मज़दूरों के लिए “अच्छे दिन” शुरू, भाजपा द्वारा श्रमिकों के अधिकारों पर पहला हमला

अमृतपाल

Modi-letter‘मज़दूर बिगुल’ के पन्नों पर पहले ही कहा गया था कि पूँजीवाद के ढाँचागत संकट के चलते आने वाले दिनों में नवउदारवादी नीतियों को और भी दमनकारी ढंग से लागू किया जायेगा, जिसकी सबसे पहले और सबसे बुरी मार मज़दूर वर्ग पर पड़ेगी। श्रम क़ानूनों को ज़्यादा से ज़्यादा बेअसर करने की तरकीबें गढ़ी जायेंगी और मज़दूर यूनियनों तथा अन्य मज़दूर संगठनों का काम करना मुश्किल बनाया जायेगा। भाजपाइयों को पूँजीपतियों की सेवा करने की इतनी जल्दी है कि केन्द्र में सत्ता में आने के दो सप्ताह के भीतर ही उन्होंने इस बात को सही साबित करना शुरू कर दिया है। राजस्थान की भाजपा सरकार ने फ़ैक्टरी एक्ट 1948, इण्डस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट 1947 और ठेका क़ानून 1971 को संशोधित करके पहले से ही कमजोर श्रम क़ानूनों पर हमला बोलने की शुरुआत कर दी है।

फ़ैक्टरी एक्ट के लागू होने की शर्त के रूप में अब मज़दूरों की संख्या को दोगुना कर दिया है। अब फ़ैक्टरी एक्ट 20 या इससे ज़्यादा मज़दूरों (जहाँ बिजली का इस्तेमाल होता हो) तथा 40 या इससे ज़्यादा मज़दूरों (जहाँ बिजली का इस्तेमाल न होता हो) वाली फ़ैक्टरियों पर ही लागू होगा। इस तरह सीधे-सीधे बड़ी संख्या में छोटे फ़ैक्टरी मालिकों को फ़ैक्टरी एक्ट से बाहर कर दिया गया है। मगर उन पर अब और कौन सा एक्ट लागू होगा, यह कुछ पता नहीं है और सम्भवतः यह कभी पता चलेगा भी नहीं। दूसरी तरफ़, इस संशोधन ने एक मालिक के लिए अलग-अलग खाते दिखाकर फ़ैक्टरी एक्ट से बचना बहुत आसान कर दिया है।

मज़दूरों के लिए यूनियन बनाना और भी मुश्किल कर दिया गया है। पहले किसी फ़ैक्टरी में काम करते मज़दूरों का कोई ग्रुप अगर कुल मज़दूरों की संख्या का 15 प्रतिशत अपने साथ ले लेता तो वह यूनियन पंजीकृत करवा सकता था, अब इसे बढ़ाकर 30 प्रतिशत कर दिया गया है। मतलब साफ़ है कि अगर फ़ैक्टरी मालिक ने अपनी फ़ैक्टरी में दो-तीन दलाल यूनियनें पाल रखी हैं तो एक नयी यूनियन बनाना बहुत कठिन होगा और फ़ैक्टरी जितनी बड़ी होगी, यूनियन बनाना उतना ही मुश्किल होगा। ठेका एक्ट भी अब 20 या इससे ज़्यादा मज़दूरों वाली फ़ैक्टरी पर लागू होने की जगह 50 या इससे ज़्यादा मज़दूरों वाली फ़ैक्टरी पर लागू होगा। इण्डस्ट्रियल डिस्प्यूट एक्ट 1947 में संशोधन करते हुए अब कम्पनियों को 300 या इससे कम मज़दूरों को निकाल बाहर करने के लिए सरकार से अनुमति लेने से छूट दे दी गयी है, पहले यह संख्या 100 थी। इस संशोधन से यह भी तय है कि अब किसी पूँजीपति को अपनी ऐसी फ़ैक्टरी जिसमें 300 से कम मज़दूर काम करते हैं, को बन्द करने के लिए सरकार से पूछने की ज़रूरत नहीं है। फ़ैक्टरी से जुड़े किसी झगड़े को श्रम अदालत में ले जाने के लिए पहले कोई समय-सीमा नहीं थी, अब यहाँ भी तीन साल की सीमा तय कर दी गयी है।

और बेशर्मी की हद यह है कि ये सब रोज़गार” पैदा करने तथा कामगारों की काम के दौरान दशा सुधारने तथा सुरक्षा बढ़ाने के नाम पर किया जा रहा है। सरकार का कहना है कि इससे ज़्यादा निवेश होगा तथा ज़्यादा नौकरियाँ पैदा होंगी। असल में कहानी रोज़गार बढ़ाने की नहीं, बल्कि पूँजीपतियों को मज़दूरों की लूट करने के लिए और ज़्यादा छूट देने की है। ये तो अभी शुरुआत है, श्रम क़ानूनों को ज़्यादा से ज़्यादा बेअसर बनाने की कवायद जारी रहने वाली है और पूरे भारत में यही होने वाला है। राजस्थान सरकार के इन संशोधनों का केन्द्र सरकार कोई विरोध नहीं करने वाली और राष्ट्रपति तो है ही रबड़ की स्टैम्प। वैसे भी प्रणब मुखर्जी भी तो पूँजीपतियों के हमदर्द” ही हैं। राजस्थान सरकार द्वारा किये गये संशोधनों के पीछे-पीछे दूसरे राज्य (चाहे सरकार किसी भी पार्टी की हो) भी यही करेंगे, क्योंकि उनके पास भी “रोज़गार”” पैदा करने जैसे बहाने मौजूद हैं तथा इससे वे सहमत भी हैं। यदि उन्हें अपने यहाँ पूँजी को रोके रखना है तो अन्य राज्य राजस्थान से भी आगे बढ़कर ज़्यादा मज़दूर-विरोधी संशोधन करेंगे। इस सबके बीच पूँजी का कुल्हाड़ा मज़दूर वर्ग के ऊपर और ज़ोर से चलेगा। बहरहाल पूँजीपति ख़ुश हैं, कई मुँह छुपाके मुस्करा रहे हैं, तो कई जैसे मारुति सुजुकी इण्डिया लिमिटेड के चेयरमैन आर.सी. भार्गव, सरेआम हँस रहे हैं कि “इस दिशा (मतलब श्रम क़ानून ख़त्म करने की दिशा) में हरकत शुरू हुई है” और साथ ही नयी डिमाण्ड भी पेश कर रहे हैं कि फ़ैक्टरी बन्द करनी है तो करनी है”, मतलब कि उन्हें फ़ैक्टरी से 300 मज़दूर निकालने या फ़ैक्टरी बन्द करने वाला संशोधन अभी भी कम लग रहा है। इसके लिए ऐसा क़ानून होना चाहिए कि फ़ैक्टरी से मज़दूरों को निकालने या फ़ैक्टरी बन्द करने में कोई भी सरकारी या क़ानूनी दख़ल बिल्कुल न हो।

पूँजीपतियों की लगातार कम होती मुनाफ़े की दर और ऊपर से आर्थिक संकट तथा मज़दूर वर्ग में बढ़ रहे बग़ावती सुर से निपटने के लिए पूँजीपतियों के पास आखि़री हथियार फासीवाद होता है। भारत के पूँजीपति वर्ग के भी अपने इस हथियार को आज़माने के दिन आ गये हैं। फासीवादी सत्ता में आते तो मोटे तौर पर मध्यवर्ग (तथा कुछ हद तक मज़दूर वर्ग भी) के वोट के बूते पर हैं, लेकिन सत्ता में आते ही वह अपने मालिक बड़े पूँजीपतियों की सेवा में सरेआम जुट जाते हैं। राजस्थान सरकार के ताज़ा संशोधन इसी का हिस्सा हैं। मगर फासीवाद के सत्ता में आने के बाद बात श्रम क़ानूनों को कमजोर करने तक ही नहीं रुकेगी, क्योंकि फासीवाद बड़ी पूँजी के रास्ते से हर तरह की रुकावट दूर करने पर आमादा होता है और यह सब वह “राष्ट्रीय हितों”” के पर्दे के पीछे करता है। फासीवादी राजनीति पूँजीपतियों के लिए काम करने, उनका मुनाफ़ा बढ़ाने को देश के लिए काम करना, देश को “महान”” बनाने के लिए काम करना बनाकर पेश करती है जिसके लिए सभी को (ज़ाहिर है पूँजीपति इसमें शामिल नहीं होते) बिना कोई सवाल-जवाब किये, बिना कोई हक़-अधिकार माँगे काम करना पड़ेगा। जो भी कोई इससे इंकार करेगा, वह देश का दुश्मन घोषित किया जायेगा और फिर “देश के दुश्मनों”” को ख़त्म करने के बहाने मज़दूर वर्ग पर खुले हमले किये जायेंगे, मज़दूरों के नेताओं को देशद्रोही बताकर पकड़ा या मारा जायेगा और मज़दूर संगठनों को देशहित के विरोधी बताकर प्रतिबन्धित किया जायेगा। इस तरह मज़दूर वर्ग की लड़ाई अब पहले से ज़्यादा बड़ी तथा सख्त होने वाली है। इसलिए मज़दूर वर्ग को अपने विशाल से विशाल हिस्से को तो एकताबद्ध करना ही होगा, साथ ही समाज के दूसरे मेहनतकश लोगों के बड़े से बड़े हिस्से को अपने पक्ष में जीतने के लिए कोशिशें करनी होंगी, फासीवादियों के अन्धराष्ट्रवादी प्रचार का पर्दाफ़ाश करना होगा। पूँजीपतियों तथा सरकारी गुण्डा-गिरोहों का मुकाबला करने के लिए मज़दूर वर्ग को बहुत जल्दी ही अपनी ताक़त जुटानी होगी और व्यापकतम एकता क़ायम करते हुए अपने अधिकारों को बचाने की लड़ाई में उतरना होगा, लेकिन अब उन्हें यह भी याद रखना होगा कि अब उनका सामना पूँजीपतियों के पाले हुए गुण्डों तथा सरकारी वर्दीधारी गुण्डों के साथ-साथ फासीवादी गुण्डा-गिरोहों तथा फासीवादी प्रचार से भी होगा।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2014

 


 

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