आम लोगों को मौत और ग़रीबी में धकेलती चिकित्सा सेवाएँ

– अनुपम

इस बात से शायद ही कोई इन्कार करेगा कि आज के दौर में रोटी, कपड़ा और मकान के साथ ही साथ शिक्षा और स्वास्थ्य भी इन्सान की मूलभूत ज़रूरत हैं। केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री हर्षवर्धन ने हाल ही में यह दावा किया कि केन्द्र सरकार 2025 तक जीडीपी में स्वास्थ्य के हिस्से को 1.02 प्रतिशत से बढ़ाकर 2.5 प्रतिशत करने की मंशा रखती है। ग़ौरतलब है कि 2009 से भारत में जीडीपी का स्वास्थ्य पर प्रतिशत ख़र्च पिछले दस सालों से लगभग एक ही जैसा बना हुआ है। यह प्रतिशत ख़र्च भारत से काफ़ी छोटी अर्थव्यवस्था वाले देश श्रीलंका में पहले से ही भारत की अपेक्षा चार गुना है और इंडोनेशिया में दोगुना। इस वायदे से कुछ लोगों को आस जग सकती है। हम जानते हैं कि मोदी सरकार जब जीडीपी के आँकड़े फ़र्ज़ी ज़ाहिर कर सकती है तो स्वास्थ्य ख़र्च में बढ़त दिखाना भी उसके लिए बायें हाथ का खेल है। लेकिन आगामी 7 सालों में अगर वास्तव में स्वास्थ्य पर ख़र्च 2.5 प्रतिशत हो जाता है तो भी वह विश्व के औसत यानी 6 प्रतिशत से बहुत कम ही होगा।

हाल ही में जारी राष्ट्रीय स्वास्थ्य खाता (नेशनल हेल्थ अकाउण्ट) की एक रिपोर्ट में यह दिखाया गया है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं पर केन्द्र व राज्य सरकारें मिलकर जितना ख़र्च करती हैं वह मरीज़ों द्वारा किये गये कुल ख़र्च का मात्र 39 प्रतिशत होता है। यानी 61 फ़ीसदी ख़र्च लोगों को अपनी जेब से ही करना होता है। ऐसे में अगर 2025 तक स्वास्थ्य पर ख़र्च 2.5 प्रतिशत हो भी जाता है तो भी मरीज़ों पर पड़ने वाले बोझ से मुक्ति नहीं मिलने वाली।

ग़ौरतलब है कि पूरे एशिया में सबसे अधिक मलेरिया के मरीज़ भारत में ही हैं। टीबी की बीमारी के हारने का दावा कई सालों से टीवी पर विज्ञापन के ज़रिये किया जा रहा है, लेकिन अभी भी टीबी रोगियों की सबसे ज़्यादा संख्या भारत में ही रहती है। जापानी इंसेफ़लाइटिस और चमकी बुखार का प्रकोप भी हर साल देश के बच्चों पर कहर ढाता है। पिछले कुछ सालों में यह भी देखा गया है कि कैंसर जैसी गम्भीर बीमारी भी भारत में तेज़ी से अपने पैर पसार रही है। देश में कैंसर रोगियों की संख्या में हर साल 12 लाख से भी ज़्यादा की वृद्धि होती है। ऐसे में जनता की रोज़ी-रोटी और दवा-इलाज को ख़ुद ही बन्द करवाने में लगे इन हुक्मरानों का यह कहना कि स्वास्थ्य व्यवस्था में सुधार कर देंगे, यह एक जुमला ही है। कोई मूर्ख ही शायद इस पर विश्वास करेगा कि अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी की वजह से बच्चों को मार देने वाले लोग स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार कर देंगे।

मोदी सरकार के विकास के फ़ार्मूले का ककहरा निजीकरण से शुरू होता है। स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के लिए ईज़ाद की गयी आयुष्मान योजना भी ऐसी ही है। यह बीमा आधारित योजना है जिसे 6,400 करोड़ रुपये की निधि सरकार द्वारा दी गयी है। हर बीमा योजना की तरह यह योजना भी लोगों की गाढ़ी कमाई को बाज़ार के हवाले और निजी कम्पनियों के हवाले कर देने का औज़ार है। देश के विभिन्न हिस्सों में आयुष्मान कार्ड ग्राहकों के अनुभव बताते हैं कि यह कार्ड ज़्यादातर मामलों में किसी काम नहीं आता क्योंकि इस योजना के तहत जिन अस्पतालों को पैनल में शामिल किया गया है उनकी संख्या बहुत कम है और सरकारी अस्पतालों में बहुत लम्बी लाइन लगी रहती है।

निजीकरण के रास्ते स्वास्थ्य सेवाओं में बेहतरी के सब्ज़बाग़ दिखाने वाली मोदी सरकार के नुमाइन्दे हमें ये नहीं बताते कि हाल के दशकों में निजीकरण से ख़ासकर ग़रीबों और मेहनतकशों की पहुँच से स्वास्थ्य सुविधाओं क्यों लगातार दूर होती गयी हैं। आइए कुछ आँकड़े देखते हैं –
1) राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग द्वारा जुलाई-जून 2017-18 की अवधि में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार निजी अस्पतालों में इलाज कराने का औसत ख़र्च सरकारी अस्पताल में करवाने पर लगने वाले इलाज के ख़र्च का सात गुना है। 1.13 लाख परिवारों पर हुए इस सर्वेक्षण में जहाँ सरकारी अस्पतालों में इलाज करवाने पर औसत ख़र्च 4,452 पाया गया जबकि निजी अस्पतालों में इलाज का औसत ख़र्च 31,845 था।
2) आर्थिक सर्वेक्षण 2015-16 के तहत जनवरी से जून 2014 की अवधि में निजी अस्पतालों का औसत ख़र्च (शिशु जन्म सम्बन्धी ख़र्च के अतिरिक्‍त) सरकारी अस्पतालों की तुलना में चार गुना पाया गया।
3) देश में अधिकतर स्वास्थ्य सुविधाएँ पहले से ही आम जनता के बजट के बाहर हैं। प्रतिवर्ष पाँच करोड़ पचास लाख की आबादी स्वास्थ्य सम्बन्धी ख़र्चों के कारण ग़रीबों की जमात में शामिल हो जाती है।

ऐसे में बची-खुची सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली को भी निजी हाथों में सौंपकर सरकार जनता की आख़िरी बैसाखी भी छीन लेना चाहती है। हमें और आपको इसका पता न चले इसलिए सहारे के नाम पर झूठा दिलासा इस बात का दिया जाता है कि सरकार की नीयत में कोई खोट नहीं है तभी तो टीवी, रेडियो और अख़बार तक में यही दिखाया, सुनाया और लिखा जा रहा है कि भारत की दुनिया में साख बन रही है। हमारे प्रधान सेवक अमेरिका से भी यह घोषणा कर चुके हैं कि ‘भारत में सब चंगा सी’।

पर नंगी सच्चाई यह है कि पिछड़ी स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते पूरी दुनिया में भारत की भद्द पिट चुकी है। मानव पूँजी सूचकांक के मामले में भारत 195 देशों की सूची में 158वें पायदान पर है। एक अन्य वैश्विक मानक स्वास्थ्य सेवा और सुलभता एवं गुणवत्ता सूचकांक में भारत को 145वाँ स्थान मिला हुआ है जो कि बांग्लादेश से भी नीचे का है। चिकित्सा क्षेत्र की प्रसिद्ध पत्रिका ‘लैंसेट’ में छपी एक रिपोर्ट में तो पाकिस्तान सहित अपने सभी पड़ोसी देशों को पछाड़कर भारत सही देखभाल के अभाव में होने वाली मौतों के मामले से सबसे आगे निकल गया है। इस रिपोर्ट के अनुसार भारत में प्रति एक लाख में 122 लोग अस्पताल तक पहुँचने के बाद भी सही देखभाल के अभाव में मर जाते हैं। पाकिस्तान, चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और नेपाल में यह संख्या क्रमशः 119, 46, 57, 51 और 93 है। यही तो हक़ीक़त है इस विश्वगुरु देश की!

मोदी सरकार ने 2014 में सत्ता में आते ही ‘पोषण निगरानी बोर्ड’ को ही ख़त्म कर दिया। न रहेगा आँकड़ा, न होगा बवाल! अब चूँकि इस बोर्ड के आँकड़े उपलब्ध ही नहीं हैं, इसलिए हम स्वास्थ्य सेवाओं की हालत को समझने के लिए ‘इण्डिया स्टेट लेवल बर्डन इनीशिएटिव’ के तहत जुटाये गये बच्चों और माँओं के कुपोषण के बढ़ते बोझ के आँकड़े यहाँ दे रहे हैं।

इस इनीशिएटिव के तहत देश में 1990 से लेकर 2017 तक बच्चों और माँओं के पोषण से सम्बन्धित आँकड़े जुटाये गये और पाया गया कि देश की 54 प्रतिशत महिलाएँ ख़ून की कमी की शिकार हैं और 60 प्रतिशत बच्चे भयंकर कुपोषण की चपेट में हैं। हालत यह है कि वर्ष 2015-16 में पाया गया कि पाँच वर्ष से कम उम्र के 38.4 प्रतिशत बच्चे अपनी उम्र से अनुपात में छोटे थे और 35.4 प्रतिशत बच्चे कम वज़न के थे।

लोगों को स्वच्छता का पाठ पढ़ाने वाली मोदी सरकार अभी तक सभी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों में शौचालय की सुविधा नहीं उपलब्ध करा सकी है। अभी तक देश में 72,045 प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र ऐसे हैं जहाँ एक भी शौचालय नहीं है और 1,15,484 स्वास्थ्य केन्द्रों में महिलाओं और पुरुषों के लिए अलग-अलग शौचालय नहीं हैं।

ऐसे में स्वास्थ्य के अपने मूलभूत अधिकार के लिए लड़ने के अलावा और कोई रास्‍ता नहीं बचता है। क्योंकि नहीं लड़ने पर रहे-सहे अधिकार भी छीन लिये जायेंगे और बदहाल स्वास्थ्य सेवाओं के कारण भारत में लाखों-लाख बच्चों और महिलाओं की बलि इस मानवद्रोही व्यवस्था में यूँ ही चढ़ती रहेगी।

मज़दूर बिगुल, दिसम्बर 2019


 

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