किसान आन्दोलन के सन्दर्भ में मेरे गाँव के कुछ अनुभव

  • लालचन्द्र

अभी हाल ही में मेरा गाँव जाना हुआ (जो उत्तर प्रदेश के फै़ज़ाबाद ज़ि‍ले में है)। मुझे पहले थोड़ा आश्चर्य हुआ कि गाँव में या रास्ते में बस और टैक्सी में लोगों के बीच किसान आन्दोलन की कोई सुगबुगाहट या चर्चा तक नहीं सुनाई पड़ी। जबकि शहरों में “अन्नदाताओं के आन्दोलन” को लेकर मध्यम वर्ग में काफ़ी भावुकतापूर्ण उद्गार सुनने को मिल रहे थे। मेरे परिचितों में भी और सोशल मीडिया के ज़रिए भी।
गाँव में कुछ किसानों से बात की तो उनका कहना था कि यहाँ सब छोटे किसान हैं, हमको अपने कमाने-खाने के लाले पड़े हैं, हम कहाँ जाकर लड़ाई लड़ेंगे? जो लोग अपनी माँगों को लेकर लड़ रहे हैं वे सब बड़े किसान हैं। उनकी तो सरकार सुन नहीं रही है, हमारी कौन सुनेगा? वैसे भी एमएसपी मिले या न मिले, हम तो “लोकल आदमी” को ही बेचते हैं, ताकि जल्दी पैसा मिल जाये। सरकारी रेट तो यहाँ शायद ही किसी को मिलता है। आन्दोलन के नाम पर टिकैत की यूनियन व किसान सभा की ओर से केवल एक घण्टे टोल प्लाज़ा को जाम करने कार्यक्रम चला था बस।
यह पूछने पर कि आस-पास के किसानों के पास कितनी बड़ी जोतें हैं, पता चला कि ज़्यादातर के पास एक बीघा से 10 बीघे के आस-पास ज़मीनें हैं। एक या दो लोग ही हैं जिनके पास 40-45 बीघे हैं। ज़्यादातर घरों के नौजवान काम करने के लिए दिल्ली-मुम्बई या दूसरे शहरों में जा चुके हैं। गाँव में न तो काम मिलता है, न खेती की आमदनी से गुज़ारा होता है। उल्टे शहर से आने वाले पैसे न मिलें, तो न घर चले, न खेतीबाड़ी का काम हो पाये।
इस समय गन्ना किसान अपनी फसल को मिलों में बेचने के लिए लखीमपुर से आये ठेके के मज़दूरों की मदद ले रहे हैं। गाँव में पशुओं की तादाद तेज़ी से घटी है। बैल रखना पुराने दिनों की बात हो चुकी है। तब लोग पशुओं के चारे के लिए गन्ना किसानों के यहाँ जाकर गन्ने को छीलकर बाँधते थे और बदले में गन्ने की पत्ती चारे के लिए घर ले जाते थे। अब तो गाँवों के छोटे किसान, जिनके घर के युवा शहरों में जाकर उद्योग-धन्धों में खट रहे हैं, उन्हें भी ठेके पर धान की रोपाई, गन्ने व गेहूँ की बुवाई-कटाई करवानी पड़ रही है। 5-6 मज़दूरों का एक दल 4000 रुपये बीघा के हिसाब से गन्ना काटकर, छीलकर ट्राली में लोड करने का काम करता है। दिन भर में करीब एक बीघा का काम होता है। एक किसान ने कहा कि हम से भले तो यही हैं, जब चाहे, जहाँ जाकर काम कर लेते हैं और कमाई भी हमसे ज़्यादा ही है।

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2021


 

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