मज़दूरों का राजनीतिक अख़बार एक क्रान्तिकारी पार्टी खड़ी करने के लिए ज़रूरी है

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Lenin-reading-Pravda-c.19-007…यदि स्थानीय पैमाने पर मज़बूत राजनीतिक संगठन प्रशिक्षित नहीं किये जाते, तो एक अखिल रूसी अख़बार का बहुत बढ़िया संगठन करने से भी कोई लाभ न होगा। बिल्कुल सही है। लेकिन यही तो असल बात है कि मज़बूत राजनीतिक संगठनों को प्रशिक्षित करने का एक अखिल रूसी अखबार के अलावा और कोई तरीक़ा नहीं है। ईस्क्रा ने अपनी ‘‘योजना’’ पेश करने से पहले जो महत्वपूर्ण बातें कही थी, उसे लेखक ने एकदम भुला दिया है। ईस्क्रा ने कहा था: ‘‘एक ऐसे क्रान्तिकारी संगठन के निर्माण का नारा देना’’ आवश्यक है, ‘‘जिसमें केवल नाम के लिए नहीं, बल्कि कार्यरूप में सभी शक्तियों को एकत्रित करने और आन्दोलन का नेतृत्व करने की क्षमता हो, यानि जो संगठन प्रत्येक विरोध-आन्दोलन और प्रत्येक विस्फोट का किसी भी क्षण समर्थन करने को तैयार रहे और जो उनका उपयोग उन लड़ाकू शक्तियों को बढ़ाने और मज़बूत करने के लिए करे, जो निर्णायक युद्ध के लिए आवश्यक होगी।’’ परन्तु – ईस्क्रा ने आगे लिखा था – फरवरी और मार्च की घटनाओं के बाद अब इस बात को सिद्धान्त रूप में हर आदमी मान लेगा। फिर भी हमें जिस चीज़ की आवश्यकता है, वह यह नहीं है कि इस समस्या का सिद्धान्त रूप में हल निकाला जाये, बल्कि यह कि उसका कोई व्यावहारिक हल निकले। हमें तुरन्त कोई निश्चित रचनात्मक योजना पेश करनी चाहिए, ताकि हर आदमी निर्माण का काम आरम्भ कर सके और हर तरफ़ से संगठन बनना शुरू हो जाये। लेकिन हमें फिर व्यावहारिक हल से हटाकर एक ऐसे तथ्य की ओर घसीटा जा रहा है, जो सिद्धान्त रूप में तो बिल्कुल सही, निर्विवाद और महान तथ्य है, पर आम मज़दूरों की दृष्टि से एकदम नाकाफ़ी और क़तई समझ में न आने वाला तथ्य है, यानि ‘‘मज़बूत राजनीतिक संगठनों को प्रशिक्षित करना’’! सुयोग्य लेखक महोदय, यहाँ सवाल यह नहीं है। सवाल यह है कि प्रशिक्षण देने का काम किस तरह किया जाये और सम्पन्न किया जाये!

यह कहना सही नहीं है कि ‘‘अभी तक हम मुख्यतया सजग मज़दूरों के बीच ही काम करते रहे हैं और आम मज़दूर प्रायः केवल आर्थिक संघर्ष में लगे रहे हैं।’’ इस रूप में तो यह प्रस्थापना सजग मज़दूरों को ‘‘आम’’ मज़दूरों के मुक़ाबले खड़ा करने की उस प्रवृत्ति का रूप धारण कर लेती है, जो स्वोबोदा में अक्सर दिखायी पड़ती है और जो बुनियादी तौर पर ग़लत है। हमारे यहाँ पिछले कुछ वर्षों में तो सजग मज़दूर भी ‘‘प्रायः केवल आर्थिक संघर्ष में लगे रहे हैं’’। पहली बात यह है। दूसरी बात यह है कि यदि हम सजग मज़दूरों और बुद्धिजीवियों, दोनों के बीच से इस संघर्ष के लिए नेता प्रशिक्षित करने में मदद नहीं करेंगे, तो जनता राजनीतिक संघर्ष चलाना कभी नहीं सीखेगी, और ऐसे नेता प्रशिक्षण केवल इसी तरीक़े से पा सकते हैं कि वे हमारे राजनीतिक जीवन के सभी कोशिशों का नियमित रूप से, दैनन्दिन मूल्यांकन करते चलें। इसलिए ‘‘राजनीतिक संगठनों के प्रशिक्षण’’ की बातें करना और साथ ही राजनीतिक अखबार के ‘‘काग़ज़ी काम’’ का ‘‘स्थानीय पैमाने पर किये जाने वाले सजीव राजनीतिक काम’’ से मुक़ाबला करना एकदम हास्यास्पद बात है! अरे, ईस्क्रा ने तो अपनी अखबार की ‘‘योजना’’ को बेरोजगारों के आन्दोलन, किसानों के विद्रोहों, जेम्स्त्वो के सदस्यों के असन्तोष और ‘‘जारशाही के बाशीबुजूक (18-19वीं शताब्दियों की तुर्क सेना के अनियमित दस्ते। इन दस्तों के सैनिक अपनी अनुशासनहीनता, क्रूरता और लूटमार के लिए कुख्यात थे।- सं-) के खिलाफ़ जनता के क्रोध’’, आदि का समर्थन करने के लिए ‘‘जुझारू मुस्तैदी’’ पैदा करने की ‘‘योजना’’ के ही अनुरूप बनाया है। हर आदमी, जिसे आन्दोलन की थोड़ी भी जानकारी है, अच्छी तरह जानता है कि स्थानीय संगठनों में से अधिकतर इन चीज़ों के बारे में कभी सपने में भी नहीं सोचते; कि ‘‘सजीव राजनीतिक काम’’ की जिन सम्भावनाओं की ओर यहाँ संकेत किया गया है, उनमें से कई ऐसी हैं, जिन्हें एक भी संगठन कभी कार्यान्वित नहीं कर पाया है; कि, मिसाल के लिए, जब जेम्स्त्वो के बुद्धिजीवियों में बढ़ते हुए असन्तोष और विरोध की ओर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की जाती है, तो नदेज्दिन (‘‘हे भगवान, तो क्या यह अखबार जेम्स्त्वो के लिए निकाला गया है?’’-पूर्वबेला, पृ- 129), ‘‘अर्थवादी’’ (ईस्क्रा के अंक 12 में प्रकाशित उनका पत्र) और बहुत-से व्यावहारिक कार्यकर्ता एकदम निराश और चिन्तित हो उठते हैं। ऐसी हालत में ‘‘शुरू करने’’ का केवल यही तरीक़ा हो सकता है कि लोगों को इन तमाम चीज़ों के बारे में सोचने के लिए प्रेरणा दी जाये और उन्हें प्रेरणा दी जाये कि वे असन्तोष और सक्रिय संघर्ष के सभी विविध रूपों का जोड़ लगायें और सामान्यीकरण करें। आज, जब कि सामाजिक-जनवादी कार्यभारों को बहुत निचले स्तर पर लाया जा रहा है, ‘‘सजीव राजनीतिक काम’’ को केवल सजीव राजनीतिक आन्दोलन से आरम्भ किया जा सकता है, और यह उस वक़्त तक नहीं हो सकता, जब तक कि हमारे पास एक ऐसा अखिल रूसी अखबार न हो, जो जल्दी-जल्दी निकले और उसका सही तौर पर वितरण हो।

जो लोग ईस्क्रा की ‘‘योजना’’ को ‘‘साहित्यिकपने’’ का सूचक समझते हैं, उन्होंने योजना का सारतत्व जरा भी नहीं समझा है और वे सोचते हैं कि इस समय सबसे उपयोगी साधन के रूप में जिस चीज़ का सुझाव दिया गया है, वही लक्ष्य है। प्रस्तावित योजना के स्पष्टीकरण के लिए जो दो उपमाएँ दी गयी थीं, उनका अध्ययन करने की तक़लीफ़ इन लोगों ने गवारा नहीं की है। ईस्क्रा ने लिखा था: एक अखिल रूसी राजनीतिक अखबार का प्रकाशन वह मुख्य सूत्र होना चाहिए, जिसके सहारे हम इस संगठन को (अर्थात एक ऐसे क्रान्तिकारी संगठन को, जो प्रत्येक विरोध आन्दोलन और प्रत्येक विस्फोट का समर्थन करने के लिए सदा तैयार रहे) अडिग भाव से विकसित कर सकेंगे तथा उसे अधिक गहरा और व्यापक बना सकेंगे। अब मुझे कृपया यह बताइये: जब राजगीर लोग कोई बहुत बड़ी इमारत खड़ी करने के लिए, जितनी बड़ी इमारत पहले कभी न देखी गयी हो, उसके अलग हिस्से में ईंटे बिछाते हैं, तब वे यदि प्रत्येक ईंट के वास्ते ठीक स्थान का पता लगाने के लिए, पूरे काम के अन्तिम लक्ष्य को सदा अपने सामने रखने के लिए और न केवल हरेक ईंट का, बल्कि ईंट के हरेक टुकड़े का सही इस्तेमाल करने के लिए, ताकि वह पहले बिछायी गयी और बाद में बिछायी जाने वाले ईंटों के साथ जुड़कर एक पूर्ण और सबको मिलाकर चलने वाली रेखा बन जायें – इस सबके लिए यदि वह एक डोरी इस्तेमाल करते हैं, तो क्या उसे ‘‘काग़ज़ी’’ काम कहा जायेगा? और क्या अपने पार्टी जीवन में हम ठीक एक ऐसे ही समय से नहीं गुजर रहे हैं, जब कि हमारे पास ईंटें और राजगीर तो हैं, पर सबका पथ प्रदर्शन करने वाली यह डोरी नहीं है, जिसे सब देख सकें और जिसके मुताबिक सभी काम कर सकें? उन लोगों को चिल्लाने दीजिए, जो यह कहते हैं कि हम डोरी तानकर अपना हुक़्म चलाते हैं: महानुभावो, यदि हम अपना हुक़्म चलाना चाहते, तो अपने मुखपृष्ठ पर हम ‘‘ईस्क्रा, अंक 1’’ न लिखकर ‘‘राबोचाया गजेता, अंक 3’’ लिखते, और जैसा कि हमसे अनेक साथी लिखने के लिए कह रहे थे और जैसा कि लिखने का हमें ऊपर बतायी गयी घटनाओं के बाद पूरा अधिकार होता। परन्तु हमने यह नहीं किया। हम हर जगह के झूठे सामाजिक-जनवादियों से निर्ममतापूर्वक लड़ने के लिए अपने हाथों को स्वतन्त्र रखना चाहते थे; हम यह चाहते थे कि यदि हमने सही ढंग से अपनी डोरी तानी है, तो लोग उसका आदर इसलिए करें कि वह सही है, इसलिए नहीं कि उसे अधिकृत मुखपत्र ने ताना है।

‘‘स्थानीय कार्य को केन्द्रीय संस्थाओं के रूप में जोड़ने का प्रश्न एक गोरखधन्धा बन गया है,’’  ल. नदेज्दिन हमें उपदेश देते हुए फरमाते हैं, ‘‘एकता के लिए एकरूप तत्वों की आवश्यकता होती है, और यह एकरूपता उसी चीज़ से पैदा हो सकती है, जो दूसरों को जोड़ती हो; लेकिन यह जोड़ने वाला तत्व मज़बूत स्थानीय संगठनों की ही उपज हो सकता है, जो इस समय अपनी एकरूपता के लिए कतई प्रसिद्ध नहीं है।’’ यह सत्य भी उतना ही प्राचीन तथा निर्विवाद है, जितना यह सत्य कि हमें मज़बूत राजनीतिक संगठनों को प्रशिक्षित करना चाहिए। और यह सत्य उतना ही बंजर भी है। हर सवाल ‘‘एक गोरखधन्धा है’’, क्योंकि पूरा राजनीतिक जीवन एक ऐसी अन्तहीन जंज़ीर है, जो असंख्य कड़ियों से बनी है। राजनीतिज्ञ की पूरी कला इस बात में निहित है, कि वह उस कड़ी का पता  लगा सके और उस कड़ी को ज़्यादा से ज़्यादा मज़बूती से पकड़ सके, जिसके हमारे हाथों से छीन लिये जाने का सबसे कम अंदेशा हो, जो उस समय सबसे अधिक महत्वपूर्ण कड़ी हो और जिसको पकड़ लेने से पूरी ज़ंजीर पर क़ाबू पा लेने की गारण्टी हो जाये। यदि हमारे पास ऐसे अनुभवी राजगीरों का एक दल हो, जो मिलकर काम करने में इतने दक्ष हों कि वे बिना किसी निर्देशक डोरे के ईंटों को बिल्कुल सही स्थान पर बिछा सकते हों (और सिद्धान्त रूप में यह बात असम्भव हरगिज नहीं है), तो उस समय शायद हम किसी और कड़ी को पकड़ सकें, परन्तु दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे पास ऐसे अनुभवी राजगीर अभी नहीं हैं, जिन्हें दल बनाकर काम करना आता हो, अक्सर ऐसी जगहों पर ईंटें बिछा दी जाती हैं, जहाँ उनकी कोई ज़रूरत नहीं होती, ईंटें एक सामान्य डोरे के अनुसार नहीं बिछायी जातीं, बल्कि इस तरह बिखेर दी जाती हैं कि दुश्मन इन्हें आसानी से ढहा सकता है, मानो वे ईंट नहीं, बालू के कण हों।

अब दूसरी उपमा को लीजिए: ‘‘अखबार न केवल सामूहिक प्रचारक और सामूहिक आन्दोलनकर्ता का, बल्कि सामूहिक संगठनकर्ता का भी काम करता है। इस दृष्टि से उसकी तुलना किसी बनती हुई इमारत के चारों ओर बाँधे गये पाड़ से की जा सकती है; इससे इमारत की रूपरेखा प्रकट होती है और इमारत बनाने वालों को एक-दूसरे के पास आने-जाने में सहायता मिलती है, इससे वे काम का बँटवारा कर सकते हैं, अपने संगठित श्रम द्वारा प्राप्त आम परिणाम देख सकते हैं।’’ क्या इस उद्धरण से यह मालूम होता है कि कोई कुर्सीतोड़ लेखक अपनी भूमिका को बढ़ा-चढ़ाकर बता रहा है? पाड़ इमारत के काम नहीं आता, उसे खड़ा करने में सबसे सस्ता सामान इस्तेमाल किया जाता है; उसे अस्थायी रूप से, कुछ समय के लिए ही बनाया जाता है और जैसे ही इमारत का ढाँचा बनकर तैयार हो जाता है, वैसे ही पाड़ को गिराकर उसकी लकड़ी जलाने के काम में ले ली जाती है। जहाँ तक क्रान्तिकारी संगठनों की इमारत बनाने का सवाल है, अनुभव यह बताता है कि कभी-कभी वह बिना पाड़ बाँधे भी बनायी जा सकती है – उदाहरण के लिए, पिछली शताब्दी के आठवें दशक को ले लीजिए। लेकिन वर्तमान समय में यह बात नहीं सोची जा सकती कि जिस इमारत की हमें ज़रूरत है, वह बिना पाड़ बाँधे भी बन सकती है।


 

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