चीनी क्रान्ति के महान नेता माओ त्से-तुङ के जन्मदिवस (26 दिसम्बर) के अवसर पर
कम्युनिस्ट जीवनशैली के बारे में माओ त्से-तुङ के कुछ उद्धरण

mao_1मानव जाति का इतिहास अनिवार्यता के राज्य से मुक्ति के राज्य तक निरन्तर विकास का इतिहास है। इतिहास की इस प्रक्रिया का कभी अन्त नहीं होता। एक ऐसे समाज में जहाँ वर्ग मौजूद हों, वर्ग-संघर्ष कभी ख़त्म नहीं होगा। और एक …वर्गहीन समाज में, नये और पुराने के बीच तथा सही और ग़लत के बीच संघर्ष कभी ख़त्म नहीं होगा। उत्पादन के संघर्ष और वैज्ञानिक प्रयोग के क्षेत्र में, मानव जाति लगातार प्रगति करती रहती है तथा प्रकृति का निरन्तर विकास होता रहता है; वे एक ही स्तर पर कभी नहीं ठहरते। इसलिए मनुष्य को लगातार अपने अनुभवों का निचोड़ निकालते रहना चाहिए, नयी-नयी खोजें और नये-नये आविष्कार करते रहना चाहिए तथा निरन्तर सृजन करते रहना चाहिए और आगे बढ़ते जाना चाहिए। ठहराव, नाउम्मीदी, बेहरकती और ख़ुशफहमी वाले जो भी विचार हैं, वे सब ग़लत हैं। वे सब इसलिए ग़लत हैं क्योंकि वे न तो पिछले लगभग दस लाख वर्षों के सामाजिक विकास के ऐतिहासिक तथ्यों से मेल खाते हैं और न ही प्रकृति के उन ऐतिहासिक तथ्यों से जिनकी जानकारी हमें प्राप्त हो चुकी है (जैसे प्रकृति का वह रूप जो खगोलीय पिण्डों, पृथ्वी, प्राणी-जीवन और अन्य नैसर्गिक घटनाओं के इतिहास से प्रकट होता है)।

”चीन लोक गणराज्य की तीसरी राष्ट्रीय जन-प्रतिनिधि सभा के प्रथम अधिवेशन में प्रधान मन्त्री चाउ एन-लाई द्वारा प्रस्तुत सरकारी काम की रिपोर्ट” में उद्धृत (21-22 दिसम्बर 1964)

सच्चे दिल से आत्मालोचना करना एक अन्य विशेषता है जो हमारी पार्टी तथा बाकी तमाम राजनीतिक पार्टियाँ के बीच फर्क कर देती है। जैसा कि हम कहते हैं, अगर किसी कमरे में नियमित रूप से झाड़न्न न लगाया गया तो उसमें धूल जमा हो जायेगी; अगर हम रोज़ाना अपना मुँह नहीं धोयेंगे, तो उस पर मैल जम जायेगी। हमारे साथियों के दिमाग़ पर और हमारी पार्टी के काम पर भी धूल जमा हो सकती है और उसे झाड़ू से साफ करने और धोने की ज़रूरत होती है। कहावत है – ”बहता पानी कभी नहीं सड़ता और किवाड़ के कब्जे को कभी दीमक नहीं लगती”। इसका मतलब यह है कि जो वस्तु लगातार गतिशील रहती है उसके अन्दर कीटाणुओं और दूसरे जीवों की घुसपैठ नहीं हो सकती। अपने काम की नियमित रूप से जाँच करते रहना तथा इस प्रक्रिया के दौरान एक जनवादी कार्यशैली का विकास करना, न आलोचना से डरना और न आत्मालोचना से, तथा इस प्रकार की लोकप्रिय चीनी सूक्तियों को लागू करना जैसे ”जो कुछ तुम जानते हो, वह सब बिना किसी संकोच के बता दो”, ”कहने वाले को दोषी न ठहराओ और उसकी बात को एक चेतावनी समझो”, तथा ”अगर तुम ग़लतियाँ कर चुके हो तो उन्हें सुधार लो और अगर तुमने ग़लतियाँ न की हों तो उनसे बचते रहो” यही एकमात्र कारगर तरीका है जिसके ज़रिये हम अपने साथियों के विचारों और अपने पार्टी-संगठन को सभी प्रकार की राजनीतिक धूल और कीटाणुओं से बचा सकते हैं।

”मिलीजुली सरकार के बारे में”
(24 अप्रैल 1945), संकलित रचनाएँ, ग्रन्थ 3

हम कम्युनिस्टों में यह क्षमता अवश्य होनी चाहिए कि हम सभी बातों में अपने को आम जनता के साथ एकरूप कर सकें। अगर हमारे पार्टी-सदस्य बन्द कमरे में बैठे रहकर सारी ज़िन्दगी गुज़ार दें और दुनिया का सामना करने व तूफान का मुकाबला करने के लिए कभी बाहर ही न निकलें, तो चीनी जनता को उससे क्या फायदा होगा? रत्तीभर भी नहीं, और इस तरह के पार्टी-सदस्य हमें नहीं चाहिए। हम कम्युनिस्टों को दुनिया का सामना करना चाहिए और तूफान का मुकाबला करना चाहिए; यह दुनिया जन-संघर्षों की विशाल दुनिया है तथा यह तूफान जन-संघर्षों का ज़बरदस्त तूफान है।

”संगठित हो जाओ!”
(29 नवम्बर 1943), संकलित रचनाएँ, ग्रन्थ 3

इस बात की गारण्टी करने के लिए कि हमारी पार्टी व हमारा देश अपना रंग न बदले, हमें न सिर्फ सही दिशा और सही नीतियाँ अपनानी चाहिए, बल्कि दसियों लाख ऐसे उत्तराधिकारियों को भी प्रशिक्षित करना चाहिए और उनका पालन-पोषण करना चाहिए जो सर्वहारा क्रान्ति के कार्य को आगे बढ़ाना जारी रखेंगे।

अन्ततोगत्वा, सर्वहारा वर्ग के क्रान्तिकारी कार्य के उत्तराधिकारियों को प्रशिक्षित करने का सवाल यह है कि क्या ऐसे लोग होंगे या नहीं जो सर्वहारा क्रान्तिकारियों की पुरानी पीढ़ी द्वारा शुरू किये गये मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी क्रान्तिकारी कार्य को आगे बढ़ाना जारी रखेंगे, क्या पार्टी व राज्य का नेतृत्व सर्वहारा क्रान्तिकारियों के हाथ में रहेगा या नहीं, क्या हमारी आने वाली पीढ़ियाँ मार्क्‍सवाद-लेनिनवाद द्वारा दिखाये गये सही रास्ते पर आगे बढ़ना जारी रखेंगी या नहीं, अथवा दूसरे शब्दों में कहा जाये तो क्या हम चीन में ख्रुश्चेव के संशोधनवाद के उदय की सफलतापूर्वक रोकथाम कर सके हैं या नहीं? संक्षेप में, यह एक बेहद महत्तवपूर्ण सवाल है, हमारी पार्टी व हमारे देश के लिए ज़िन्दगी-मौत का सवाल है। यह सवाल सर्वहारा क्रान्तिकारी कार्य के लिए सौ साल तक, हज़ार साल तक, यही नहीं दस हज़ार साल तक एक बुनियादी महत्तव का सवाल रहेगा। सोवियत संघ में जो परिवर्तन हुए हैं, उनके आधार पर साम्राज्यवादी फरिश्ते यह आस लगाये बैठे हैं कि चीनी पार्टी की तीसरी या चौथी पीढ़ी में ”शान्तिपूर्ण विकास” हो जायेगा। हमें साम्राज्यवादियों की इन भविष्यवाणियों को धूल में मिला देना चाहिए। अपने सर्वोच्च संगठनों से लेकर बिलकुल बुनियादी पाँतों तक, हमें हर जगह क्रान्तिकारी कार्य के उत्तराधिकारियों के प्रशिक्षण और पालन-पोषण की ओर लगातार ध्‍यान देना चाहिए।

सर्वहारा वर्ग के क्रान्तिकारी कार्य के योग्य उत्तराधिकारी बनने के लिए कौन-कौन सी शर्तें पूरी करनी होती हैं?

उन्हें सच्चे मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी होना चाहिए तथा ख़्रुश्चेव की तरह नहीं होना चाहिए जो मार्क्‍सवाद-लेनिनवाद का जामा पहनने वाला संशोधनवादी है।

उन्हें ऐसे क्रान्तिकारी होना चाहिए जो चीन और समूची दुनिया की जनता की भारी बहुसंख्या की तन-मन से सेवा करें, तथा ख़्रुश्चेव की तरह नहीं होना चाहिए जो अपने देश के विशेषाधिकार-प्राप्त तबके के मुट्ठीभर लोगों और विदेशी साम्राज्यवाद व प्रतिक्रियावाद के हितों की सेवा करता है।

उन्हें ऐसे सर्वहारा राजनीतिज्ञ होना चाहिए जो लोगों की भारी बहुसंख्या के साथ एकताबद्ध होने और काम करने की क्षमता रखते हों। उन्हें न सिर्फ ऐसे लोगों के साथ एकता कायम करनी चाहिए जो उनके विचारों से सहमत हों, बल्कि ऐसे लोगों के साथ भी एकता कायम करने में निपुण होना चाहिए जो उनके विचारों से सहमत न हों, यहाँ तक कि ऐसे लोगों के साथ भी एकता कायम करने में निुपण होना चाहिए जो पहले उनका विरोध कर चुके हों और अब ग़लत साबित हो चुके हों। लेकिन उन्हें ख़्रुश्चेव जैसे कैरियरवादियों और षडयन्त्रकारियों से ख़ासतौर पर सतर्क रहना चाहिए तथा इस प्रकार के बुरे तत्तवों को पार्टी व राज्य का नेतृत्व किसी भी स्तर पर नहीं हथियाने देना चाहिए।

उन्हें पार्टी की जनवादी केन्द्रीयता को लागू करने के लिहाज से आदर्श बन जाना चाहिए, ”जन-समुदाय से लेकर जन-समुदाय को ही लौटा देने” के उसूल के आधार पर नेतृत्व करने के तरीके में माहिर बन जाना चाहिए, तथा जनवादी कार्यशैली अपना लेनी चाहिए और दूसरों की बात अच्छी तरह सुननी चाहिए। उन्हें ख़्रुश्चेव की तरह नहीं होना चाहिए जो पार्टी की जनवादी केन्द्रीयता का उल्लंघन करता है, मनमाने ज़ुल्म ढाता है, साथियों पर आकस्मिक प्रहार करता है अथवा स्वेच्छाचारी और तानाशाही तरीके से काम करता है।

उन्हें नम्र और विवेकशील होना चाहिए तथा हेकड़ी और जल्दबाज़ी से बचना चाहिए; उन्हें आत्मालोचना की भावना से ओतप्रोत होना चाहिए तथा उनके अन्दर अपने काम की त्रुटियों और कमियों को सुधारने का साहस होना चाहिए। उन्हें ख़्रुश्चेव की तरह नहीं होना चाहिए जो अपनी तमाम ग़लतियों पर पर्दा डालता है तथा तमाम श्रेय ख़ुद लेकर तमाम दोष दूसरों के मत्थे मढ़ देता है।

सर्वहारा वर्ग के क्रान्तिकारी कार्य के उत्तराधिकारी, जन-संघर्षों के दौरान आगे आते हैं तथा क्रान्ति के महान तूफानों में तपते-मँजते हैं। यह ज़रूरी है कि जन-संघर्षों के लम्बे दौर में कार्यकर्ताओं को जाँचा-परखा जाये तथा उत्तराधिकारियों को चुना जाये और प्रशिक्षित किया जाये।

”ख़्रुश्चेव का नकली कम्युनिज्म और दुनिया के लिए उसके ऐतिहासिक सबक” में उद्धृत
(14 जुलाई 1964)

कोई नौजवान क्रान्तिकारी है अथवा नहीं, यह जानने की कसौटी क्या है? उसे कैसे पहचाना जाये? इसकी कसौटी केवल एक है, यानी यह देखना चाहिए कि वह व्यापक मज़दूर-किसान जनता के साथ एकरूप हो जाना चाहता है अथवा नहीं, तथा इस बात पर अमल करता है अथवा नहीं? क्रान्तिकारी वह है जो मज़दूरों व किसानों के साथ एकरूप हो जाना चाहता हो, और अपने अमल में मज़दूरों व किसानों के साथ एकरूप हो जाता हो, वरना वह क्रान्तिकारी नहीं है या प्रतिक्रान्तिकारी है। अगर कोई आज मज़दूर-किसानों के जन-समुदाय के साथ एकरूप हो जाता है, तो आज वह क्रान्तिकारी है; लेकिन अगर कल वह ऐसा नहीं करता या इसके उल्टे आम जनता का उत्पीड़न करने लगता है, तो वह क्रान्तिकारी नहीं रह जाता अथवा प्रतिक्रान्तिकारी बन जाता है।

”नौजवान आन्दोलन की दिशा”
(4 मई 1929), संकलित रचनाएँ, ग्रन्थ 2

बुद्धिजीवी लोग जब तक तन-मन से क्रान्तिकारी जन-संघर्षों में नहीं कूद पड़ते, अथवा आम जनता के हितों की सेवा करने और उसके साथ एकरूप हो जाने का पक्का इरादा नहीं कर लेते, तब तक उनमें अक्सर मनोगतवाद और व्यक्तिवाद की प्रवृत्तियाँ बनी रहती हैं, उनके विचार अव्यावहारिक होते हैं और उनकी कार्रवाइयों में दृढ़ निश्चय की कमी बनी रहती है। इसलिए हालाँकि चीन में क्रान्तिकारी बुद्धिजीवियों का जन-समुदाय एक हिरावल दस्ते की भूमिका अथवा एक सेतु की भूमिका अदा कर सकता है, फिर भी यह नहीं हो सकता कि उनमें से सभी लोग अन्त तक क्रान्तिकारी बने रहेंगे। कुछ लोग बड़ी नाज़ुक घड़ी में क्रान्तिकारी पाँतों को छोड़ जायेंगे और निष्क्रिय बन जायेंगे, यहाँ तक कि उनमें से कुछ लोग क्रान्ति के दुश्मन भी बन जायेंगे। बुद्धिजीवी लोग केवल दीर्घकालीन जन-संघर्षों के दौरान ही अपनी कमियों को दूर कर सकते हैं।

”चीनी क्रान्ति और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी” (दिसम्बर 1939),
संकलित रचनाएँ, ग्रन्थ 2

बिगुल, दिसम्‍बर 2009


 

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