करोड़ों “स्‍लमडॉग” और मुट्ठीभर करोड़पति!

आनन्द सिंह, चेन्नई

dharavi-slumकई ऑस्कर अवार्ड जीतने वाली फ़िल्म ‘स्लमडॉग मिलिनायर’ को इलेक्ट्रानिक और प्रिण्ट मीडिया में मिले धुआँधार प्रचार की बदौलत दुनियाभर में इसकी चर्चा हो रही है। भारत में तथाकथित सेलिब्रिटी कलाकार और पत्रकार टेलीविज़न चैनलों पर इस बहस में उलझे हैं कि इसे भारतीय फ़िल्म माना जाये या नहीं और भारतीयों को इसका जश्‍न मनाना चाहिए या नहीं। यह फ़िल्म रोडपति से करोड़पति बनने की आम फ़ार्मुला छाप कहानी है जिसमें मुम्बई की एक झुग्गी में रहने वाला लड़का टीवी शो “कौन बनेगा करोड़पति” में 1 करोड़ रुपये जीत लेता है।

उम्मीद तो इस बात की थी कि इस फ़िल्म की सफलता शहरी भारत की झुग्गियों में रहने वाले करोड़ों लोगों की अमानवीय जीवन स्थितियों की ओर दुनिया का ध्यान खींचेगी और बहस का मुद्दा यह होगा कि इन स्थितियों को बेहतर कैसे बनाया जाये। लेकिन, जैसाकि अक्सर होता है, तथाकथित सेलिब्रिटी लोगों ने पूरे मुद्दे को हाइजैक करके भारतीय बनाम विदेशी फ़िल्म की बहस तक समेट दिया है।

मध्य वर्ग और उच्च मध्य वर्ग के बहुत से हिन्दुस्तानी, जिनके लिए इण्डिया अब भी शाइनिंग है, उन्हें यह फ़िल्म नागवार गुज़री क्योंकि यह भारत की छवि ख़राब करती है। हालाँकि इस बात में थोड़ी सच्चाई है कि पश्चिम में यह फ़िल्म इसलिए भी इतनी हिट हुई है क्योंकि विदेशियों के मन में भारत की इस छवि को ही पुख्ता करती है कि यह गन्दगी, बीमारी और झुग्गियों से भरा तीसरी दुनिया का ग़रीब देश है। लेकिन यह भी सच है कि फ़िल्म भारत की बहुसंख्यक मेहनतकश आबादी के वास्तविक जीवन स्तर को दर्शाती है और इस मामले में इसने कुछ भी बढ़ाचढ़ाकर नहीं दिखाया है। इसकी शूटिंग स्टूडियो के सेट में नहीं वास्तव में झुग्गी बस्ती में ही हुई है। इसने भारत के ऐसे पहलू को दिखाया है जिसे बॉलीवुड के बड़े बैनर वाले दिखाना पसन्द नहीं करते।

लेकिन झुग्गियों के जीवन की असली तस्वीर पेश करने के बावजूद यह फ़िल्म झुग्गी में रहने वालों की समस्याओं के बारे में नहीं है। इसके बजाय, यह झूठ के बारे में है कि यह व्यवस्था हरेक को इतना मौक़ा देती है कि एक झुग्गीवाला भी करोड़पति बनने की उम्मीद पाल सकता है। जैसे-जैसे फ़िल्म आगे बढ़ती है, सच्चाई से इसका नाता ख़त्म हो जाता है। सच तो यह है कि भारत में झुग्गियों का कोई निवासी सिर्फ़ अपराध की दुनिया में जाकर ही 1 करोड़ रुपये कमाने की बात सोच सकता है। अगर क़िस्मत से उसकी लॉटरी लग ही जाये, जैसाकि फ़िल्म में दिखाया गया है, तो भी इससे भारत की झुग्गियों में रहने वाले करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा जो अब भी इन्सान की तरह जीने के लिए ज़रूरी सुविधाओं से वंचित हैं। सच्चा कलाइमेक्स तो यह होगा कि करोड़ों झुग्गीवासियों की ज़िन्दगी को मानवीय बनाने के लिए व्यवस्था में बदलाव किया जाये न कि करोड़पति बनने के झूठे सपने दिखाये जायें। कई मामलों में यह फ़िल्म उसी पूँजीवादी सोच को पेश करती है जो देश में करोड़पतियों की बढ़ती तादाद पर जश्‍न मनाती है लेकिन इस तथ्य की अनदेखी करती है कि करोड़ों लोग नर्क जैसे हालात में जी रहे हैं। आज के भारत की ही तरह, यह फ़िल्म भी इन्सान बनने के संघर्ष की प्रेरणा देने के बजाय करोड़पति बनने की झूठी आशा जगाती है। हम चाहें या न चाहें, सच तो यह है कि भारत करोड़ों “स्‍लमडॉग” और मुट्ठीभर करोड़पतियों का देश है।

 

 

बिगुल, मार्च 2009

 


 

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