कड़कड़ाती ठण्ड और ‘स्मॉग’ के बीच मज़दूर वर्ग का जीवन

शिशिर गुप्ता‍

कुछ लोग नसीहत देते हैं कि हर मौसम का अपना-अपना मिजाज़ होता है और इंसान को सबके मज़े लेने चाहिए। ऐसा बोलते हुए वे भूल जाते हैं कि एक वर्ग-आधारित समाज में अमूर्त बातों का भी वर्ग-चरित्र होता है। इस देश की बहुसंख्यक जनसंख्या को गर्मी में लू के थपेड़े पड़ते हैं, बारिश में नाले का सड़ा हुआ पानी घर में घुसता है और जाड़े में – जाड़े में तो जाने कितने अभागों की अकाल मौत बस इसलिए हो जाती है कि उनके पास जाड़े से बचने का कोई चारा ही नहीं था। हाँ, जाड़े में घटिया किस्म का जूता-चप्पल और जैकेट-स्वेटर पहनकर काम करने वाली बहुसंख्यक मेहनतकश मज़दूर आबादी के द्वारा अपना हाड़-मास गलाकर बनाये गये बढ़िया रेशेदार और गरम ऊनी कपड़े, कम्बल और तमाम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का इस्तेमाल करने वाला परजीवी पूँजीपति वर्ग और उसके पिछलग्गू मध्यम और उच्च-मध्यम वर्गों के लोग ज़रूर मौसम के मज़े लेने जैसे व्यसन पाल सकते हैं।

कहने की ज़रूरत नहीं कि पूँजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत ढंग का कम्बल भी नहीं जुगाड़ पाने वालों के लिए साल भर में ठण्ड से ही सबसे ज़्यादा मार पड़ती है। और अब इसी मरणासन्न सड़ते हुए पूँजीवाद ने वायुमण्डल को भी इस क़दर प्रदूषित कर दिया है कि इस बार दिल्ली में ठण्ड ने भयंकर ‘स्मॉग’ के साथ दस्तक दी। पूँजीपतियों की हमदर्द सरकारें, और उन्हीं के भोंपू टीवी समाचार चैनल विलाप करते रहे कि प्रदूषण पर लगाम लगनी चाहिए और नीम-हकीमी नुस्खे समझाते रहे कि दफ़्तरों-स्कूलों में छुट्टी करें (कारख़ानों-वर्कशॉपों में नहीं!), चेहरे पर मास्क लगायें, पर्याप्त मात्रा में पानी पियें,  घर के अन्दर ही रहें वग़ैरह-वग़ैरह! इन महानुभावों ने कभी ये नहीं बताया कि रोजाना दिहाड़ी पर काम करने वाला छुट्टी कैसे ले, रिक्शा चलाकर कमाने वाला कितनी देर तक घर के अन्दर बैठा रहे और ग़ाज़ि‍याबाद के फारुख़ नगर में पटाखे बनाने की वर्कशॉपों में काम करने वाले बच्चे कौन सा मास्क लगायें जो उन्हें ‘स्मॉग’ से, कारख़ाने की जानलेवा धूल से (जिससे उन्हें पहले ही दमा और टीबी हो चुका होता है) और सुपरवाइज़र की गालियों और थप्पड़ों से बचा सके! मेहनतकशों की अन्य समस्याएँ गिनाकर हम ये नहीं कहना चाहते कि ‘स्मॉग’ जैसी समस्याओं को उन्हें गम्भीरता से नहीं लेना चाहिए, बल्कि ज़रूर लेना चाहिए और उसके मूलभूत कारणों की तहक़ीक़ात भी करनी चाहिए! यह लेख उसी दिशा में एक छोटा सा प्रयास है। आइए सबसे पहले जानते हैं कि ‘स्मॉग’ होता क्या है!

ठण्ड  में कोहरा तो हर साल होता है, मगर प्रदूषण के साल दर साल बढ़ते जाने से कोहरा प्रदूषित धुएँ से मिलकर लगातार सघन होता गया है और यह सघनता इस बार इतनी ज़्यादा और नुक़सानदेह थी कि इसे ‘स्मॉग’ कहा गया। इसमें सबसे ख़तरनाक कण होता है पीएम 2.5 जिसका स्तर 150 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर पार करते-करते किसी हृष्ट-पुष्ट व्यक्ति के लिए भी दिक़्क़ततलब हो जाता है और इस बार के ‘स्मॉग’ के दौरान तो दिल्ली में स्तर 400 के ऊपर होना आम बात थी! ‘स्मॉग’ के कारण खाँसी-सर्दी, सीने में संक्रमण, आँख में जलन हो सकती है, दमा के मरीजों को इसका दौरा पड़ सकता है और अकाल प्रसव की सम्भावना बढ़ जाती है।

मेहनतकशों के जीवन में वैसे ही कठिनाइयों का ताँता लगा रहता है। ठण्ड का मौसम भी उनके लिए एक चुनौती ही होता है। कड़कड़ाती ठण्ड में जब लोगों से कम्प्यूटर पर भी हाथ नहीं चलाये जाते, मज़दूरों को कारख़ानों में फिर भी 12 घण्टे की ड्यूटी पूरी करनी ही पड़ती है। ऐसे में सड़क-पुल-मकान इत्यादि के निर्माण कार्य में लगे मज़दूरों का कार्य और भी दुश्वार हो जाता है। सुरक्षा गार्ड की नौकरी करने वाले और सफ़ाई काम के लिए ठेके पर रखे गये नगर निगमों के मज़दूरों के लिए भी ठण्ड को झेलने के अलावा कोई चारा नहीं होता। ठण्ड में बच्चे भी सुविधा-सम्पन्न देखभाल के अभाव में ज़्यादा बीमार पड़ते हैं और दवा-इलाज पर होने वाला ख़र्च बढ़ जाता है। कई रिक्शे वाले कम आमदनी के चलते कमरा किराये पर नहीं ले पाते और किसी तरह रिक्शे पर ही कोहरे और ठण्ड में सोते हैं। इतनी मुसीबत के बाद ‘स्मॉग’ जैसी नयी-नयी समस्याएँ मेहनतकश तबक़े का जीवन बदतर बना देती हैं क्योंकि इसके ख़तरों से सर्वाधिक प्रत्यक्ष रूप में उन्हीं का आमना-सामना होता है।

ठण्ड में ‘स्मॉग’ की यह समस्या असल में एक विश्व्यापी समस्या है। मगर विकसित देशों की आम जनता में ऐतिहासिक कारणों से अपने अधिकारों को लेकर जागरूकता और उनके लिए लड़ने का जज़्बा ऐसा है कि वहाँ का बुर्जुआ वर्ग भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, फिलिपींस जैसे देशों के मेहनतकशों की हडि्डयाँ निचोड़कर अपने देश की जनता को राहत देता रहा है। इसीलिए जहाँ भारत जैसे देशों में अभी भी ऊर्जा के लिए ख़राब किस्म के डीजल-पेट्रोल और कोयले का ही ज़्यादा प्रयोग किया जाता है, वहीं विकसित देशों में बढ़िया किस्म का डीजल-पेट्रोल-गैस, सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और नाभिकीय ऊर्जा इत्यादि का प्रयोग होने लगा है। हमारे यहाँ बिना फ़िल्टर वाली चिमनियों से ज़हरीला धुआँ निकलता रहता है, कूड़े-करकट के निस्तारण तक की ढंग की व्यवस्था नहीं होती, बस मध्य-वर्गीय और अमीरों के इलाक़ों से कूड़ा इकट्ठा कर मज़दूर बस्तियों के आस-पास कहीं जमा कर दिया जाता है।

विश्वं स्वास्थ्य संगठन की 2014 की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में से 13 भारत के थे। इन 20 प्रदूषित शहरों में पहला स्थान दिल्ली का था। दिल्ली  में हर साल प्रदूषण जनित बीमारियों से 10 हज़ार से लेकर 30 हज़ार तक मौतें होती हैं। राष्ट्रीय स्तर पर इन मौतों का आँकड़ा 6 लाख 50 हज़ार है। दुनिया के दो अरब बच्चे प्रदूषित हवा में साँस लेते हैं। इनमें से 62 करोड़ बच्चे दक्षिण एशिया के (जिनमें भारत सबसे ऊपर है), 52 करोड़ अफ़्रीका के तथा 45 करोड़ पूर्वी एशिया व प्रशान्त क्षेत्र के हैं। पिछले कई वर्षों से वायु प्रदूषण के मामले में भारत की स्थिति दुनिया में सबसे ख़राब बनी हुई है और हर आने वाले वर्ष के साथ बद से बदतर होती जा रही है। 2015 में ग्रीनपीस, इण्डिया ने अपनी एक जाँच में भारत के 168 में से 154 शहरों में (यानी 90 प्रतिशत शहरों में) वायु प्रदूषण राष्ट्रीय पैमाने पर निर्धारित स्तर से अधिक पाया। इन 168 में से एक भी शहर में वायु प्रदूषण विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित स्तर से नीचे नहीं था। कहने की ज़रूरत नहीं कि वास्तविक स्थि‍ति उपरोक्त आँकड़े से भी ज़्यादा ख़ौफ़नाक है क्योंकि ग़रीबों-मेहनतकशों के परिवारों में होने वाली तमाम बीमारियों का कोई रिकॉर्ड ही नहीं मौजूद होता। वैसे तो प्रदूषण जनित बीमारियों से समाज का हर तबक़ा प्रभावित होता है, लेकिन मेहनत-मज़दूरी करने वाले तबक़े को इनका दंश सबसे ज़्यादा झेलना पड़ता है।

ज़ाहिर है कि इस बेहद गम्भीर स्थिति के लिए कारख़ानों की अनियन्त्रित धुँआ उग़लती चिमनियों के साथ-साथ सड़कों पर हर रोज़ बढ़ती वाहनों की संख्या ही मुख्य तौर पर ज़ि‍म्मेदार है। अकेले दिल्ली की सड़कों पर रोज़ाना लगभग 90 लाख पेट्रोल और डीज़ल चालित वाहन होते हैं। जाड़े के दिनों में दिल्ली और पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश में ‘स्मॉग’ और प्रदूषण की समस्या को अतिगम्भीर बनाने वाला एक अतिरिक्त कारक पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तर प्रदेश-उत्तरांचल के तराई अंचल के किसानों द्वारा मध्य अक्टूबर से लेकर नवम्बर के शुरुआती हफ़्ते तक खेतों में धान की पराली जलाना होता है। इसमें पंजाब सबसे आगे है। दूसरे स्थान पर हरियाणा है, लेकिन पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तराई में भी यह चलन बढ़ता जा रहा है और अब राजस्थान भी इसकी चपेट में है। इन इलाक़ों के बड़े किसान मज़दूरी का ख़र्च बचाकर आमद बढ़ाने के लिए पराली को जला देते हैं जबकि छोटे किसान ज़्यादातर मामलों में पराली जलाते नहीं। उसे हाथ से काटकर वे पशुओं के चारे, जाड़े में उनके नीचे बिछाने या चटाई बनाने आदि में इस्तेमाल  करते हैं। ‘सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेण्ट सिस्टम’, टीएचएस मशीन का प्रयोग, प्लावर के प्रयोग से पराली को मिट्टी में मिला देना और रोटावेटर और बेलर के इस्तेमाल जैसी पराली के निस्तारण की तमाम तरीक़े उपलब्ध होने के बावजूद लागत कम से कम रखने के लिए धनी किसान इन्हें नहीं अपनाते और सरकारें भी अपनी वर्ग-पक्षधरता के चलते चुप्पी साधे रहती हैं।

यह वर्गीय पक्षधरता ही है कि नगर निगम मध्यम वर्गीय इलाक़ों का कूड़ा मज़दूर बस्तियों के पास कहीं पाट कर वहाँ की आबोहवा ज़हरीली बनाते हैं और पूँजीपति खुलेआम बिना फ़िल्टर वाली चिमनियों का प्रयोग करते हैं। यह भी इस पूरी व्यवस्था की वर्गीय पक्षधरता ही है कि परिवहन के क्षेत्र में भी हुई अभूतपूर्व तकनीकी प्रगति का इस्तेमाल सार्वजनिक यातायात को बेहतर बनाने की बजाय अमीरों के लिए लग्ज़री कारों को बनाने में किया जाता है। ‘स्मॉग’ की समस्या बढ़ने पर मीडिया में तमाम धुरन्धर विशेषज्ञ पर्यावरण पर अपने घड़ि‍याली आँसू बहाते नज़र आने लगते हैं; बेशर्मी की हद तो तब हो जाती है जब ऐसे विश्लेषणों के बीच कारों के विज्ञापन आने का सिलसिला बदस्तूर जारी रहता है और लोगों को अपनी मनपसन्द कार लेने के लिए सस्ती दरों पर क़र्ज़ की भाँ‍ति‍-भाँति की स्कीमों के लालच भरे ऑफ़र परोसे जाते हैं। ज़रा सोचिए दोस्तो, क्या ये ‘स्मॉग’ का सवाल महज़ पर्यावरण और विज्ञान का सवाल है, जैसा कि पूँजीवादी भोंपू मीडिया और तमाम खा-पीकर अघाये बुद्धिजीवी हमें समझाना चाहते हैं? नहीं! ये आपकी ज़िन्दगी जीने की रोज़ाना की जद्दोज़हद और समाज में उत्पादन की प्रणाली से जुड़ा सवाल है। ये इस बात से जुड़ा है कि आप अपने बच्चों को बचाने के लिए अच्छे वाले मास्क और एयर प्योरीफ़ायर कहाँ से ख़रीदेंगे? निरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए विटामिन सी वाले फल कैसे खायेंगे? प्रदूषक कण साँस के साथ फेफड़ों में न जायें, इसके लिए मेहनत भरी गतिविधियाँ बन्द या कम कैसे कर सकेंगे? इसलिए टीवी चैनल वाले और सरकारें अपने नीम-हकीमी नुस्ख़े बताते रहें, हमें तो अपनी दिक़्क़तों की जड़ से शिनाख़्त कर वहीं पर प्रहार करना होगा। पर्यावरण के विनाश को रोकने के लिए भी हमें पूरे समाज में लोभ-लालच, मतलबपरस्ती और मुनाफ़ाखोरी का धुँआसा फैलाने वाली पूँजीवादी व्यवस्था का नाश करने की तैयारी करनी होगी।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2018

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