125वें मई दिवस पर एक नया संकल्प!
एक नयी पहल! एक नयी शुरुआत! एक नयी मुहिम!
मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन को एक तूफ़ानी जनान्दोलन बनाओ!
एकजुट होकर आगे बढ़ो! 1 मई 2011 से एक नयी शुरुआत करो!
सत्ताधारियों से अपने हक़ माँगने के लिए एकजुट होकर करनी होगी फि‍र से राजनीतिक संघर्ष की शुरुआत!

सम्‍पादकीय अग्रलेख

गुज़रे कई दशकों का समय पूरी दुनिया के मेहनतकशों के संघर्षों के पीछे हटने का समय रहा है। वक्‍़ती तौर पर इतिहास की गति रुकी हुई-सी रही है, और कभी-कभी तो पीछे मुड़ती हुई-सी भी लगती रही है। उलटाव-बिखराव के इस अन्‍धकारमय दौर में पूँजीवादी और साम्राज्यवादी ज़ोरो-जुल्म अपनी सारी हदों को पार कर चुके हैं। मज़दूरों की हड्डियाँ निचोड़ने के लिए और कच्चे माल की लूट के लिए देशी पूँजीपतियों ने विदेशी कम्पनियों को भी खुला न्यौता दे दिया है। काग़ज़ पर जो श्रम कानून मौजूद थे, वे पहले भी मज़दूरों को अतिसीमित हक़ और इंसाफ देते थे, पर अब तो उनका कोई मतलब ही नहीं रह गया है। पूँजीवादी जनतन्त्र एकदम नंगा हो चुका है। सरकारें और अदालतें पूँजीपतियों की खुली तरफदारी कर रही हैं। देश की जिस तरक्‍की का चौतरफा डंका बज रहा है, उसका सारा फल सिर्फ ऊपर की दस-पन्द्रह फीसदी आबादी तक ही पहुँचता है। मेहनतकशों की ज़िन्दगी के अँधेरे रसातल तक उसका एक कतरा भी रिसकर नहीं पहुँचता। उन्हें बस ज़िन्दा रहक़र हाड़ गलाने भर के लिए मेहनत-मजूरी मिल जाती है।

essay_nepalबर्दाश्त की हदें जब पार होने लगती हैं तो यहाँ-वहाँ, मज़दूर बीच-बीच में आन्दोलन की राह पर उतरते रहते हैं। ये बिखरी हुई लड़ाइयाँ पूँजी की संगठित ताक़त, कानून और सरकारी मशीनरी की ताक़त के बूते या तो दबा दी जाती हैं, या लम्बे इंतज़ार से थके-पस्त मज़दूरों के आगे कभी रियायतों के कुछ टुकड़े फेंक दिये जाते हैं। कुछ कारखानों या किसी एक सेक्टर के मज़दूर जब हड़ताल पर होते हैं तो उनसे बेख़बर या अलग रहते हुए आस-पास के कारख़ानों तक के उनके भाई-चाकरी बजाते रहते हैं। और जब उनकी बारी आती है तो दूसरे कारख़ानों के मज़दूर उनके साथ नहीं आते। पूँजीवाद के तौर-तरीकों में पिछली आधी सदी के दौरान काफी बदलाव आये हैं और मज़दूरों द्वारा पूँजी के हमलों के विरुद्ध बचाव और हमलों के तौर-तरीकों में भी निश्चय ही बदलाव लाने होंगे। पर एक बात जितनी सौ-डेढ़ सौ साल पहले सही थी, उतनी ही आज भी सही है। वह यह कि मज़दूर वर्ग जब तक कारख़ानों और पेशों (सेक्टरों) की चौहद्दियों में बँट-बिखरकर लड़ता रहेगा तब तक, ज़्यादा से ज़्यादा कुछ आर्थिक रियायतों और कुछ सहूलियतों के टुकड़े ही हासिल कर पायेगा। यदि पूँजी की ताक़तों को पीछे धकेलकर कुछ राजनीतिक अधिकार हासिल करने हैं और उनके अमल की सीमित गारण्टी भी हासिल करनी है, तो मज़दूर वर्ग को इस या उस कुछ मालिकों के बजाय समूचे मालिक वर्ग के विरुद्ध (जिसकी नुमाइंदगी पूँजीवादी राज्यसत्ता करती है) संघर्ष करना होगा। राजनीतिक माँगों पर संघर्ष का यही महत्व है।

एक बात और है जो पिछले सौ-डेढ़ सौ सालों में नहीं बदली है। जो ट्रेड यूनियनवादी और अर्थवादी हैं वे कुल मिलाकर आर्थिक संघर्षों की चौहद्दी में ही मज़दूर चेतना और मज़दूर संघर्षों को क़ैद रखना चाहते हैं। पूँजी और श्रम के सतत् संघर्षरत शिविरों के बीच सुलह-सफाई उनका काम होता है। वे सौदेबाज़ी करके मज़दूरों को रियायतें दिलवाते रहते हैं और अतिरिक्त श्रम शक्ति निचोड़ने वाली पूँजीवादी मशीनरी की ‘ऑयलिंग-ग्रीजिंग-ओवरहॉलिंग’ करते रहते हैं। वे चोला-पगड़ी तो मज़दूरों के प्रतिनिधि का पहने रहते हैं, लेकिन सेवा पूँजीपति वर्ग की करते हैं। लड़ाइयों को कमज़ोर बनाने और हार के गड्ढे में ढकेलने में भितरघातियों-घुसपैठियों की भूमिका हरदम ही अहम होती है। अर्थवादी-ट्रेडयूनियनवादी पहले हमेशा इसी भूमिका में थे और आज भी हैं। जो संसदमार्गी वामपन्‍थी (संशोधनवादी) पार्टियाँ हैं, उनकी भी यही भूमिका है। एक ओर तो उनकी ट्रेड यूनियन दुकानें महज दुअन्नी-चवन्नी की रियायतों-सुविधाओं की रस्मी लड़ाइयाँ लड़ती रहती हैं और सौदेबाज़ी में मशगूल रहती हैं, दूसरी ओर समूचे मज़दूर वर्ग के हितों-अधिकारों को लेकर लड़ी जाने वाली राजनीतिक लड़ाइयों को ये पार्टियाँ या तो संसदीय बहसबाज़ी के अड्डे की नौटंकियों तक सीमित कर देती हैं या फिर (ये पार्टियाँ और इनकी यूनियनें) बीच-बीच में कुछ रस्मी प्रदर्शनों और एक दिन के प्रतीकात्मक बन्द या हड़तालों के द्वारा यह दिखलाने की कोशिश करती हैं कि मज़दूर वर्ग का राजनीतिक संघर्ष भी उनके एजेण्डे पर अभी मौजूद है।

May day 2011 posterजो बिखरी हुई क्रान्तिकारी वाम ताक़तें हैं, वे अर्थवाद, ट्रेडयूनियनवाद और संसदवाद की लगातार भर्त्सना का जुबानी जमाखर्च करती हुई मज़दूर वर्ग के बीच या तो मौजूद ही नहीं हैं, या फिर अर्थवाद या अराजकतावादी संघाधिपत्यवाद की किसी न किसी किस्म की बानगी ही यहाँ-वहाँ पेश कर रही हैं। एक बड़ा हिस्सा (हालाँकि औद्योगिक मज़दूरों में भी यह कुछ रस्मी क़वायदें करता रहता है) ”वामपन्थी” दुस्साहसवाद या आतंकवाद के रास्ते पर दूर जा चुका है। जाहिर है कि आज की ऐतिहासिक परिस्थितियों को सैद्धान्तिक स्तर पर समझे बिना और अमली स्तर पर जाँचे-परखे बिना न तो मज़दूर आन्दोलन की व्यापक एकता क़ायम की जा सकती है, न ही मज़दूर क्रान्ति के ऐतिहासिक मिशन को पूरा करने में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाली एक क्रान्तिकारी पार्टी का नवनिर्माण किया जा सकता है।

इक्कीसवीं सदी में पूँजी और श्रम के बीच का संघर्ष एक नयी ज़मीन पर गति पकड़ने वाला है। आज की दुनिया एक सदी या आधी सदी पहले की दुनिया से काफी हद तक भिन्न है। उपनिवेशवाद इतिहास के रंगमंच से विदा हो चुका है और सामन्‍तवाद के अवशेष यदि कहीं हैं भी तो सुदूर कोने-अन्‍तरों और हाशिए पर बिखरे पड़े हैं। पूँजी और श्रम की शक्तियाँ एकदम आमने-सामने खड़ी हैं और अतीत के छूटे हुए कार्यभारों और मिलावटों से मुक्त होकर भावी मज़दूर क्रान्तियों का पूँजी-विरोधी चरित्र एकदम साफ़ उभर रहा है। पर पुरानी जटिलताओं का स्थान नयी जटिलताओं ने ले लिया है। ‘औपनिवेशिक साम्राज्य-विहीन साम्राज्यवाद’ या भूमण्डलीकरण के इस दौर में, वित्तीय पूँजी के निर्बाध, तीव्र आवागमन के लिए राष्ट्र राज्यों की सीमाएँ काफी कमज़ोर हो गयी हैं, लेकिन श्रम के वैश्विक आवागमन पर बंदिशें यथावत् हैं। पूँजी के शासन को बनाये रखने का सबसे प्रभावी औजार आज भी राष्ट्र राज्य ही हैं, साथ ही पूँजी के वर्चस्व के नये उपकरण, नये सामाजिक अवलम्ब और पूँजीवादी व्यवस्था की नयी सुरक्षा पंक्तियाँ (सिविल सोसायटी; अस्मितावादी राजनीति और एन.जी.ओ. आदि) भी पैदा हुई हैं। उत्पादन और संचय में हुई अकूत वृद्धि के बाद शेयर बाज़ार और मनोरंजन, मीडिया आदि अनुत्पादक क्षेत्रों में पूँजी निवेश तो बेहिसाब रफ़्तार से बढ़ा ही है, उत्पादक श्रम शक्ति के दो तिहाई हिस्से तक को दुनिया की पूँजीवादी अर्थव्यवस्थाएँ सेवा क्षेत्र में झोंक चुकी हैं और उनके सकल घरेलू उत्पाद का दो तिहाई भी इस कथित सेवा क्षेत्र से ही आता है। पूँजी के आन्तरिक पुनर्गठन ने मज़दूर वर्ग की संरचना भी काफी हद तक बदल दी है। पूँजीवादी श्रम-विभाजन के अतिरिक्त जाति, जेण्डर, राष्ट्रीयता आदि रेखाओं के इर्दगिर्द तो वह पहले भी बँटा होता था, पर आज मज़दूर आबादी ज़्यादा व्यापक और बहुपरती संस्तरों में बँटी हुई है। उन्नत तकनोलॉजी और संचार परिवहन के साधनों की मदद से ज़्यादातर बड़े कारख़ानों की फोर्डिस्ट चलन की असेम्बली लाइन पर होने वाले उत्पादन को दूर-दूर बिखरे वर्कशॉपों में और यहाँ तक कि काण्ट्रैक्टरों-सब काण्ट्रैक्टरों के मज़दूरों और पीस रेट पर काम करने वाले मज़दूरों तक फैली श्रृंखला में विखण्डित कर दिया गया है। मज़दूरों की भारी आबादी ठेका, कैजुअल, अस्थायी, पीसरेट या पार्टटाइम मज़दूरों की बना दी गयी है। खेती और खेती आधारित ग्रामीण उद्यम मुख्यत: उजरती श्रम पर आधारित हैं, पर ग्रामीण मज़दूरों के लिए जो थोड़े से श्रम क़ानून और राजनीतिक हक़ काग़ज़ों पर मौजूद हैं उनका वास्तव में कोई अर्थ नहीं है। गाँवों और शहरों में छोटे माल-उत्पादकों की एक बड़ी आबादी वस्तुगत तौर पर मज़दूरों जैसी स्थिति में ही जी रही है।

इन तमाम बदलावों के मद्देनज़र, नयी मज़दूर क्रान्तियों की नीतियों-रणनीतियों व तौर-तरीकों में बदलाव आने लाज़िमी हैं। लोक-लुभावन लकीर की फकीरी नहीं चलेगी। लेकिन यह बात जितनी पहले सही थी, उतनी ही आज भी सही है कि मज़दूर वर्ग को बिखरे हुए आर्थिक संघर्षों से ऊपर साझा हितों के राजनीतिक संघर्ष की उन्नततर ज़मीन पर उठाना होगा, अलग-अलग मालिकों के बजाय उन्हें समूचे मालिक वर्ग से, उनकी हुकूमत से लड़ना सिखाना होगा।

राजनीतिक संघर्ष के बारे में आम प्रचार करते रहने और अर्थवाद-ट्रेडयूनियनवाद की आलोचना और भण्डाफोड़ करते रहने मात्र से मज़दूर वर्ग के क्रान्तिकारी नेतृत्व की ज़िम्मेदारी पूरी नहीं हो जाती। हमें राजनीतिक संघर्ष में उतरने की बात व्यवहार में बतानी होगी, अमल करके दिखानी होगी।

‘मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन 2011’ क़ा यही महत्व है। बेशक़ यह एक लम्बी यात्रा के लिए उठाया गया पहला छोटा क़दम है। यह एक छोटी-सी दिखने वाली शुरुआत हो सकती है, पर इसमें ऐतिहासिक सम्भावनाएँ छिपी हुई हैं।

जाहिर है कि यह मज़दूर माँगपत्रक मज़दूर क्रान्ति का कार्यक्रम नहीं है। इस बात में कोई सन्देह नहीं कि जबतक सर्वहारा वर्ग पूँजीवादी राज्यसत्ता को चकनाचूर करके सर्वहारा राज्यसत्ता की स्थापना नहीं कर लेगा और जब तक उत्पादन के साधनों पर निजी स्वामित्व को समाप्त करके सामूहिक उत्पादक को अधिशेष का सामूहिक हस्तगतकर्ता नहीं बना दिया जायेगा, तबतक पूँजीवादी शोषण का खात्मा सम्भव नहीं है। मज़दूर वर्ग का यही ऐतिहासिक मिशन है। कुछ थोड़े से उन्नत वर्ग चेतस मज़दूर ऐसे हो सकते हैं कि मज़दूर वर्ग के इस ऐतिहासिक मिशन को आम राजनीतिक प्रचार एवं शिक्षा की कार्रवाई के माध्यम से जल्दी ही समझ लें। लेकिन व्यापक मज़दूर आबादी बुर्जुआ राज्यसत्ता के विरुद्ध सीधे नहीं उठ खड़ी होगी। आर्थिक संघर्ष तो उसकी जीवन स्थितियों के दबाव से पैदा होते हैं। उस दौरान मज़दूर वर्ग एकजुटता की ताक़त पहचानता है और संगठित होकर लड़ना सीखता है। वर्ग-संघर्ष की इस प्राथमिक पाठशाला से बाहर निकलकर वह राजनीतिक संघर्ष के निम्नतर से उन्नततर धरातलों पर पहुँचने की लम्बी प्रक्रिया से गुजरता है। मज़दूर वर्ग जब अपने आम हितों को लेकर सरकार के सामने (जो वस्तुत: ‘पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी’ ही होती है) माँगें रखता है और आन्दोलन की राह पर उतरता है तो यह राजनीतिक संघर्ष होता है।

इसी मायने में ‘मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन’ एक नयी पहल है, एक महत्वपूर्ण शुरुआत है। इस आन्दोलन के माध्यम से शुरुआत यहाँ से की जा रही है कि जो श्रम क़ानून काग़ज़ों पर मौजूद हैं, उन्हें वास्तव में लागू करने के लिए सरकार पर मज़दूर शक्ति का दबाव बनाया जाये। इससे एक क़दम आगे बढ़कर, पूँजीवादी लोकतन्त्र (बुर्जुआ जनवाद) जो वायदे करता है, जिन मज़दूर अधिकारों-हितों की पूँजीवादी सिद्धान्तकार भी दुहाई देते रहते हैं, उन्हें पूरा करने वाले नये श्रम क़ानून बनाने और उनके अमल की गारण्टी के लिए दबाव बनाया जाये तथा मज़दूर-विरोधी क़ानूनों और समूची आम जनता के जनवादी अधिकारों का हनन करने वाले काले क़ानूनों को रद्द करने के लिए दबाव बनाया जाये। हर पूँजीवादी समाज में सर्वहारा वर्ग अर्द्ध-सर्वहारा जमातों और पूँजीवाद के हाथों तबाह होते छोटे माल-उत्पादकों और निम्न-मध्यवर्ग के लोगों से घिरा होता है। नयी संविधान सभा बुलाकर जनवादी प्रक्रिया से नया संविधान बनाने की माँग, काले क़ानूनों को रद्द करने की माँग, नौकरशाही-नेताशाही और सैन्यतन्त्र के ख़र्चों को कम करने की माँग तथा जीवन की बुनियादी सुविधाओं (खाद्यान्न सुरक्षा, आवास, स्वास्थ्य-चिकित्सा, शिक्षा और रोजगार के अधिकार) को हर नागरिक का मूलभूत अधिकार और राज्य की ज़िम्मेदारी बनाने की माँग ऐसी राजनीतिक माँगें हैं, जो मज़दूर वर्ग के साथ सभी अर्द्ध-सर्वहारा जमातों और छोटे मिल्कियों को ला खड़ा करेंगी। ‘मज़दूर माँगपत्रक’ मज़दूर वर्ग की सभी आम माँगों (काम के घण्टे, न्यूनतम मज़दूरी, ठेका मज़दूरी, काम की जगह एवं परिस्थितियों से जुड़ी माँगें, कार्यस्थल पर सुरक्षा प्रबन्ध और दुर्घटना के मुआवज़े से जुड़ी माँगें… आदि) के अतिरिक्त मज़दूरों के अलग-अलग हिस्सों की विशिष्ट माँगों को भी एक साथ सूत्रबद्ध करने की एक अहम कोशिश है। जाहिर है कि यह एक राजनीतिक माँगपत्रक है पर इसका दायरा मुख्यत: बुर्जुआ जनवादी प्रकृति तक सीमित है। राजनीतिक संघर्ष के इसी धरातल से व्यापक मेहनतकश आबादी की जागृति और एकजुटता की शुरुआत की जा सकती है। इसी प्रक्रिया में पूँजीवादी जनवाद की असलियत व्यवहार में बेनक़ाब की जा सकती है और उन्नततर धरातल के राजनीतिक संघर्ष की ज़मीन तैयार की जा सकती है।

अधीर क्रान्तिकारी आत्माएँ पूछ सकती हैं कि मज़दूर वर्ग के राजनीतिक संघर्ष के लिए जनवादी अधिकारों की यह चौहद्दी क्यों, वह भी खास तौर पर तब, जब लक्ष्य समाजवादी क्रान्ति का हो! कुछ तो यह भी सवाल उठाने वाले मिले कि बुर्जुआ सरकार और संसद के सामने भला माँगपत्रक लेकर क्या जाना? यह तो क्रान्तिकारी कार्रवाई नहीं है! ऐसे लोगों की समझ लेनिन के हवाले से साफ़ करने की ज़रूरत है। लेनिन का कहना था कि बेशक़ बिना बैंकों पर कब्ज़ा किये, बिना उत्पादन-साधनों पर निजी मालिकाने को खत्म किये, पूँजीवाद को पराजित नहीं किया जा सकता, लेकिन जो सर्वहारा जनवाद के संघर्ष में शिक्षित नहीं होगा, वह आर्थिक क्रान्ति सम्पन्न करने में असमर्थ होगा। लेनिन का स्पष्ट विचार था कि बुर्जुआ वर्ग की सत्ता ध्‍वस्त करने की तैयारी की प्रक्रिया में सर्वहारा वर्ग को बुर्जुआ वर्ग द्वारा सृजित और विकृत की जाने वाली जनवादी संस्थाओं और पूँजीवाद द्वारा जनसाधारण में पैदा की गयी जनवादी आकांक्षाओं का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए। (विस्तार के लिए देखें, लेनिन : प. कीयेव्स्की को जवाब; ‘मज़दूर आन्दोलन में जड़सूत्रवाद और संकीर्णतावाद का विरोध’ शीर्षक संकलन, पृ. 81-82, मास्को, 1986)।

‘मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन 2011’ का मक़सद देश के ज़्यादा से ज़्यादा मज़दूरों को यह बताना है कि आज किन राजनीतिक माँगों पर मज़दूर वर्ग का राजनीतिक संघर्ष नये सिरे से संगठित होगा और कहाँ से शुरुआत करके यह क़दम-ब-क़दम अपनी मंजिल की ओर बढ़ेगा।

एक बात और यहाँ स्पष्ट करना बेहद ज़रूरी है। ‘मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन’ मज़दूर वर्ग के किसी राजनीतिक संगठन/पार्टी या किसी ट्रेड यूनियन या यूनियनों-जनसंगठनों के संयुक्त मोर्चे के किसी बैनर तले संगठित नहीं किया गया है। बेशक ट्रेड यूनियन मोर्चे पर सक्रिय बहुत सारे संगठनकर्ताओें और राजनीतिक कार्यकर्ताओं की इसमें सक्रिय पहल और भूमिका है। ‘मज़दूर बिगुल’ से जुड़े कार्यकर्ताओं-प्रचारकों की भी इसमें भूमिका है। इन सभी ने मिलकर मज़दूरों के बीच प्रचार और आन्दोलन के अपने अनुभवों, व्यापक मज़दूर आबादी से हुई बातचीत, अध्ययन-मनन और विचार-विमर्श के बाद माँगपत्रक का यह मसौदा तैयार किया है और फिर संयोजन समिति बनाकर मज़दूरों के बीच इसका व्यापक प्रचार किया है तथा हस्ताक्षर जुटाये हैं। बेशक़ इस माँगपत्रक की बहुत सारी माँगें ट्रेड यूनियनों या उनके किसी संयुक्त मोर्चे के बैनर तले भी उठाई जा सकती हैं। पर माँगपत्रक आन्दोलन के मौजूदा स्वरूप के पीछे हमारी साझा सोच यह है कि मज़दूर वर्ग के इस राजनीतिक संघर्ष के एजेण्डे को सघन प्रचार करके व्यापक मज़दूर आबादी तक पहुँचाया जाये, उसकी सामूहिक पहलकदमी और निर्णय-क्षमता को जगाया जाये, इस प्रक्रिया में छोटी-छोटी मज़दूर पंचायतें की जायें और उनकी कड़ियों को जोड़ते हुए मज़दूर वर्ग के व्यापक जन-प्लेटफॉर्म निर्मित करने की कोशिश की जाये। ट्रेड यूनियन संघर्ष का क्रान्तिकारीकरण एक अलग मोर्चा है। ‘मज़दूर बिगुल’ जैसे राजनीतिक मज़दूर अख़बार के द्वारा मज़दूर वर्ग के ऐतिहासिक मिशन और मज़दूर क्रान्ति की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करते हुए हरावल पार्टी के निर्माण की पूर्वपीठिका बनाना एक अलग काम है। पर इन दो कामों के साथ-साथ राजनीतिक संघर्ष में उतरने के लिए व्यापक मज़दूर वर्ग की सामूहिक पहलक़दमी और सक्रियता जगाने और उसकी चेतना के स्तरोन्नयन के लिए ऐसे व्यापक ‘मास-प्लेटफार्मों’ (जन मंचों) के गठन की प्रक्रिया भी जगह-जगह मज़दूर पंचायतों और फिर अपेक्षतया बड़े स्तरों पर कुछ महापंचायतों के आयोजन और पंचायती कमेटियों के चुनाव के द्वारा आगे बढ़ायी जानी चाहिए। ऐसा करना (कुछ क्रान्तिकारी अराजकतावादियों की तरह) यूनियन की भूमिका का निषेध करना नहीं है, बल्कि मेहनतकश जनसमुदाय की सामूहिक पहलक़दमी, सामूहिक विवेक और सामूहिक निर्णय-क्षमता को जागृत करना है, जो राजनीतिक संघर्ष को व्यापक आधार देने के साथ ही ट्रेड यूनियन नौकरशाही पर भी सामूहिक जन-चौकसी की भूमिका निभायेगा) यह मज़दूर वर्ग की पार्टी की हरावल भूमिका का भी निषेध नहीं है, बल्कि (अमल में विचारधारा का प्राधिकार स्थापित करने के जरिए) उसे व्यापक और उच्चतर धरातल पर सक्रिय करने की ज़मीन तैयार करना है। यह मज़दूर वर्ग के संगठित जनदबाव की राजनीति को विकसित करने का, पूँजी और सत्ता के केन्द्रों के इर्दगिर्द जागृत-संगठित मेहनतकश आबादी की जन घेरेबन्दी तैयार करने का एक सामाजिक प्रयोग है यह मज़दूर वर्ग के नये इंक़लाबी सत्याग्रह आन्दोलन का एक रूप है। इस प्रक्रिया में व्यापक मेहनतकश जनसमुदाय कई चक्रों से गुज़रते हुए संगठित होकर एक इस्पाती दुर्ग में ढल जायेगा। संगठित-शस्त्र सज्जित मालिक वर्गों की निरंकुश दमनकारी सत्ता भी उस जनसमुदाय को आतंकित नहीं कर पायेगी, उसका दमन नहीं कर पायेगी। इक्कीसवीं सदी की मज़दूर जन क्रान्तियाँ तभी सफल हो सकती हैं, जब वे सर्वहारा वर्ग और उसके आसपास बिखरे पूँजी की मार से त्रस्त सभी अर्द्ध-सर्वहाराओं और छोटे मिल्की वर्गों के बीच अपना व्यापक एवं सुदृढ़ सामाजिक आधार तैयार करें। इसके लिए ज़रूरी है कि मज़दूर वर्ग की हरावल पार्टी तैयार करने और ट्रेड यूनियन आन्दोलन के क्रान्तिकारीकरण के सतत् सघन प्रयासों के साथ-साथ मज़दूर वर्ग की सामूहिक पहल एवं सक्रियता जगाकर उन्हें मज़दूर पंचायतों जैसे व्यापक मंचों पर संगठित किया जाये। शुरू में ये प्रयास कुछ बिखरे हुए हो सकते हैं। ठहराव के अन्तराल भी आ सकते हैं। पर संघर्ष का हर दौर इन मंचों को अधिक सजग-सक्रिय-सुगठित बनायेगा और इन पंचायतों की सांगठनिक कमेटियों के रूप में मज़दूरों की नयी सामूहिक नेतृत्वकारी सम्भावनाएँ प्रकट हो सकती हैं। आगे के ठोस रूपों और ठोस विकास-प्रक्रिया की पूर्वकल्पना नहीं की जा सकती। हम किसी प्रयोग के तार्किक आधार और आम दिशा पर बात कर सकते हैं। आगे की चीज़ें अमल के दौरान तय होंगी।

हमारा ज़ोर इस बात पर भी नहीं है कि मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन सिर्फ मज़दूर पंचायतें गठित करते हुए ही आगे बढ़ाया जा सकता है। क्रान्तिकारी ट्रेड यूनियनों का कोई साझा मोर्चा या मज़दूर वर्ग का कोई क्रान्तिकारी हरावल संगठन इसी उद्देश्य से एक राजनीतिक मोर्चा/मंच बनाकर भी इस आन्दोलन को आगे बढ़ा सकता है। वही होगा, जैसा इस आन्दोलन के ज़्यादातर संगठक सहभागी चाहेंगे। यदि ये वैकल्पिक रास्ते भी चुने जाते हैं तो ‘मज़दूर बिगुल’ अपनी पूरी ताक़त से इस आन्दोलन के साथ होगा। मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन का मुख्य वाहक या मंच न बनने की स्थिति में भी तृणमूल स्तर से (मज़दूर बस्तियों और फैक्ट्रियों से) शुरू करते हुए शहरों, इलाकों, अंचलों के स्तर तक मज़दूरों की जन पंचायतों और उनका संचालन करने वाली समितियों का ढाँचा खड़ा करना होगा। यह रोज़मर्रे के जीवन में विविध प्रश्नों पर जनवादी ढंग से निर्णय लेने और सामूहिक ढंग से उन्हें लागू करने के प्रशिक्षण एवं तैयारी का एक मंच भी होगा तथा बुर्जुआ सत्ता के हमलों का बचाव एवं प्रतिकार करने वाला जनशक्ति का केन्द्र भी होगा। इसके स्वरूप को देखते हुए, हमें सबसे उचित यही लग रहा है कि 1 मई, 2011 के बाद देश के विभिन्न औद्योगिक इलाकों और ग्रामीण क्षेत्रों में व्यापक और सघन तैयारी करके मज़दूरों की पंचायतें बुलायी जाएँ, माँगपत्रक के मसलों पर देशव्यापी आन्दोलन खड़ा करने के सवाल पर उन्हें तैयार किया जाये, उनकी राय ली जाये और उनका निचोड़ निकालकर कार्य योजना को माँजा-तराशा जाये। मज़दूरों की पंचायतें क्रमश छोटे से बड़े स्तर पर बुलाई जाए और नीचे से ऊपर तक के प्रशासनतन्त्र पर जन दबाव बनाने का उन्हें एक प्रभावी माध्यम बना दिया जाये।

मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन 1 मई, 2011 को दिल्ली की दहलीज पर अपनी पहली दस्तक देगा, जब देश के विभिन्न हिस्सों से माँगपत्रक पर इकट्ठा किये गये मज़दूरों के हस्ताक्षरों को लेकर हज़ारों मज़दूर जन्तर-मन्तर पर इकट्ठा होंगे और फिर संसद की ओर मार्च करके यह माँगपत्रक सत्ता के प्रतिनिधियों को सौंपेंगे। यह एक प्रतीकात्मक कदम है। एक लम्बी यात्रा की छोटी-सी शुरुआत है। मुहिम यहीं खत्म नहीं हो रही है, बल्कि यहाँ से शुरू हो रही है। मज़दूरों की यह लहर दिल्ली से वापस लौट जायेगी। फिर देश के ज़्यादा से ज़्यादा हिस्से की शहरी और देहाती मज़दूर आबादी के बीच माँगपत्रक के मुद्दों पर सघन प्रचार किया जायेगा, छोटे-बड़े स्तर की पंचायतें बुलायी जायेंगी, उन्हें संगठित जन मंच का रूप देने की कोशिश की जायेगी। तीन वर्षों बाद करोड़ों हस्ताक्षरों के साथ लाखों मज़दूर दिल्ली के दरवाज़ों पर जब दस्तक देंगे तो बहरे सत्ताधारियों के कानों में वह आवाज़ एक प्रचण्ड धमाके की तरह सुनाई देगी।

निराश-हताश आत्माओं, मैदान छोड़ चुके लोगों, घोंसलावादी दुनियादारों और बुद्धि-विलासियों को ‘मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन’ को मज़दूर वर्ग के व्यापक राजनीतिक आन्दोलन के रूप में विकसित करने की हमारी योजना बेशक़ सपना देखने जैसी या मंसूबा बाँधने जैसी लगेगी, दूर की कौड़ी लगेगी। पर हर नयी शुरुआत के लिए सपने देखने ही होंगे, मंसूबे तो बाँधने ही होंगे। शुरुआत करने और आगे बढ़ने से पहले तो हर लक्ष्य दूर की कौड़ी ही प्रतीत होता है।

इस वर्ष का मई दिवस 125वाँ मई दिवस है। सवा सौ वर्षों पहले शिकागो के मज़दूरों ने आठ घण्टे कार्यदिवस के लिए एक शानदार लड़ाई लड़ी थी। उस लड़ाई को ख़ून के दलदल में डुबो दिया गया, लेकिन 8 घण्टे के कार्यदिवस सहित राजनीतिक माँगों को लेकर लड़ने का सन्देश पूरी दुनिया में फैल चुका था। पूरी दुनिया की बुर्जुआ सरकारों को मज़दूरों के कई राजनीतिक अधिकारों को स्वीकार करना पड़ा। मज़दूर वर्ग के राजनीतिक संघर्षों ने बीसवीं शताब्दी की सर्वहारा क्रान्तियों की विजय-यात्रा में अहम् भूमिका निभाई। मई दिवस मज़दूर वर्ग के राजनीतिक चेतना के युग में प्रवेश करने का प्रतीक चिह्न बन गया।

इक्कीसवीं सदी में पूँजी और श्रम की शक्तियों के बीच निर्णायक युद्ध होना ही है। मेहनतकशों के सामने नारकीय ग़ुलामी, अपमान और बेबसी की ज़िन्दगी से निज़ात पाने का मात्र यही एक रास्ता है। गुज़रे दिनों की पस्ती-मायूसी भूलकर और पिछली हारों से ज़रूरी सबक लेकर एक नयी लड़ाई शुरू करनी होगी और जीत का भविष्य अपने हाथों गढ़ना होगा। शुरुआत पूँजीवादी हुकूमत के सामने अपनी सभी राजनीतिक माँगों को चार्टर के रूप में रखने से होगी। मज़दूरों को भितरघातियों, नकली मज़दूर नेताओं और मौक़ापरस्तों से होशियार रहना होगा। रस्मी लड़ाइयों से दूर रहना होगा। मेहनतकश की मुक्ति स्वयं मेहनतकश का काम है।

मज़दूर वर्ग की राजनीतिक लड़ाई की नयी शुरुआत के लिए 125वें मई दिवस से अधिक उचित मौक़ा भला और क्या हो सकता है? मई दिवस के महान शहीदों को याद करने और क्रान्तिकारी श्रद्धांजलि देने का भला इससे बेहतर तरीक़ा और क्या हो सकता है? मज़दूर साथियो, आगे बढ़ो, ‘मज़दूर माँगपत्रक आन्दोलन 2011’ क़े जरिए अपने राजनीतिक संघर्ष को नये सिरे से, नयी ज़मीन पर संगठित करने की शुरुआत करके 125वें मई दिवस को एक यादगार बना दो!

मज़दूर बिगुल, अप्रैल 2011

 


 

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मज़दूरों के महान नेता लेनिन

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