भीष्म साहनी के उपन्यास ‘तमस’ के अंश

”तुम गली में रहनेवाले म्लेच्छों को जानते हो?”

रणवीर ने शम्भू से पूछा था।

”हाँ सरदार, मैं इन्हें जानता हूँ। महमूद धोबी हमारे घर के कपड़े धोता है, और पीर की क़ब्र के सामने जो मियाँजी रहते हैं, वे मेरे दादाजी के साथ बहुत उठते-बैठते हैं।”

”तुम इस गली में काम नहीं करोगे।” रणवीर ने निर्णायक स्वर में कहा। शम्भू हतोत्साह हो गया।

आज ये लोग अपने पहले शिकार पर धावा बोलनेवाले थे। चारों वीर उत्तेजित थे। अभी तक केवल तैयारी चलती रही थी, आज रणभूमि में जौहर दिखाने का समय आ गया था। ”आज रण में जाके धूम मचा दे बेटा!” धर्मदेव के कानों में वीररस भरे इस गीत की पंक्ति देर से गूँज रही थी। मनोहर तनिक चिन्तित था। वह अपनी माँ से कुछ भी कहे बिना चला आया था, और अब दिन के दो बजा चाहते थे और मनोहर को डर था कि चौका समेटने के बाद उसकी माँ उसे ढूँढ़ने निकल पड़ेगी और कौन जाने ढूँढ़ती-ढूँढ़ती इधर ही आ निकले?

रणवीर ने अन्य तीनों योद्धाओं को ‘शस्त्रागार’ में इकट्ठा किया और रणनीति पर विचार करते हुए बोला, ”शत्रु पर उबलता तेल डालने का समय अभी नहीं आया है। उबलता तेल उस समय डाला जाता है जब शत्रु अपने दुर्ग पर हमला कर दे और आप हथियारों से उसका मुकाबला न कर सकते हों।” फिर उसने तनिक सोचकर कहा, ”यहाँ केवल छुरा चलेगा, कमानीदार छुरा।”

फिर उसने इन्द्र को सम्बोधित करके कहा, ”एक बार फिर पैंतरा करके दिखाओ। उठाओ छुरा दासे पर से।”

इन्द्र फ़ुरती से छुरा उठा लाया। कमरे के बीचोंबीच दोनों टाँगें फैलाये वह क्षण-भर के लिए खड़ा रहा। छुरे की मूठ उसके दायें हाथ में थी और उसका फल पीछे की ओर था। फिर बायाँ क़दम उठाकर वह उछला, और हवा में अर्द्धवृत्त काटकर फिर दोनों टाँगें फैलाये रणवीर की पीठ की ओर मुँह किये फ़र्श पर उतरा। इसी बीच उसने रणवीर की कमर को निशाना बनाते हुए उलटे हाथ से छुरे के वार का संकेत किया था।

रणवीर ने सिर हिलाया, ”शत्रु की छाती अथवा पीठ को कभी भी निशाना नहीं बनाओ। वार हमेशा कमर में करो या पेट में। और घुमावदार छुरा घोंपने के बाद उसे अन्दर ही अन्दर थोड़ा मोड़ दो, इससे अँतडि़याँ बाहर आ जायेंगी। अगर तुम भीड़ में शत्रु पर वार करते हो तो छुरा बाहर खींचने की कोशिश नहीं करो, उसे वहीं रहने दो और भीड़ में खो जाओ।”

रणवीर वही कुछ बोले जा रहा था जो उसने मास्टर देवव्रत के मुँह से सुना था।

थोड़ी देर बाद दल दो हिस्सों में बँट गया था। पहले हमला इन्द्र के हाथों किया जायेगा। इसलिए इन्द्र, शम्भू और सरदार शस्त्रागार को छोड़कर नीचे ड्योढ़ी में आ गये, जबकि मनोहर ऊपर बना रहा। फ़ैसला किया गया कि सड़क की ओर छज्जे पर खड़ा सैनिक नज़र रखेगा और गली में आने-जाने वाले लोगों पर रणवीर और इन्द्र और शम्भू। और रणवीर के हुक्म से इन्द्र ड्योढ़ी में से निकलकर शत्रु पर हमला करेगा। गली में घूमनेवाले दरवाज़े को थोड़ा-सा खोल देने पर सड़क का कुछ हिस्सा और गली का शुरू का हिस्सा नज़र आते थे। पीपल के तने के पार सड़क का हिस्सा था जो दोपहर की धूप में चमक रहा था।

गली के सामने एक ताँगा रुका। रणवीर ने दरवाज़े को लगभग पूरा मूँद दिया और एक पतली-सी दरार में से बाहर की ओर देखने लगा।

”कौन है?” इन्द्र ने फुसफुसाकर पूछा।

रणवीर चुप रहा। अन्य दो सैनिकों ने भी आगे बढ़कर दरार पर आँख लगायी।

”जलालख़ान है। नवावज़ादा जलालख़ान।” शम्भू बोला, ”यह सड़क के किनारे सामनेवाले मकान में रहता है। हमारे मुहल्ले को बहुत बड़ा रईस है। डिप्टी-‍कमिश्नर से मिलने जाता है।” शम्भू एक साँस में कह गया।

दरार में से क्षण-भर के लिए उसका सफ़ेद तुर्रा, चढ़ी हुई मूँछें और लाल दमकता चेहरा नज़र आये। पर जैसे वह सामने आया वैसे ही ओझल भी हो गया। गली में से गुज़रते हुए उसकी सरसराती सलवार और चरमराते जूते सुनायी दिये। कुछ निर्णय कर सकने के पहले ही वह अपने घर के अन्दर जा चुका था। तीनों वीर-सैनिक ठगे-से खड़े रह गये। वह यों भी क़द में बहुत ऊँचा-लम्बा था। उसे सामने से जाता देखकर तीनों सहम-से गये थे। और सोचने का मौक़ा ही नहीं मिला था।

मास्टरजी ने कहा था कि अपने शत्रु की ओर ध्यान से कभी नहीं देखो, इससे निश्चय डगमगाने लगता है। किसी भी जीव की ओर ध्यान से देखो तो उसके प्रति दिल में सहानुभूति पैदा होने लगती है। ऐसा कभी नहीं होने देना चाहिए।

पीछे गली में कोई दरवाज़ा खुला और फिर खड़ाक-से बन्द हो गया। तीनों के कान खड़े हो गये। रणवीर ने दरवाज़े के पर्दे को इस तरह से खोला कि पर्दों के बीच की दरार गली की ओर खुल गयी।

”कौन है?!” इन्द्र ने फुसफुसाकर पूछा।

”म्लेच्छ है।” रणवीर बोला।

दोनों मित्र ऊपर-नीचे दरार से आँख लगाकर खड़े हो गये। एक दाढ़ीवाला बड़ी उम्र का आदमी गली में से चलता हुआ सड़क की ओर आ रहा था।

”मियाँजी हैं।” शम्भू पहचानते हुए बोला, ”पीर की क़ब्र के सामनेवाले  घर में रहते हैं। इस वक़्त मस्जि़द में नमाज़ पढ़ने जा रहे हैं। रोज़ इस वक़्त नमाज़ पढ़ने जाते हैं।”

”चुप रहो।”

मियाँ गली का थोड़ा-सा हिस्सा लाँघकर पीपल के पेड़ के पास आया और वहाँ से बायें हाथ घूम गया। वह काले रंग की वास्कट पहने था और नीचे सलवार और ढीली-सी चप्पल। उसके दायें हाथ में छोटी-सी तसबीह लटक रही थी। बूढ़ा होने के कारण उसकी पीठ झुकी थी और वह धीरे-धीरे चलता जा रहा था।

”जाऊँ?” इन्द्र ने झट-से सरदार से पूछा।

”नहीं, अब वह सड़क पर पहुँच चुका है।”

”तो क्या हुआ?”

”नहीं। सड़क पर हमला करने की मनाही है।”

शम्भू को इन्द्र की आवाज़ में उतावलापन लगा, जबकि स्वयं शम्भू का मन शिथिल-सा पड़ रहा था। इन्द्र के पूछने पर शम्भू को एक अजीब धक्का-सा लगा था। सरदार की मनाही पर उसे मन ही मन राहत-सी मिली।

कुछ देर तक वे फिर दरवाज़े के पीछे खड़े रहे। वक़्त बीतता जा रहा था। चार बजे नल खुल जायेगा आैर गली की औरतें घड़े उठाये नल पर पहुँच जायेंगी। दोपहर बीतते ही इक्का-दुक्का और लोग भी बाहर निकलने लगेंगे।

इस बीच एक-एक करके दो आदमी गली में दाख़िल हुए। एक के हाथ में साइकल थी और आँखों पर चश्मा था।

”यह बाबू चूनीलाल है। यह एक दफ़्तर में काम करता है। इसके पास कुत्ता है।”

और दूसरा एक सिख सरदार गली में आया, जाे कन्धे पर गठरी उठाये हुए था।

दोनों बारी-बारी से आये और अपने पटपटाते जूतों के साथ गली लाँघ गये।

तभी उन्हें फिर किसी के क़दमों की आहट मिली। इन्द्र ने दरार में से झाँककर देखा और रणवीर की कोहनी को छू दिया।

”कौन है?”

इन्द्र कुछ नहीं बोला और बाहर देखता रहा।

पटपटाते हुए जूतों की आवाज़ आयी। रणवीर झट-से दरार में से झाँकने लगा। शम्भू भी दरार के साथ चिपक गया था।

”कौन है?”

”कोई खोमचेवाला है।” इन्द्र ने फुसफुसाकर कहा।

” नहीं, इत्र-फुलेल बेचता है। दूर कहीं रहता है, इस वक़्त रोज़ इधर से गुज़रता है। म्लेच्छ है।”

एक भारी-भरकम आदमी, मेहँदी से रँगी मूँछों और कूची दाढ़ीवाला अपने अगल-बग़ल बहुत-से थैले लटकाये पीपल के पेड़ के नीचे से होकर गली के अन्दर आ गया था। बोझ के कारण उसके माथे पर पसीने की बूँदें छलक आयी थीं। उसके दायें कान में रुई के फाहे थे और ऊपर दो-तीन सलाइयाँ पगड़ी में खोंस रखी थीं।

रणवीर को लगा जैसे उसकी पीठ-पीछे कोई हरक़त हुई हो। उसने घूमकर देखा। इन्द्र का हाथ अपनी जेब में रखे घुमावदार छुरे पर चला गया था।

क्षण बीत रहे थे और निर्णय का वक़्त आ गया था। यह आदमी म्लेच्छ था, अजनबी था, थैलों से लदा था, न भाग सकता था, न अपने को बचा सकता था, और थका हुआ था। सभी गुण  मौजूद थे। कुछ सवालों का जवाब मस्तिष्क नहीं देता, अन्त:प्रेरणा देती है। क्षण बीत रहे थे और फेरीवाला गली में आगे बढ़ता जा रहा था। रणवीर ने आँख का इशारा किया और इन्द्र लपककर बाहर हो गया। उसके बाहर निकलने पर क्षण-भर के लिए बाहर की रोशनी का चुँधियाता पुंच जैसे अन्दर घुस आया। पर रणवीर ने फिर से दरवाज़ा बन्द कर दिया।

कोई आहट या आवाज़ नहीं थी। रणवीर और शम्भू दम साधे दरवाज़े के पीछे खड़े थे। रणवीर अत्यधिक उत्तेजित हो उठा। उससे न रहा गया। उसने धीरे-से दरवाज़ा खोला और सिर बाहर निकालकर देखा। गली में कुछ दूरी पर इत्रफ़रोश झूलता हुआ चला जा रहा था। थैलों के बोझ के कारण उसकी पीठ झुकी हुई थी। और इन्द्र, बौना छोटा-सा इन्द्र, उससे कुछ दूर उसके पीछे-पीछे चलता जा रहा था। इन्द्र का हाथ कुरते की जेब में था और वह उचक-उचककर चल रहा था।

रणवीर के लिए दरवाज़े में से सिर निकालकर गली में झाँकना उतना ही असम्भव था जितना दरवाज़ा बन्द करके उसके पीछे खड़े रहना। उसका सभी बातों पर नियन्त्रण था, परन्तु अपने बाल-सुलभ कुतूहल पर कोई नियन्त्रण नहीं था। तभी उसे शम्भू ने पीछे खींच लिया। शम्भू डरा हुआ था और उसकी टाँगों में जैसे पानी भर गया था। आख़िरी झलक में रणवीर केवल इतना ही देख पाया था कि इन्द्र उस भारी-भरकम म्लेच्छ के साथ-साथ जा रहा था और दोनों गली का मोड़ काट रहे हैं।

शम्भू ने साँकल चढ़ा दी और दोनों अँधेरे में एक-दूसरे को देखते खड़े रह गये। दोनों बुरी तरह हाँफ रहे थे। शम्भू के लिए खड़े हो पाना असम्भव हो रहा था, जबकि रणवीर बाहर जाने के लिए अधीर था।

गली का मोड़ मुड़ने पर सहसा इत्रफ़रोश की नज़र बालक पर पड़ गयी। अपने पटपटाते जूतों के कारण शायद वह उसके पाँवों की आहट नहीं सुन पाया था।

इत्रफ़रोश मुस्करा दिया।

”किधर जा रहे हो बेटे इस वक़्त?” उसने कहा और मुस्कराते हुए अपना हाथ बढ़ाकर इन्द्र के सिर पर रख दिया।

इन्द्र ठिठक गया और एकटक उसके चेहरे की ओर देखने लगा। उसका हाथ अपनी जेब में था। इन्द्र के अवचेतन में यह बात उठी कि इस आदमी के गाल फूले हुए हैं और मास्टरजी ने एक बार कहा था कि फूले हुए गालोंवाले लोग बुजदिल होते हैं और उनका मेदा ख़राब होता है और वे भाग नहीं सकते, जल्दी हाँफने लगते हैं। और यह आदमी सचमुच हाँफ रहा था।

इन्द्र अपने शिकार पर झपटने के लिए पैर तौल रहा था। उसकी आँखें अभी भी म्लेच्छ के चेहरे पर गड़ी थीं।

इत्रफ़रोश को लड़का मासूम-सा लगा, छोटी उम्र का, कोमल-सा जो शायद आश्रय खोजता हुआ उसके पीछे-पीछे चला आया था। शायद डरा हुआ था, शहर में आज सभी लोग डरे हुए थे।

”कहाँ रहते हो?” चलो मेरे साथ आते जाओ। आज के दिन बाहर अकेले नहीं घूमना चाहिए।”

लेकिन इन्द्र टस से मस नहीं हो रहा था। अभी भी वह अत्रफ़रोश के चेहरे की ओर घूरे जा रहा था।

”तेली मुहल्ले तक मैं तुम्हें पहुँचा दूँ्गा।” आगे कहीं जाना हुआ तो तुम्हें किसी के सुपुर्द कर दूँगा। आज शहर में गड़बड़ है।”

और बिना बालक के उत्तर की प्रतीक्षा किये वह घूमकर आगे बढ़ने लगा।

क्षण-भर के लिए इन्द्र वहीं ठिठक खड़ा रहा, फिर साथ हो लिया।

आसपास के घरों में चुप्पी छायी हुई थी। उनकी ड्योढि़यों में इतना अँधेरा था कि आँखें फाड़-फाड़कर भी देखो तो भी कुछ नज़र नहीं आता था।

”मुझे भी आज फेरी पर नहीं निकलना चाहिए था,” उसने इन्द्र से कहा, ”आज भी कोई दिन है फेरी करने का? सारे शहर में सूखा पड़ा है। पर मैंने सोचा घर पर बैठकर क्या करूँगा, दो-चार आने की जुगाड़ हो जाये तो क्या बुरा है, दूकानदार घर पर बैठा रहे तो खायेगा कहाँ से?”  और इत्रफ़रोश हँस दिया।

पानी का नल नज़दीक आ रहा था। नल में पानी नहीं था और उसके नीचे पत्थर की सिल जो घिस-घिसकर गहरी हो गयी थी, सूखी पड़ी थी। और उसके आसपास दो-तीन बर्रे उड़ रहे थे। कुछ ही दिन पहले तक इन्द्र बर्रे पकड़ा करता था।

”इत्र के चार फाहे भी हमसे ले ले तो हमारी चवन्नी खरी हो जाती है।” इत्रवाले ने जैसे अपने-आपसे बात करते हुए कहा। वक़्त काटने के लिए वह बतियाना चाहता था या शायद शहर की सूनी गलियाँ लाँघने के बाद वह ख़ुद डरा हुआ था।

”हमें एक-एक गली का मालूम है कि वहाँ कौन इत्र ख़रीदता है। जिस मर्द की दो बीवियाँ हों, वह ज़रूर इत्र लेता है, वह वसमा भी लेगा और सुरमा भी लेगा। वह मर्द भी इत्र ख़रीदता है जो उम्र में बड़ा हो और जिसकी जवान बीवी हो। अच्छा, और बताऊँ!” वह बच्चे का मन बहलाने के लिए बोले जा रहा था।

इत्रफ़रोश की बातों के ही कारण इन्द्र सँभल गया था और पैर मज़बूती से चल रहे थे और कमानीदार चाकू की मूठ को ही उसने मज़बूती से पकड़ रखा था। उसके मन में एकाग्रता आने लगी थी, उसकी आँखें इत्रफ़रोश की कमर पर टिकने लगी थीं। वही एकाग्र दृष्टि जिससे अर्जुन ने पेड़ पर बैठे पक्षी की आँख को फोड़ा था। इत्रफ़रोश के बायें कन्धे से झूलता थैला बार-बार घड़ी के पेण्डुलम की तरह उसकी कमर के आगे हिल रहा था। उसका गाढ़े का कुरता बोतलों के थैले के नीचे कुछ-कुछ उभरा हुआ था।

नल पार करते ही इन्द्र की सारी चेतना जैसे उसके दायों हाथ में आ गयी। नल के आगे का फ़ासला एक-एक बालिश्त जैसे उसके मस्तिष्क में गिना जाने लगा था। बोतलों का थैला झूल रहा था, कमर बार-बार सामने आ रही थी और इत्रफ़रोश के पटपटाते जूते उसके साथ-साथ बज रहे थे।

”बाज़ार में फाहे ज़्यादा बिकते हैं, घरों में इत्र और तेल ज़्यादा बिकता है,” इत्रफ़रोश कह रहा था। सहसा इन्द्र लपका और उसने पैंतरा मारा। इत्रफ़रोश को लगा जैसे उसके बायें हाथ कोई चीज़ ज़ोर से हिली है। उसे भास हुआ जैसे कोई चीज़ चमकी भी है। पर वह खड़ा होकर घूमकर देखे कि क्या बात है, तब तक उसे थैले के नीचे तीखी चुभन का-सा भास हुआ। इन्द्र का निशाना ठीक बैठा था। वार करने के बाद सरदार के आदेशानुसार उसने चाकू को थोड़ा मोड़ दिया था और अँतडि़यों के जाल में फँसा भी दिया था।

इत्रफ़रोश अभी पूरी तरह से मुड़ नहीं पाया था कि उसने देखा, लड़का पीछे की ओर भागा जा रहा है। उसे फिर भी समझ में नहीं आया कि क्या हुआ है। उसकी इच्छा हुई कि लड़के को आवाज़ देकर बुला ले, लेकिन तभी उसे अपने पैरों पर बहता ख़ून नज़र आया और कमर में कुछ कराहता, कुछ डूबता-सा महसूस हुआ। मीठा-सा दर्द उठा, फिर तेज़ नश्तर-सा दर्द और वह डर के मारे बदहवास हो गया।

”ओ लोको, मार डाला! मुझे मार डाला! ओ लोको!…”

इत्रफ़रोश इतना घबरा गया था कि उसके मुँह से बोल नहीं फूट रहा था। वह कमर में लगे ज़ख़्म से इतना नहीं मर रहा था जितना त्रास आैर भय से और भोले बालक द्वारा किये गये हमले से। उसके लिए अपने थैलों का बोझ उठा पाना असम्भव हो रहा था और उनके बोझ के नीचे ही वह मुँह के बल धड़ाम से गिरा।

इन्द्र के भागते पाँव उसे दो क्षण पहले साफ़ नज़र आ रहे थे, पर अब गली में उस लड़के का नाम-निशान नहीं था।

”ओ लोको…!” वह फुसफुसाया।

एक शिथिल-सी चीख़ उसके होंठों से निकली और उसकी आँखें गली के ऊपर फैले गहरे नीले आसमान के छोटे-से टुकड़े पर लग गयीं। वहाँ दो-तीन चीलें उड़ रही थीं। चीलें अब दो की जगह चार हो गयी थीं और आकाश की नीलिमा धीरे-धीरे हिलने और धूमिक पड़ने लगी थी।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2018

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