पंजाब सरकार द्वारा ”इंस्पेक्टर राज” के ख़ात्मे का ऐलान – पूँजीपतियों के हित में मज़दूरों-मेहनतकशों के हकों पर डाका

रणबीर

पंजाब की अकाली-भाजपा सरकार लंबे समय से पंजाब से ‘’इंस्पेक्टर राज’’ ख़त्म करने की बात कर रही है। पिछले दिनों उप-मुख्य मंत्री सुखबीर बादल और अन्य सरकारी आधिकारियों ने इससे सम्बन्धित सरकार की कई तजवीज़ों के ऐलान किये हैं। सरकार द्वारा जो तजवीजें पेश की गई हैं उनसे भी यह स्पष्ट होता है कि केंद्र और अन्य राज्य सरकारों की तरह पंजाब सरकार भी किस बड़े स्तर पर मज़दूरों-मेहनतकशों की लूट-खसोट और तेज़ करने की जन विरोधी योजनाएँ बनाए हुए है।

पूरे देश में ‘’इंस्पेक्टर राज’’ के ख़ात्मे की चल रही प्रक्रिया के तहत ही पंजाब में भी यह प्रक्रिया जारी है। सुखबीर बादल बार-बार यह कहता रहा है कि वह ‘’इंस्पेक्टर राज’’ ख़त्म करके रहेगा। नवंबर महीने में एक मीटिंग के दौरान सुखबीर बादल ने कहा है कि उसकी हार्दिक इच्छा है कि 31 दिसंबर 2015 तक पंजाब में से ‘’इंस्पेक्टर राज’’ का ख़ात्मा कर दिया जायेगा। इसी साल 10 सितम्बर को दिए एक बयान में सुखबीर बादल ने कहा था कि ‘’किसी भी इंस्पेक्टर को फैक्ट्री क्षेत्र में दाख़िल होने की इजाज़त नहीं दी जायेगी’’। उद्योग और व्यापार से सम्बन्धित अलग -अलग कानूनों के अंतर्गत श्रम, आमदन कर, ई.एस.आई.सी., ई.पी.एफ., ख़ुराक, प्रदूषण नियंत्रण, औद्योगिक सुरक्षा आदि विभागों के इंस्पेक्टरों की द्वारा औद्योगिक और व्यापारिक इकाईयों के ‘’मुआइने’’ और कानूनों के उलंघनों के लिए ‘’कार्यवाही’’ (जुर्माने आदि) को पूँजीपति ‘’इंस्पेक्टर राज’’ कहते हैं। पूँजीपति कहते हैं कि ‘’बार -बार’’ होने वाले ‘’मुआइनों’’ और ‘’बहुत ज़्यादा’’ कागज़ी कार्यवाही के कारण उनको कारोबार करने में बहुत परेशानी होती है। उनका कहना है कि ‘’छोटी-छोटी’’ बातों की शिकायतों पर इंस्पेक्टर उनको तंग करते हैं।

पंजाब सरकार द्वारा इससे सम्बन्धित नवंबर 2015 में पेश तजवीज़ों के मुताबिक औद्योगिक और व्यापारिक संस्थानों के मुआइनों के लिए एक नया संस्थान ‘‘औद्योगिक मुआइना ब्यूरो’’ कायम किया जायेगा। इस के अंतर्गत सभी कानूनों के अंतर्गत इकट्ठा ही मुआइना और वार्षिक लेखा-जोखा हो जाया करेगा। यह तजवीज़ भी पेश की गई है कि श्रम विभाग का कोई भी इंस्पेक्टर किसी शिकायत और केंद्रीय कानून के अंतर्गत अति ज़रूरी होने पर ही मुआइनों के लिए जायेगा। दूसरी स्थिति में मुआइना श्रम कमिश्नर की आगामी आज्ञा के बिना नहीं हो सकेगा। एक तजवीज़ यह रखी गई है कि ब्वाय्लर इंस्पेक्टर सम्बन्धित अथारिटी से आगामी आज्ञा के बिना उतनी देर तक किसी फैक्ट्री का दौरा नहीं करेगा जब तक सम्बन्धित फर्म द्वारा उसको सालाना मुआइने के लिए न्योता नहीं दिया जाता ! सभी विभागों खासकर श्रम, जंगलात, प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड, उद्योग विभाग आदि को अपनी वेबसाइटें अपडेट करने के लिए कहा गया है जिससे आनलाइन अर्ज़ी दाख़िल करने, फ़ीसों का भुगतान आदि के साथ -साथ स्व-घोषणा आदि के द्वारा ‘’मुआइना’ ‘प्रक्रिया को सरल और तेज़ बनाया जा सके।

पूँजीपतियों के पक्ष में ‘’इंसपेकटर राज’’ ख़त्म करने का मुद्दा लंबे समय से जारी है। प्रधानमंत्री से लेकर अलग -अलग केंद्रीय मंत्रियों, अलग-अलग राज्यों के मुख्य मंत्रियों और मंत्रियों और आधिकारियों द्वारा द्वारा बार-बार इस ‘’दैत्य’’ ‘’इंस्पेक्टर राज’’ को ख़त्म करने के लिए कदम उठाने के ऐलान होते रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा काम और अन्य कानूनों में बड़े बदलाव करके इस मुसीबत का ख़ात्मा करने की प्रक्रिया जारी है। बिना किसी छूट के, भाजपा, कांग्रेस, अकाली दल, समाजवादी पार्टी, जे.डी.यू., आम आदमी पार्टी, बसपा, आदि प्रत्येक पार्टियों की केंद्र या राज्य सरकार की कार्य-सूची में यह एक बड़ा काम शामिल रहा है।

आइए जरा अब औद्योगिक इलाकों, कारखानों और अन्य व्यापारिक संस्थानों में अलग-अलग कानूनों के पालन, ‘’इंस्पेक्टर राज’’,  मज़दूरों की हालत आदि के बारे में ज़मीनी हकीकत पर थोड़ी नज़र डालें। हालत यह है कि पंजाब समेत पूरे देश में पूँजीपति पहले ही अलग -अलग स्तर के कानूनों की सरेआम धज्जियाँ उड़ा रहे हैं। श्रम कानूनों की बात करें तो देश के पाँच प्रतिशत मज़दूरों को भी श्रम कानूनों के अंतर्गत न्यूनतम वेतन, आठ घण्टे कार्यदिवस, ओवरटाईम, साप्ताहिक व अन्य छुट्टियों, ई.एस.ई., पी.एफ., हाज़िरी, पहचान पत्र, काम के दौरान हादसों और बीमारियों से सुरक्षा के प्रबंध, मुआवज़ा, आदि कानूनी श्रम अधिकार प्राप्त नहीं होते हैं। औद्योगिक इलाकों में पहले ही बड़े स्तर पर पूँजीपतियों का जंगल राज कायम हो चुका है। मज़दूरों द्वारा हक मांगने पर पूँजीपतियों के निजी गुंडों और पुलिस द्वारा उनका दमन किया जाता है। श्रम विभागों और श्रम अदालतों के अफ़सरों-कर्मचारियों की संख्या इस हद तक घटा दी गई है कि इनका अस्तित्व सिर्फ़ नाम मात्र का ही है। अन्य विभागों के इंस्पेक्टरों और अन्य आधिकारियों की तरह श्रम विभाग के अफ़सर कारखानों में ‘’मुआइनो ‘’ का दिखावा करने जाते हैं। आमतौर पर पूँजीपतियों के ख़िलाफ़ कोई कार्यवाही नहीं होती। यदि होती भी है तो बहुत मामूली होती है। व्यापारिक इकाईयाँ के बारे में भी यह स्थिति हू-व्-हू लागू होती है। इन आधिकारियों को पूँजीपतियों द्वारा रिश्वतों के बड़ी-बड़ी दी जाती हैं।

श्रम विभाग के साथ-साथ अन्य विभागों के बारे भी यही सत्य है। आय कर,  प्रदूषण नियंत्रण, बिजली, इमारतें, ख़ुराक आदि प्रत्येक विभागों से सम्बन्धित कानूनों की पूँजीपति जी भर कर धज्जियाँ उड़ाते हैं। इन विभागों से सम्बन्धित अफसरों को रिश्वतों के बड़े पैमाने पर घूस दी जाती है। पूँजीपतियों द्वारा विभिन्न कानूनों की किस स्तर पर धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं इसका अंदाज़ा तो पंजाब सरकार के बयानों से भी लगाया जा सकता है। सरकार मानती है कि पंजाब के ढाई लाख व्यापारियों में से बहुत कम ही टैक्स नियमों की पालना करते हैं। सिर्फ़ 900 व्यापारियों ने एक वर्ष के वैट के तौर पर एक करोड़ से भी ज्यादा की राशि जमा करवाई है।

कहने की ज़रूरत नहीं है कि श्रम कानूनों का उल्लंघन, अफसरों को दी जाने वाली रिश्वत आदि ने मज़दूरों पर बड़ा आर्थिक बोझ डाला हुआ है। उनकी ज़िंदगी हद से बदतर कर रखी है। मज़दूरों की आमदन इतनी कम है कि वह अपनी, बुनियादी जरूरतें भी पुरी नहीं कर पाते। कारखानों में रोज़मर्रा भयानक हादसे होते हैं जिनमें मज़दूर बड़ी संख्या में मारे जाते हैं, ज़ख़्मी और अपाहिज होते हैं। पूँजीपतियों द्वारा नियम -कानूनों की उलंघनायों का बोझ सिर्फ़ मज़दूरों को ही झेलना नहीं पड़ रहा बल्कि समाज के दूसरे गरीब मेहनतकश तबकों को भी इसकी मार झेलनी पड़ रही है। पूँजीपतियों द्वारा टैक्सों की बड़ी स्तर पर चोरी का बोझ वास्तव में सारी मेहनतकश जनता पर पड़ता है। सरकारी खजाने में पड़े घाटो का बहाना बना कर सरकार एक तरफ़ लोगों को दी जाने वाली सहूलतों पर कट लगाती है और दूसरी तरफ़ जनता पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष करों का बोझ बढ़ा दिया जाता है।

लेकिन पूँजीपतियों की मुनाफे की भूख कभी भी शांत नहीं होती। वह और बड़े स्तर पर मुनाफे लूटना चाहते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि जो थोड़े से भी श्रम कानून उनको लागू करने पड़ते हैं उससे भी उन्हें छुटकारा मिले। मज़दूर एकजुट होकर पूँजीपतियों को काम कानूनों के अंतर्गत कुछ चीजें लागू करने के लिए मजबूर कर देते हैं। श्रम विभाग पर दबाव बना कर मज़दूर संग्ठन इंस्पेक्टरों से कारखाने का मुआइना करवा देते हैं और कई बार ताकत के मुताबिक पूँजीपतियों के ख़िलाफ़ कार्यवाही कराने में मज़दूरों को कामयाबी भी मिल जाती है। मुआइना नियमों में बदलाव द्वारा पूँजीपति इस झंझट से छुटकारा हासिल करना चाहते हैं। न रहेगा बाँस और न बजेगी बाँसुरी।

विभिन्न विभागों के अफसरों को दी जाने वालीं रिश्वतों के कारण मुनाफे बँट जाते हैं। मुनाफे का एक ठीक-ठाक हिस्सा सरकारी अफसरों -इंस्पेक्टरों की जेबों में चले जाने से उद्योगपति और व्यापारी काफ़ी दिक्कत में हैं। वह चाहते हैं मज़दूरों की लूट का सारा माल उन्हीं के पास ही रहे। इस मकसद के अंतर्गत सरकारी ढांचे में से भ्रष्टाचार के ख़ात्मे के लिए ज़ोर लगाया जा रहा है। कुछ समय पहले अन्ना हज़ारे-केज़रीवाल को आगे करके बड़े स्तर पर चलाई गई ‘’भ्रष्टाचार विरोधी’’ मुहिम, जिसमें पूँजीपति वर्ग ने मीडिया की बड़ी ताकत झोंक दी थी, पीछे यह एक बड़ा कारक था।

अपनी, उपरोक्त मुसीबतों से छुटकारा पाने के लिए ही पूँजीपतियों द्वारा ‘’इंस्पेक्टर राज’’ के ख़ात्मे के लिए चीख-चिल्लाना हो रहा है और उनकी सेवक भाजपा, अकाली दल, कांग्रेस, आप जैसी सभी वोट-बटोरू राजनैतिक पार्टियाँ और सरकारें उनकी सुर में सुर मिला रही हैं।

मौजूदा समय में जब पूरी विश्व पूँजीवादी व्यवस्था में आर्थिक संकट के बादल छाये हुए हैं,  भारतीय अर्थव्यवस्था भी लड़खड़ा रही है, मुनाफे सिकुड़ रहे हैं, सकल घरेलू गतिरोधव गिरावट का शिकार है, तब भारत के पूँजीवादी हुक्मरान देसी -विदेशी पूँजी के लिए भारत में साजगार माहौल के निर्माण की कोशिश में लगे हुए हैं। आर्थिक सुधारों में बेहद तेज़ी भारतीय पूँजीवादी हुक्मरानों की इन्हीं कोशिशों का हिस्सा है। ‘’इंस्पेक्टर राज’’ के ख़ात्मे की प्रक्रिया में तेज़ी लाने का भी यही कारण है।

आज मज़दूरों द्वारा भी पूँजीपति वर्ग के इस हमले के ख़िलाफ़ ज़ोरदार हल्ला बोलने की ज़रूरत है। ज़रूरत तो इस बात की है कि पहले से मौजूदा श्रम अधिकारों को तुरंत लागू किया जाये, श्रम अधिकारों को विशाल स्तर पर और बढ़ाया जाये। ज़रूरत इसकी है कि पूँजीपतियों पर बड़े टेक्स बढ़ाकर सरकार द्वारा जनता को बड़े स्तर पर सहूलतें मिलें। ज़रूरत इस बात की है कि पूँजीपतियों द्वारा मज़दूरों-मेहनतकशों की मेहनत की लूट पर लगाम कसने के लिए कानून सख़्त किए जाएँ। इन कानूनों के पालन के लिए अपेक्षित ढाँचा बनाया जाए। परन्तु पूँजीपतियों की सरकारों से जो उम्मीद की जा सकती है वह वही कर रही हैं – पूँजीपति वर्ग की सेवा। मज़दूर वर्ग यदि आज पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर कुछ थोड़ी-बहुत भी राहत हासिल करना चाहता है तो उसको मज़दूरों के विशाल एकजुट आन्दोलन का निर्माण करना होगा। पूँजीपति वर्ग द्वारा मज़दूर वर्ग पर बड़े एकजुट हमलों का मुकाबला मज़दूर वर्ग द्वारा जवाबी बड़े एकजुट हमले द्वारा ही किया जा सकता है।

मज़दूर बिगुल, दिसम्‍बर 2015


 

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