मज़दूरों की कत्लग़ाह बने चाय बागान

श्‍वेता

अकसर चाय की चुसकियाँ लेते समय हम यह कल्पना भी नहीं कर पाते कि इस चाय का उत्पादन करने वाले चाय बागान मज़दूर किन विषम परिस्थितियों में काम कर रहे हैं और उनके जीवन के हालात कैसे हैं। एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2000 से 2014 के बीच दार्जीलिंग के दुआर और तराई के मैदानी क्षेत्रों के करीब 17 चाय बागानों में 1400 मज़दूरों की मौत हो चुकी है। इन मौतों का कारण कुपोषण, स्वच्छ पानी एवं स्वास्थ्य सुविधओं की कमी बताया गया है। हालाँकि पश्चिम बंगाल के श्रममंत्री मलय घटक ने बेशर्मी से इन कारणों को नकारकर पल्ला झाड़ लिया। पूँजी के इन टुकड़खोरों से और किस बात की उम्मीद की जा सकती है। गौरतलब है कि एक अन्य सर्वेक्षण के अनुसार इन क्षेत्रों के अधिकतर मज़दूरों का बॉडी मास इंडेक्स (बी.एम.आई.) 18.5 और कई का तो 14 से भी नीचे पाया गया है। यह जान लेना ज़रूरी है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के अनुसार 18.5 बी.एम.आई. अकाल ग्रस्त क्षेत्रों के लोगों में पाया जाता है।
tea plantationचाय बागान मज़दूरों की ऐसी हालत  उनके काम करने के हालात से जुड़ी हुई है। इन चाय बागान मज़दूरों का प्रतिदिन का मेहनताना सिर्फ 90 रुपये है । वह भी उन्हें बहुत देरी से दिया जाता है। इन्हें पीने का साफ़ पानी, कार्यस्थल पर शौचालय की सुविधा और स्वास्थ्य सुविधाएँ तक उपलब्ध नहीं हैं। दूषित पानी पीने के चलते डायरिया यहाँ एक सामान्य रोग बन चुका है। यही नहीं, लगातार कड़ी धूप में काम करने के कारण मज़दूरों के शरीर में पानी की बहुत कमी हो जाती है, जिससे निपटने के लिए बागान मालिकों ने उन्हें चाय में नमक मिलाकर पीने की आदत डलवा दी है। यह तरीका अंग्रेज़ी हुकूमत के दौर से ही बागानों में अपनाया जाता रहा है। शरीर में नमक की अधिकता ने इन मज़दूरों के बीच दिल की बीमारियों को भी बढ़ावा दिया है जिससे उनका अनुमानित जीवनकाल काफी घट गया है। इन क्षेत्रों में करीब 107 चाय बागान तो ऐसे हैं जिनमें कोई अस्पताल ही नहीं है और जहाँ हैं वहाँ भी ज़्यादातर अरसे से बंद पड़े हैं। अस्पतालों की कमी और आर्थिक तंगी दोनों के ही कारण बीमारी होने पर अधिकतर मज़दूरों को बिना दवा-इलाज के तिल-तिलकर मरने के लिए छोड़ दिया जाता है। बड़ी संख्या में गर्भवती महिलाओं की मृत्यु अस्पतालों की कमी के कारण हो जाती है। यहाँ 95 प्रतिशत महिलाएँ खून की कमी की शिकार हैं।
इन चाय बागानों में कितने बड़े पैमाने पर मानव तस्करी और यौन गुलामी जारी है इसका अंदाज़ा यूनीसेफ की वर्ष 2010 की रिपोर्ट से ही लगाया जा सकता है जिसके अनुसार दुआर के 12 चाय बागानों से करीब 3500 नाबालिग लड़कियों की तस्करी की गयी है और अगर इसमें तराई और दार्जीलिंग की पहाड़ियों को जोड़ दिया जाय तो यह आँकड़ा और अधिक बढ़ जायेगा।
कहने को तो बागान मज़दूरों के लिए चाय बागान श्रम कानून 1951 के तहत न्यूनतम मज़दूरी, पी.एफ,, पेंशन, बोनस, राशन, कार्यस्थल पर छाते एवं एप्रेन, आवास, साफ पीने के पानी, स्वास्थ्य एवं बच्चों के लिए शिक्षा आदि  सुविधाओं के प्रावधान शामिल हैं। मगर सब जानते हैं कि इस तरह के तमाम कानून केवल काग़ज़ों की शोभा बढ़ाने एवं आँखों में धूल झोंकने के ही काम आते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2010 के अपने एक निर्णय में भारत सरकार को टी-एक्ट 1953 के तहत कर्तव्य निर्वाह करने का आदेश दिया था। यह अधिनियम केन्द्र सरकार को शक्ति देता है कि वह चाय बागानों का नियंत्रण एवं प्रबन्धन अपने हाथों में लेकर बागान मज़दूरों के हितों को सुनिश्चित करे। मगर इस आदेश का पालन करना तो दूर जो थोड़े बहुत चाय बागान सरकारी नियंत्रण में थे उन्हें भी निजी हाथों में सौंप दिया गया। इसमें हैरान होने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि पूँजी के हितों की रक्षा करने के लिए बनी तमाम राज्य संस्थाएँ अदालतों के फैसलों की धज्जियाँ उड़ाने में हिचकिचाती नहीं हैं और इस तरह के अदालती फैसले न्यायपालिका समय-समय पर इसलिए भी देती रहती है ताकि जनता की उस पर से आस्था पूरी तरह से ख़त्म न हो जाय।
बागान मज़दूरों के श्रम को निचोड़कर मालिक जो बेहिसाब म़ुनाफ़ा कमाते हैं उसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चाय उत्पादन से होने वाला सालाना कारोबार 10,000 करोड़ रुपये का है। एक बड़े चाय बागान मकईबाड़ी ने तो हाल में चाय की नीलामी में 4 लाख 30 हज़ार रुपये किलो के भाव से चाय बेची! चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा बड़ा चाय उत्पादक है। भारत में वर्ष 2010 में चाय का उत्पादन 1.44 लाख टन था जो वर्ष 2014 में बढ़कर 1.89 लाख टन हो गया। ज़ाहिर है कि चाय उत्पादन की इस बढ़ोतरी में असंख्य बागान मज़दूरों का खून मिला हुआ है।
ब्रिटिश हुकूमत ने चाय पर चीन के एकाधिकार को चुनौती देने के मक़सद से असम क्ष्ेात्र में चाय का उत्पादन शुरू करवाया था। चाय उत्पादन में उतरने वाली कम्पनियों को ब्रिटिश हुकूमत द्वारा बेशुमार रियायतें दी गयीं। उन्हें न केवल बागानों के लिए बेहद सस्ती दरों पर ज़मीन मुहैया करायी गयी बल्कि उनके लिए श्रम कानूनों को भी बेहद ढीला किया गया। असम में दूसरे राज्यों से होने वाले श्रमिकों के आयात को सुगम बना दिया गया ताकि चाय बागानों में उत्पादन के लिए श्रमशक्ति बे-रोकटोक मुहैया हो सके। उस समय के चाय बागानों में मज़दूरों की हालत का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि असम में वर्ष 1863 में अन्य राज्यों से आये मज़दूरों की संख्या 84,915 थी जो 1866 में घटकर 49,750 रह गयी। घटिया खाना खाने और बीमार पड़ने के कारण बड़ी संख्या में मज़दूरों की मौत हो गयी। बागानों में मज़दूरों को मारा-पीटा जाता था और यदि वे इस हालत से बाहर निकलने के लिए भागने की कोशिश करते तो पकड़े जाने पर उन्हें भारी जुर्माना भरना पड़ता। महिलाएँ अकसर यौन उत्पीडन की घटनाओं का शिकार होतीं। मज़दूरों को यूनियन बनाने तक का अधिकार हासिल नहीं था।
बागान मज़दूरों ने इन हालात के खिलाफ़ एकजुट होकर संघर्ष किया और जीने और काम करने की बेहतर स्थितियों की माँगें उठाई और कुछ हद तक उन्हें हासिल भी किया। लेकिन बाद में ट्रेड यूनियनों की कमज़ोरी और ग़द्दारी के कारण ये संघर्ष बिखर गये जिसका नतीजा यह है कि आज फिर चाय बागान मज़दूरों के हालात कमोबेश वैसे ही हो गये हैं जैसे ब्रिटिश हुकूमत के दौरान थे ।

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2016


 

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