस्ट संगठन को निर्णायक शिकस्त देने के लिए एक कॉडर आधारित क्रान्तिकारी संगठन का ढाँचा खड़ा करना बेहद ज़रूरी है। यानी पूँजीवादी ढाँचे को नेस्तनाबूद करने के अपने ऐतिहासिक मिशन को पूरा करने की प्रक्रिया में मज़दूर वर्ग को न सिर्फ़़ राज्य की ताक़त से लोहा लेना पड़ेगा बल्कि समाज में मौजूद फ़ासिस्ट गुण्डावाहिनियों का भी सड़कों पर सामना करने की तैयारी करनी होगी। ऐसा तभी किया जा सकता है जब मज़दूर बस्तियों, निम्न मध्यवर्गीय इलाक़ों और ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न क़िस्म की सांस्कृतिक और राजनीतिक संस्थाओं तथा लोगों की ज़िन्दगी को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर जनान्दोलनों के ज़रिये क्रान्तिकारी विचारों की पैठ बनायी जाये। ज़ाहिर है कि यह बेहद जोखिम भरा, चुनौतीपूर्ण और लम्बा काम है। लेकिन इस चुनौती को स्वीकार करने की बजाय कोई शॉर्टकट ढूँढ़ने की कोई भी क़वायद जाने-अनजाने फ़ासीवाद के आधार को मज़बूत ही करेगी, क्योंकि क्रान्तिकारी हस्तक्षेप की ग़ैरमौजूदगी में पूँजीवाद के लाइलाज ढाँचागत संकट से जनित सामाजिक असुरक्षा का लाभ संगठित फ़ासीवादी ताक़त को ही मिलेगा।
इसलिए चुनौतियों के इस विशालकाय पर्वत को लाँघने का संकल्प बाँधने के अलावा अब और कोई रास्ता नहीं बचा है। इस दूरगामी लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए तात्काालिक तौर पर क्रान्तिकारी ताक़तों को अर्थवाद और दुस्साहसवाद के भटकावों से निज़ात पाकर एक फ़ासीवाद-विरोधी जुझारू मुहिम छेड़ने के लिए एकजुट होना आज की ज़रूरत है। हालाँकि इसकी सम्भावना कम है, लेकिन अगर संशोधनवादी वाम ताक़तें ऐसी जुझारू मुहिम में शामिल होने के लिए तैयार हों तो उनके साथ मोर्चा भी बनाया जा सकता है। बुर्जुआ वर्ग के चन्द रैडिकल बुद्धिजीवी भले ही ऐसे किसी मोर्चे में शामिल हो सकते हैं, लेकिन फ़ासीवाद-विरोधी इस मुहिम में बुर्जुआ वर्ग की किसी पार्टी या संगठन की कोई भूमिका नहीं दिखती। मज़दूर वर्ग के क्रान्तिकारी राजनीतिक केन्द्र के संगठित होने की सूरत में रणकौशल के रूप में बुर्जुआ चुनावों में भी फ़ासीवादियों से लोहा लिया जा सकता है, लेकिन उस परिस्थिति में भी इस गफ़लत में नहीं रहना होगा कि केवल चुनावों में भाजपा को हराकर फ़ासीवाद को निर्णायक शिकस्त दी जा सकती है। फ़ासीवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई का मुख्य मोर्चा सड़कों पर ही बँधेगा। उसके लिए आज से ही फ़ासीवादियों की घिनौनी करतूतों, उनके काले इतिहास और उनके पूँजीपरस्त, धनलोलुप और लम्पट चरित्र का व्यापक पैमाने पर पर्दाफ़ाश करने की जुझारू मुहिम पुरज़ोर ढंग से छेड़नी होगी। परिवर्तनकामी ताक़तों के लिए नये साल के मौक़े पर इससे बेहतर संकल्प और कुछ नहीं हो सकता कि हम फ़ासीवादियों के सामाजिक आधार को छिन्न-भिन्न करने में अपनी पूरी ताक़त झोंक दें।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2018

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