मज़दूरों पर मन्दी की मार: छँटनी, बेरोज़गारी का तेज़ होता सिलसिला

पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति वर्ग मुनाफ़े की अन्धी हवस में जिस आर्थिक संकट को पैदा करता है वह इस समय विश्‍वव्यापी आर्थिक मन्दी के रूप में समूचे संसार को अपने शिकंजे में जकड़ती जा रही है। मन्दी पूँजीवादी व्यवस्था में पहले से ही तबाह-बर्बाद मेहनतकश के जीवन को और अधिक नारकीय तथा असुरक्षित बनाती जा रही है। इस मन्दी ने भी यह दिखा दिया है कि पूँजीवादी जनतन्त्र का असली चरित्र क्या है? पूँजीपतियों की मैनेजिंग कमेटी यानी ‘सरकार’ पूँजीपतियों के लिए कितनी परेशान है यह इसी बात से जाना जा सकता है कि सरकार पूँजीवादी प्रतिष्‍ठानों को बचाने के लिए आम जनता से टैक्स के रूप में उगाहे गये धन को राहत पैकेज के रूप में देकर एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रही है। जबकि मेहनतकशों का जीवन मन्दी के कारण बढ़ गये संकट के पहाड़ के बोझ से दबा जा रहा है। परन्तु सरकार को इसकी ज़रा भी चिन्ता नहीं है। दिल्ली के कुछ औद्योगिक क्षेत्रों के कुछ कारख़ानों की बानगी से भी पता चल जायेगा कि मन्दी ने मज़दूरों के जीवन को कितना कठिन बना दिया है।

कुण्डली, प्याऊ मनियारी औद्योगिक क्षेत्र

प्रसेन

एस.एम. इण्टरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड (फ़ैक्ट्री नं- 306) कुण्डली सोनीपत में 7 फ़रवरी तक 40 मज़दूरों की छँटनी हो गयी। इसमें विदेश के लिए कपड़े बनते हैं। छँटनी में हेल्पर, चेकर तथा टेलर तीनों हैं।

मन्दी के दबाव में ठेकेदार ने इस कम्पनी में यह नियम बना रखा है कि जब ऑर्डर रहता है तो वह कम्पनी के बाहर ‘आवश्‍यकता है’ का बोर्ड लगाकर मज़दूरों को रख लेता है और कम्पनी में काम ख़त्म होते ही मज़दूरों को बाहर निकाल देता है। मन्दी के कारण बेरोज़गार मज़दूर उसे हमेशा मिल जाते हैं। इसके अतिरिक्त वह मज़दूरों को 2,000 रुपये तनख़्वाह पर रखता है तो हिसाब 1,800 रुपये के हिसाब से करके थमा देता है।

इसी फ़ैक्ट्री में जो महिलाएँ पीस रेट पर कपड़ों पर वाश केयर लेबल और मेन लेबल लगाती थीं, उनका प्रति पीस रेट 25 पैसे से घटाकर 10 पैसा कर दिया गया। विरोध करने पर मालिक ने साफ़ कह दिया कि इतने पर करना है तो करो, नहीं तो जाओ। कपड़े की लाइन में और कहीं काम न मिलने के कारण मजबूरन उन्हें इसी रेट पर काम करना पड़ रहा है।

एल्ट्रो जीनियो प्राइवेट लिमिटेड (प्याऊ मनियारी) में कपड़े का काम होता है। इसमें क़रीब 35 लोगों की छँटनी हुई है। छँटनी उन हेल्परों की हुई है जिनका ईएसआई कार्ड आदि बन गया था। केवल उन हेल्परों को रखा है जिन्हें ये सुविधाएँ प्राप्त नहीं हैं। इस प्रकार मालिक ने ईएसआई कार्ड जैसी सुविधाओं से पल्ला झाड़ लिया।

डूना ओवरसीज़ प्राइवेट लिमिटेड (7 न. राई सोनीपत) में पैंट बनती हैं। इसमें 65 कारीगर पीस रेट पर तथा 10 हेल्पर काम कर रहे थे। हेल्परों को 1,800-2,000 रुपये मिलते थे। इधर काम कम होने के कारण कम्पनी का गोदाम ख़ाली रहने लगा, उधर हेल्परों ने वेतन बढ़ाने की बात की तो मालिक को बहाना मिल गया और उसने तुरन्त 7 हेल्परों को निकाल बाहर किया।

कम्पनी न. 343 (कुण्डली, सोनीपत) इसमें केबल बनता है। मन्दी के कारण पहले काम के घण्टे घटाकर 12 से 8 कर दिये गये। और अब काम न होने के कारण मज़दूरों से केवल लोडिंग का काम करवाया जा रहा है। इसमें 2,500 रुपये मिलते थे। अब तार के बहुत वज़नदार बण्डलों को ऊपर ले जाना, फिर नीचे ले आना यही काम रह गया है। ओवरटाइम न मिलने और बहुत कड़ी मेहनत के कारण मज़दूर ख़ुद ही हिसाब लेकर काम छोड़ देना चाहते हैं।

वाटिका प्राइवेट लिमिटेड (कुण्डली सोनीपत) में स्टील के बर्तन बनते हैं। इसमें 70 मज़दूर थे जिनमें से 25 महिलाएँ थीं। 29 लड़कों तथा 21 लड़कियों की छँटनी कर दी गयी है। इनमें सात वे लड़के भी हैं जिनका काम के दौरान हाथ कट गया था। क़ानूनी लफ़ड़ों से बचने के लिए मालिक ने उन्हें काम दे रखा था। कुछ समय बाद अब मालिक ने उनसे कहा कि 7,000-7,000 रुपये लेकर वे काम छोड़ दें तो मज़दूरों के मना करने पर उन्हें काम से निकाल दिया गया और अब कह रहा है कि वह कम्पनी बन्द करने वाला है।

पंजाब स्टील प्राइवेट लिमिटेड (प्याऊ मनियारी) इसमें 60 लोगों की छँटनी हुई है जिसमें अधिकतर महिला मज़दूर हैं। इन्हें 8 घण्टे का 2,400 वेतन मिलता था। 2 घण्टे ओवरटाइम लगता था। इस समय ओवरटाइम नहीं लग रहा है।

धर्म इण्डस्ट्री प्राइवेट लिमिटेड (प्याऊ मनियारी) में स्टील के बर्तन बनते हैं। इसमें 90 लोगों की छँटनी हुई है। आधे से अधिक महिला मज़दूर हैं। इस समय न तो ओवर-टाइम लग रहा है और न ही नाइट।

विम पैक प्राइवेट लिमिटेड (कुण्डली, सोनीपत) में गत्ता बनता है। इसमें 7 लड़कों की छँटनी हुई है। इसमें 8 घण्टे का 2,200 रुपया मिलता है। इसमें न तो ओवरटाइम लग रहा है और न ही नाइट।

सिडिप इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड (316 न.) (कुण्डली, सोनीपत) में स्टील की आलमारी बनती है। इसमें 20 लड़कों की छँटनी हुई है। इस समय ओवरटाइम नहीं लग रहा है।

रिलायंस फ्रेश प्राइवेट लिमिटेड (प्याऊ मनियारी) इसमें फ़ल-सब्जियों को पैक करके देश के अलग-अलग हिस्सों तथा बाहर भेजा जाता है। इसमें 46 मज़दूरों की छँटनी हुई थी। काम शुरू होने पर सिर्फ़ 30 मज़दूरों को ही फिर से रखा गया। पहले ओवरटाइम लगता था, अब नहीं लग रहा है।

स्वास प्राइवेट लिमिटेड (प्याऊ मनियारी) में 7 महिला मज़दूरों की छँटनी हुई है। इसमें मसाले और दवाइयाँ बनती हैं। प्लाईवुड इण्ड्रस्टी प्राइवेट लिमिटेड (प्याऊ मनियारी) में 7 मज़दूरों की छँटनी हुई है। गेल इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड में 5 मज़दूरों की छँटनी हुई है।

फ़ेम इण्डस्ट्री प्राइवेट लिमिटेड में हेलोजन गाड़ियों के हेडलाइट, बल्ब इत्यादि बनते हैं। इसमें 10 हेल्परों की छँटनी हो चुकी है। स्नेच स्टील प्राइवेट लिमिटेड (कुण्डली) में चम्मच-काँटे बनते हैं। इसमें 9 लोगों की छँटनी हो चुकी है। मैगपाई में स्टील के बर्तन बनते हैं। इसमें 20 लोगों की छँटनी हो चुकी है।

ओवरटाइम न मिलने से मज़दूरों की हालत बहुत ख़राब है। क्योंकि इतनी महँगाई में 2,200-2,400 रुपयों से होता क्या है? जहाँ ओवरटाइम मिल रहा है वहाँ जमकर कमरतोड़ मेहनत करवायी जा रही है। कुण्डली, प्याऊ मनियारी, भोरगढ़, राई इत्यादि इलाक़ों में ‘आवश्‍यकता है’ का बोर्ड कहीं नहीं दिख रहा है। मज़दूर शोषण तथा कम वेतन के खिलाफ़ अपनी आवाज़ नहीं उठा पा रहे हैं क्योंकि मालिक तुरन्त निकाल देगा और बेरोज़गारों की फ़ौज में से नयी भर्ती कर लेगा।

इन उदाहरणों से ज़ाहिर है कि पूँजीवादी अर्थशास्त्रियों की ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ कि ‘समृद्धि ऊपर से छनकर नीचे आयेगी’ भद्दा मज़ाक़ ही साबित होती है क्योंकि समृद्धि तो कभी रिसकर आती नहीं बल्कि मन्दी के समय में संकट का पहाड़ सीधे मज़दूरों के सिर पर गिर पड़ता है। सरकार को मज़दूरों की कोई चिन्ता नहीं होती जबकि मन्दी पैदा करने वाले पूँजीपतियों को बचाने में सरकार आकाश-पाताल एक कर देती है।

बादली औद्योगिक क्षेत्र

रूपेश

दिल्ली के तमाम औद्योगिक इलाक़ों में छोटी-बड़ी फ़ैक्ट्रियों में लाखों मज़दूर ऐसे हैं जिनके काम की कोई निश्चितता नहीं है। आज इस फ़ैक्ट्री में तो कल उस फ़ैक्ट्री में। कुछ लोग जो एक ही फ़ैक्ट्री या मालिक के पास बरसों से काम कर रहे हैं, उनकी स्थिति भी बदतर ही है। जब तक मालिक को मुनाफ़ा हो रहा है, तब तक ठीक, नहीं तो एक नोटिस या बिना नोटिस के फ़ैक्ट्री बन्द!

ऐसी ही एक फ़ैक्ट्री है हैवल्स इण्डिया प्राइवेट लिमिटेड। बिजली से चलने वाले विभिन्न सामान, सीएफ़एल बल्ब आदि बनाने वाली यह कम्पनी काफ़ी बड़ी है तथा भारत के कई राज्यों में इसकी फ़ैक्ट्रियाँ हैं। समयपुर बादली के गली नं- 9 में भी हैवल्स की एक काफ़ी पुरानी फ़ैक्ट्री है।

इस फ़ैक्ट्री में क़रीब एक हज़ार मज़दूर काम करते थे। इनमें से 200 के लगभग मज़दूर ऐसे थे जो वर्षों से इसमें काम कर रहे थे। बाक़ी मज़दूर ठेके पर रखे जाते थे तथा उनकी संख्या बढ़ती-घटती रहती थी। यहाँ एक बात यह भी गौरतलब है कि समयपुर तथा बादली औद्योगिक क्षेत्र में ज़्यादातर छोटी-छोटी फ़ैक्ट्रियाँ ही बची हैं जिनमें ज़्यादातर लोहे तथा प्लास्टिक के विभिन्न उत्पाद बनते हैं। जो कुछ बड़ी फ़ैक्ट्रियाँ थीं उनके मालिक धीरे-धीरे विकसित हो रहे नये औद्योगिक क्षेत्रों में जा चुके हैं तथा जो कुछ बड़ी फ़ैक्ट्रियाँ अभी बची हैं उनके मालिकान भी इसी जुगत में हैं। मन्दी ने उन्हें एक सुनहरा मौक़ा दे दिया है। अब वे नियमित मज़दूरों से भी पल्ला झाड़ने के चक्कर में हैं। ऐसा ही हैवल्स के मज़दूरों के साथ भी हुआ।

31 जनवरी को प्रबन्धन ने बताया कि फ़ैक्ट्री बन्द होने वाली है, सभी मज़दूर अपना-अपना हिसाब ले लें। इसके पहले प्रबन्धन अक्टूबर से ही उत्पादन कम करके मज़दूरों की संख्या कम करने में लग गया था तथा अब सिर्फ़ वे ही मज़दूर बचे थे जो काफ़ी समय से फ़ैक्ट्री में काम कर रहे थे। जब मज़दूरों ने एकजुट होकर इसका विरोध किया तो प्रबन्धन ने नयी चाल चली। 4 फ़रवरी को फ़ैक्ट्री गेट पर एक नोटिस लगा दिया गया कि फ़ैक्ट्री शिफ्ट हो रही है तथा अन्य राज्यों की फ़ैक्ट्रियों में स्थानान्तरण के पत्र मज़दूरों को थमा दिये गये। किसी को कलकत्ता, किसी को हरिद्वार, किसी को पूना शिफ्ट करने की चिट्ठी थमा दी गयी। अभी मज़दूर कुछ समझ पाते तब तक 17 फ़रवरी को प्रबन्धन फ़ैक्ट्री गेट पर फ़ैक्ट्री बन्द करने का नोटिस लगा चुका था।

समयपुर बादली में ही रेलवे स्टेशन के पास ही आदित्य बिड़ला ग्रुप का बहुत बड़ा गोदाम है। यहाँ पर इस समूह के डिपार्टमेण्ट स्टोर – मोर के लिए विभिन्न उत्पादकों से थोक में सामान खरीद कर लाया जाता है तथा उसके बाद यहाँ से विभिन्न डिपार्टमेण्टल स्टोरों पर सामान की डिलीवरी होती है। करीब दो साल पहले जब समूह ने काम शुरू किया तो कई दिनों तक लम्बी-लम्बी लाईन लगाकर मज़दूरों की भर्ती की गयी। उन मज़दूरों को विभिन्न प्रकार के आश्‍वासन देकर पक्की नौकरी, फ़ण्ड, ईएसआई कार्ड आदि बनाने की बातें करके भर्ती किया गया। करीब 300 लोगों को लेकर काम शुरू किया गया। पहले तो मज़दूरों को आसपास की अन्य फ़ैक्ट्रियों से कुछ ज़्यादा पैसा दिया गया। ओवरटाइम के डबल पैसे दिये गये क्योंकि प्रबन्धन यहाँ पर नया काम शुरू कर रहा था। उसके बाद धीरे-धीरे तरह- तरह के बहाने करके मज़दूरों की संख्या कम की गयी। आसपास के कुछ दबंगों को सुपरवाइजर के रूप में भर्ती कर लिया गया। जो तरह-तरह से मज़दूरों को तंग करने लगे। ज़्यादातर मज़दूरों ने तंग आकर काम छोड़ दिया तथा प्रबन्धन के ख़िलाफ़ किसी प्रकार का विरोध भी नहीं किया। अब यहाँ मुश्किल से पचास मज़दूर बचे हैं, जबकि पहले की तुलना में काम काफ़ी बढ़ गया है।

बादली औद्योगिक क्षेत्र के फ़ेस तीन के ए-2 में मोबाईल का चार्जर बनाने वाली एक फ़ैक्ट्री है। यहाँ का प्रबन्धन काफ़ी चालाक है। जैसे ही ज़्यादा आर्डर मिलता है, वह ढेर सारे लड़के-लड़कियों को काम पर रख लेता है। काम कुछ ऐसा है कि चन्द घण्टों में मज़दूर तेज़ी से काम करने लगते हैं। एक दिन की दिहाड़ी तो प्रबन्धन ट्रेनिंग के नाम पर मार देता है। उसके बाद मज़दूरों के साथ बात-बात पर गाली-गलौज और ज़रा सा कुछ कहने पर तुरन्त बाहर। कोई मज़दूर दो दिन, कोई तीन दिन तो कोई-कोई पाँच-दस दिन बाद निकाल दिया जाता है। इस तरह से प्रोडक्शन का ज़्यादा हिस्सा बिना किसी मज़दूरी के ही पूरा हो जाता है। जैसे ही मन्दी की बयार बहने लगी, मालिक ने धीरे-धीरे सभी मज़दूरों को एक-एक करके बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब मुश्किल से आठ-दस मज़दूरों को लेकर फ़ैक्ट्री चल रही है। मालिक ने मज़दूरों से कहा है कि जैसे ही काम बढ़ेगा तुम लोगों को फिर से काम पर रख लेंगे! जैसे मज़दूर और उसका परिवार तब तक हाथ पर हाथ रखे हवा पीकर जिन्दा रहेंगे।

 

बिगुल, मार्च 2009

 


 

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