कैसा है यह लोकतन्त्र और यह संविधान किनकी सेवा करता है? (अठारहवीं किस्त)
भारतीय संघात्मक ढाँचे के ढोल की पोल

आनन्द सिंह

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भारतीय संविधान और लोकतन्त्र के उत्साही समर्थक भारत के संघात्मक ढाँचे के विशिष्ट स्वरूप पर बलाइयाँ लेते नहीं अघाते। उनके अनुसार भारतीय गणतन्त्र की यह ख़ूबी है कि वह आम तौर पर तो संघात्मक रहता है, परन्तु विघटनकारी तत्वों से निपटने के लिए ज़रूरत पड़ने पर इसको एकात्मक ढाँचे में भी तब्दील किया जा सकता है। जबकि सच्चाई तो यह है कि अर्न्तवस्तु के रूप में भारतीय संविधान एक एकात्मक ढाँचे की आधारशिला रखता है जिसकी असलियत बाहरी रंगरोगन के द्वारा छिपायी गयी है। एक बहुराष्ट्रीय देश (कई राष्‍ट्रों-राष्ट्रीयताओं-उपराष्ट्रीयताओं वाला देश) होने के बावजूद भारतीय गणराज्य की स्थापना एक ऐसी पद्धति द्वारा नहीं हुई जिसमें विभिन्न राष्ट्रीयताओं ने अपने अधिकांश अधिकार अपने पास रखकर अपने कुछ अधिकार स्वैच्छिक रूप से भारतीय गणराज्य को देने का फैसला किया हो। यहाँ हुआ यह कि औपनिवेशिक सत्ता की वापसी के फैसले के साथ ही भारत की केन्द्रीय बुर्जुआ राज्यसत्ता ने तमाम राष्ट्रीयताओं और उपराष्ट्रीयताओं को अपने नवनिर्मित संघात्मक गणराज्य (न कि गणराज्यों का संघ) के ढाँचे में शामिल कर लिया। उनमें से कुछ तो स्वेच्छा से (हलाँकि उनमें भी केन्द्रीय दबाव के प्रतिकार और वर्चस्व की भावना मौजूद थी) इस गणराज्य में शामिल हुए, परन्तु कई मामलों में मुखर या परोक्ष रूप में बलप्रयोग तथा विश्वासघात (वायदों से मुकरने के रूप में) का पहलू मौजूद था। रियासतो-रजवाड़ों की मौजूदगी ने भी कांग्रेसी सरकार द्वारा दबाव के प्रयोग के लिए औचित्य-प्रतिपादन का काम किया था क्योंकि जनता इन राजे रजवाड़ों से त्रस्त थी और इनसे किसी भी हाल में छुटकारा पाना चाहती थी।

भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास पर एक नज़र डालने से हम पाते हैं कि कमोबेश समूचे भारतीय उपमहाद्वीप को एक केन्द्रीय राज्यसत्ता के मातहत लाने का काम ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने मुकम्मिल किया। भारतीय राष्ट्रवाद का जन्म उपनिवेशवाद विरोध की भावना और विचार के रूप में हुआ और उपनिवेशवाद की गर्भ से जन्मा भारतीय बुर्जुआ वर्ग राष्ट्रीय आन्दोलन में नेतृत्वकारी वर्ग के रूप में उभरा और समझौता-दबाव-समझौता की रणनीति अपनाते हुए जनता की संगठित शक्ति का इस्तेमाल कर एक ओर उसने औपनिवेशिक सत्ता से अपने लिये रियायतें माँगकर अपने आप को मजबूत किया और वहीं दूसरी ओर जनता के आन्दोलनों को एक हद से ज़्यादा उग्र नहीं होने दिया। औपनिवेशिक काल में, भारतीय उपमहाद्वीप के अलग-अलग भाषाओं-संस्कृतियों वाले इलाकों की ठोस परिस्थितियों के हिसाब से बुर्जुआ और निम्नबुर्जुआ वर्ग का राष्ट्रीय मानस शुरू से ही द्विस्तरीय या द्वैधतापूर्ण रूप में विकसित हुआ। एक ओर अलग-अलग विकसित हुए राष्ट्रों-राष्ट्रीयताओं (जैसे बंगला, तेलगू, मराठी, तमिल आदि) की ज़मीन पर विकसित हुई राष्ट्रीय भावना थी, दूसरी ओर उपनिवेशवाद-विरोध की साझा जमीन पर विकसित हुई सर्वभारतीय राष्ट्रवाद (पैन-इण्डियन नेशनलिज़्म) की भावना थी। इन दोनों के बीच अतिच्छादन(ओवरलैपिंग) की स्थिति भी बनती थी और संघात की भी। उत्तर औपनिवेशिक भारत(और पाकिस्तान) कई राष्ट्रों, राष्ट्रीयताओं और उपराष्ट्रीयताओं के एक संजटिल समुच्चय के रूप में अस्तित्व में आया।

औपनिवेशिक सत्ता से आज़ादी की लड़ाई के दौरान कांग्रेसी नेतृत्व ने एकाधिक बार देश की जनता से यह वायदा किया था कि आज़ादी मिलने के बाद भारत गणराज्यों का एक ऐसा स्वैच्छिक संघ होगा जिसमें विभिन्न इकाइयों के पास अधिकतम स्वायत्तता होगी और केवल कुछ ही न्यूनतम साझा मामले केन्द्र के पास होंगे। यहाँ तक कि अवशिष्ट अधिकार (residuary powers) राज्यों को देने का वायदा किया गया था। परन्तु आज़ादी मिलने की आहट सुनते ही कांग्रेसी नेतृत्व ने निहायत ही बेशर्मी से अपने वायदों से मुकरते हुए एक मज़बूत केन्द्र की रट लगानी शुरू कर दी। 1946 के कैबिनेट मिशन की योजना में एक अविभाजित भारत का प्रस्ताव था जिसमें बंगाल और पंजाब का विभाजन किये बगैर एक ढीले ढाले संघात्मक ढाँचे की बात कही गई थी जिसमें केन्द्र के पास सीमित अधिकारों का प्रावधान था। परन्तु नेहरू और पटेल के नेतृत्व में कांग्रेस ने इस योजना को इस तर्ज़ पर अस्वीकार कर दिया कि इससे देश में अपकेन्द्री ताकतों (centrifugal forces) को बढ़ावा मिलेगा। ग़ौरतलब है कि कैबिनेट मिशन की इस योजना पर मुस्लिम लीग की सहमति थी। भारत में आम तौर पर विभाजन की पूरी ज़िम्मेदारी मुस्लिम लीग और जिन्ना के मत्थे मढ़ दी जाती है, परन्तु कैबिनेट मिशन के प्रस्ताव पर नेहरू और पटेल सहित कांग्रेसी शीर्ष नेतृत्व के रुख से स्पष्ट है कि वो भी विभाजन की विभीषिका की ज़िम्मेदारी से अपना पल्ला नहीं झाड़ सकते। एक मज़बूत केन्द्र की सनक भरी ख़्वाहिश में उन्होंने विभाजन जैसी त्रासदी को स्वीकार कर लिया और अन्ततः माउण्टबेटन एवार्ड को हाथों हाथ लिया क्योंकि इसमें सत्ता को कांग्रेस के नेतृत्व में एक मज़बूत केन्द्र को सत्ता हस्तांतरण का प्रस्ताव था।

सत्ता हस्तांतरण के बाद संविधान सभा ने भारतीय संविधान के निर्माण का काम पूरा किया। संघात्मक ढाँचे के वायदे को ताक पर रख कर इस संविधान में भारत को राज्यों के ‘यूनियन’ के रूप में परिभाषित किया गया न कि राज्यों के ‘फ़ेडरेशन’ के रूप में (अनु. 1)। भारतीय संविधान में केन्द्र की अविभाज्यता को प्रश्नों से परे बता कर विभिन्न राष्ट्रीयताओं के आत्मनिर्णय के अधिकार और उनके संघ से अलग होने के अधिकार को असंवैधानिक क़रार दिया गया है। जबकि भारत की संसद के पास यह अधिकार है कि वह राज्यों को विभाजित कर सकती है, उनके क्षेत्रों, सीमाओं और यहाँ तक नामों में फ़ेरबदल कर सकती है (अनु. 3)।

भारतीय संविधान में केन्द्र व राज्य के सम्बन्धों से जुड़े जितने भी प्रावधान हैं वे संघात्मक ढाँचे के सिद्धान्त की खिल्ली उड़ाते नज़र आते हैं। संविधान की सातवीं अनुसूची में केन्द्र और राज्यों के बीच अधिकार क्षेत्रों को विभाजित करती हुई तीन सूचियाँ – संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची मौजूद हैं। इनमें क्रमशः 97, 66 और 47 अधिकार क्षेत्र उल्लिखित हैं। यानी संघ की सूची में कहीं ज़्यादा अधिकार हैं। यही नहीं महत्व की दृष्टि से भी संघ की सूची में उल्लिखित अधिकार ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं और राज्य की सूची में प्रशासनिक किस्म के कुछ अधिकार दिये गये हैं। यहाँ तक कि समवर्ती सूची में भी केन्द्र को वरीयता दी गयी है। अवशिष्ट अधिकार (residuary powers) राज्य के पास न होकर केन्द्र के पास हैं। संसद में राज्य सभा को यह अधिकार है यदि उसके दो तिहाई या उससे ज़्यादा सदस्य रज़ामन्द हों तो वह राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों पर भी कानून बना सकती है।

अनु. 257 केन्द्र सरकार को यह अधिकार देता है किसी भी राज्य को निर्देश दे सकती है कि उसके कार्यकारी अधिकार केन्द्र के अधिकारों के आड़े न आयें। किसी राज्य का राज्यपाल उस राज्य की जनता द्वारा नहीं चुना जाता बल्कि केन्द्र द्वारा मनोनीत किया जाता है। राज्यपाल को कई विशेषाधिकार मिले हैं। वह राज्य की विधायिका द्वारा पारित किसी भी बिल को राष्ट्रपति के विचाराधीन रख सकता है। पिछले छह दशकों में राज्यपालों के आचरण से यह स्पष्ट हो गया है कि राज्यपाल राज्य में केन्द्र सरकार के एजेण्ट की भूमिका निभाते हैं। राज्यपाल की रिपोर्ट के आधार पर राष्ट्रपति राज्य की असेम्बली को भंग कर सकता है, मंत्रिमण्डल को निरस्त कर सकता है और राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता है (अनु. 356)। पिछले छह दशकों में 100 से भी ज़्यादा बार अलग-अलग समयों पर लगभग हर राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू हो चुका है जो संघीय ढाँचे को एक मज़ाक बनाकर रख देता है। यही नहीं आपातकाल लागू होने की स्थिति में केन्द्र सभी राज्यों के विधायी और कार्यकारी अधिकार अपने पास रख सकता है (अनु. 353)। सामान्य परिस्थितियों में भी आई ए एस और आई पी एस जैसी ऑल इण्डिया सर्विसेज़ के ज़रिये राज्यों के प्रशासन तन्त्र पर अपनी पकड़ क़ायम रखता है। ये सर्विसेज़ अपने आप में संघीय व्यवस्था का माखौल उड़ाती हैं। संविधान में केन्द्र और राज्यों के बीच राजस्व के बँटवारे सम्बन्धी प्रावधानों में भी केन्द्र को ज़्यादा अहम राजस्व के स्रोत दिये गये हैं जिसके फलस्वरूप राज्य केन्द्र पर निर्भर रहते हैं। मुद्रा के मुद्रण का अधिकार सिर्फ केन्द्र के पास है।

भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त भारतीय राज्य की एकात्मक अन्तर्वस्तु के चलते ही पिछले छह दशकों में केन्द्रीय बुर्जुआ राज्य सत्ता ने उत्पीड़ित राष्ट्रीयताओं की जनाकांक्षाओं का दमन करने के लिए संविधान का उल्लंघन करने की ज़रूरत ही नहीं हुई। अनु. 370 के माध्यम से कश्मीर को केन्द्र ने वहाँ की जनता की स्वायत्तता और आज़ादी की आकांक्षाओं को कुचलते हुए भारतीय संघ में मिला लिया। उत्तर-पूर्व की राष्ट्रीयताओं के साथ भी भारतीय राज्य की दग़ाबाज़ी का एक लम्बा इतिहास है। उत्तर-पूर्व में 1958 से और कश्मीर में 1990 से घनघोर दमनकारी सैन्य बल विशेष अधिकार कानून (Armed Forces Special Powers Act) लगा है जिसकी वजह से इन राज्यों में वस्तुतः सैनिक शासन की स्थिति है। इसके अतिरिक्त 1975 में भारतीय राज्य ने शातिराना ढंग से सिक्किम को बिना जनमतसंग्रह कराये भारतीय संघ में मिला लिया। ग़ौरतलब है कि ये सभी जनवाद विरोधी क़दम संविधानसम्मत हैं जो भारतीय संविधान की गैरजनवादी अन्तर्वस्तु का जीता जागता उदाहरण है। इस श्रृंखला के अगले अंक में हम विस्तार से चर्चा करेंगे कि किस प्रकार भारतीय राज्य ने कश्मीर और उत्तर पूर्वी राज्यों की राष्ट्रीयताओं के साथ ऐतिहासिक विश्वासघात किया।

पिछले छह दशकों के पूँजीवादी विकास ने क्षेत्रीय असमानता को पहले से कई गुना बढ़ाया है। जैसा कि हर पूँजीवादी देश में होता है, भारतीय संघात्मक ढाँचा भी कई परिधियों वाले केन्द्र-परिधि सम्मिश्र (सेण्टर-पेरिफ़ेरी कॉम्प्लेक्स) के साँचे में ढलकर सामने आया। इस क्षेत्रीय आर्थिक असमानता का अतिच्छादन जहाँ भी ऐतिहासिक रूप से, सांस्कृतिक-भाषिक रूप से सापेक्षतः पिछड़े क्षेत्र के साथ होता है, वहीं राष्ट्रीयताओं के बीच असमानता और राष्ट्रीय उत्पीड़न की ज़मीन तैयार हो जाती है। परन्तु भारत की स्थिति ज़ारकालीन रूस जैसी नहीं जहाँ रूसी राष्ट्र की स्थिति उत्पीड़क की बनती थी। यहाँ कोई एक राष्ट्र नहीं, बल्कि केन्द्र की भूमिका देश के विभिन्न राष्ट्रों-राष्ट्रीयताओं के लिए अलग-अलग रूपों एवं परिणामों में उत्पीड़नकारी की बनती है। इसका कारण यह है कि कई राज्यों में बँटी हिन्दी पट्टी एक राष्ट्र के रूप में संगठित नहीं है, हलाँकि इसमें राष्ट्र के तत्व किसी हद तक मौजूद भी हैं। इसके भीतर तमाम लोकभाषाओं-क्षेत्रीय उपभाषओं-बोलियों के क्षेत्र हैं और एक हद तक सांस्कृतिक भिन्नताएँ हैं। समानता और विभिन्नता के द्वन्द्व-युग्म में, दोनों पक्षों के सन्तुलन के अलग-अलग मामले में अलग-अलग स्थिति है। ऐसा भी नहीं कि किसी एक राष्ट्र का पूँजीपति हावी-प्रभावी हो। पर चूँकि सत्ता का केन्द्र (दिल्ली) हिन्दी भाषी क्षेत्र में है और हिन्दी क्षेत्र के बुद्धिजीवी नौकरशाही, मीडिया व संस्कृति के राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपनी स्पष्ट बढ़त बनाये हुए हैं और बीच-बीच में हिन्दी का राष्ट्रभाषा के रूप में ऊपर से लादने के पक्ष में भी हिन्दी बुद्धिजीवी और राजनेता आवाज़ उठाते हैं, इसलिए न केवल दक्षिण भारत में राष्ट्रीयताएँ बल्कि बंगाली और पंजाबी राष्ट्रीयताएँ भी (जिनमें से ज़्यादातर आर्थिक दृष्टि से हिन्दी प्रदेशों से उन्नत हैं) सांस्कृतिक अलगाव और उत्पीड़न महसूस करती हैं। यह एक वास्तविक स्थिति है, पर उत्पीड़क की स्थिति में कोई ‘‘हिन्दी राष्ट्र ’’ (यह मिथ्याभासी चेतना है) नहीं, बल्कि केन्द्र की बुर्जुआ सत्ता है।

पूँजीवादी विकास के फ़लस्वरूप अलग-अलग राज्यों और राष्ट्रीयताओं में क्षेत्रीय बुर्जुआ वर्ग भी पैदा हुआ है। इस क्षेत्रीय बुर्जुआजी की परिपक्वता के साथ ही साथ केन्द्रीय बुर्जुआजी से इसके अन्तर्विरोध भी बढ़े हैं। इनमें से अधिकांश इसी व्यवस्था के दायरे में अन्तर्विरोधों को हल करने के पक्षधर हैं। पिछले दो दशकों से केन्द्र में मिली-जुली सरकारों का अस्तित्व इसी की निशानी है और यह दर्शाता है कि केन्द्रीय बुर्जुआजी से  मोल-तोल में भी क्षेत्रीय बुर्जुआजी की ताकत बढ़ी है। क्षेत्रीय बुर्जुआजी विभिन्न राष्ट्रीयताओं की जनता को असली मुद्दों से दूर करके अन्य राज्यों के प्रवासी मज़दूरों को वापस भेजने, नये राज्य बनाने अथवा नदियों के जल के बँटवारे जैसे मुद्दे उछालकर क्षेत्रीय अन्धराष्ट्रवादी भावनायें फैलाती है और लोगों की वर्ग-चेतना को भोथरा कर इस व्यवस्था की उम्र लम्बी करने मे अपनी भूमिका अदा करती है। इस प्रकार यह क्षेत्रीय बुर्जुआ वर्ग जनता की आकांक्षाओं को पूरा करने की बजाय उसे आपस में बाँटने का ही काम करता है।

एक अतिकेन्द्रित राज्य सत्ता की निगरानी में हुए पूँजीवादी विकास से अपरिहार्य रूप से जो क्षेत्रीय असन्तुलन और जनअसंतोष उत्पन्न हुआ उस पर काबू पाने के मक़सद से 1980 के दशक से ही भारतीय बुर्जुआ वर्ग की सबसे भरोसेमन्द पार्टी कांग्रेस ने पंचायती राज का शिगूफ़ा उछालकर सत्ता के विकेन्द्रीकरण का स्वांग रचना शुरू किया। 1992 में संविधान का 73 वाँ और 74 वाँ संशोधन संसद द्वारा पारित हुआ। इन संशोधनों द्वारा क्रमशः गाँवों में पंचायतों तथा शहरों में म्यूनिसिपैलिटी को संवैधानिक दर्ज़ा देते हुए भारतीय संघ में तीसरे संस्तर के निर्माण की ढींगे हाँकी गयीं और जोर-शोर से यह प्रचारित किया गया कि इस ‘क्रान्तिकारी कदम’ से सत्ता जनता के क़रीब पहुँचेगी। परन्तु इन संशोधनों के पारित होने के दो दशकों बाद आलम यह है कि सत्ता तो जनता तक नहीं पहुँची बल्कि गाँवों और शहरों के स्थानीय कुलीनों को लूट का एक हिस्सा देकर भारतीय राज्य सत्ता ने अपने सामाजिक अवलंबों का अवश्य विस्तार किया। मनरेगा जैसी स्कीमों में व्याप्त जबर्दस्त भ्रष्टाचार इसी सच्चाई को दिखाता है। इन संशोधनों के बाद भी भारतीय राज्य का केन्द्रीयकृत स्वरूप बरकरार है और केन्द्र ने बड़ी ही चालाकी से राज्यों के कुछ अधिकारों को स्थानीय निकायों में हस्तांतरण कर स्थानीय कुलीनों को संतुष्ट कर अपने एकात्मक ढाँचे को कुल मिलाकर अक्षुण्ण ही रखा है। इस तथाकथित सत्ता के विकेन्द्रीकरण से जनता को तो कुछ लाभ नहीं हुआ, हाँ केन्द्रीय ढाँचे की कुल लूट का एक हिस्सा स्थानीय स्तर के लुटेरों तक अवश्य पहुँचा है जिसका प्रमाण ग्राम प्रधानों और पार्षदों की बढ़ती हुई धन-सम्पदा के रूप में सामने आ रहा है।

(अगले अंक में: कश्मीर और उत्तर-पूर्वी राज्यों की जनता के साथ भारतीय संघ का ऐतिहासिक विश्वासघात)

 

मज़दूर बिगुलअप्रैल-मई  2013

 


 

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