फ़ैक्ट्री-मज़दूरों की एकता, वर्ग-चेतना और संघर्ष का विकास*
(रूसी सामाजिक-जनवादी पार्टी के कार्यक्रम के मसौदे की व्याख्या का एक अंश)

व्ला.इ. लेनिन

 

लेनिन ने 1895 में सेण्ट पीटर्सबर्ग के सभी मार्क्‍सवादी मज़दूर मण्डलों को मिलाकर ‘मज़दूर मुक्ति संघर्ष लीग’ की स्थापना की थी जिसने मज़दूरों के बीच मार्क्‍सवाद के प्रचार-प्रसार के साथ ही हड़तालों और आन्दोलनों में भी गुप्त रूप से अग्रणी भूमिका निभायी। उस समय तक रूस के कई शहरों में मार्क्‍सवादी ग्रुप गठित हो चुके थे जिन्हें एकजुट करके लेनिन सर्वहारा वर्ग की एक अखिल रूसी पार्टी बनाना चाहते थे। इसी बीच, दिसम्बर 1895 में ज़ारशाही ने लेनिन को गिरफ्तार कर लिया। चौदह महीने तक विचाराधीन क़ैदी के रूप में जेल में रखने के बाद उन्हें तीन वर्ष के लिए साइबेरिया निर्वासन का दण्ड सुनाया गया। 

जेल और निर्वासन के दौरान लेनिन लगातार सैद्धान्तिक और प्रचारात्मक-आन्दोलनात्मक लेखन करते रहे। जेल में रहते हुए दिसम्बर 1895 से जुलाई 1896 के बीच उन्होंने रूस की सामाजिक-जनवादी पार्टी के कार्यक्रम का एक मसौदा तैयार किया और आम कार्यकर्ताओं तथा मज़दूरों को समझाने के लिए उसकी एक लम्बी व्याख्या भी लिखी। यह सबकुछ उन्होंने दवाइयों की किताब की पंक्तियों के बीच अदृश्य स्याही के रूप में दूध का इस्तेमाल करते हुए लिखा। यह लेनिन का महत्वपूर्ण प्रारम्भिक लेखन है। पार्टी कार्यक्रम के इस प्रस्तावित मसौदे और उसकी व्याख्या का पहले-पहल प्रकाशन 1924 में हो पाया। 

यह दस्तावेज़ मज़दूरों और कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं के अध्ययन के लिए आज भी बेहद प्रासंगिक है। हम यहाँ ‘मज़दूर बिगुल’ के पाठकों के लिए उक्त मसौदा पार्टी कार्यक्रम की व्याख्या का एक हिस्सा प्रकाशित कर रहे हैं जिसमें इस प्रक्रिया का सिलसिलेवार ब्योरा दिया गया है कि किस प्रकार कारख़ानों में बड़ी पूँजी का सामना करने के लिए एकता मज़दूर वर्ग की ज़रूरत बन जाती है, और किस प्रकार उनकी वर्ग-चेतना विकसित होती है तथा उसके संघर्ष व्यापक होते जाते हैं। लेनिन ने इस बात पर बल दिया है कि पूँजीपतियों के ख़िलाफ मज़दूरों का संघर्ष जब राजनीतिक संघर्ष (राज्यसत्ता के विरुद्ध संघर्ष) बन जाता है, तभी वे अपनी और शेष ज़नता की मुक्ति की दिशा में आगे डग भर पाते हैं। लेनिन के अनुसार, अपनी राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व में एकजुट होकर ही मज़दूर वर्ग अपना यह लक्ष्य हासिल कर सकता है। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त की रूसी फैक्ट्रियों से आज की फैक्ट्रियों के तौर-तरीक़े कई मायनों में बदल गये हैं, लेकिन पूँजीवादी शोषण और उसके विरुद्ध मज़दूरों की एकजुटता एवं लामबन्दी का जो चित्र लेनिन ने उपस्थित किया है, उसकी प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है। मज़दूरों और मज़दूर कार्यकर्ताओं के लिए इस ऐतिहासिक दस्तावेज़ का गम्भीर अध्ययन बेहद ज़रूरी है। — सम्पादक

(*इस अंश का यह शीर्षक हमारे द्वारा दिया गया है — सम्पादक)

lenin…मज़दूर पूँजीपति के, जो मशीनें चलवाता है, सामने असहाय तथा अरक्षित है। मज़दूर को किसी भी क़ीमत पर पूँजीपति का विरोध करने के साधनों की तलाश करनी होती है, ताकि वह अपना बचाव कर सके। और उसे ऐसा साधन एकता में मिल जाता है। अकेले वह असहाय होता है, परन्तु अपने साथियों के साथ ऐक्यबद्ध होने पर वह एक शक्ति बन जाता है तथा पूँजीपति से संघर्ष करने और उसके प्रहार का मुक़ाबला करने में सक्षम हो जाता है।

एकता मज़दूर के लिए, जिसका सामना अब बड़ी पूँजी से होता है, आवश्यकता बन जाती है। परन्तु क्या लोगों के, जो एक-दूसरे के लिए अजनबी होते हैं, भले ही वे एक फैक्ट्री में काम करते हैं, इस पंचमेली समूह को ऐक्यबद्ध करना सम्भव है? कार्यक्रम में वे परिस्थितियाँ इंगित की गयी हैं जो मज़दूरों को एकता के लिए तैयार करती हैं तथा उनमें ऐक्यबद्ध होने की क्षमता तथा योग्यता का विकास करती हैं। ये परिस्थितियाँ इस प्रकार हैं: 1) बड़ी फैक्ट्री, जिसमें पूरे साल नियमित काम का तक़ाज़ा करने वाला मशीनी उत्पादन होता है, मज़दूर और उसकी ज़मीन तथा उसके अपने फार्म के बीच सम्बन्ध को पूरी तरह भंग कर देती है और उसे पूर्ण सर्वहारा बना देती है। यह तथ्य कि प्रत्येक मज़दूर अपने खेत के टुकड़े पर अपने लिए काम करता था, मज़दूरों को एक-दूसरे से अलग करता था तथा उनमें से प्रत्येक को विशिष्ट हित प्रदान करता था, इस प्रकार वह एकता की राह में बाधक था। ज़मीन के साथ मज़दूर का सम्बन्ध-विच्छेद इन बाधाओं को नष्ट कर देता है। 2) इसके अलावा सैकड़ों और हज़ारों मज़दूरों का संयुक्त कार्य स्वयं मज़दूरों को संयुक्त रूप से अपनी आवश्यकताओं पर विचार करने, संयुक्त कार्रवाई करने का आदी बना देता है और उन्हें स्पष्ट रूप से बताता है कि मज़दूरों के पूरे समूह की स्थिति तथा हित एक जैसे हैं। 3) अन्तिम बात, एक फैक्ट्री से दूसरी फैक्ट्री में मज़दूरों का लगातार स्थानान्तरण उन्हें भिन्न-भिन्न फैक्ट्रियों में हालात और अमल की तुलना करने, तमाम फैक्ट्रियों में शोषण के एक जैसे स्वरूप के बारे में आश्वस्त होने, पूँजीपति के विरुद्ध संघर्षों के अन्य मज़दूरों के अनुभव को ग्रहण करने और इस प्रकार मज़दूरों की ऐक्यबद्धता तथा एकजुटता बढ़ाने का आदी बना देता है। समग्र रूप में इन परिस्थितियों के कारण बड़ी फैक्ट्रियों में मज़दूरों की एकता का जन्म हुआ है। रूसी मज़दूरों के बीच एकता मुख्यतया तथा बहुधा हड़तालों के रूप में प्रकट होती है (इस कारण पर हम और विचार करेंगे कि यूनियनों या पारस्परिक सहायता कोषों के रूप में संगठन क्यों हमारे मज़दूरों के वश के बाहर की चीज़ है)। बड़ी फैक्ट्रियों का विकास जितना अधिक होता है मज़दूरों की हड़तालें उतनी ही बारम्बारता के साथ, उतनी ही सशक्त तथा उतनी ही अनमनीय होती हैं; पूँजीवाद द्वारा उत्पीड़न जितना ज्यादा होता है, मज़दूरों के संयुक्त प्रतिरोध की आवश्यकता उतनी ही बढ़ जाती है। जैसा कि कार्यक्रम में बताया गया है, मज़दूरों की हड़तालों तथा छुटपुट विद्रोहों ने अब रूसी फैक्ट्रियों में सबसे अधिक व्यापक परिघटना का रूप ग्रहण कर लिया है। परन्तु वे पूँजीवाद की और संवृद्धि होने के कारण तथा हड़तालों की बढ़ती बारम्बारता बढ़ने के कारण अपर्याप्त सिद्ध होते हैं। मालिक उनके ख़िलाफ संयुक्त कार्रवाई करते हैं : वे अपने बीच समझौते करते हैं, दूसरे इलाक़ों से मज़दूर लाते हैं तथा मदद के लिए राजकीय यन्त्र का संचालन करने वालों की ओर मुड़ते हैं, जो उन्हें मज़दूरों के प्रतिरोध को चकनाचूर करने में मदद देते हैं। अलग-अलग फैक्ट्री में अलग-अलग मालिक का सामना करने के बजाय मज़दूरों को अब पूरे पूँजीपति वर्ग और उसकी सहायता करने वाली सरकार का सामना करना पड़ता है। पूरा पूँजीपति वर्ग पूरे मज़दूर वर्ग के ख़िलाफ संघर्ष के लिए मैदान में उतरता है। वह हड़तालों के विरुद्ध संयुक्त कार्रवाइयों का आयोजन करता है, सरकार पर मज़दूर वर्ग-विरोधी क़ानून पास करने के लिए दबाव डालता है, फैक्ट्रियों को दूर-दराज़ बस्तियों में स्थानान्तरित करता है, घर पर काम करने वाले लोगों के बीच काम बाँटता है, मज़दूरों के ख़िलाफ सैकड़ों दूसरी चालों और युक्तियों का सहारा लेता है। पृथक फैक्ट्री, यही नहीं, पृथक उद्योग के मज़दूरों की एकता पूरे पूँजीपति वर्ग का प्रतिरोध करने के लिए अपर्याप्त सिद्ध होती है तथा पूरे मज़दूर वर्ग की संयुक्त कार्रवाई नितान्त आवश्यक हो जाती है। इस तरह अलग-अलग हड़तालों से पूरे मज़दूर वर्ग के संघर्ष का जन्म होता है। मालिकों के ख़िलाफ मज़दूरों का संघर्ष वर्ग-संघर्ष में परिणत हो जाता है। सारे मालिक मज़दूरों को अपनी मातहती की स्थिति में रखने और यथासम्भव न्यूनतम मज़दूरी देने के एकहित से ऐक्यबद्ध होते हैं। मालिक देखते हैं कि उनके हितों की रक्षा का एकमात्र तरीक़ा यह है कि पूरा मालिक वर्ग संयुक्त कार्रवाई करे, राजकीय यन्त्र पर अपना प्रभाव स्थापित करे, इसी तरह मज़दूर भी एक जैसे हित से परस्पर ऐक्यबद्ध होते हैं, यह हित है – अपने को पूँजी द्वारा रौंदे जाने से बचाना, ज़िन्दा रहने के, मानव-अस्तित्व के अपने अधिकार की रक्षा करना। मज़दूरों को भी इसी तरह पक्का यकीन हो जाता है कि उन्हें भी एकता, पूरे वर्ग, मज़दूर वर्ग की संयुक्त कार्रवाई की आवश्यकता है और इस लक्ष्य की पूर्ति के लिए उन्हें राजकीय यन्त्र पर अपना प्रभाव स्थापित करना चाहिए।

(क) 4. हम बता चुके हैं कि फैक्ट्री मज़दूरों तथा मालिकों के बीच संघर्ष कैसे और क्यों वर्ग-संघर्ष, मज़दूर वर्ग — सर्वहाराओं — का पूँजीपति वर्ग — बुर्जुआ — के विरुद्ध वर्ग-संघर्ष बनता है। सवाल उठता है — इस संघर्ष का पूरी ज़नता, पूरी मेहनतकश ज़नता के लिए क्या महत्व है? समकालीन अवस्थाओं में जिनकी हम मुद्दा 1 की व्याख्या में पहले ही चर्चा कर चुके हैं, उजरती मज़दूरों द्वारा किया जाने वाला उत्पादन लघु अर्थव्यवस्था को बाहर धकेल देता है। उजरती श्रम के सहारे जीवन-यापन करने वाले लोगों की संख्या बहुत तेज़ी से बढ़ती है, नियमित फैक्ट्री मज़दूरों की संख्या ही नहीं बढ़ती, अपितु उन किसानों की संख्या में और ज्यादा वृद्धि होती है, जिन्हें जीवन-यापन कर सकने की ख़ातिर उजरती मज़दूरों के रूप में काम की तलाश भी करनी पड़ती है। इस समय भाड़े पर काम, पूँजीपति के लिए काम श्रम का सबसे व्यापक रूप बन गया है। श्रम पर पूँजी का प्रभुत्व उद्योग को ही नहीं वरन कृषि क्षेत्र की आबादी के अधिकांश को भी अपनी परिधि में ले आया है। तो समकालीन समाज में अन्तर्निहित उजरती श्रम का यही शोषण है, जिसका बड़ी फैक्ट्रियाँ अधिकतम विकास करती हैं। शोषण की तमाम विधियाँ, जिनको सारे उद्योगों में सारे पूँजीपति अमल में लाते हैं तथा जिनसे सारी रूसी मेहनतकश आबादी पीड़ित है, ठीक फैक्ट्री में संकेन्द्रित हैं, गहन की जाती हैं, उन्हें बाक़ायदा नियम बनाया जाता है और वे मज़दूर के श्रम तथा जीवन के तमाम पहलुओं तक प्रसारित होती हैं, वे एक पूरा नित्यक्रम, एक पूरी पद्धति तैयार करती हैं, जिनके ज़रिये पूँजीपति मज़दूर का ख़ून चूसता है। एक उदाहरण देकर इस पर प्रकाश डालें — सदैव तथा सर्वत्र जो कोई भाड़े पर काम करता है, वो किसी उत्सव के मनाये जाने पर आराम करता है, अपना काम छोड़ देता है। परन्तु फैक्ट्री में दूसरी बात होती है, फैक्ट्री के प्रबन्‍धक एक बार किसी मज़दूर को काम पर रख लेने के बाद उसकी सेवाओं का मनचाहे ढंग से उपयोग करते हैं, मज़दूर की आदतों, उसके जीवन-यापन के प्रथागत तरीकों, उसकी पारिवारिक स्थिति, उसकी बौद्धिक आवश्यकताओं की ओर कोई ध्यान नहीं देते। फैक्ट्री को अपने कर्मचारी के श्रम की जब ज़रूरत होती है वो उसे काम की ओर धकेलती है, उसे मजबूर करती है कि वह अपना पूरा जीवन उसकी आवश्यकताओं के साँचे में बिठाये, उसके आराम के घण्टों को विश्रृंखलित कर देती है और अगर वह पाली में काम करता है तो उसे रात को और त्यौहारों के दिन काम करने के लिए मजबूर करती है। कार्य-समय के जितने भी दुरुपयोगों की कल्पना की जा सकती है, फैक्ट्री उन सबका आश्रय लेती है, साथ ही वह अपने ”नियम”, अपने ”अमल” को लागू करती है, जो प्रत्येक मज़दूर के लिए अनिवार्य होते हैं। फैक्ट्री में कार्य-व्यवस्था जान-बूझकर इस तरह ढाली जाती है कि भाड़े पर काम करने वाले मज़दूर से उसकी क्षमता के अनुरूप सारा श्रम निचोड़ लिया जाये, द्रुततम गति से निचोड़ लिया जाये और फिर उसे धक्‍का देकर बाहर निकाल दिया जाये! यह रहा एक और उदाहरण। जो कोई व्यक्ति काम पर लगता है, वह निस्सन्देह मालिक को वचन देता है कि उसे जो कुछ करने का आदेश दिया जायेगा, वह उसे करेगा। परन्तु जो कोई स्थायी काम के लिए अपना श्रम भाड़े पर देता है, वह अपनी इच्छा कदापि समर्पित नहीं करता; यदि वह मालिक की माँगों को ग़लत और ज्यादती भरा समझता है, तो वह उसे छोड़ देता है। फिर भी फैक्ट्री यह माँग करती है कि मज़दूर अपनी इच्छा पूरी तरह समर्पित करे। वह अपनी चारदीवारियों के अन्दर अनुशासन लागू करती है, मज़दूर को घण्टी बजने या बन्द होने पर काम शुरू करने या रोकने के लिए विवश करती है, मज़दूर को सज़ा देने का अधिकार ग्रहण करती है, उस पर उन नियमों के, जो उसने स्वयं बनाये हैं किसी भी उल्लंघन के लिए ज़ुर्माना करती है या मज़दूरी में कटौती करती है। मज़दूर मशीन के विशाल समुच्चय का अंग बन जाता है: उसे स्वयं मशीन की तरह आज्ञाकारी, ग़ुलाम होना चाहिए। उसकी अपनी कोई इच्छा नहीं होनी चाहिए।

एक तीसरा उदाहरण ले लें। जो कोई काम पर लगता है, वह अपने मालिक से अक्सर असन्तुष्ट होता है, उसकी शिक़ायत अदालत में या सरकारी अधिकारी के पास करता है। अधिकारी तथा अदालत दोनों विवाद आमतौर पर मालिक के पक्ष में निपटाते हैं उसका समर्थन करते हैं। परन्तु मालिक का यह हित साधन किसी आम विनियम या किसी क़ानून पर नहीं, वरन पृथक-पृथक अधिकारियों की ताबेदारी पर आधारित होता है, जो भिन्न-भिन्न अवसरों पर कम या अधिक मात्रा में उसकी रक्षा करते हैं और जो मामले को अनुचित रूप से, मालिक के पक्ष में इसलिए तय करते हैं कि वे या तो मालिक के परिचित होते हैं, या फिर इसलिए कि वे कामकाज के हालात के बारे में अपरिचित होते हैं तथा मज़दूर को समझने में असमर्थ होते हैं। ऐसे अन्याय का प्रत्येक पृथक मामला मज़दूर तथा मालिक के बीच प्रत्येक पृथक टक्कर पर, प्रत्येक पृथक अधिकारी पर निर्भर करता है। लेकिन फैक्ट्री मज़दूरों का इतना बड़ा समूह जमा कर लेती है, उत्पीड़न को ऐसी सीमा पर पहुँचा देती है कि प्रत्येक पृथक मामले की जाँच करना असम्भव हो जाता है। आम विनियम तैयार किये जाते हैं, मज़दूरों तथा मालिकों के बीच सम्बन्धों के बारे में एक क़ानून बनाया जाता है, ऐसा क़ानून, जो सबके लिए अनिवार्य होता है। इस क़ानून में मालिकों के लिए हित साधन को राज्य की सत्ता का सहारा दिया जाता है। पृथक अधिकारी द्वारा अन्याय का स्थान क़ानून द्वारा अन्याय ले लेता है। उदाहरण के लिए, इस प्रकार के विनियम प्रकट होते हैं — यदि मज़दूर काम से ग़ैर-हाज़िर है, तो वह मज़दूरी से ही हाथ नहीं धोता, वरन उसे ज़ुर्माना भी देना पड़ता है, जबकि मालिक यदि काम के न होने पर मज़दूरों को घर वापस भेज देता है, तो उसे कुछ नहीं देना पड़ता; मालिक मज़दूर को कठोर भाषा का उपयोग करने पर बरखास्त कर सकता है, जबकि मालिक का इस प्रकार का बर्ताव होने पर मज़दूर काम नहीं छोड़ सकता; मालिक को अपनी ही सत्ता के आधार पर ज़ुर्माना करने, मज़दूरी में कटौतियाँ करने, उससे ओवरटाइम काम करने की माँग करने का अधिकार होता है, आदि।

ये सब उदाहरण हमें बताते हैं कि फैक्ट्री कैसे मज़दूरों का शोषण गहन बनाती है और इस शोषण को सार्वत्रिक बनाती है, उसे एक पूरी ”प्रणाली” बना देती है। मज़दूर का अब चाहे अनचाहे एक अलग मालिक, उसकी इच्छा तथा उसके द्वारा उत्पीड़न से नहीं, वरन एक पूरे मालिक वर्ग के मनमाने बर्ताव तथा उत्पीड़न से साबिक़ा पड़ता है। मज़दूर देखता है कि कोई एक पूँजीपति नहीं, वरन पूरा पूँजीपति वर्ग उसका उत्पीड़क है, क्योंकि शोषण की प्रणाली सारे प्रतिष्ठानों में एक जैसी है। अकेला पूँजीपति इस प्रणाली से अलग होकर नहीं चल सकता : उदाहरण के लिए, उसके दिमाग़ में यदि कार्य-घण्टे घटाने की बात आ जाये, तो उसके माल पर आने वाली लागत उसके पड़ोसी, एक अन्य फैक्ट्री मालिक द्वारा, जो अपने मज़दूरों से उतनी ही मज़दूरी पर ज्यादा घण्टे काम करवाता है, उत्पादित माल की लागत से ज्यादा होगी। अपनी हालत में सुधार हासिल करने के लिए मज़दूर का उस पूरी सामाजिक प्रणाली से साबिक़ा पड़ता है, जिसका लक्ष्य श्रम का पूँजी द्वारा शोषण है। मज़दूर को अब एक अलग अधिकारी के अलग अन्याय का नहीं, वरन स्वयं राजकीय सत्ता के अन्याय का सामना करना पड़ता है, जो पूरे पूँजीपति वर्ग को अपना संरक्षण प्रदान करती है, सबके लिए अनिवार्य ऐसे क़ानून जारी करती है, जो उस वर्ग का हित साधन करते हैं। इस तरह मालिकों के विरुद्ध फैक्ट्री मज़दूरों का संघर्ष अनिवार्यत: पूरे पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध पूँजी द्वारा श्रम के शोषण पर आधारित पूरी सामाजिक प्रणाली के विरुद्ध संघर्ष में परिणत हो जाता है। यही कारण है कि मज़दूरों का संघर्ष सामाजिक महत्व ग्रहण कर लेता है, पूरी मेहनतकश ज़नता की ओर से उन तमाम वर्गों के विरुद्ध संघर्ष बन जाता है, जो दूसरों के श्रम के सहारे ज़िन्दा रहते हैं। यही कारण है कि मज़दूरों का संघर्ष रूसी इतिहास में एक नये युग के द्वार खोलता है, वह मज़दूरों की मुक्ति की प्रभात वेला है।

तो फिर पूरे मेहनतकश जनसाधरण पर पूँजीपति वर्ग का प्रभुत्व किस पर आधारित है? वह इस तथ्य पर आधारित है कि सारी फैक्ट्रियाँ, मिलें, खानें, मशीनें तथा श्रम के औज़ार पूँजीपतियों के हाथों में हैं तथा उनकी सम्पत्ति हैं; इस तथ्य पर आधारित है कि उनके पास भूमि विशाल परिमाण में है (यूरोपीय रूस में पूरी भूमि का एक-तिहाई से अधिक भाग भूस्वामियों के पास है, जिनकी तादाद पाँच लाख से ज्यादा नहीं है)। मज़दूरों के पास श्रम के कोई औज़ार या सामग्री नहीं होती, इसलिए वे अपनी श्रम-शक्ति पूँजीपतियों के हाथों में बेचने के लिए मजबूर होते हैं, जो उन्हें केवल इतना देते हैं कि वे बस अपना गुज़ारा कर सकें, और जो श्रम का सारा अतिरिक्त उत्पाद अपनी जेबों में ठूँस लेते हैं; इस तरह वे उन्हें इस्तेमाल किये गए कार्य-समय के केवल एक भाग की अदायगी करते हैं शेष वे हस्तगत कर लेते हैं। मज़दूर जनसमुदायों के संयुक्त श्रम के अथवा उत्पादन में सुधारों के परिणामस्वरूप सम्पदा में होने वाली सारी वृद्धि पूँजीपति वर्ग के पास चली जाती है, जबकि पीढ़ी-दर-पीढ़ी कठोर परिश्रम करने वाले मज़दूर सम्पत्तिहीन सर्वहारा बने रहते हैं। इसीलिए श्रम के पूँजी द्वारा शोषण का अन्त करने का केवल एक ही रास्ता है, और वह है श्रम के औज़ारों के निजी स्वामित्व का उन्मूलन, सारी फैक्ट्रियाँ, मिलें, खानें, साथ ही बड़ी जागीरें, आदि पूरे समाज के हवाले करना, स्वयं मज़दूरों के निर्देशन में समाजवादी उत्पादन करना। श्रम द्वारा मिलकर उत्पादित वस्तुएँ तब स्वयं मेहनतकश ज़नता को लाभान्वित करेंगी, जबकि उनके अपने गुज़ारे से अधिक अतिरिक्त उत्पाद से स्वयं मज़दूरों की आवश्यकताओं की पूर्ति होगी, उनकी सारी क्षमताओं का विकास होगा तथा उन्हें विज्ञान और संस्कृति की समस्त उपलब्धियों का उपभोग करने का समान अधिकार प्राप्त होगा। इसी कारण कार्यक्रम में कहा गया है कि मज़दूर वर्ग तथा पूँजीपतियों के बीच संघर्ष का केवल इसी तरह का अन्त हो सकता है। लेकिन इसके लिए यह आवश्यक है कि राजनीतिक सत्ता, अर्थात राज्य पर शासन करने की सत्ता ऐसी सरकार के, जो पूँजीपतियों तथा भूस्वामियों के प्रभाव में है, हाथों से, अथवा सीधे पूँजीपतियों के निर्वाचित प्रतिनिधियों को लेकर बनी सरकार के हाथों से मज़दूर वर्ग के हाथों में पहुँचे।

ऐसा है मज़दूर वर्ग के संघर्ष का अन्तिम लक्ष्य, ऐसी है उसकी पूर्ण-मुक्ति की शर्त। यह है वह अन्तिम लक्ष्य, जिसकी सिद्धि के लिए सचेत, संगठित मज़दूरों को प्रयास करना चाहिए। परन्तु यहाँ रूस में उन्हें ज़बरदस्त बाधाओं का सामना करना पड़ता है, जो मुक्ति के उनके संघर्ष का रास्ता रोकती हैं।

(क) 5. पूँजीपति वर्ग के प्रभुत्व के विरुद्ध संघर्ष इस समय सारी यूरोपीय देशों के मज़दूरों और अमेरिका तथा ऑस्ट्रेलिया के मज़दूरों द्वारा भी चलाया जा रहा है। मज़दूर वर्ग की एकता तथा ऐक्यबद्धता एक देश या एक जाति तक सीमित नहीं है; भिन्न-भिन्न देशों की मज़दूर पार्टियाँ सारे संसार के मज़दूरों के हितों तथा लक्ष्यों की पूर्ण अनुरूपता (ऐक्यबद्धता) की ऊँचे स्वर में घोषणा करती हैं। वे संयुक्त कांग्रेसों में परस्पर मिलती हैं, सारे देशों के पूँजीपति वर्ग के सामने एक समान माँगें पेश करती हैं, उन्होंने मुक्ति के लिए प्रयास करने वाले पूरे संगठित मज़दूर वर्ग के अन्तरराष्ट्रीय पर्व (मई दिवस) की स्थापना की है, और इस तरह उन्होंने तमाम जातियों तथा तमाम देशों के मज़दूर वर्ग को मज़दूरों की एक महान सेना में सूत्रबद्ध कर दिया है। मज़दूरों की एकता एक आवश्यकता है, जिसे यह तथ्य जन्म देता है कि पूँजीपति वर्ग, जो मज़दूरों पर शासन करता है, अपने शासन को एक देश तक सीमित नहीं करता। भिन्न-भिन्न देशों के वाणिज्यिक सम्बन्ध अधिक घनिष्ठ तथा अधिक व्यापक होते जा रहे हैं; पूँजी निरन्तर एक देश से दूसरे देश को पहुँचती रहती है। बैंक, ये विशाल निक्षेपागार, जो पूँजी को एक जगह जमा करते हैं तथा उसे पूँजीपतियों के बीच कर्ज़ के रूप में बाँटते हैं, राष्ट्रीय संस्थानों के रूप में काम आरम्भ करते हैं और फिर अन्तरराष्ट्रीय संस्थान बन जाते हैं, तमाम देशों की पूँजी जमा करते हैं और उसे यूरोप तथा अमेरिका के पूँजीपतियों के बीच बाँटते हैं, एक ही देश में नहीं वरन कई देशों में एकसाथ पूँजीवादी प्रतिष्ठान स्थापित करने के लिए इस समय विशाल संयुक्त पूँजी कम्पनियाँ संगठित की जा रही हैं; पूँजीपतियों की अन्तरराष्ट्रीय संस्थाएँ प्रकट हो रही हैं। पूँजीवादी प्रभुत्व अन्तरराष्ट्रीय है। यही कारण है कि तमाम देशों में अपनी मुक्ति के लिए मज़दूरों का संघर्ष तभी सफल होता है, जब वे अन्तरराष्ट्रीय पूँजी के विरुद्ध संयुक्त रूप से संघर्ष करते हैं। यही कारण है कि पूँजीपति वर्ग के विरुद्ध संघर्ष में रूसी मज़दूर का साथी ठीक उसी तरह जर्मन मज़दूर, पोलिश मज़दूर, और फ्रांसिसी मज़दूर है, जिस तरह उसके दुश्मन रूसी, पोलिश और फ्रांसिसी पूँजीपति हैं। इधर, हाल में विदेशी पूँजीपति अपनी पूँजी बड़ी उत्सुकता से रूस को स्थानान्तरित कर रहे हैं, जहाँ वे अपनी फैक्ट्रियों की शाखाएँ निर्मित कर रहे हैं तथा नये प्रतिष्ठानों के लिए कम्पनियाँ स्थापित कर रहे हैं। वे इस तरुण देश पर ललचायी दृष्टि से झपट रहे हैं, जहाँ सरकार किसी भी अन्य देश की तुलना में पूँजी के लिए अधिक अनुकूल तथा कहीं अधिक ताबेदार है, जहाँ वे मज़दूरों को पश्चिम से कम संगठित तथा जवाबी संघर्ष करने में कम सक्षम पाते हैं, जहाँ मज़दूरों का जीवन-स्तर कहीं नीचा और इसलिए उनकी मज़दूरी कहीं कम है, इस कारण विदेशी पूँजीपति विशाल, इतने बड़े पैमाने पर मुनाफे हासिल करने में समर्थ हैं, जो स्वयं उनके अपने देशों के लिए अभूतपूर्व हैं। अन्तरराष्ट्रीय पूँजी रूस की ओर अपने हाथ फैला चुकी है। रूसी मज़दूर अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर आन्दोलन की ओर हाथ बढ़ा रहे हैं।

(ख) 1. यह कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण, सर्वप्रमुख मुद्दा है, क्योंकि यह लक्षित करता है कि मज़दूर वर्ग के हितों की रक्षा के लिए पार्टी का कार्यकलाप तमाम सचेत मज़दूरों का कार्यकलाप क्या होना चाहिए। यह बताता है कि समाजवाद की आकांक्षा, इन्सान द्वारा इन्सान के शोषण का उन्मूलन करने की आकांक्षा को किस तरह बड़े पैमाने की फैक्ट्रियों द्वारा सर्जित रहन-सहन की अवस्थाओं के कारण उत्पन्न जनआन्दोलन के साथ सूत्रबद्ध करना चाहिए।

पार्टी का कार्यकलाप मज़दूरों के वर्ग-संघर्ष को बढ़ावा देना होना चाहिए। पार्टी का कार्यभार मज़दूरों की सहायता के लिए कोई फैशनेबल तरीक़ा गढ़ना नहीं, अपितु अपने को मज़दूर आन्दोलन से जोड़ना, उसमें जागृति लाना, मज़दूरों को उन द्वारा पहले ही आरम्भ किये जा चुके संघर्ष में सहायता देना है। पार्टी का कार्यभार मज़दूरों के हितों की रक्षा करना तथा पूरे मज़दूर वर्ग के आन्दोलन के हितों का प्रतिनिधित्‍व करना है। तो फिर मज़दूरों को उनके संघर्ष में यह सहायता किस तरह दी जा सकती है?

कार्यक्रम कहता है कि यह सहायता सर्वप्रथम, मज़दूरों की वर्ग-चेतना का विकास करने के लिए दी जानी चाहिए। हम पहले ही बता चुके हैं कि मालिकों के ख़िलाफ मज़दूरों का संघर्ष किस तरह पूँजीपति वर्ग के ख़िलाफ सर्वहारा का वर्ग-संघर्ष बन जाता है।

मज़दूरों की वर्ग-चेतना से तात्पर्य उस बात से स्पष्ट होता है, जो हम इस विषय पर पहले कह चुके हैं। मज़दूरों की वर्ग-चेतना का अर्थ मज़दूरों की यह समझ है कि उनके लिए अपनी अवस्थाएँ सुधारने और अपनी मुक्ति हासिल करने का एकमात्र तरीक़ा यह है कि वे पूँजीपति वर्ग तथा फैक्ट्री मालिकों के वर्ग जिन्हें बड़ी फैक्ट्रियों ने निर्मित किया है, के ख़िलाफ संघर्ष करें। इसके साथ ही मज़दूरों की वर्ग-चेतना का अर्थ उनकी यह समझ है कि किसी एक विशेष देश के तमाम मज़दूरों के हित एकसमान होते हैं, कि वे एक ऐसा वर्ग हैं, जो समाज के तमाम अन्य वर्गों से भिन्न है। अन्तत: मज़दूरों की वर्ग-चेतना का अर्थ मज़दूरों की यह समझ है कि अपने लक्ष्यों की पूर्ति के लिए उन्हें राज्य के मामलों पर प्रभाव डालने के वास्ते उसी तरह काम करना होगा, जिस तरह जमीन्दार तथा पूँजीपति करते थे तथा अब भी करते जा रहे हैं।

इन सबकी समझ मज़दूर कैसे हासिल करते हैं? यह समझ वे ठीक उस संघर्ष से निरन्तर अनुभव प्राप्त करते हुए हासिल करते हैं जिसे वे मालिकों के ख़िलाफ छेड़ना आरम्भ करते हैं, जो अधिकाधिक विकसित, तीक्ष्ण होता जाता है तथा जिसमें बड़ी फैक्ट्रियों के विकास के साथ-साथ अधिकाधिक संख्या में मज़दूर शामिल होते हैं। एक ऐसा वक्‍त था, जब पूँजी के विरुद्ध मज़दूरों की शत्रुता अपने शोषकों के विरुद्ध घृणा की धुँधली भावना में, अपने उत्पीड़न तथा दासता की धुँधली चेतना में तथा पूँजीपतियों से बदला लेने की इच्छा में अभिव्यक्त हुआ करती थी। उस समय संघर्ष मज़दूरों के छुटपुट विद्रोहों में अभिव्यक्त होता था, वे इमारतें ध्वस्त करते थे, मशीनें तोड़ते थे, फैक्ट्री के प्रबन्‍धकों पर हमले करते थे, आदि। वह था मज़दूर वर्ग आन्दोलन का पहला, आरम्भिक रूप। और वह आवश्यक था, क्योंकि पूँजीपति से घृणा मज़दूरों में अपनी रक्षा करने की इच्छा पैदा करने की दिशा में सदैव तथा सर्वत्र पहला संवेग है। परन्तु रूसी मज़दूर वर्ग आन्दोलन इस मूल रूप से आगे विकसित हो चुका है। पूँजीपति के विरुद्ध धुँधली घृणा के बजाय मज़दूरों ने मज़दूर वर्ग तथा पूँजीपति वर्ग के हितों के बीच वैर-भाव को समझना आरम्भ कर दिया है। उत्पीड़न की धुँधली भावना के बजाय उन्होंने उन उपायों और तरीकों को समझना आरम्भ कर दिया है, जिनके द्वारा पूँजी उनका उत्पीड़न करती है। और वे उत्पीड़न के विभिन्न रूपों के विरुद्ध विद्रोह करने लगे हैं, पूँजीवादी उत्पीड़न पर अंकुश लगाने लगे हैं और पूँजीवादी लालच से अपनी रक्षा करने लगे हैं। पूँजीपतियों से बदला लेने के बजाय वे अब रियायतों के लिए संघर्ष की ओर मुड़ रहे हैं, वे एक के बाद दूसरी माँग को लेकर पूँजीपति वर्ग का सामना कर रहे हैं, काम-काज की बेहतर अवस्थाओं, अधिक मज़दूरी तथा काम के कम घण्टों की माँग कर रहे हैं। प्रत्येक हड़ताल मज़दूरों का सारा ध्यान और उनके सारे प्रयास उन अवस्थाओं के किसी एक ख़ास पहलू पर केन्द्रित करती है, जिनके अन्तर्गत मज़दूर वर्ग रहता है। प्रत्येक हड़ताल इन अवस्थाओं पर विचार-विमर्श को जन्म देती है, मज़दूरों को उनका मूल्यांकन करने, यह समझने में मदद देती है कि किसी एक विशेष मामले में पूँजीवादी उत्पीड़न किसमें निहित है तथा इस उत्पीड़न का मुक़ाबला करने के लिए किन साधनों का उपयोग किया जा सकता है। प्रत्येक हड़ताल पूरे मज़दूर वर्ग के अनुभव को समृद्ध बनाती है। यदि हड़ताल सफल होती है, तो वह उन्हें बताती है कि मज़दूर वर्ग की एकता कितनी प्रबल शक्ति है तथा वह दूसरों की अपने साथियों की सफलता का उपयोग करने के लिए प्रेरित करती है। यदि वह सफल नहीं होती है, तो उसके परिणामस्वरूप विफलता के कारणों पर विचार-विमर्श होता है, संघर्ष के बेहतर तरीकों की तलाश की जाती है। अपनी जीवन्त आवश्यकताओं के लिए, रियायतों के लिए, रहन-सहन की अवस्थाओं में, मज़दूरी और काम के घण्टों में सुधार के लिए संघर्ष की ओर इस संक्रमण का, जो अब पूरे रूस में आरम्भ हो गया है, अर्थ यह है कि रूसी मज़दूर ज़बरदस्त प्रगति कर रहे हैं, और इसी कारण सामाजिक-जनवादी पार्टी तथा समस्त सचेत मज़दूरों का ध्यान मुख्यतया इस संघर्ष पर, उसे प्रोत्साहन देने पर केन्द्रित होना चाहिए। मज़दूरों को सहायता उन्हें वे मौलिक आवश्यकताएँ दिखाने में निहित होनी चाहिए जिनकी पूर्ति के लिए उन्हें संघर्ष करना चाहिए, यह सहायता भिन्न-भिन्न श्रेणियों के मज़दूरों की अवस्थाओं के बिगड़ने के लिए ज़िम्मेवार कारकों का विश्लेषण करने, उन फैक्ट्री क़ानूनों तथा विनियमों को समझाने में निहित होनी चाहिए, जिनके उल्लंघन (इसके साथ ही पूँजीपतियों की कपटपूर्ण तिकड़मों) के ज़रिए मज़दूरों को बहुधा दुहरी डकैती का शिकार बनाया जाता है। सहायता मज़दूरों की माँगों को अधिक सटीक तथा निश्चित अभिव्यक्ति प्रदान करने में, इन माँगों को सार्वजनिक रूप से पेश करने में, प्रतिरोध के लिए सर्वोत्तम समय चुनने में, संघर्ष की विधि चुनने में, दो विरोधी पक्षों की स्थिति तथा शक्ति पर विचार-विमर्श करने में, इस बात पर विचार-विमर्श करने में निहित होनी चाहिए कि संघर्ष करने का क्या और भी कोई बेहतर तरीक़ा चुना जा सकता है (यह तरीक़ा सीधी कार्रवाई उचित न समझे जाने की दशा में परिस्थितियों पर निर्भर कर सकता है, जैसे फैक्ट्री मालिक को चिटठी लिखना, इंस्पेक्टर या डॉक्टर के पास पहुँचना आदि)।

हम बता चुके हैं कि इस प्रकार के संघर्ष में रूसी मज़दूरों का संक्रमण उन द्वारा की गयी ज़बरदस्त प्रगति का द्योतक है। यह संघर्ष मज़दूर वर्ग आन्दोलन को राजपथ पर पहुँचाता (ले जाता) है तथा उसकी आगे की सफलता की निश्चित गारण्टी है। मेहनतकश जनसाधरण इस संघर्ष से सर्वप्रथम, पूँजीवादी शोषण के तरीकों को एक-एक कर पहचानना तथा जाँचना, क़ानून के साथ, अपने रहन-सहन की अवस्थाओं के साथ, पूँजीपति वर्ग के हितों के साथ उनका परस्पर सम्बन्ध स्थापित करना सीखते हैं। शोषण के विभिन्न तरीकों तथा मामलों की जाँचकर वे समग्र शोषण के महत्व तथा सार को समझना सीखते हैं, पूँजी द्वारा श्रम के शोषण पर आधारित सामाजिक व्यवस्था को समझना सीखते हैं। दूसरे, इस संघर्ष की प्रक्रिया में मज़दूर अपनी शक्ति परखते हैं, ऐक्यबद्ध होना सीखते हैं, एकता की आवश्यकता तथा महत्व समझना सीखते हैं। इस संघर्ष के फैलने तथा टक्करों की बढ़ती बारम्बारता के फलस्वरूप संघर्ष का अनिवार्यत: विस्तार होता है, एकता की भावना, एकजुटता की भावना का — सर्वप्रथम, एक ख़ास इलाक़े के मज़दूरों में और उसके बाद पूरे देश के मज़दूरों में, पूरे मज़दूर वर्ग में — विकास होता है। तीसरे, यह संघर्ष मज़दूरों की राजनीतिक चेतना का विकास करता है। मेहनतकश जनसाधरण की रहन-सहन की अवस्था उन्हें ऐसी स्थिति में पहुँचा देती है कि राज्य की समस्याओं पर विचार करने के लिए उनके पास न तो फुरसत होती है (हो भी नहीं सकती) और न मौक़ा। दूसरी ओर, अपनी नित्यप्रति की आवश्यकताओं के लिए फैक्ट्री मालिकों के ख़िलाफ मज़दूरों का संघर्ष अपने आप और अनिवार्यत: मज़दूरों को राज्य के राजनीतिक प्रश्नों के, इन प्रश्नों के बारे में सोचने के लिए प्रेरित करता है कि रूसी राज्य का किस तरह शासन होता है, क़ानून तथा विनियम कैसे जारी किये जाते हैं और वे किनके हितों की पूर्ति करते हैं। फैक्ट्री में प्रत्येक टक्कर मज़दूरों को लाज़िमी तौर पर क़ानूनों और राजकीय सत्ता के प्रतिनिधियों से भिड़ा देती है। इस सिलसिले में मज़दूर पहली बार ”राजनीतिक भाषण” सुनते हैं। पहले, वे, उदाहरण के लिए, फैक्ट्री-इंस्पेक्टरों की बात सुनते हैं, जो उन्हें समझाते हैं कि उन्हें धोखा देने के लिए अपनायी गयी तिकड़म उन विनियमों के सही-सही अर्थ पर आधारित है, जिन्हें उपयुक्त सत्ता अनुमोदित कर चुकी है तथा जो मज़दूरों को धोखा देने के लिए मालिक को खुली छूट देते हैं या यह समझाते हैं कि फैक्ट्री मालिक के उत्पीड़नकारी पग सर्वथा क़ानूनी हैं, क्योंकि वह तो महज़ अपने अधिकारों का उपयोग कर रहा है, उस अमुक क़ानून पर अमल कर रहा है, जिसे राजकीय सत्ता अनुमोदित कर चुकी है तथा जिसका वह कार्यान्वयन सुनिश्चित करती है। इंस्पेक्टरों महाशयों के राजनीतिक स्पष्टीकरणों की परिपूर्ति समय-समय पर मन्त्री के और भी कल्याणकारी ”राजनीतिक स्पष्टीकरणों” द्वारा की जाती है, जो मज़दूरों को उस ”ईसाईसुलभ” प्यार की भावनाओं की याद दिलाता है, जिसे उनसे पाने के लिए फैक्ट्री मालिक हक़दार हैं, क्योंकि वे उनके श्रम से करोड़ों की कमाई करते हैं। आगे चलकर राजकीय सत्ता के प्रतिनिधियों के इन स्पष्टीकरणों तथा इन तथ्यों से, जो बताते हैं कि यह सत्ता किसके हितार्थ काम करती है, मज़दूरों की प्रत्यक्ष जानकारी की परिपूर्ति उन पर्चों या उन अन्य स्पष्टीकरणों द्वारा होती है, जिन्हें समाजवादी जारी करते हैं; फलस्वरूप मज़दूर इस प्रकार की हड़ताल से पूरी राजनीतिक शिक्षा प्राप्त कर सकते हैं। वे मज़दूर वर्ग के विशिष्ट हितों को ही नहीं, वरन राज्य में मज़दूर वर्ग के विशिष्ट स्थान को भी समझने लगते हैं। अत: सामाजिक-जनवादी लोग मज़दूरों के वर्ग-संघर्ष को जो मदद दे सकते हैं, वह यह होनी चाहिए — मज़दूरों को उनके सबसे जीवन्त अधिकारों के लिए संघर्ष में सहायता देकर उनकी वर्ग-चेतना का विकास किया जाये।

जैसा कि कार्यक्रम में कहा गया है, दूसरी किस्म की सहायता मज़दूरों के संगठन को बढ़ावा देने के रूप में प्रदान की जानी चाहिए। हमने जिस संघर्ष का अभी-अभी वर्णन किया है वह अनिवार्यत: इस बात का तक़ाज़ा करता है कि मज़दूरों को संगठित किया जाये। संगठन हड़ताल करने, उनका संचालन अत्यधिक सफलता के साथ सुनिश्चित करने, हड़तालियों के समर्थन के लिए धन-संग्रह करने, मज़दूर पारस्परिक सहायता कोषों की स्थापना करने, मज़दूरों के बीच प्रचार करने, पर्चे, सूचना तथा घोषणापत्र वितरित करने, आदि के लिए आवश्यक होता है। संगठन और भी ज्यादा ज़रूरी है, ताकि मज़दूरों को पुलिस तथा राजनीतिक पुलिस के अत्याचार से अपनी रक्षा करने में सक्षम बनाया जा सके, उनकी नज़रों से मज़दूरों के सारे संपर्कों तथा संघों को बचाया जा सके, पुस्तकें, पर्चे तथा अख़बार, आदि पहुँचाने की व्यवस्था की जा सके। इन सब कार्यों में सहायता देना — ऐसा है पार्टी का दूसरा कार्यभार।

तीसरा कार्यभार है संघर्ष के असल ध्येय बताना, अर्थात मज़दूरों को यह समझाना कि पूँजी द्वारा श्रम का शोषण कैसे होता है, किस पर आधारित है, ज़मीन और श्रम के औज़ारों का निजी स्वामित्व कैसे मेहनतकश जनसाधरण को ग़रीबी की ओर ले जाता है, उन्हें अपना श्रम पूँजीपतियों को बेचने के लिए तथा आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद अपने श्रम की सारी अतिरिक्त उपज कैसे मुफ्त समर्पित करने के लिए बाधित करता है; इसके अलावा यह समझाना कि यह शोषण कैसे अनिवार्यत: मज़दूरों तथा पूँजीपतियों के बीच वर्ग-संघर्ष को जन्म देता है, इस संघर्ष की शर्तें तथा उसके अन्तिम लक्ष्य क्या होते हैं — संक्षेप में, कार्यक्रम में सक्षिप्त रूप में बतायी गयी बातें समझाना।

(ख) 2. मज़दूर वर्ग का संघर्ष राजनीतिक संघर्ष है — इन शब्दों का क्या अर्थ है? इनका अर्थ यह है कि मज़दूर वर्ग राज्य के मामलों पर, राज्य के प्रशासन पर, क़ानून के मसलों पर प्रभाव हासिल किये बिना अपनी मुक्ति के लिए संघर्ष नहीं कर सकता। इस तरह के प्रभाव की आवश्यकता को रूसी पूँजीपतियों ने बहुत पहले ही समझ लिया था, और हम बता चुके हैं कि वे पुलिस क़ानूनों में सब किस्म के निषेधों के बावजूद राजकीय सत्ता पर प्रभाव डालने के हज़ारों उपाय ढूँढने में किस तरह सफल हुए हैं और कैसे यह सत्ता पूँजीपति वर्ग का हित साधन करती है। इसका स्वभावत: यह निष्कर्ष निकलता है कि मज़दूर वर्ग भी राजकीय सत्ता पर प्रभाव हासिल किये बिना अपना संघर्ष नहीं चला सकता, अपनी दशा में कोई स्थायी सुधार तक हासिल नहीं कर सकता।

हम पहले ही कह चुके हैं कि पूँजीपतियों के ख़िलाफ मज़दूरों के संघर्ष का अनिवार्य परिणाम सरकार के ख़िलाफ संघर्ष होगा तथा स्वयं सरकार मज़दूरों के सामने यह सिद्ध करने के लिए पूरी कोशिश कर रही है कि केवल संघर्ष तथा संयुक्त प्रतिरोध से ही वे राजकीय सत्ता पर प्रभाव डाल सकते हैं। यह चीज़ 1885-86 में रूस में हुई बड़ी-बड़ी हड़तालों ने विशेष स्पष्टता के साथ प्रदर्शित कर दी। सरकार ने मज़दूरों से सम्बन्धित विनियम तुरन्त तैयार करने आरम्भ कर दिये थे। फौरन फैक्ट्री कार्यों के बारे में क़ानून जारी किये। वह मज़दूरों की ज़ोरदार माँगों के आगे झुक गयी (उदाहरण के लिए ज़ुर्माने सीमित करने तथा मज़दूरी की ठीक ढंग से अदायगी सुनिश्चित करने के लिए विनियम जारी किये गये थे)। इसी तरह मौजूदा हड़तालों (1896) में फिर सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करने के लिए बाध्य किया है और सरकार समझ चुकी है कि गिरफ्तारियों तथा निर्वासनों तक सीमित रहने से काम नहीं चल सकता, कि फैक्ट्री मालिकों के उदात्त आचरण के बारे में मूर्खतापूर्ण उपदेशों से मज़दूरों का मनोरंजन करना उपहासास्पद है (देखें फैक्ट्री इंस्पेक्टरों के नाम वित्त मन्त्री वित्ते की गश्ती चिट्ठी। वसन्त, 1896)। सरकार ने अनुभव कर लिया है कि ”संगठित मज़दूर ऐसी शक्ति हैं जिसे ध्यान में रखना होगा”। इसलिए फैक्ट्री क़ानून में संशोधन करने का कार्य पहले ही उसके विचाराधीन है और काम के घण्टे घटाने तथा मज़दूरों को दूसरी अनिवार्य रियायतें देने के प्रश्न पर विचार करने के लिए उसने वरिष्ठ फैक्ट्री इंस्पेक्टरों की कांग्रेस सेण्ट पीटर्सबर्ग में बुलायी है।

इस तरह हम देखते हैं कि पूँजीपति वर्ग के ख़िलाफ मज़दूर वर्ग के संघर्ष को अवश्य ही राजनीतिक संघर्ष होना चाहिए। वस्तुत: यह संघर्ष राजकीय सत्ता पर प्रभाव डालने भी लगा है, राजनीतिक महत्व हासिल कर रहा है। परन्तु मज़दूर वर्ग आन्दोलन ज्यों-ज्यों विकसित होता है त्यों-त्यों मज़दूरों के पास राजनीतिक अधिकारों का सरासर अभाव जिसके बारे में हम पहले ही बता चुके हैं, तथा मज़दूरों द्वारा राजकीय सत्ता पर खुले तथा प्रत्यक्ष रूप में प्रभाव डालने की सरासर असम्भवता स्पष्टतया तथा तीक्ष्णतापूर्वक स्पष्ट होती जाती है तथा अनुभव की जाती है। यही कारण है कि मज़दूरों की सबसे तात्कालिक माँग राज्य के मामलों पर मज़दूर वर्ग के प्रभाव का प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए राजनीतिक स्वतन्त्रता की उपलब्धि, अर्थात राज्य के प्रशासन में तमाम नागरिकों की क़ानून (संविधान) द्वारा गारण्टीशुदा सीधी शिरक़त, स्वतन्त्र रूप से जमा होने, अपने मामलों पर विचार-विमर्श करने, अपनी संस्थाओं तथा अख़बारों के ज़रिये राज्य पर प्रभाव डालने के गारण्टीशुदा अधिकार। राजनीतिक स्वतन्त्रता की उपलब्धि ”मज़दूरों का जीवन्त कार्यभार” बन जाती है क्योंकि उसके बिना मज़दूरों का राज्य के मामलों पर कोई प्रभाव नहीं होता और न हो सकता है, तथा इस तरह वे अनिवार्यत: अधिकारहीन, अपमानित तथा मूक वर्ग बने रहते हैं। और यदि इस समय भी, जब मज़दूरों ने संघर्ष करना तथा अपनी क़तारों को ऐक्यबद्ध करना आरम्भ ही किया है, सरकार आन्दोलन को और आगे बढ़ाने से रोकने के लिए मज़दूरों को जल्दी-जल्दी रियायतें देने लगी है, तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि जब मज़दूर अपनी क़तारों को पूरी तरह ऐक्यबद्ध कर लेंगे तथा एक राजनीतिक पार्टी के नेतृत्व में एकजुट हो जायेंगे, तो वे सरकार को आत्मसमर्पण करने के लिए बाधित कर सकेंगे, वे अपने लिए तथा पूरी रूसी ज़नता के लिए राजनीतिक स्वतन्त्रता हासिल कर सकेंगे!

दिसम्बर, 1895 – जुलाई 1896 के दौरान लिखित।
पहले पहल 1924 में प्रकाशित।
अंग्रेज़ी से अनूदित।

 


 

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