अगर हम अब भी फासीवादी गुण्‍डई का मुकाबला करने सड़कों पर नहीं उतरे तो…
कोई नहीं बचेगा!

(नौजवान भारत सभा, दिशा छात्र संगठन और क्रान्तिकारी मज़दूर मोर्चा की ओर से जारी पर्चा)

पिछली 17 जुलाई को झारखण्ड में जंगल बचाने के सवाल पर आदिवासियों को सम्बोधित करने पहुँचे 78 वर्षीय स्वामी अग्निवेश पर भाजपा के संगठन भाजयुमो के लम्पटों ने हमला कर दिया। संघ और भाजपा के गुण्डों ने इस बुजुर्ग आर्यसमाजी सन्त को सड़क पर नीचे गिराकर घसीटा और गन्दी गालियाँ देते हुए लात-घूँसों से बुरी तरह पीटा।

यह घटना भाजपा और संघियों के चाल-चरित्र-चेहरे को उजागर कर देती है। इस घटना पर हम चुप नहीं रह सकते क्योंकि अब चुप रहना मुर्दा रहने के समान होगा। पहलू खान, अख़लाक़, जुनैद और उना व भीमा कोरेगांव के बाद अग्निवेश पर यह हमला यह दिखाता है कि सिर्फ मुसलमान या दलित नहीं बल्कि हिन्दुत्ववादी फ़ासीवाद के इस दौर में हर वह शख़्स ख़तरे में है जो मोदी सरकार और संघ परिवार के आगे नतमस्तक न हो। यहाँ तक कि अग्निवेश जैसे लोग भी नहीं जिन्होंने 2014 में मोदी के समर्थन में बयान दिया था। हालाँकि उसके बाद उनका मोदी सरकार से मोहभंग हो गया और वे जगह-जगह उसके विरुद्ध चलने वाले आन्दोलनों के समर्थन में जाते और बोलते रहे हैं। आर्य समाजी और समाजसुधारक स्वामी अग्निवेश पिछले चार दशकों से बाल श्रम, बँधुआ मजदूरी, अन्धविश्वासों और शराबखोरी के खिलाफ़ अभियान चलाते रहे हैं। कोई स्वामी अग्निवेश के धर्मनिरपेक्षता या हिन्दू धर्म के अन्य विचारों से असहमति रखता हो तो भी उसे  उन पर हमले का विरोध करना चाहिए! क्‍योंकि यह हमला केवल अग्निवेश पर नहीं है बल्कि यह संकेत है कि मोदी और संघ का विरोध करने वाले किसी भी व्‍यक्ति को छोड़ा नहीं जायेगा।  स्वामी अग्निवेश पर इसलिए बर्बर हमला किया गया क्योंकि उन्होंने मोदी सरकार की नीतियों की आलोचना की। दरअसल संघ परिवार और भाजपा उन बलात्कारी संतों या मौलवियों का समर्थन करते हैं जो इनकी फासीवादी राजनीति का समर्थन करते हैं। आसाराम और उसके जैसे बलात्कारियों के लिए सड़कों पर उतरकर ये संघी और भाजपाई प्रदर्शन करते हैं। परन्तु हिन्दू सन्त स्वामी अग्निवेश पर इसलिए हमला किया जाता है क्योंकि अग्निवेश का हिन्दू धर्म, हिन्दू जीवन शैली और हिन्दू दर्शन का विचार संघ परिवार की हिन्दुत्व विचारधारा से मेल नहीं खाता है। उनपर इसलिए हमला किया जाता है कि उन्होंने फासीवादी संगठनों द्वारा फैलायी जा रही साम्प्रदायिकता और पोंगापंथ का विरोध किया, उन्होंने केंद्र सरकार और विभिन्न प्रदेश सरकारों की जनविरोधी नीतियों की आलोचना की, शराबबन्दी न करने पर योगी आदित्यनाथ की आलोचना की।

78 वर्षीय आर्यसमाजी सन्‍त पर हमले ने इनके इस झूठ को उजागर कर दिया है कि भाजपा और संघ परिवार हिन्दू धर्म और हिन्दुओं के संरक्षक हैं। अगर संघ परिवार और भाजपा का हिन्दू धर्म से लेना देना होता तो ये संघी स्वामी अग्निवेश पर हमला क्यों करते? अगर इनका हिन्दू आबादी से लेना देना होता तो क्या इस देश के 84 प्रतिशत हिन्दुओं की ज़िन्दगी की हालत में सुधार नहीं होता? क्यों इस देश की बहुतायत हिन्दू आबादी बेरोज़गारी, गरीबी और बदहाली में जी रही है? इनका गौरक्षा से भी कोई लेना देना नहीं है! अगर इनका मकसद गाय की सेवा होता गाय के नाम पर सड़कों पर लोगों की हत्या करने के बाद बजरंग दल और भाजपा के लोग क्यों बीफ़ सप्लाई करने वाली अल दुआ कंपनी के मालिक संगीत सोम को पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुख्य नेता बनाते? वे क्यों देश के सबसे बड़े बूचडखानों से चंदा लेते? आप खुद गूगल पर ढूंढ़ें तो पायेंगे कि बीफ़ का व्यापार करने वाली कम्पनियों से सबसे अधिक भाजपा ने चन्दा लिया है। अगर इनका गौरक्षा से लेना देना होता क्यों भाजपा मणिपुर, गोआ और केरल में गाय का मांस खाने का समर्थन करती? इनका लव जिहाद से भी वास्तव कोई लेना-देना नहीं वर्ना भाजपा और संघ परिवार के अनेक नेताओं और उनके बेटे बेटियों की शादी मुसलमानों से क्यों होती। इनका एकमात्र मकसद ऐसे नारे उछालकर साम्प्रदायिक राजनीति का प्रचार कर लोगों को बाँटना है और अम्बानी, अडानी, रामदेव जैसे पूँजीपतियों की सम्पत्ति में दिन दूनी रात चौगुनी वृद्धि करनी है। इनका मकसद फासीवादी शासन को क़ायम करना है। संघियों का किसी भी धर्म से कोई लेना-देना नहीं है और न ही जनता से कुछ लेना-देना है! इनकी विचारधारा फासीवादी है जो लोगों को और धर्म को इस्तेमाल कर अपना उल्लू सीधा करती है।

पिछले 4 सालों में जो सवा दो करोड़ लोग बेरोजगार हुए हैं उनमें से कितने हिन्दू थे और कितने मुसलमान थे क्या इसका हिसाब किसी ने लगाया है? कितने सवर्ण थे और कितने दलित थे? क्या नौकरी से निकालते हुए किसी ने जाति‍धर्म पूछा था? नोटबन्दी में जिन 200 लोगों की मौत हुई उनमें से कितने हिन्दू थे और कितने मुसलमान थे? कितने सवर्ण थे और कितने दलित थे? क्या नोटबन्दी के कारण हुई मौतें जाति-धर्म पूछकर हुई थीं? जीएसटी लागू होने के बाद जितने उद्योग बर्बाद हुए और इसके कारण जितने लोग सड़कों पर चप्पल फटकारने को मजबूर हुए उनमें कितने हिन्दू थे? मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों के कारण जो देश में बर्बादी फैली है उसने हिन्दू मुसलमान के आधार पर फर्क नहीं किया है! पर जब वोट लेने की बारी आती है तो हमें हिन्दू मुसलमान में बाँट दिया जाता है। स्वामी अग्निवेश पर हमला कर संघियों ने अपने चाल-चरित्र-चेहरे को पूरी तरह नंगा कर दिया है। पर इनसे मौन बने रहकर मुकाबला नहीं किया जा सकता है। ये फासीवादी आतंकवादी संगठन व्हाट्सऐप द्वारा अफवाह फैलाकर केवल 8-10 की भीड़ में हमला करते हैं पर सोशल मीडिया के जरिये देश में इसे ऐसा प्रचार किया जा रहा है जैसे यह एक सामान्य घटना बन चुकी है। इस छोटी सी भीड़ द्वारा इन घटनाओं को इसीलिए अंजाम दिया जा रहा है क्योंकि लोग तमाशबीन बने रहकर भीड़ के हमले को खड़े देखते रहते हैं। परन्तु हम इस पराजयबोध को अस्वीकार करते हैं, हम इस बात को अस्वीकार करते हैं कि इस देश की पूरी जनता ही ऐसी है। हम इस देश की नौजवानी को, इस देश के मेहनतकश अवाम को और इस देश के इंसाफ़पसन्द नागरिकों को ललकारते हैं कि सड़क पर उतरकर इन फासीवादियों से मुकाबला करें क्योंकि अब हम नहीं उठे तो कोई भी नहीं बचेगा! 

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2018


 

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