करावलनगर के बादाम उद्योग का मशीनीकरण
‘मज़दूर बिगुल’ द्वारा एक जाँच रिपोर्ट

बिगुल संवाददाता

 

दिल्ली। करावलनगर के बादाम मज़दूरों के बारे में ‘बिगुल’ के पाठकों को पता ही है। ‘बिगुल’ के पिछले अंको में हम कई बार इस उद्योग से सम्बन्धित रिपोर्टें प्रकाशित कर चुके हैं। वह चाहे बादाम मज़दूरों के आन्दोलनों का सवाल हो या बादाम मज़दूरों की जीवन स्थितियों का हमने हमेशा आपको ज़मीनी हकीकत से अवगत कराने का प्रयास किया है। अब इस उद्योग में कुछ नयी तब्दीलियाँ देखने को मिल रही हैं, जिन्हे देर-सवेर होना ही था। यह जाँच-पड़ताल उसी के बारे में है जिससे कि हम ताज़ा स्थिति से अवगत हो सकें।

करावलनगर के एक गोदाम में बादाम तोड़ने की मशीन के साथ खड़ा मज़दूर

करावलनगर के एक गोदाम में बादाम तोड़ने की मशीन के साथ खड़ा मज़दूर

मालूम हो कि इस इलाक़े में क़रीब 40-45 बादाम के गोदाम हैं, जिनमें बादाम प्रसंस्करण का काम कराया जाता है। इस काम में तक़रीबन 15000 मज़दूर कार्यरत हैं, जो कि परिवार सहित काम करते हैं। बादाम का यह कारोबार वैश्विक असेम्बली लाइन का एक प्रत्यक्ष उदाहरण है। आस्‍ट्रेलिया, अमेरिका के बादाम बागानों में पैदा होने वाला यह बादाम करावलनगर जैसे इलाक़ों तक संसाधन (छिलका उतारने) हेतु पहुँचाया जाता है। ज़ाहिर सी बात है अमेरिका, आस्ट्रेलिया के पूँजीपति भारत के मज़दूरों को काम देने के लिए नहीं बल्कि यहाँ के सस्ते श्रम का पर्याप्त फायदा उठाने के मकसद से ही साफ-सफाई करने हेतु बादाम यहाँ के श्रम बाज़ार में भेजते हैं जहाँ बेहद ग़रीबी, बेकारी के हालात में जीने वाली मज़दूर जमात बेहद कम मज़दूरी पर भी काम करने को मजबूर है। खारी बावली (दिल्ली) के बड़े-बड़े व्यापारियों से तमाम ठेकेदार या गोदाम मालिक छिलकायुक्त बादाम संसाधन हेतु लेकर आते हैं। और करावलनगर जैसे इलाक़ों में काम कराते हैं। अभी तक मज़दूरों की बड़ी संख्या हाथों से तोड़-फोड़कर बादाम की गिरी निकालने का काम करती थी। जो आठ घण्टे में महज दो बोरी ही तोड़ पाती थी। जिसकी मज़दूरी उन्हें प्रति बोरी 50 रुपये के हिसाब से मिलती थी। लोगों ने मज़दूरी बढ़ाने हेतु ‘बादाम मज़दूर यूनियन’ के नेतृत्व में पिछले वर्ष एकजुट होकर संघर्ष किया तब जाकर मज़दूरी में मामूली बढ़ोत्तारी हुई। मज़दूरी 50 रुपये से बढ़कर 60 रुपये हुई जोकि आठ घण्टे के हिसाब से देखा जाये तो न्यूनतम मज़दूरी की दर से बहुत ही कम है। उस पर भी मालिकों की भाषा ऐसी होती है कि मानो काम देकर मज़दूरों पर एहसान कर रहे हैं। खुली निगाह से इन इलाक़ों में कोई आकर देखे तो पता चल जायेगा कि कौन किस पर एहसान कर रहा है। बड़े-बड़े बहुमंज़िला मकान एवं ज़मीनें कुछ ही सालों में किनके बल पर इन गोदाम मालिकों के पास हो गयीं? वहीं दूसरी तरफ मज़दूरों की दड़बेनुमा कोठरियाँ हैं। बच्चे सड़कों पर बचपना गुजारते नज़र आते हैं। ख़ैर, यही बात हर उद्योग में देखने को मिलेगी। अब हम अपनी मूल बात पर आते हैं। मुनाफे एवं लाभ की व्यवस्था कम से कम ख़र्च करके ज्यादा से ज्यादा कमाने की होती है। यही बात इस समय बादाम उद्योग के मशीनीकरण की प्रक्रिया में लागू होती है। इस समय बादाम के छिलके उतारने के लिए गोदाम मालिकों ने मशीनें लानी शुरू कर दी हैं। इसके ज़रिये मालिक बादाम मज़दूरों पर दबाव बनाना चाहते हैं कि बादाम मज़दूर अब हड़ताल करेंगे तो वे कम से कम लोगों को लेकर काम करा लेंगे।

अपने फायदे को गारण्टीशुदा बनाने के लिए गोदाम मालिक किन-किन तरीकों को अमल में ला रहे हैं, यह जानना ज़रूरी है। हमने ऊपर बताया कि एक मज़दूर आठ घण्टे में महज़ दो बोरी बादाम की गिरी निकाल पाता है। तब मालिकों को माँग-आपूर्ति के नियम से कम उत्पादन होने पर अपना ग्राहक हाथ से निकल जाने का भय बना रहता था, कहीं मज़दूरों की ज्यादा संख्या अपने अधिकारों की माँग कर बैठे तो और भी दिक्‍कत। ऐसे में बाज़ार की ज़रूरत है कि उत्पादन बढ़ाया जाये, उत्पादन की गति बढ़ायी जाये, और साथ ही लागत को घटाया जाये; तभी लाभ में बढ़ोत्तरी हो सकती है। इस प्रक्रिया में मशीनी उत्पादन मालिकों को लाभ पहुँचाता है। इन मशीनों से एक आकलन के मुताबिक एक घण्टे में क़रीब 20-25 बोरी बादाम की तुड़ाई होती है। मालिक एक बोरी पर 6 रुपये मज़दूरी देता है। कोई-कोई मालिक तो 5 रुपये ही देते हैं। वहीं साफ-सफाई करने वाले मज़दूर को प्रति किलो पर 1 रुपये मज़दूरी दी जाती है। किसी-किसी मालिक/ठेकेदार ने मशीन पर बादाम तुड़वाने से लेकर साफ-सफाई तक का ठेका दे दिया है। ये ठेकेदार और कोई नहीं इन्हीं बादाम मज़दूरों में से ही होते हैं। जो काम का ठेका ले लेते हैं और 100 या 120 रुपये दिहाड़ी पर अपने लोगों को काम पर ले आते हैं। इस प्रकार इस उत्पादन प्रक्रिया में जो नयी चीज़ सामने आयी है वह है मशीनीकरण के साथ बहुपरतीय ठेकाकरण जिसमें माल का मुनाफा तो बादाम ठेकेदार के हाथ में जाता है लेकिन मज़दूरी के भुगतान सम्बन्धी चिन्ता से वह बच जाता है।

इस मशीनीकरण की प्रक्रिया का ग़ौरतलब पहलू यह है कि 6 हॉर्स पावर की यह मशीन और बादाम का सम्पूर्ण उद्योग ही ग़ैर-लाइसेंसी है। श्रम-विभाग की नाक के नीचे, एक छत तले 50 से 100 तक मज़दूर काम कर रहे हैं, न तो उनके लिए श्रम क़ानूनों का कोई मतलब है और न ही उनके मालिक इनकी परवाह करते हैं। वहीं जिस इलाक़े में ये मशीनें लगी हुई हैं वह रिहायशी इलाक़ा है, औद्योगिक इलाक़ा नहीं। जबकि धड़ल्ले से यह अवैध कारोबार क़ानून की धज्जियाँ उड़ाने में लगा हुआ है। कारख़ाना अधिनियम 1948 के मुताबिक अगर किसी जगह पर दस मज़दूर मिलकर काम करते हैं और वहाँ उत्पादन कार्य में बिजली संयत्र का भी प्रयोग होता है तो वह औद्योगिक नियमों के अन्तर्गत आ जाता है। वहाँ काम करने वाले मज़दूर श्रम क़ानून सम्बन्धी अधिकारों के अधिकारी बन जाते हैं। मसलन उनके काम के घण्टे 8 होने चाहिए, पी.एफ. व ई.एस.आई. की सुविधा मिलनी चाहिए, ओवर टाइम का भुगतान डबल रेट से होना चाहिए, काम करने वाले मज़दूरों को उपस्थिति कार्ड एवं जॉब कार्ड मिलना चाहिए आदि-आदि।

तात्कालिक तौर पर तो लग सकता है कि मशीनीकरण होने से मालिक ज्यादा ताक़तवर हो गया है, जबकि यह सतह की सच्चाई है। यहाँ कार्यरत बादाम मज़दूरों के लिए नए रास्ते खुल रहे हैं। असल में मालिक क़ानूनी तौर पर अब कारख़ाना अधिनियम के दायरे में आया है। बादाम मज़दूर साथियों को याद होगा कि विगत आन्दोलन में अपने अधिकार के सवाल को लेकर जब वे श्रम विभाग गये थे तब उपश्रमायुक्त का कहना था कि बादाम उद्योग घरेलू उद्योग है और उसमें हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते । यह कहकर श्रम विभाग कन्नी काट गया था। लेकिन मशीनें लगने के बाद यह घरेलू उद्योग की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। जैसे-जैसे बादाम उद्योग का मशीनीकरण बढ़ता जायेगा, वैसे-वैसे मज़दूरों की मोल-तोल की स्थिति भी मज़बूत होगी।

मशीनों पर काम करने वाले मज़दूर भले ही संख्या में कम हों लेकिन निश्चित तौर पर वे कुशल मज़दूर होंगे। मशीनों को चलाने वाला मज़दूर सामान्य/अकुशल मज़दूर से हटकर होना चाहिए। ऐसे में मशीन पर निर्भरता मालिक को मजबूर करेगी कि मशीन चलाने वाले मज़दूरों को बुनियादी अधिकार दे। सबसे सामान्य बात कि अब हड़ताल होने पर क्या मालिकों के लिए सम्भव रहेगा कि वे अपनी मशीनें जगह-जगह लेकर भागें? पिछली हड़ताल के दौरान कुछ मालिक करावलनगर के इलाक़े से हटकर दूसरे इलाक़ों में उत्पादन का कुछ हिस्सा लेते गये थे, और हड़ताल के ख़त्म होने तक कुछ दिनों के लिए अपना काम चला रहे थे। लेकिन मशीनीकरण के बाद यह सम्भव नहीं रह जायेगा। उत्पादन का स्थिरीकरण बढ़ेगा। आज हमें ज़रूरत इस बात की है कि बादाम उद्योग जैसे तमाम उद्योग, जो अनौपचारिक तरीक़े से कार्यरत हैं, ऐसे सेक्टरों में काम करने वाले मज़दूर अपने इलाक़े के अन्य मज़दूरों के साथ एकजुटता बनायें। ऐसे इलाक़ाई संगठन के आधार पर हम इन उद्योगों के नियमितीकरण की माँग के लिए लड़ सकेंगे और साथ ही आगे मज़दूरों की मज़बूत इलाक़ाई ट्रेड यूनियन बना सकेंगे।

मशीनीकरण करावलनगर के बादाम उद्योग का मानकीकरण करेगा और उसे देर-सबेर कारख़ाना अधिनियम के तहत लायेगा। मशीनीकरण मज़दूरों की राजनीतिक चेतना को बढ़ाने में एक सहायक कारक बनेगा और मशीन पर काम करने वाली मज़दूर आबादी मालिकों और ठेकेदारों के लिए अकुशल मज़दूर के मुक़ाबले कहीं ज्यादा अनिवार्य होगी। अकुशल मज़दूर आसानी से मिल जाता है, लेकिन एक ख़ास प्रकार की मशीन को सही तरीक़े से चला सकने वाला मज़दूर सड़क पर घूमता नहीं मिल जाता। ऐसे में, मज़दूरों की सामूहिक मोल-भाव की ताक़त पहले के मुक़ाबले कहीं ज्यादा होगी। मशीनीकरण के शुरू होने के समय मज़दूर आतंकित थे कि अब मालिक गरज़मन्द नहीं रहा और अब उनकी ताक़त कम हो गयी है। लेकिन अब मज़दूर इस बात को समझने लगे हैं कि मशीनीकरण के कारण होने वाली छँटनी के बाद जो कटी-छँटी मज़दूर आबादी बचेगी, वह कहीं ज्यादा ताक़तवर और संगठित होगी और साथ ही मालिकों के लिए कहीं ज्यादा ज़रूरी होगी। इस रूप में मशीनीकरण ने बादाम उद्योग के साथ-साथ बादाम मज़दूरों के संगठन को भी एक नयी मंज़िल में पहुँचा दिया है।

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2011

 


 

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