कय्यूर के उन चार शहीदों की गाथा जिन्होंने देश की आज़ादी  के लिए संघर्ष में अपना जीवन न्योछावर कर दिया

ब्रिटिश राज के आखि़री दशक में पूरे देश में किसानों और मज़दूरों के आन्दोलनों की बाढ़ आ गयी थी जिसके बारे में ज़्यादातर लोग बहुत ही कम जानते हैं क्योंकि पढ़ाये जाने वाले इतिहास में इनकी कोई चर्चा नहीं होती। यहाँ हम उत्तरी केरल में मालाबार इलाक़े के कसरगोद तालुक के एक गाँव में हुए किसान विद्रोह पर आधारित निरंजन के प्रसिद्ध उपन्यास ‘चिरस्मरणीय’ का एक अंश पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।
ब्रिटिश सरकार के पिट्ठू ज़मींदारों के शोषण-उत्पीड़न से त्रस्त और उनके क़र्ज़ के जाल में फँसकर तबाह किसानों और ग़रीब मज़दूरों ने सामन्तवाद और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के ख़ि‍लाफ़ ऐतिहासिक लड़ाई छेड़ी थी। यह उस गाँव के किसानों के न्यायोचित संघर्ष की कहानी है। यह कय्यूर के उन चार शहीदों की गाथा है जिन्होंने देश की आज़ादी और ग़रीब जनता की बेहतर ज़िन्दगी के लिए संघर्ष में अपना जीवन न्योछावर कर दिया था। 29 मार्च 1943 को कय्यूर के चार बेटों – अप्पू, चिरुकण्डन, कुहाम्बू और अबु बक्र को फाँसी दी गयी थी।

जज ने अपना फ़ैसला पढ़ना समाप्त किया और अदालत की उस दिन की कार्रवाई की समाप्ति की घोषणा कर दी। बाईस किसानों की हथकड़ियाँ खोल दी गयीं। वे वहीं खड़े रहे, गये नहीं। राजाराव के चेहरे की मुस्कुराहट ग़ायब हो गयी। उसका लाल चेहरा काला पड़ गया। एक-एक क़दम उसके लिए भारी पड़ने लगा। ”मुझे पता था, वे लोग न्याय की हत्या कर देंगे।” पिल्लई ने कहा, ”हम लोग अपील करेंगे। घबराओ नहीं।” वह अपने होटल के लिए चल पड़ा।
उस सुबह क़ैदियों के पीछे-पीछे पुलिस की एक गाड़ी आयी थी। उसमें सशस्त्र सिपाही थे। अब चार को दूसरों से अलग करना होगा। कुट्टी कृष्णन को भी। किसान एक-दूसरे से मानो चिपक गये थे, इस भय से कि कुछ नयी बात हो जायेगी। कुट्टी कृष्णन को अबु बक्र के साथ हथकड़ी लगायी गयी थी। बाल संघ और वालण्टियर ब्रिगेड के नेता को। अब वे एक साथ नहीं रह सकते थे। फाँसी के फन्दे के लिए कुट्टी कृष्णन अभी बहुत छोटा था। सिपाही उन्हें अलग करने आये। कुट्टी कृष्णन, अबु बक्र की बाँहों को पकड़कर झूल गया। ”एट्टन-एट्टन” (भइया-भइया) कहकर रो पड़ा। सिपाही ने हथकड़ी को निकाल दिया और दूसरी हथकड़ी पहना दी। ”भइया-भइया, मैं तुम्हारे साथ जाऊँगा।” अबु बक्र शून्य में देखता खड़ा रहा। उसके आँसू उसकी छाती पर गिर रहे थे। मोटा, जिसका हृदय फौलाद का था, दीवार से टिककर खड़ा हो गया। उसने अपनी बाँहों में चेहरा छुपा लिया और सुबकने लगा। मास्टर जी मुस्कुराने की कोशिश कर रहे थे। अप्पू और चिरुकण्डन ने पूछा, ”अब वे हम लोगों को अलग ले जायेंगे सर?”
उनके छात्र कुछ कह रहे हैं – वे बहुत छोटे थे…दस साल पहले की बात है…वे क्या कह रहे हैं? आप बहुत बीड़ी पीते हैं, है न सर? नहीं अप्पू, नहीं चिरुकण्डन। अब मैं बीड़ी नहीं पीता। क्या? नहीं?
”क्या वे हम चारों को अभी ही ले जायेंगे सर?” अप्पू और चिरुकण्डन ने अपना सवाल दोहराया।
मास्टर जी के गले में कुछ अटक गया। उन्होंने उसे घोंटते हुए कहा, ”नहीं। थोड़ी देर के लिए हम लोग साथ-साथ रहेंगे।”
किसी ने पूछा, ”क्या पाँच साल सज़ा काटने के बाद उन्हें फाँसी दी जायेगी वकील साहब।”
राजाराव ने बताया ऐसा नहीं होता। जब दो सज़ाएँ एक साथ सुनायी जाती हैं तो मौत की सज़ा ही दी जाती है।
”अच्छा होगा कि जिन लोगों को मुक्त कर दिया गया, वे घर चले जायें। है न सर।” चिरुकण्डन ने कहा।
सचिव अगले क़दम के बारे में सोच रहा था।
”हाँ ठीक है।”
”और उनका ख़र्च।”
”आपके कुछ लोग बाहर हैं।” राजाराव ने कहा, ”वे लोग सारी व्यवस्था कर देंगे। चिन्ता मत करें।”
”चलो-चलो।” सिपाही चिल्लाया। अड़तीस क़ैदियों को अब पैदल नहीं चलना पड़ा, पुलिस की गाड़ी थी।
लोग उनके क़रीब आ रहे थे। किसान नहीं, कय्यूर तो बहुत दूर था। ये लोग शहर के लोग थे…वे जानते थे कि दुख क्या होता है…हो सकता है उनके बीच जासूस भी हों। फूलों के बीच जैसे काँटे होते हैं।
गाड़ी में सबसे पहले उन चार लोगों को चढ़ाया गया। अप्पू, चिरुकण्डन, कुन्हाम्बु, अबु बक्र को। ि‍फर कुट्टी कृष्णन को। उसके बाद मास्टर जी को और तब दूसरों को। जिन किसानों को रिहा कर दिया गया था, वे भी चढ़ने की कोशिश कर रहे थे।
”…एई…अकल नहीं है क्या? बन्द करो, दरवाज़ा बन्द करो।”
”इन्क़लाब…” अचानक कोई बोल उठा।
”ज़िन्दाबाद” सिर्फ़ एक आवाज़ आयी वह भी रुकी हुई-सी।
”इन्क़लाब…” इस बार आवाज़ बुलन्द थी।
”ज़िन्दाबाद…” सैकड़ों कण्ठों से आवाज़ आयी।
किसान, शहर के लोग और गाड़ी में बैठे क़ैदी भी एक साथ बोल पड़े।
”सरकारी दमन – मुर्दाबाद”
”साम्राज्यवाद – मुर्दाबाद”
”इन्क़लाब ज़िन्दाबाद”
पुलिस भीड़ को हटाने की कोशश कर रही थी। गाड़ी आगे बढ़ी, कुछ आवाज़ें आयीं।
”कय्यूर के कामरेडों को लाल सलाम।”
गाड़ी तेज़ हो गयी। ”लाल सलाम कामरेड”
…ऊँची दीवारों के पीछे की जेल।
जेलर उनसे बात करने आया।
”आप लोग अपील करने तो जा ही रहे होंगे?”
”जी हाँ।”
”यही होता है, आप लोगों को ज़्यादा दिक़्क़त नहीं होती। पर लड़ाई का समय है ना।”
किसी जवाब की ज़रूरत नहीं थी। हाँ एक लड़ाई जारी थी। मौत की सज़ा पाये चारों क़ैदियों को अलग कोठरी में डाल दिया गया। कुट्टी कृष्णन को कहीं और रखा गया। बाक़ी को एक कोठरी में रखा गया।
”कुछ दिन और यहाँ रहना है।” मास्टर जी ने जेलर से कहा, ”हम लोग क्या एक साथ नहीं रह सकते।”
”साॅरी, क़ानून इसकी इजाज़त नहीं देता। हम क्या कर सकते हैं?”
अँधेरा हो गया। बातचीत धीमी पड़ गयी। सभी ऊँघ रहे थे। कन्नन ने आहिस्ता-आहिस्ता गाना शुरू किया। यह गाँव की एक औरत के बारे में था, जिसे बच्चों के लिए मनौती मानने के बाद एक बेटा पैदा हुआ। उसकी आवाज़ दीवारों को पार करती हुई अप्पू और चिरुकण्डन तक भी पहुँची।
”आज बीड़ी नहीं चाहिए?” गार्ड आया था।
मोटा आज नहीं था, जो बीड़ी बाँटता। किसी ने जवाब नहीं दिया। मास्टर जी ने हाथ बढ़ाया, ि‍फर वह चला गया।
…कम से कम एक सप्ताह और मास्टर जी ने सोचा। हर किसी के घर वाले को यहाँ बुलाने का इन्तज़ाम करना होगा। पर, अगली ही सुबह उन्हें भारी सुरक्षा व्यवस्था के बीच कन्नानूर ले जाया गया।
होसदुर्ग, नीलेश्वर, तेजस्विनी, चरवात्तूर स्टेशन, त्रिकरापुरा, रेलगाड़ी बढ़ती जा रही थी।
…वह एक बड़ी जेल थी। कहना मुश्किल था कि किनकी संख्या अधिक थी। चोरों की, डाकुओं की या देशभक्तों की। वहाँ कुछ ऐसे किसान भी थे जो तेलीपरम्बा के किसान सम्मेलन में शरीक हुए थे। उन्होंने कय्यूर के लोगों का स्वागत किया। उत्सुकतापूर्वक ख़बरों की जानकारी हासिल की। लगा कि एक बड़ा परिवार है।
पर, यहाँ भी नियम-क़ानून थे। मौत की सज़ा पाये चारों लोगों को अलग कोठरी में रखा गया। उन्हें बन्द कोठरी में दिन-रात रहना पड़ता था, बाक़ी लोगों को दूसरे क़ैदियों के साथ हाज़िरी या काम के समय मिलने-जुलने की अनुमति थी। गार्ड कड़े थे, पर दीवारें भी बोलती थीं। गार्ड भी कभी-कभी अचानक कुछ कह देते, या कोई समाचार सुना देते, फिर चले जाते। छोटी-छोटी पर्चियाँ यहाँ-वहाँ पहुँच जातीं।…
सिर्फ़ मद्रास हाई कोर्ट में अपील की गुंजाइश थी। सुनवाई की लम्बी तारीख़ तय हुई, पर जजों ने एक बार तय कर लिया तो फ़ैसला तुरन्त आ गया। फ़ैसला निर्विरोध था। हाई कोर्ट ने कहा कि सेशन जज का फ़ैसला सही था।
…जब ख़बर मिली तो अप्पू ने चिरुकण्डन से पूछा जो पास की कोठरी में था। ”तो मुक़दमे का सारा झंझट अन्त में ख़त्म हुआ?”
अभी ख़त्म नहीं हुआ था। कय्यूर बचाव समिति लन्दन की प्रीवी कौंसिल तक गयी। लड़ाई के ज़माने में भारतीय संघीय अदालत सबसे ऊँची अदालत थी। प्रीवी कौंसिल ने कय्यूर का मामला उसे सौंप दिया।
संघीय अदालत की नज़र में मद्रास हाई कोर्ट का फ़ैसला सही था।
”अन्ततः सब समाप्त हुआ।” अप्पू ने कहा।
नहीं, अभी भी समाप्त नहीं हुआ था। बचाव समिति का एक वकील एक दिन उन चारों के पास आया और उनसे एक जगह हस्ताक्षर करने को कहा।
”अब क्या करने जा रहे हैं।” चिरुकण्डन ने पूछा।
”हम लोग दया की याचना करेंगे।”
”दया की?” अप्पू गरज उठा। ”नहीं चाहिए हम लोगों को दया। आप जा सकते हैं।”
”नहीं कामरेड…मैं…”
”आप हम लोगों को इज़्ज़त के साथ मरने देंगे या नहीं!”
वकील चला गया। फिर मास्टर जी ने बाहर के लोगों के साथ गोपनीय तरीक़े से बातचीत की। पर्चियाँ बाहर से आयीं-गयीं।
मास्टर जी ने अप्पू और दूसरों से धैर्य के साथ विचार किया।
”अगर तुम इस तरह देखो, हम लोगों को इस अदालत पर क्या विश्वास था? फिर भी हम उसके सामने खड़े हुए और मुक़दमे की कार्रवाई में शामिल हुए, ठीक है ना? यह सिर्फ़ एक नियमित काम था। हमारा उद्देश्य क्या है? क्या उसकी प्राप्ति के लिए हमें तुम्हारी ज़रूरत नहीं है? दया की माँग करने में कुछ भी अपमानजनक नहीं है। याद रहे हमें अभी भी क्या हासिल करना है। यह मत भूलो कि सारे देश के लोग तुम्हारी रिहाई के लिए आन्दोलन कर रहे हैं।”
मास्टर जी जीत गये। चारों ने अपील पर हस्ताक्षर कर दिये।
कुट्टी कृष्णन को बेजवाड़ा जेल भेज दिया गया। कय्यूर का नाम पूरे देश में और दुनिया के प्रमुख शहरों तक पहुँच गया। लोगों ने इन चारों को बचाने के लिए संघर्ष शुरू कर दिया।
शासक टस से मस नहीं हुए। सरकार चुप थी। उस बड़ी लड़ाई के समय जनता के सामने झुकना कमज़ोरी की निशानी होती और सारे हिन्दुस्तान के लोग गर्वनर के आदेश की उम्मीद लगाये बैठे थे।
…भारत का राजनीतिक माहौल मेघाच्छन्न था। एक तूफ़ान उमड़ रहा था। बिजलियाँ चमक रही थीं और बादल गरज रहे थे। एक दिन नौ अगस्त को बादल फटा और घनघोर बारिश शुरू हो गयी। गलियों में लोगों की बाढ़ आ गयी। उसने अहिंसा के जादुई परदे को हटा दिया और अपना उग्र रूप दिखाया। सरकार ने उसे रोकने की कोशिश की। संघर्ष की लहरें जेलों की दीवारों से टकराने लगीं। अन्दर के लोग सबकुछ सचेत होकर देख-सुन रहे थे।
…जेल लोगों से भर गयीं।
मद्रास में अंग्रेज़ गवर्नर ने दया की याचिका की अनदेखी कर दी।
”अन्ततः सब समाप्त हो गया।” अप्पू ने चिरुकण्डन से कहा।
वह हँसा, ”हाँ अप्पू। अब हम एक साथ फाँसी के फन्दे तक जायेंगे। एक- दूसरे का हाथ पकड़े।” पर सरकार व्यस्त थी। उसे उन्हें फाँसी देने की फ़ुरसत नहीं थी। उन्हें इन्तज़ार करना पड़ा। अप्पू को एक रात विचित्र सपने आये। लोग जेल की दीवारों को तोड़कर क़ैदियों की हथकड़ियाँ खोल रहे हैं। फिर वे पूरे देश में घूम-घूमकर अंग्रेज़ अफ़सरों को पकड़ रहे हैं। उनके उन देशी नौकरों को पकड़ रहे हैं, जिन्होंने अपनी आत्माएँ बेच दी हैं। ज़मींदारों और पूँजीपतियों को पकड़ रहे हैं और उन्हें कालकोठरियों में बन्द कर रहे हैं।
अप्पू ने अपना सपना चिरुकण्डन को अपनी कोठरी की सलाखों के पीछे से सुनाया। ”उनमें नम्बियार भी था। वह गिड़गिड़ा रहा था, ‘अप्पू मैंने तुम्हें रात्रि पाठशाला शुरू करने की अनुमति दी थी ना? मुझे छोड़ दो भाई।’ पर हम चारों में तुम, कुन्हाम्बु और अबु बक्र अपने कन्धों पर बन्दूक़ रखे वहाँ से चले गये। कन्नन गा रहा था और आगे-आगे झण्डा लिये चल रहा था। मास्टर जी और पण्डित जी हमसे बहुत पीछे थे। ‘भागो नहीं लड़को, भागो नहीं, आहिस्ता- आहिस्ता’…और मेरी नींद टूट गयी।”
चिरुकण्डन ने सुनकर कहा, ”सपने वैसे ही आते हैं, जैसा तुम सोचते हो।”
इस सपने की कहानी कुन्हाम्बु से होते हुए अबु बक्र तक पहँुची। यह एक सपना मात्र था, पर सुनकर उनके मन में उम्मीद पैदा हुई।
”शायद हम चारों यह देखने के लिए नहीं रहेंगे” अबु बक्र ने कहा, ”पर ऐसा होगा। बस यही अर्थ है इस सपने का। और नम्बियार भी उसी तरह गिड़गिड़ायेगा, जैसा तुमने अपने सपने में देखा है।”
कुन्हाम्बु ने अबु बक्र की बातें चिरुकण्डन तक पहुँचाई जिसने अप्पू को बता दी। बारिश रुक गयी। लोगों की बाढ़ उतर गयी। जब लोग एकजुट नहीं रहे और कोई नेता नहीं था, तब सरकार को आन्दोलन कुचलने में आसानी हुई। फाँसी का दिन तय हो गया। फिर उसे आगे बढ़ा दिया गया। सरकार ने महसूस किया कि तिथि की पूर्व घोषणा मूर्खता होगी। वह डर गयी थी। अप्पू खीजा हुआ और ग़ुस्से में था।
”क्यों नहीं सबकुछ जल्दी समाप्त कर देते हैं।”
… … …

शाम ढल रही थी। बस एक रात और ढलने की देर है और फिर सुबह हो जायेगी। जेलर के जूतों की आवाज़ पास आती सुनायी पड़ी। ठक-ठक-ठक।
”आज रात को क्या खाना चाहोगे?”
”आज रात को?”
”तुम लोग जो चाहो हम तैयार कर सकते हैं।”
”हमें कुछ नहीं चाहिए।”
”तुम्हारी आखि़री इच्छा क्या है? हम उसे पूरी करने की कोशिश करेंगे।”
”सुना अप्पू? और तुम क्या चाहते हो कुन्हाम्बु? अबु बक्र?”
”बोलो यहाँ ये लोग उसे पूरा करेंगे।”
अबु बक्र का अट्टहास। एक व्यंग्यात्मक आवाज़, ”हम अपने मरने से पहले साम्राज्यवाद का नाश चाहते हैं। चिरुकण्डन उनसे पूछो तो, वे हमारे लिए ऐसा कर सकते हैं।” अप्पू और चिरुकण्डन मास्टर जी के बारे में सोच रहे थे। …क्या मास्टर जी से भेंट सम्भव है?
”एक और इच्छा है कुन्हाम्बु? क्या हम लोग उनसे कहें अबु बक्र?”
”बोलो कामरेड बोलो।”
”जेलर साहब हमारी एक ही इच्छा है। मास्टर जी से भेंट करने की।”
लेकिन जेल का क़ानून।
”वह तो एक क़ैदी है! पता नहीं सम्भव हो पायेगा या नहीं। फिर भी सुपरिण्टेण्डेण्ट से पूछता हूँ।”

नज़दीक आ रहे जूतों की आवाज़। क्या सुपरिण्टेण्डेण्ट आ रहा है?
दो सशस्त्र गार्डों के बीच मास्टर जी आ रहे थे। दोनों ओर से हथकड़ियाँ लगी हुई थीं।
जेलर सामने आया, ”मिलने की अनुमति मिल गयी। पर ज़्यादा देर तक नहीं।”
”क्या आप थोड़ा हटकर खड़े हो सकते हैं।” चिरुकण्डन ने पूछा। उसकी आवाज़ काँप रही थी।
”माफ़ करना। हमें यहीं रहने का आदेश है।”
”क्योंकि हम लोग यहाँ कोई और साज़िश रच सकते हैं। यही बात है ना?” अबु बक्र ने पूछा।
”उन्हें रहने दो अबु बक्र।”
चारों कोठरियों के बीच में मास्टर जी खड़े थे और मुस्कुराने की कोशिश कर रहे थे।
कुछ समय चुप्पी में ही बीत गया। उन्हें बातचीत करनी चाहिए। उनका छात्र चिरुकण्डन बोला।
”कल सुबह हम लोग जा रहे हैं सर।”
और उनका छात्र अप्पू बोला। ”भूलियेगा नहीं सर।”
ओह ये लड़के क्यों मिलना चाहते थे? और कुन्हाम्बु और अबु बक्र। मास्टर जी ने सबको बारी-बारी से देखा।
नहीं, कहने के लिए कुछ नहीं था। कुछ भी कहना असम्भव था।
रुलाई फूट पड़ रही थी। पर नहीं, इनकी विदाई ऐसे नहीं होनी चाहिए।
”अप्पू-चिरुकण्डन साथ-साथ रहना … सब लोग … कुन्हाम्बु-अबु बक्र…”
”बिलकुल। हम लोग साथ-साथ रहेंगे।”
मास्टर जी ने दाहिने हाथ की मुट्ठी ऊपर उठायी। हथकड़ियाँ बज उठीं।
”लाल सलाम कामरेड।”
”लाल सलाम सर।”
”लाल सलाम कामरेड।”
वह एक काली रात थी। जेल की कोठरियों के बाहर सितारों की रोशनी फीकी-सी थी। रह-रहकर सन्तरी की आवाज़ आती — ”सब ठीक है।” और घण्टे की आवाज़। आठ बजे, नौ बजे, दस…
समय बीत रहा था। कोई सोया नहीं। सारी दुनिया के बारे में वे सोचते रहे। कय्यूर — फिर स्तालिनग्राद, लन्दन और दिल्ली…
”चिरुकण्डन, कुन्हाम्बु क्या कर रहा है? अबु बक्र से कहो कुछ बातचीत करे।”
”कुछ भी”
”किस बारे में?”
उन्होंने अपने बचपन के बारे में बातचीत की। पुरानी यादों के बारे में।
चिरुकण्डन उन दिनों के बारे में सोच रहा था, जब वह किसान सम्मेलन की तैयारियाँ कर रहा था। सिपाही सुब्बैया के बारे में — लगता है उसकी बीबी होगी और बच्चे। पर वह विदेशी सरकार के पहरे का कुत्ता था। इसीलिए कुत्ते की मौत मरा। उन्होंने उसे नहीं मारा। पर उनकी मौत का इन्तज़ाम इसी बहाने किया गया है कि उन्होंने ही उसे…। कुन्हाम्बु…संघ के कार्यालय के लिए थोड़ी-सी ज़मीन देने का सिला उस बेचारे को क्या मिला। और अबु बक्र को ज़ोर-ज़ोर से रोने की इच्छा हुई।
”क्या अप्पू…क्या हुआ।”
”कुछ नहीं-कुछ नहीं।”
”किसी को खेद नहीं होना चाहिए। कल इतिहासकार लिखेंगे। वे फाँसी के तख़्ते पर बहादुर की तरह चढ़ गये।”
”मुझे और एक बात का अफ़सोस है चिरुकण्डन।”
”क्या है अप्पू?”
”हममें से कोई गाना नहीं जानता। नहीं तो हम लोग कल एक साथ गाते हुए जाते।”
”कोई बात नहीं है। हम लोग ‘इन्क़लाब ज़िन्दाबाद’ का नारा लगाते हुए जायेंगे।” कुन्हाम्बु अपने भाइयों के बारे में सोच रहा था। फिर वह अपने दूसरे भाइयों के बारे में सोचने लगा। देश के हज़ारों भाइयों के बारे में। अगर उसे जीने का और मौक़ा मिले तो फिर वह सबकुछ करेगा, इसी रास्ते को अख़्तियार करेगा।
अबु बक्र कुट्टी कृष्णन को याद कर रहा था। ”कामरेड” काफ़ी नहीं था। वह अबु बक्र को ”एट्टन” (भइया) भी कहता था। जब देश आज़ाद होगा, वह मुक्त हो जायेगा। वह कय्यूर लौटेगा और वालण्टियर ब्रिगेड का नेतृत्व करेगा।…
”चिरुकण्डन याद है तुम हमेशा इस डर से किनारे ही रहते थे कि मछलियाँ काट लेंगी।”
”हाँ।”
…आधी रात बीत चुकी थी। सन्तरी लैम्प लेकर घूम रहे थे। कोई सोया क्यों नहीं है? मास्टर जी, कन्नन, कोई नहीं सोया है?
सुनो। कोई गा रहा है। कन्नन। उसकी आवाज़ चारों कोठरियों में पहुँचती है। और आवाज़ें। हर कोई गा रहा है। गाने की आवाज़ वहाँ से क्यों नहीं आ रही हैं जहाँ सामान्य अपराधी हैं? अपराधी? जो हो रहा है क्या उसे वह नहीं समझते? क्या वे इस गीत का अर्थ नहीं समझते?
सुनो। एक और आवाज़। एक और। कौन है यह?
”अप्पू सुन रहे हो? कोई सोया नहीं है। वे सब गा रहे हैं, हम लोगों के लिए। हमारे जाने से पहले।” कुन्हाम्बु अपनी पीड़ा छुपाने के लिए चिल्ला पड़ा।
अबु बक्र ने भर्रायी आवाज़ में गाना शुरू किया। बोल रहा था या गा रहा था? या अपनी ब्रिगेड को आदेश दे रहा था? लेफ़्ट राइट, लेफ़्ट राइट, लेफ़्ट राइट…। या उसके दिल की गहराइयों से कोई शोक गीत उठ रहा था।
कोई अप्पू की कोठरी में गा रहा है। किसी औरत की आवाज़ है। धीमी ममतामयी आवाज़ में गा रही है…
”सो जा मेरे बच्चे…”
”अम्मा।”
”मेरे प्यारे बच्चे…”
”अम्मा…अम्मा…”
”अप्पू…एई अप्पू…”
डिंग-डांग, डिंग-डांग…सिर्फ़ दो घण्टे बचे हैं। जेल आज सोया नहीं है। एक कौआ बोलता है। दीवारों के पीछे पेड़ों पर…काँव-काँव…
उन आवाज़ों पर कोई असर नहीं पड़ता। गीत गा रही आवाज़ों पर…अबाध अनन्त गीतों पर…
ठण्डी हवा चल रही है। पौ फट रही है। आखि़री बार। धीरे-धीरे…
और उसकी साड़ी काले रंग की है।
चिरुकण्डन उठ खड़ा होता है।
”उठो कामरेड। सुबह हो गयी…।”
गार्ड आते हैं। जेलर। वार्डन और डिस्ट्रिक्ट कलक्टर।
”मार्च।”
चारों दृढ़ क़दमों से आगे बढ़ते हैं।
”हाल्ट!”
वार्डन अपनी घड़ी देखता है। पाँच मिनट बाक़ी हैं। हथकड़ियाँ खोल दी जाती हैं।
”मत छुओ हम लोगों को!” चिरुकण्डन दृढ़ आवाज़ में कहता है। ”हम ख़ुद चढ़ेंगे इस पर।”
”उन्हें जाने दो।” कलक्टर कहता है।
सशस्त्र गार्ड अपनी बन्दूक़ों को उन पर तान देते हैं, एहतियात के तौर पर।
दो मिनट और।
जेल की कोठरियों से आवाज़ें और तेज़ हो जाती हैं, और गीत और तेज़ तथा स्पष्ट।
…कलक्टर अप्रसन्नता जाहिर करता है। वार्डन फिर अपनी घड़ी देखता है। नीचे एक गड्ढा है। उसके ऊपर चार तख़्ते। ऊपर फन्दे झूल रहे हैं।
”उनके चेहरे ढँक दो।”
”हमें नक़ाब नहीं चाहिए।”
हर गरदन में फन्दा पहना दिया जाता है।
चिरुकण्डन ज़ोर से चिल्लाता है।
”इन्क़लाब…”
और अप्पू, कुन्हाम्बु, अबु बक्र जवाब देते हैं —
”ज़िन्दाबाद…”
”साम्राज्यवाद मुर्दाबाद”
”इन्क़लाब ज़िन्दाबाद”
वार्डन संकेत देता है। फन्दे उनकी गरदन को और उनकी आवाज़ को कस लेते हैं। तख़्ते हटा दिये जाते हैं। फन्दे और कस जाते हैं।
”तब तक लटकाया जाये जब तक मर नहीं जाते।”
शवों से कोई आवाज़ नहीं आती। पर, कोठरियों से ”इन्क़लाब ज़िन्दाबाद” का उद्घोष सुनायी पड़ता है।
सुबह हो चुकी थी। किसी भी समय सूरज उग सकता था। पर उग क्यों नहीं रहा?
”उनके लोग शवों के लिए आये हैं।” वार्डन फुसफुसाता है।
”उन्हें कैसे पता चला।”
”पता नहीं। पर आये हैं।”
”वे करेंगे क्या शवों का? उनको जुलूस में ले जायेंगे?”
”उनका कहना है कि उन्हें उनके गाँव ले जायेंगे।”
”असम्भव।” कलक्टर ने फ़ैसला सुनाया। ”उन्हें शव मत सौंपो। यहीं दफ़न कर दो।”
…जेल से बाहर, शहर जाग चुका है। शोक और विजय के गीत शहर में यह ख़बर फैला देते हैं कि कय्यूर के नायक शहीद हो चुके हैं।
ज़मींदार नम्बियार की नींद उड़ चुकी थी। वह कुछ ऐसा करना चाहता था जो अरसे से उसके मन में था। इसलिए शाम को वह स्कूल तक गया। उसके साथ कुल्हाड़े लिये उसके नौकर थे।
मास्टर जी के लगाये आम के दोनों पेड़ फलों से लदे हुए थे, जैसे पच्चीस-पच्चीस साल के दो नौजवान हों।
”काटके गिरा दो इन्हें!” नम्बियार चिल्लाया। ”काटके गिरा दो।”
पेड़ में चार आदमियों की ताक़त थी। ज़मींदार के नौकर कुल्हाड़ा चलाते-चलाते थक गये। पसीने-पसीने हो गये।
बाद में जब अँधेरा हो रहा था कन्नानूर से ख़बर लेकर कोई आया…
…तपती हुई धरती ठण्डी पड़ गयी। हवा थम गयी और पेड़ चुप हो गये।
उस रात कय्यूर में कोई रोशनी नहीं हुई। लोग अँधेरे में बैठे रोते रहे।
जानकी बाहर आँगन में अप्पू कुट्टी के साथ थी। लड़का लगातार सिसक रहा था। जानकी से चुप नहीं हो रहा था। उसने रात के आकाश की ओर देखा जहाँ लाखों सितारे चमक रहे थे। पश्चिम में उसे लगा कि चार सितारे पहले से कहीं अधिक चमक रहे हैं।
जानकी ने पहले सितारे की ओर इंगित करके कहा, ”अप्पू कुट्टी। देख। तेरे पिता वहाँ हैं। तू रो मत। उन्हें अच्छा नहीं लगेगा।”
वह रात बड़ी लम्बी थी।
क्रमशः अँधेरा छँटा और सुबह हुई।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2017

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