नोएडा में ज़ोहरा के साथ हुई घटना : घरेलू कामगारों के साथ बर्बरता की एक बानगी

तपिश

हाल ही में नोएडा के महागुन मॉर्डन अपार्टमेण्ट में एक घरेलू कामगार महिला के साथ जो घटना हुई है, वह देश के लाखों-करोड़ों घरेलू कामगार महिलाओं के साथ होने वाली रोज़-रोज़ की बर्बरता और अमानवीयता का एक प्रमाण है। साथ ही साथ यह इस बात का भी प्रमाण है कि खाते-पीते मध्य वर्ग के धनपशुओं की बर्बरता बेलगाम हो चुकी है।

हम देखते हैं कि पूँजी की मार से उजड़ कर लाखों लोग रोज़गार की तलाश में दूरदराज़ इलाक़ों से निकलकर शहरों की ओर आ रहे हैं। पूँजीवाद ने जहाँ मुट्ठीभर आबादी को ऐशो-आराम के तमाम सरंजाम दिये हैं, वहीं अधिकांश आबादी को भयानक ग़रीबी और भुखमरी के हालात में धकेल दिया है। हमारे देश में घरेलू कामगारों की एक बहुत बड़ी आबादी काम करती है। एक अनुमान के मुताबिक़ उनकी कुल संख्या 10 करोड़ है, जिसमें स्त्री, पुरुष और बच्चे भी शामिल हैं। यह आबादी बहुत बिखरी हुई है और बेहद नारकीय जीवन बिता रही है। जिस घटना का हम जि़क्र करने जा रहे हैं, वह नोएडा के सेक्टर 78 स्थित महागुन मॉडर्न अपार्टमेण्ट में एक घरेलू कामगार महिला ज़ोहरा बीबी के साथ 11 जुलाई की घटना है। इस घटना ने साबित कर दिया है कि यह आबादी लम्बे समय तक चुप नहीं बैठेगी और देर-सवेर अपने हक़ों के लिए ज़रूर आवाज़ उठायेगी।

घटना की शुरुआत 11 जुलाई को हुई। महागुन के फ़्लैट नंबर 12 में दो घरेलू कामगार औरतें काम करती हैं। इनमें से एक, ममता बीबी खाना बनाती है और दूसरी ज़ोहरा बीबी झाड़ू-पोंछा लगाती है। घटना वाले दिन दोनों ने अपनी दो महीने से बकाया तनख्वाह माँगी तो उनसे कहा गया कि शाम को आकर पैसे ले जाना। उस दिन शाम को ज़ोहरा बाकी पाँच घरों का काम निपटाने के बाद अपने पैसे लेने पहुँची। मालकिन ने उससे कुछ काम कराया और इसी बीच उस पर पर्स से रुपये चुराने का आरोप लगा दिया। ज़ोहरा के मुताबिक उसने मारपीट भी की। एक अखबार के अनुसार, मालकिन का आरोप है कि उसके पर्स के दस हज़ार ज़ोहरा ने चुराये हैं और दूसरे अख़बार के अनुसार, मालकिन ने 17 हज़ार रुपये चुराने का आरोप लगाया और जोहरा ने दस हज़ार रुपये चुराने की बात मंज़ूर भी कर ली। एक अख़बार के अनुसार मालकिन पदाधिकारियों से शिकायत करने की बात कहकर अंदर गयी तो ज़ोहरा पकड़े जाने के डर से मोबाइल वहीं छोड़कर भाग गयी। ज़ोहरा का कहना है कि वह छोड़ कर नहीं गयी बल्कि उसका मोबाइल छीन लिया गया। वैसे, चोरी की बात पुलिस या पदाधिकरियों से तब तक नहीं बतायी गयी जब तक कि ज़ोहरा के बुरी हालत में मिलने के बाद हंगामा नहीं हो गया।

शाम हो जाने के बाद भी ज़ोहरा वापस घर नहीं पहुँची तो उसके पति अब्दुल सत्तार रात करीब आठ बजे अपनी बीवी को ढूँढ़ने महागुन अपार्टमेंट पर पहुंचे। चौकीदार ने कामकाजी लोगों के लिए बने रजिस्टर को देखकर बताया कि ज़ोहरा के आने का समय तो दर्ज है लेकिन जाने का नहीं। दो चौकीदार उनके साथ बारह नंबर फ्लैट पर गये लेकिन मालकिन ने कह दिया कि उसे कुछ नहीं मालूम। पति के सौ नंबर पर फोन करने के दो घंटे बाद पुलिस आयी और अब्दुल सत्तार के साथ फिर से 12 नंबर के फ्लैट में गयी मगर खानापूरी करके लौट आयी। अपनी झुग्गी बस्ती में वापस आकर पड़ोसियों को घटना बताने पर सबकी राय बनी कि सुबह-सुबह महागुन पर चलकर पूछा जाये। सुबह ज़ोहरा के पति के साथ बस्ती के काफी लोग महागुन के गेट पर पहुँचे और ज़ोहरा का पता लगाने के लिए हंगामा किया। इस दबाव में पुलिस आयी और करीब छह बजे ज़ोहरा को चौकीदारों के साथ महिला पुलिस किसी सामान की तरह उठाकर बाहर लायी। वह अर्द्धबेहोशी की हालत में थी और ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी। किसी तरह उसने बताया कि उस पर चोरी का आरोप लगाकर मालकिन ने मारा-पीटा, उसका मोबाइल छीन लिया। इस पर भीड़ उत्तेजित हो गयी और भीतर घुसने की कोशिश करने लगी। गार्डों ने उन्हें भीतर जाने से रोका, उनके साथ गाली-गलौज और अभद्रता की। वे लोग पहले से ही परेशान थे और गुस्से में भी थे। महागुन के गेट पर तोड़फोड हुई और पुलिस तथा चौकीदारों के बावजूद कई लोग मालकिन के फ्लैट तक पहुँच गये। आरोप लगाया गया है कि कुछ लोग फ्लैट का शीशा वगैरह तोड़कर अंदर घुस गये जिससे मालकिन और उसका बेटा डरकर बाथरूम में छिप गये। घटना के बाद दोनों तरफ से प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हुई। महागुन की तरफ से अलग-अलग तीन एफ़.आई.आर. और ज़ोहरा की तरफ से कुल एक।

तमाम अख़बारों ने इस ख़बर को इस तरह बताया जैसे कि ज़ोहरा के घरवाले और आसपास के लोग दंगाई थे, लुटेरे थे, या फिर हत्यारे थे, जिन्होंने खाते-पीते मध्यवर्ग के घरों को अपने हमले का निशाना बनाया। बहरहाल पूँजीवादी मीडिया से इससे ज़्यादा की उम्मीद की भी नहीं जा सकती है। हद तो तब हो गयी जब सोशल मीडिया, फे़सबुक, ट्विटर और व्हाट्सऐप पर इस तरीक़े के सन्देश प्रसारित होने लगे कि नोएडा को ”मालदा” बनाया जा रहा है, कि नोएडा मुस्लिम आतंकवादियों का गढ़ बन गया है। असल में मामला तो घरेलू मज़दूरी करने वाली एक महिला कामगार से जुड़ा हुआ था, लेकिन इसे साम्प्रदायिक रंग दिया जाने लगा। सोशल मीडिया पर दुष्प्रचार में सक्रिय बहुतेरे लोगों के फे़सबुक अकाउण्ट देखने पर पता चला कि ये लोग या तो मोदीभक्त थे, या कहीं-न-कहीं भाजपा की विचारधारा, संघ की विचारधारा और हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रभावित हैं। कोई हेडगेवार का समर्थक था तो कोई सावरकर का पूजक था या फिर कोई हिन्दू ”राष्ट्रवाद” का झण्डा उठाने वाला था। इससे यह भी पता चलता है कि मध्य वर्ग के वे तमाम लोग जो आज हिन्दुत्ववादी विचारधारा का समर्थन कर रहे हैं, जो ”राष्ट्रवाद” के नारे लगा रहे हैं, असल में उन्हें देश के करोड़ों-करोड़ मेहनतकशों की जि़न्दगी से कोई लगाव नहीं है। इसके ठीक विपरीत उनके भीतर मेहनतकश वर्ग के लोगों के प्रति बहुत नफ़रत भरी हुई है। वे कामगारों को कीड़े-मकौड़ों से ज़्यादा कुछ नहीं समझते। वे शायद यह समझते हैं कि ग़रीब लोग उनकी सेवा के लिए ही बने हैं और इसलिए उनके साथ ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ वाला घटिया बर्ताव करते हैं।

महागुन के सदस्यों द्वारा कामकाज करने वालों को बांग्लादेशी बताए जाने पर पुलिस ने इनकी नागरिकता की जांच करने की बात शुरू कर दी जबकि पुलिस का एक अधिकारी ज़ोहरा को भारतीय नागरिक पहले ही बता चुका था। महागुन से करीब एक किलोमीटर दूर रहने वाले ये लोग पश्चिम बंगाल के कूचबिहार ज़िले के रहने वाले हैं, जिनमें से कई 10-15 साल पहले ही यहाँ आकर बस गये थे। बस्ती की महिलाओं ने थाने पर प्रदर्शन करके अपना भारतीय निर्वाचन कार्ड और आधार कार्ड भी सबको दिखाया।

इस पूरी घटना के दौरान पुलिस महक़मा महागुन अपार्टमेण्ट के रहने वाले करोड़पतियों के पक्ष में काम कर रहा था। उन्होंने यह मानने से ही मना कर दिया कि ज़ोहरा के साथ उसकी मालकिन ने मारपीट की है और उसे महागुन अपार्टमेण्ट में ही बन्द करके रखा हुआ है। जब सुबह बस्ती के लोग महागुन अपार्टमेण्ट पहुँचे तो मजबूर होकर पुलिस को वहाँ आना पड़ा और तब पता चला कि ज़ोहरा को सचमुच में एक कमरे में बन्द करके रखा गया था। उसके साथ मारपीट की गयी थी। जब उसे इलाज के लिए अस्पताल ले जाया जा रहा था तो वह रास्ते-भर उल्टियाँ करती रही। उसकी हालत बेहद खराब थी। बाद में पता चला कि पुलिस वालों ने ख़ुद ही ज़ोहरा की तरफ़ से एक एफ़आईआर दर्ज की है, लेकिन वह इस तरह से की गयी थी कि पूरा मामला ही कमज़ोर पड़ जाये। इसके साथ ही साथ ज़ोहरा के खि़लाफ़ भी एक झूठी एफ़आईआर दर्ज करवायी गयी, जिसमें उस पर 17000 रुपये चोरी करने का मनगढ़न्त आरोप लगाया गया था। पहले बताया गया कि चोरी करते हुए ज़ोहरा का एक वीडियो है, लेकिन बाद में पता चला कि यह दावा एकदम झूठा था और ऐसा कोई वीडियो था ही नहीं। आमतौर पर यही होता है कि ग़रीब मज़दूर जब भी अपने हक़ों के लिए आवाज़ उठाते हैं तो उन्हें चोर, लुटेरा साबित करने की कोशिश की जाती है, ताकि उनकी आवाज़ को दबाया जा सके। इसके साथ ही पुलिस वालों ने उसी दिन रात के अँधेरे में, ज़ोहरा की बस्ती पर छापा मारा और क़रीब 50 लोगों को रात में उठा लिया। अगले दिन उनमें से 13 लोगों के खि़लाफ़ एफ़आईआर दर्ज की गयी और उन्हें गिरफ़्तार कर उन पर संगीन धाराओं में मुक़दमा दायर किया गया। इसके तीन ही दिन बाद अतिक्रमण बताकर उस पूरी बस्ती को बुलडोज़र चलाकर ध्वस्त कर दिया गया।   यह सब कुछ बताता है कि आज ग़रीब बिखरी हुई आबादी के लिए अपने हक़ों के लिए आवाज़ उठाना कितना मुश्किल हो गया है और जब तक कि वे संगठित नहीं हो जाते हैं, तब तक उनके सामने ये मुश्किलें बनी रहेंगी। साथ ही साथ यह घटना बताती है कि आम मेहनतकशों की एकता को तोड़ने और उनके खि़लाफ़ नफ़रत फैलाने के लिए फासीवादी ताक़तें बेशर्मी के साथ धर्म का इस्तेमाल करती हैं ताकि असली मुद्दे पर पर्दा डाला जा सके।

 

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2017

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