क्या आतंकवाद वाक़ई देश और दुनिया की सबसे बड़ी समस्या है?

अनुपम

अख़बारों और टीवी चैनलों से लेकर सोशल मीडिया तक में अक्सर आतंकवाद का मुद्दा छाया रहता है। टीवी स्टूडियो और अख़बारों के सम्पादकीय पृष्ठों पर देश के नामी-गिरामी रक्षा विशेषज्ञ और रिटायर्ड पुलिस अधिकारी व नौकरशाह हमें बताते हैं कि आतंकवाद देश की सबसे बड़ी समस्या है। हमें बताया जाता है कि देश के बाहर और भीतर देश को कमज़ोर करने वाली ताक़तें आतंकी कार्रवाइयाँ अंजाम देने का षडयंत्र रच रही हैं। सरकार भी इन विशेषज्ञों की राय को संजीदगी से लेते हुए हर साल रक्षा बजट में इज़ाफ़ा करती रहती है। लेकिन अगले साल आतंकवाद का मुद्दा और ज़्यादा ज़ोर-शोर से उछलने लगता है और सैन्यबलों के आधुनिकीकरण की माँग पहले से भी ज़्यादा ज़ोर पकड़ने लगती है। सिर्फ़ हमारे ही देश के नहीं, बल्कि दुनियाभर के हुक्मरान आतंकवाद को सबसे बड़ी समस्या और चुनौती के रूप में पेश करते रहे हैं। ये बात दीगर है वे कभी भी आतंकवाद को बढ़ावा देने में ख़ुद की भूमिका की कभी बात नहीं करते।

इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता है कि हाल के दशकों में आतंकवाद दुनियाभर में एक प्रमुख मुद्दा बनकर उभरा है। लेकिन क्या भारत जैसे पिछड़े पूँजीवादी मुल्क में यह सबसे बड़ी समस्या है? क्या इस देश में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, आवास, पेयजल आदि जैसे मुद्दे अब गौण हो गये हैं? आतंकवाद से आतंकित हुए बिना आइए ठोस आँकड़ों की मदद से ठण्डे दिमाग से इन सवालों के जवाब ढूँढ़ने की कोशिश करते हैं।

‘साउथ इंडिया टेररिज़्म पोर्टल’ के एक आँकड़े के मुताबिक़ भारत में वर्ष 2017 में पूरे देशभर में 178 छोटी-बड़ी आतंकी घटनाएँ हुईं जिसमें 77 लोगों की मौतें हुई। उसी वर्ष 11 अगस्त से 15 अगस्त के बीच गोरखपुर में 79 बच्चे केवल पाँच दिन में ही मौत की नींद में सुला दिए गए। ये बच्चे किसी आतंकी हमले में नहीं बल्कि समय पर ऑक्सीजन न मिलने की वजह से इस दुनिया में नहीं रहे।

भारत रक्षा-व्यय के मामले में चौथा सबसे अधिक ख़र्च करने वाला देश है। यहाँ पर रक्षा बजट 2017-18 कुल 4.31 लाख करोड़ था। यह धनराशि वर्ष 2017-18 के स्वास्थ्य बजट की दोगुनी है। भारत में स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं से होने वाली मौते कुल मौतों की 90 प्रतिशत हैं जबकि आतंकी घटनाओं में हुई मौतों का प्रतिशत केवल 0.07 प्रतिशत है। ऐसे मेँ अगर केवल आम जनता के हित में आतंकवाद से लड़ने के लिए ही सैन्य ख़र्च बढ़ाया जा रहा है तो लोगों की भलाई के लिए क्या ठीक रहेगा स्वास्थ्य पर खर्च बढ़ाया जाए या सेना पर?

विभिन्न स्त्रोतों से प्राप्त स्वास्थ्य से जुड़े आँकड़े बताते हैं कि:

भारत में एक व्यक्ति के जीवन का वह आयुकाल जिसमें वह अधिकतम उत्पादन करने में सक्षम होता है, केवल साढ़े छह वर्ष है। यह आयुकाल चीन में 20 वर्ष, ब्राजील में 16 वर्ष और श्रीलंका में 13 वर्ष है। ‘इंटरनेशनल रैंकिंग ऑफ ह्यूमन कैपिटल’ की इस रिपोर्ट में जो सूची दी गयी है उसमें भारत का स्थान 195 देशों में 185वाँ है।

भारत में वित्तीय वर्ष 2017-18 में जीडीपी का 1.4 प्रतिशत स्वास्थ्य पर ख़र्च किया गया जबकि मालदीव, श्रीलंका और भूटान जैसे देशों ने इसी वित्तीय वर्ष में स्वास्थ्य पर अपने-अपने देश की जीडीपी का क्रमशः 9.4, 1.6 और 2.5 प्रतिशत ख़र्च किया।

अब अपने देश की बात करें, यदि भय और असुरक्षाबोध को आतंकवाद का पैमाना माना जाए तो अपने देश में तो भयंकर असुरक्षाबोध है। 2012 की लेन्सर्ट रिपोर्ट के अनुसार, यहाँ हर घंटे एक छात्र आत्महत्या करता है। हर साल यहाँ 1,600 से भी अधिक लोग मौसम के कहर के शिकार होकर मर जाते हैं। WHO की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत दुनिया का सबसे अधिक अवसादग्रस्त देश है, इसके अतिरिक्त महिला सुरक्षा के मामले में यह एक अन्य रिपोर्ट ( थॉमसन रायटर्स की एक रिपोर्ट ) के अनुसार, दुनिया का चौथा सबसे अधिक असुरक्षित देश है।
यदि लोगों की मृत्यु के बजाय आतंकवाद से उत्पन्न भय और असुरक्षाबोध को ध्यान में रखकर यह कहा जाये कि आतंकवाद भारत में सबसे बड़ी समस्या है क्योंकि यह लोगों के दिलों में किसी दुर्घटना का ख़ौफ़ पैदा किए हुए है तो यह भी सोचना होगा कि उससे ज्यादा ख़ौफ़ तो लोगों में इस बात को लेकर है कि बेरोज़गारी और मँहगाई के रहते उनकी मूलभूत आवश्यकताएँ पूरी हो भी पाएँगी या नहीं। सड़क, अस्पताल और स्कूल जैसी सुविधाओं की बात यदि न भी की जाए तो भी स्थिति कहीं से भी बेहतर नहीं दिखती। लेकिन फिर भी हवाई वादे हर चुनाव में होना कोई नयी बात नहीं। हर पार्टी यह सब्ज़बाग़ दिखाती है कि वह सत्ता में आकर विकास करेगी लेकिन सत्ता में आने के बाद सारे वादे भूलभाल जाती है और पूँजीपतियों के कल्याण के लिए उल्टा विनाश करने लगती है।
क्या यह कोई आतंकवाद करता है जो देश की 18 करोड़ आबादी को फुटपाथों पर सोना पड़ता है और करीब इतनी ही आबादी को ही झुग्गी-झोंपड़ियों में रहना पड़ता है?

अब आइए दुनिया के स्तर पर बात करें। विश्वशांति के लिए सबसे अधिक चिंतित कौन सा देश दिखाई पड़ता है? कौन सा देश आतंकवाद से लड़ने के लिए पूरी तरह तत्पर है? शायद आप अमेरिका का नाम लें। आइए आतंकवाद को बढ़ावा देने में अमेरिका की ख़ुद की भूमिका से सम्बन्धित कुछ आँकड़ें देखें।

अमेरिका दुनिया का सबसे बड़ा हथियारों का उत्पादक है। यह 98 से भी अधिक देशों को हथियार बेचता है। यह अपने देश की जीडीपी का लगभग 3.2 प्रतिशत रक्षा-व्यवस्था पर खर्च करता है। बीसवीं और इक्कीसवीं सदी में सबसे अधिक युद्ध छेड़ने और दूसरे देशों पर हमले करने में इस देश को विश्व में पहला स्थान प्राप्त है। केवल 21वीं सदी की सूची यह रही : अफगानिस्तान पर हमला (2001), उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान में युद्ध (2004), सोमालिया के गृहयुद्ध में हस्तक्षेप (2007), इराक पर हमला (2003), सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप (2014), यमन के गृहयुद्ध में हस्‍तक्षेप (2015), लीबिया में सैन्य हस्तक्षेप (2015)।

इसके अतिरिक्त ड्रोन जैसे मानवरहित विमानों से हमले करके पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान और यमन जैसे देशों में हज़ारों नागरिकों को मारने का काम तो अमेरिका 2009 से ही करता आ रहा है। यह सारा ही काम आतंकवाद के सफ़ाये के लिए हुआ है या फिर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के नाम पर।
लेकिन क्या पूरे के पूरे देशों को तबाह कर डालना, लाखों बच्चों को मौत के घाट उतार देना, लोगों में आतंक फैलाना आतंकवाद नहीं है?

मज़दूर बिगुल, अक्तूबर 2019


 

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