यमन संकट और अन्तरराष्ट्रीय मीडिया की साज़िशी चुप्पी

मानव

पिछले कुछ सालों से अरब के कई मुल्क़ों में चल रही उथलपुथल की ख़बरों को हम लगातार देख-सुन रहे हैं। इस सदी के शुरू में इराक़, अफ़गानिस्तान से शुरू होकर अमेरिकी नेतृत्व वाले साम्राज्यवादी दख़ल ने धीरे-धीरे मिस्र, लीबिया को तबाह किया और अब कुछ सालों से सीरिया को भी रौंदा है। पिछले कुछ समय से मीडिया की भी सीरिया की घटनाओं को लेकर लगातार रुचि रही है जहाँ पर कि दो साम्राज्यवादी ताक़तों, अमेरिका और रूस, के बीच के अन्तरविरोधों की गाँठ भयानक रूप में निर्दोष लोगों के ऊपर जा खुली है। साम्राज्यवादी, ख़ासकर अमेरिका, के दख़ल ने ना सिर्फ़ सीरिया की पूरी आर्थिकता को बर्बाद कर दिया है, बल्कि इसकी पूरी सामाजिक बनावट को ही उधेड़कर रख दिया है जिसके दुष्प्रभाव आने वाले कई दशकों तक नज़र आते रहेंगे। परन्तु तक़रीबन पिछले 2-3 सालों से ही अरब जगत के एक देश यमन में भी इसी अनुपात का ही एक और साम्राज्यवादी दख़ल चल रहा है जिसको लेकर तक़रीबन पूरे मीडिया ने या तो साजि़शाना चुप्पी धारण कर रखी है और या फिर बेहद एकतरफ़ा तरीक़े के साथ अब तक रिपोर्टिंग की है। मार्च 2015 से अमेरिकी सहायता प्राप्त देश सउदी अरब ने अपने नेतृत्व में अरब जगत के दूसरे देशों को मिलाकर यमन पर हमला शुरू किया था जो कि आज पूरे यमन के अस्तित्व पर ही संकट बन चुका है। साम्राज्यवादियों की ओर से इंसानी ज़िन्दगियों की इस क़द्र तबाही के सामने पिछले समय की सब बर्बरताएँ भी फीकी पड़ रही हैं।

यमन में मौजूदा उथलपुथल की तार तो अरब बहार के समय से ही जोड़ी जा सकती है जब यमन में भी ट्यूनिशिया, मिस्र की तरह ही लोग तत्कालीन राष्ट्रपति अली अब्दुल्लाह सालेह के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए थे। यमन अरब के सबसे ग़रीब देशों में से है जहाँ तक़रीबन 40% आबादी ग़रीबी में रहती है। और इसी ग़रीबी, बेरोज़गारी जैसे मुद्दों को लेकर जनता का गुस्सा लगातार सालेह के ख़िलाफ़ बढ़ रहा था जिसने यमन पर 33 सालों तक (पहले यमन अरब गणतन्त्र के राष्ट्रपति के तौर पर और 1990 में दक्षिणी यमन के साथ एकीकृत होने के बाद पूरे यमन में) बतौर राष्ट्रपति हुक़ूमत की। इस कार्यकाल में उसने अपने और अपने नज़दीकियों की दौलत में बेहद विस्तार किया। उसकी अब हुई मौत के बाद उस के द्वारा पीछे छोड़ी गयी कुल दौलत खरबों में बतायी जाती है। उसकी इन ही भ्रष्ट और ज़ालिमाना नीतियों के ख़िलाफ़ ही जब लोग उठ खड़े हुए तो उसे 2012 के शुरू में गद्दी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। उसके बाद उसने सउदी अरब के नेतृत्व में एक समझौते पर दस्तख़त किये जिसके अन्तर्गत सत्ता उसकी सरकार के ही डिप्टी अबदर-अबूह मन्सूर हादी को सँभाल दी गयी। फ़रवरी 2012 में ही सालेह देश में फिर वापिस आ गया और तत्कालीन यमनी सरकार ने उस पर किसी भी क़ानूनी कार्यवाही से उसकी रक्षा की और उसका लड़का जनरल अहमद अली अब्दुल्लाह सालेह भी यमन की फ़ौज में अपना अहम रसूख रखता रहा। इस सबसे साफ़ था कि सउदी अरब की देख-रेख में यमन में सिर्फ़ चेहरों का ही तबादला हुआ है, बुनियादी तब्दीली कोई नहीं आयी।

इस सरकार के ख़िलाफ़ भी कुछ समय बाद ही हूती क़बायली लोगों ने संघर्ष छेड़ दिया। हूती क़बायली लोग शिया इस्लाम की ही एक शाखा ज़ाइदिया से सम्बन्ध रखते हैं जो कि सुन्नी इस्लाम के ही ज़्यादा करीब है। ग़ौरतलब है कि मीडिया के कई अदारे मौजूदा संकट को सुन्नी बनाम शिया का मसला बनाकर पेश कर रहे हैं जिससे आम लोगों में वही ग़लत पूर्व धारणा फैलायी जा सके कि मुसलमान बुनियादी तौर पर ही हिंसात्मक हैं। हालाँकि सच्चाई यह है कि यमन में सुन्नी और शिया लोग एक ही मस्जिद में नमाज़ पढ़ते रहे हैं और इनके बीच विवाह सम्बन्ध भी आम बात है। मीडिया की तरफ़ से ऐसा करने के पीछे दूसरा कारण यह है कि इस तरह मसले को पेश करके वह नाजायज़ ही यमन के मौजूदा संकट के लिए शिया बाहुल्य ईरान को जि़म्मेदार ठहरा सकते हैं ताकि इस संकट के लिए मुख्य तौर पर जि़म्मेदार अमेरिकी सहायता वाले सउदी गँठजोड़ को बरी किया जा सके। हालाँकि सच्चाई यह है कि यमन में ईरानी दख़ल एक बेहद सीमित हद तक ही है, और मौजूदा हालत में सीमित ही हो सकता है क्योंकि सउदी अरब वाले गँठजोड़ ने यमन के साथ हवाई मार्गों के साथ-साथ समुद्री मार्गों पर भी बन्दिशें लगा रखी हैं। ख़ुद अमेरिकी सरकार के पैसों पर चलने वाले एक नामी अमेरिकी विशेषज्ञ दल, कारनेगी मध्य-पूर्व केन्द्र, ने अपनी एक प्रकाशित रिपोर्ट में भी यही माना है। यह पश्चिमी मीडिया की पक्षपाती पत्रकारिता का ही एक नमूना है।

सो, हूती क़बाइलियों के इस गुट ने अबदर-अबूह मन्सूर हादी के ख़िलाफ़ अपने संघर्ष के लिए अली अब्दुल्लाह सालेह के साथ मौक़ापरस्त गँठजोड़ भी किया। चूँकि सालेह की यमन की सेना पर पकड़ थी, इस सहयोग के बदौलत हूती विद्रोही बहुत जल्द ही यमन की राजधानी सना पर काबिज़ हो गये और मार्च 2015 में हादी सउदी अरब के पास शरण के लिए भाग गया। सउदी अरब ने अपने क़रीबी हादी को इस तरह गद्दी से उतारे जाने को अपने हितों के लिए ख़तरा समझते हुए तुरन्त यमन पर कार्यवाही शुरू की और यह यमन की स्थिति में एक भारी मोड़ था। मार्च 2015 से लेकर अब तक सउदी अरब के नेतृत्व वाले इस गठजोड़ (जिसमें मिस्र, मोराको, जॉर्डन, सूडान, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, क़तर, बहरेन शामिल हैं) ने पूरे यमन पर जो क़हर बरपा किया है उसकी मिसाल पिछले समय में ढूँढ़नी मुश्किल है। सउदी नेतृत्व वाले इस गँठजोड़ ने हवाई और समुद्री रास्तों पर बन्दिशों और चौकसी बढ़ाकर यमन को बाक़ी देशों से काट दिया है जिसके चलते यमन को पहुँचने वाली बुनियादी ज़रूरतों की रसद में भारी कमी आ गयी है। इसके साथ ही इसने यमन के अहम अवसरंचनात्मक ढाँचे – राजमार्गों, बन्दरगाहों, आदि पर भी बमबारी करके नुक़सान पहुँचाया है जिसके चलते रसद की ढुलाई का कार्य चौपट होकर रह गया है। ग़ौरतलब है कि यमन अपनी बुनियादी ज़रूरतों का 90% बाहर से आयात करता है, इसीलिए इन पाबन्दियों और तबाही ने यमनी लोगों के जीवन के लिए ही ख़तरा पैदा कर दिया है। इसके अलावा इस गँठजोड़ ने यमन के स्कूलों, अस्पतालों, सार्वजनिक स्थलों जैसे कि बाज़ार, अन्तिम-संस्कार के अवसरों और अन्य सार्वजनिक इमारतों पर लगातार हवाई बमबारी के ज़रिये हज़ारों आम बेगुनाह लोगों को मार डाला है। इस बमबारी के लिए ऐसे गुच्छा बमों (क्लस्टर बमों) का इस्तेमाल किया गया है जो फटते ही हज़ारों टुकड़ों में विभाजित हो जाते हैं और फिर प्रत्येक टुकड़ा इस पूरी लड़ी का हिस्सा बनकर क़हर ढाहता है। ऐसे हथियारों पर दुनिया के 100 से ज़्यादा देशों ने पाबन्दी लगायी हुई है परन्तु सउदी अरब इन हथियारों को खुलेआम इस्तेमाल कर रहा है। अकेले हवाई हमलों में ही अब तक 12,000 यमनी नागरिक मारे जा चुके हैं जबकि यमन पर लगायी गयी बन्दिशों के चलते 10,000 और मौतें हो चुकी हैं। इन बन्दिशों ने यमन के लिए अस्तित्व का ही संकट खड़ा कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस समय 90% यमनी नागरिकों को किसी-न-किसी कि़स्म की गम्भीर सहायता की दरकार है, जबकि 75% आबादी के पास अनाज की कमी है। इस समय 1.7 करोड़ लोगों के पास अनाज की कमी है जबकि 70 लाख और गम्भीर भुखमरी की हालत में पहुँच चुके हैं (यमन की कुल आबादी 2.70 करोड़ है)। अत्यधिक भुखमरी की हालत से जूझती यह करोड़ों की आबादी ज़िन्दगी और मौत के बीच एक बारीक़ डोर पर ही टिकी हुई है और यदि राहत जल्दी नहीं पहुँचती तो इनकी ज़िन्दगी को ही ख़तरा बताया जा रहा है। यमन के 333 में से 49 ज़िले तो ऐसे हैं जहाँ अस्पताल की तो बात दूर है, एक भी डाॅक्टर तक मौजूद नहीं है। कुल 30 लाख लोग घरों से उजड़ चुके हैं। पानी की किल्लत की हालत यह है कि आने वाले सात बरसों में यमन में पीने वाले साफ़ पानी की मुकम्मल किल्लत होने का अनुमान किया जा रहा है। इस समय गन्दे पानी पर निर्भर रहने की मजबूरी के चलते यमन के 23 में से 22 राज्यों में हैज़े की बीमारी फैल चुकी है और साल 2017 में ही 5 लाख से अधिक हैज़े के नये मामले सामने आये हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने हैज़े के इस विस्फोट की “विश्व के सबसे गम्भीर विस्फोट के तौर पर निशानदेही की है।”

सीधे ही यह सवाल तो बनता ही है कि ऐसी बरबादी के बावजूद भी ज़्यादातर पश्चिमी मीडिया चुप क्यों है? पश्चिमी सरकारें अभी तक चुप क्यों हैं? इसका स्पष्ट सा कारण है कि इस पूरे मामले में अमेरिका का भीतर तक शामिल होना। सउदी अरब जो हवाई हथियार और बम यमन पर इस समय इस्तेमाल कर रहा है वह सब अमेरिका ने ही उसे मुहैया करवाये हैं। ओबामा प्रशासन के समय में भी अमेरिका ने सउदी अरब को 15 अरब डॉलर के हथियार बेचे थे और साल 2014 में ही खाड़ी के इन छोटे-छोटे देशों को कुल 33 अरब डॉलर के हथियार बेचे थे। हथियारों के ये सौदे ट्रम्प के समय में भी न सिर्फ़ जारी हैं बल्कि और बड़े हुए हैं। इस साल की मई में ही ट्रम्प ने सउदी अरब का दौरा किया था जिसमें ऐसे ही कई और समझौते स्याहीबन्द हुए थे। ऐसे ही एक समझौते में यह भी शामिल था कि आने वाले 10 बरसों के दौरान अमेरिका सउदी अरब को 350 अरब डॉलर के हथियार मुहैया करायेगा। अमेरिका की सउदी अरब को हिमायत सिर्फ़ हथियारों के रूप में ही नहीं बल्कि सउदी अरब में जिस केन्द्र से यह हवाई हथियार यमन पर दागे जा रहे हैं उस केन्द्र में दर्जनों ही अमेरिकी सेना के अफ़सर भी सउदी सेना के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।

यमन में अमेरिकी सहायता के साथ हो रही यह दख़लअन्दाज़ी वास्तव में अमेरिकी साम्राज्य का मध्य-पूर्व में खोला गया एक नया मुहाज़ है जिस के तहत अमेरिका और सउदी अरब चाह रहे हैं कि उनका ही कोई क़रीबी व्यक्ति यमन में गद्दी सँभाले। यमन सामरिक और व्यापारिक तौर पर एक अहम जगह पर क़ायम है। यमन की बाब-अल-मन्दब पणजोड़ मिस्र की सुएज़ नदी की ही तरह एक अहम मार्ग है जो कि भारतीय महासागर को भू-मध्य सागर के साथ जोड़ता है। फ़ारस की खाड़ी में से निकलने वाला तेल इसी मार्ग से होकर अफ़्रीका की तरफ़ और फिर वहाँ से यूरोप और अमेरिका की तरफ़ जाता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 2006 में ही संसार के कुल 4.3 करोड़ बैरल तेल सप्लाई में से अकेले इस रास्ते से 33 लाख बैरल तेल (एक बैरल तक़रीबन 159 लीटर के बराबर होता है) रोज़ाना की पूर्ति होती थी। वाशिंगटन में बसे एक अमेरिकी विदेश नीति के माहिर एन्थनी कौरडसमैन के मुताबिक़ इस मसले में अमेरिका के दाव पर लगे हितों में, “सुएज़ नदी के रास्ते गुज़रने वाले हर जहाज़ी माल का ख़र्चा और सुरक्षा, इस नदी में चलतीं-फिरतीं अमेरिका और सहयोगी देशों की जंगजू बेड़ियाँ, मिस्र की आर्थिक स्थिरता, और सउदी अरब की जद्दाह में मौजूद अहम बन्दरगाह की सुरक्षा और खाड़ी से बाहर तेल निर्यात करने की एक अहम जगह की सुरक्षा शामिल हैं।” कहने का तात्पर्य है कि यह साम्राज्यवादी युद्ध भू-राजनीतिक पक्ष से और वैश्विक प्रभुत्व के पक्ष से अहम है।

निकट भविष्य में यमन के इस संकट का कोई हल होता नज़र नहीं आ रहा। अमेरिका ने यमन संकट के हल के लिए “बातचीत” का दिखावा करने की कोशिश करते हुए यह माँग रखी है कि पहले हूती विद्रोही अपने सभी हथियार उनको सौंप दें, फिर ही अमेरिका बातचीत के लिए तैयार होगा। कोई भी यह समझ सकता है कि यह बातचीत को गम्भीरता के साथ चलाने के लिए दूसरे पक्ष को न्यौता देना नहीं है, बल्कि सीधा-सीधा यह कहना है दूसरा पक्ष पहले हमारे सामने समर्पण करे, फिर ही हम बातचीत करेंगे। ऐसी अमेरिकी धौंस भला कैसे बातचीत का रास्ता साफ़ कर सकती है? ज़ाहिर है अमेरिकी सहायता वाले इस सउदी गँठजोड़ ने पिछले तक़रीबन 17 सालों से ही इराक़, अफ़ग़ानिस्तान, लीबिया, सीरिया और अब यमन को एक के बाद एक निशाना बनाया है। अमेरिका इस समय अपनी गिरती हुई आर्थिक ताक़त को अपनी सैन्य श्रेष्ठता के ज़रिये सन्तुलित करने की कोशिश कर रहा है और अपने वैश्विक प्रभुत्व के मंसूबों में बाधा बनती हर ताक़त को ख़त्म करने के मक़सद के साथ युद्धों को जनम दे रहा है। यह वैश्विक प्रभुत्व का नेतृत्व क़ायम रखने की एक वहशियाना लड़ाई है जिसको मज़दूर वर्ग के नेतृत्व वाली पूँजीवाद-विरोधी, साम्राज्यवाद-विरोधी नयी समाजवादी क्रान्तियाँ ही रोक सकती हैं।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2018

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