देश के सभी ‘अर्बन नक्सलों’ से एक ‘अर्बन नक्सल’ की कुछ बातें

– कात्यायनी

अब इस बात में संशय का कोई कारण नहीं है कि यह फ़ासिस्ट सत्ता उन सभी आवाज़ों का किसी भी क़ीमत पर गला घोंट देना चाहती है जो नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकारों के पक्ष में मुखर हैं। भीमा कोरेगाँव षड्यंत्र मुक़दमा उसी साज़िश की अबतक की सबसे ख़तरनाक कड़ी है।
फ़ादर स्टैन स्वामी की न्यायिक-सांस्थानिक हत्या के अगले ही दिन ‘वाशिंगटन पोस्ट’ की भारत संवाददाता निहा मसीह और जोआना स्लेटर की रिपोर्ट के हवाले से यह बात सामने आयी कि अमेरिका के मैसाचुसेट्स स्थित डिजिटल फ़ोरेंसिक फ़र्म ‘आर्सेनल कंसल्टिंग’ ने भीमा कोरेगाँव मामले में ही, माओवादी षड्यंत्र और प्रधानमंत्री की हत्या की साज़िश में जेल में बन्द आरोपियों में से दो – रोना विल्सन और सुरेन्द्र गडलिंग के डिजिटल रिकॉर्ड्स और ई-मेल की जाँच के बाद पाया है कि किसी हैकर के ज़रिए इन दोनों के कम्प्यूटर में आपत्तिजनक सामग्री डलवायी गयी थी।* आर्सेनल की यह तीसरी रिपोर्ट है। पिछली रिपोर्ट में ही यह बात बतायी गयी थी कि रोना विल्सन के लैपटॉप में हैकर्स ने तीस आपत्तिजनक फ़ाइलें डाल दी थीं। हैकर ने एक ही सर्वर का इस्तेमाल करते हुए ई-मेल के ज़रिए ‘नेटवायर’ नामक मैलवायर रोना और सुरेन्द्र के लैपटॉप में पहुँचाये। एडवोकेट सुरेन्द्र के कम्प्यूटर में यह मैलवायर दो साल पहले ही पहुँचा दिया गया था।
‘वाशिंगटन पोस्ट’ की इस रिपोर्ट पर एन.आई.ए. प्रवक्ता अदालती कार्रवाई का हवाला देकर चुप्पी साधे हुए हैं। यहाँ यह याद दिलाना ज़रूरी है कि गिरफ़्तारी से ठीक पहले फ़ादर स्टैन ने यही कहा था कि उनके कम्प्यूटर को हैक करके आपत्तिजनक सामग्री डाली गयी थी। ठीक ऐसी ही बात गौतम नवलखा और आनन्द तेलतुम्बडे ने भी कही थी। लेकिन गोदी मीडिया के सनसनीख़ेज़ “देशद्रोह-देशद्रोह” के क़ातिलाना शोर में इन बातों पर किसी का ध्यान नहीं गया। आर्सेनल की तीन रिपोर्टें आ चुकी हैं, पर भारतीय कुत्ती मीडिया में इनकी कोई चर्चा नहीं हुई।
‘वाशिंगटन पोस्ट’ की आज की ख़बर की भी कहीं कोई चर्चा नहीं है। आगे इन साक्ष्यों पर अदालत में क्या होगा, यह अभी बताया जा सकता है। न्यायमूर्तिगण यही कहेंगे कि एक विदेशी फ़र्म की रिपोर्ट को प्रामाणिक नहीं माना जा सकता, इसलिए भारत की किसी मान्यता-प्राप्त फ़ोरेंसिक एजेंसी द्वारा जाँच करायी जाये। और जिस देश में चुनाव आयोग, ई.डी., सी.बी.आई. – सभी सरकारी इशारों पर नाच रही हों, जहाँ एन.आई.ए. जैसी एजेंसी भाड़े के हत्यारों के गिरोह की तरह काम करती हो, जहाँ न्यायपालिका सीधे-सीधे फ़ासिस्ट सत्ता की ग़ुलाम बन चुकी हो और जजों के सामने भी बस दो ही विकल्प हों – लोया या गोगोई; उस देश में किसी भी सरकारी या निजी फ़ोरेंसिक फ़र्म से ईमानदार रिपोर्ट की उम्मीद कोई गावदी, जाहिल या अहमक ही करेगा। फ़ासिस्ट प्रचारतंत्र का प्रभाव इतना वर्चस्वकारी है कि प्रिण्ट मीडिया, डिजिटल मीडिया और विशेषकर फ़ेसबुक और व्हॉट्सऐप की सूचनाओं के आम उपभोक्ता यह जानते भी नहीं कि भीमा कोरेगाँव मामला है क्या और कितने हास्यास्पद और फ़र्ज़ी तरीक़े से देश के उन लोगों को इसमें फँसाया गया है जो वहाँ मौजूद होना तो दूर, कभी गये भी नहीं थे। किस तरह हिंसा भड़काने वाले दो हिन्दुत्ववादी फ़ासिस्ट गुण्डों को बेदाग़ छोड़कर ऐसे लोगों को पकड़ा गया जो नागरिक अधिकारों के लिए लम्बे समय से आवाज़ उठाते रहे थे। ‘न्यूज़क्लिक’ और ‘वायर’ जैसे कुछ वैकल्पिक पोर्टल्स पर आयी चन्द-एक रिपोर्टें कितने लोगों ने पढ़ी होंगी? और जिनके पास ऐसी रिपोर्ट पढ़कर शंका करने लायक़ विवेक है, उन्हें ही तो कुछ बोलते ही ‘अर्बन नक्सल’ जैसे विशेषणों के साथ समाज में अलग-थलग करने, सन्देह के घेरे में ला खड़ा करने और आतंक के साये में जीने के लिए सुनियोजित ढंग से विवश कर दिया जा रहा है।

हिटलर के फ़ासिस्ट झूठ-तंत्र से भी कई गुना ताक़तवर प्रचार तंत्र और सत्ता की तमाम संस्थाओं पर फ़ासिस्टों का क़ब्ज़ा

इस सत्ता के पास आतंक, दमन और यंत्रणा की अत्याधुनिक मशीनरी के साथ ही नयी डिजिटल तकनोलॉजी से लैस गोयबल्स के झूठ-तंत्र से कई-कई गुना अधिक शक्तिशाली और प्रभावी प्रचार-तंत्र है। और साथ ही यह एक ऐसी फ़ासिस्ट सत्ता है जो संसद, न्यायपालिका और तथाकथित निष्पक्ष जाँच-एजेंसियों के पूरे आबे-काबे के साथ अपने ख़ूनी मंसूबों को अंजाम दे रही है। चन्द जर्मन इज़ारेदार पूँजीपति घरानों के प्रति हिटलर की वफ़ादारी जितनी नंगी थी, अम्बानी-अदानी-टाटा आदि के प्रति मोदी की वफ़ादारी उससे कई गुना अधिक खुली अँधेरगर्दी भरी है। बुर्जुआ और सोशल डेमोक्रैट संसदीय विपक्ष अब रस्मी विरोध लायक़ भी नहीं बचा। ऐसे में मोदी सरकार सीधे-सीधे बुर्जुआ वर्ग की मैनेजिंग कमेटी के रूप में काम कर रही है। कोई पर्दा नहीं! कौड़ियों के मोल जल-जंगल-ज़मीन-खदानें और सार्वजनिक सम्पत्ति पूँजीपतियों को सौंपी जा रही है। इसके लिए सालाना करोड़ों लोगों को दर-बदर किया जा रहा है और बेरोज़गार बनाया जा रहा है। जनता की बचत को लूटने के लिए बैंकों के दरवाज़े खोल दिये गये हैं। एक के बाद एक काले क़ानून बनाये जाने का सिलसिला लगातार जारी है। फ़ासिस्टों के लिए एक राहत की बात यह भी है कि बिखरी हुई (और ज़्यादातर दिशाहीन) क्रान्तिकारी शक्तियों की ओर से फ़िलहाल उनके सामने कोई आसन्न चुनौती नहीं है और छोटे-मोटे, या इलाक़ाई चौहद्दियों में सिमटे प्रतिरोधों से वे ख़ून के दलदल में डुबो देने या जेल-फाँसी-क़ैदख़ाना-फ़र्ज़ी एनकाउण्टर आदि के सुसंगठित तंत्र के बूते बख़ूबी निपट ले रहे हैं। इस आतंक-राज के आगे आपातकाल के उन्नीस महीने तो कुछ भी नहीं हैं।
इस बात को बड़ी आसानी से समझा जा सकता है कि आतंक के ऐसे अँधेरे में जो चन्द लोग देश के अलग-अलग हिस्सों में वंचित-उत्पीड़ित लोगों की आवाज़ बन रहे हैं, सरकारी साज़िशों को, काले क़ानूनों के असली चरित्र को, पूँजीपतियों को हर तरीक़े से पहुँचाये जाने वाले फ़ायदों को बेनक़ाब कर रहे हैं, राजनीतिक बन्दियों के लिए लड़ रहे हैं, नागरिक और जनवादी अधिकारों की बात कर रहे हैं, न्याय तथा पुलिस-तंत्र पर सवाल उठा रहे हैं, कश्मीर के आम लोगों के ख़ूनी दमन, आदिवासियों के बीच निरन्तर जारी “उजाड़ो और मारो” मुहिम की सच्चाइयाँ सामने ला रहे हैं, दंगों, धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और सुनियोजित नरसंहारों की बात कर रहे हैं, रफ़ाएल, व्यापम आदि-आदि की बातें कर रहे हैं, वे सभी लोग फ़ासिस्ट सत्ता के निशाने पर हैं। जो आतंकित नहीं हो रहे हैं, झुक नहीं रहे हैं, उन्हें एक-एक करके ठिकाने लगाया जा रहा है, फ़र्ज़ी मुक़दमे थोपे जा रहे हैं, उन्हें काल-कोठरी में ठूँसा जा रहा है, और सरकारी या भाड़े के गुण्डों द्वारा उनकी हत्या की साज़िशों को अंजाम दिया जा रहा है।
जो भी आज नागरिक और जनवादी अधिकारों की बात करेगा, उजाड़े जा रहे आदिवासियों और ग़रीबों की बात करेगा, काले क़ानूनों का विरोध करेगा, साम्प्रदायिक उन्माद की राजनीति का विरोध करेगा, कैम्पसों पर कसते फ़ासिस्ट शिकंजे का विरोध करेगा, राजनीतिक बन्दियों के अधिकारों की बात करेगा, वह ‘अर्बन नक्सल’ है। ऐसे ही ‘अर्बन नक्सलों’ को निपटाने का एक सबसे बड़ा प्रोजेक्ट भीमा कोरेगाँव काण्ड का फ़र्ज़ी मुक़दमा है।
सौभाग्य से मैं भी एक ‘अर्बन नक्सल’ हूँ और इसी नाते अपने सभी ‘अर्बन नक्सल’ साथियों से ये बातें कर रही हूँ।

आतंक के सहारे चलने वाली हर फ़ासिस्ट और तानाशाह सत्ता ख़ुद डरी हुई होती है!

कल (5 जुलाई) फ़ादर स्टैन स्वामी की शहादत से फ़ासिस्टों की आँखों का एक काँटा निकल गया। वयोवृद्ध वरवर राव बड़ी मुश्किलों से जर्जर शरीर लिये जेल से ज़मानत पर बाहर आ सके। पर कब उन्हें कुछ नये आरोप लगाकर ये हत्यारे फिर भीतर कर दें, कुछ कहा नहीं जा सकता। शरीर से अस्सी प्रतिशत विकलांग जी.एन. साईंबाबा जेल के ‘अण्डा सेल’ में मौत की दहलीज़ पर खड़े हैं। गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, शोमा सेन, वेर्नन गोंज़ालेस, रोना विल्सन, अरुण फ़रेरा, सुरेन्द्र गाडलिंग आदि – इनमें से कुछ को छोड़कर सभी साठ या सत्तर की उम्र के पार हैं और अधिकांश किसी न किसी ‘टर्मिनल डिज़ीज़’ के मरीज़ हैं। संजीव भट्ट के केस को भी नहीं भूला जा सकता। जेल की विकट परिस्थितियाँ इन सभी के लिए एक धीमी मौत के समान हैं। और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर से लेकर छत्तीसगढ़ और उत्तर-पूर्व तक – पूरे देश में हज़ारों बेक़सूर लोग यू.ए.पी.ए. जैसी संगीन धाराओं में सीखचों के पीछे हैं। पिछले दो वर्षों के भीतर देशद्रोह और आतंकवाद जैसे संगीन आरोपों के जितने भी मुक़दमों के फ़ैसले आये, उनमें से 97 प्रतिशत से अधिक आरोपी बेक़सूर पाये गये। पचासों ऐसे मामले हैं जिनमें दस से बीस साल तक बिना ज़मानत या पेरोल के जेल में सड़ने के बाद कई युवा जब बूढ़े होकर बाहर निकले तो उनकी पूरी दुनिया उजड़ चुकी थी।
ज़ाहिर है कि हर फ़ासिस्ट और तानाशाह सत्ता मुख्यतः अपने आतंक के सहारे चलती है। वह डरती रहती है कि लोग कहीं उससे डरना न बन्द कर दें। वह डरती है कि लोग इस बात को जान न लें कि संगठित जन-शक्ति के सामने वह एक काग़ज़ी बाघ से अधिक कुछ भी नहीं। इसी भय से ग्रस्त भारत के हिन्दुत्ववादी फ़ासिस्ट मुखर आवाज़ों को निशाना बनाकर उन पर चोट कर रहे हैं। इसके ज़रिए वे जनता में एक सन्देश देना चाहते हैं।
लेकिन हर चुनौती सामना करने के लिए आती है। हर समस्या समाधान का टास्क बनकर हमारे सामने आती है। हर रात की सुबह होती है और रात के अँधेरे में भी इधर-उधर कुछ मशालें जलती ही रहती हैं।
आज जब मोदी-शाह की सरकार नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकार के लिए उठने वाली हर आवाज़ का गला घोंट देने के सुनियोजित प्रोजेक्ट पर काम कर रही है तो हमें भी ऐसी आवाज़ों को और बुलन्द और ताक़तवर बनाने के प्रोजेक्ट पर नये सिरे से, सुनियोजित ढंग से काम करना होगा।

व्यापक जन-समर्थन वाला ज़मीनी जनवादी अधिकार आन्दोलन खड़ा करना वक़्त की माँग है!

1970 के दशक में भारत में जनवादी अधिकार आन्दोलन ने जो गति पकड़ी थी, वह अगले दशक के अन्त तक ही सिमटने-बिखरने और संकुचित होने लगी थी। आज यह इतिहास का तक़ाज़ा है कि नयी ज़मीन पर नागरिक और जनवादी अधिकारों के आन्दोलन को फिर से खड़ा किया जाये और एक व्यापक जन-समर्थन वाले ज़मीनी आन्दोलन के रूप में खड़ा किया जाये। ऐसे बौद्धिकों की एक भारी संख्या मौजूद है। ज़रूरत उन्हें एक साझा लक्ष्य और साझा न्यूनतम कार्यक्रम पर एक साथ खड़ा करने की है। तमाम विचारधारात्मक और राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद बने रहेंगे अभी, बहसें चलती रहेंगी अभी (और वे ज़रूरी भी हैं), अलग-अलग राजनीतिक-सामाजिक प्रयोग होते रहेंगे, लेकिन जनवादी अधिकारों का सवाल एक ऐसा सवाल है जिस पर एक साझा लड़ाई लड़ी जा सकती है और ज़रूर लड़ी जानी चाहिए। इस मायने में कोई भी राजनीतिक-सांगठनिक संकीर्णता आत्मघाती होगी।
एक बार फिर स्पष्ट कर दूँ कि यह कोई सुगठित निबन्ध नहीं है, बल्कि उन सभी साथियों के साथ एक ज़रूरी विचार-विमर्श है जो आज आम लोगों की नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकारों पर, और उनके अधिकारों की आवाज़ उठाने वाले लोगों और संगठनों पर, आज़ादी के बाद के भारत में हो रहे सबसे बड़े हमले की गम्भीरता को महसूस कर रहे हैं, उसे लेकर चिन्तित हैं और संजीदगी से संगठित होकर आवाज़ उठाने की ज़रूरत महसूस करते हैं।
मेरा यह स्पष्ट मत है कि आज के समय में मोदी-शाह सरकार के अन्धाधुन्ध दमन की कार्रवाइयों के ख़िलाफ़ और तमाम काले क़ानूनों के ख़िलाफ़ संगठित होना एक फ़ौरी ज़रूरत है, और इसके लिए ज़रूरी है कि नागरिक और जनवादी अधिकारों के पक्ष में सक्रिय सभी आवाज़ों को एक साथ लाया जाये। संगठित प्रतिरोध ही अब बचाव का एकमात्र रास्ता है! अगर अब भी हम इस दिशा में कोई ठोस क़दम नहीं उठाते हैं तो यह इतिहास की नज़रों में एक अक्षम्य भूल होगी!
1970 के दशक में आपातकाल के बाद का समय भारत में जनवादी अधिकार आन्दोलन के संगठित होने का पहला महत्वपूर्ण दौर था और उसके पीछे आपातकाल के काले दिनों की महत्वपूर्ण भूमिका थी। लेकिन जल्दी ही इस आन्दोलन में बिखराव की भी शुरुआत हो गयी। सत्तर के दशक के अन्त में पी.यू.सी.एल. में हुई फूट और पी.यू.डी.आर. के गठन के पीछे जो राजनीतिक-वैचारिक आग्रह काम कर रहे थे; नज़रिए की जो भिन्नता काम कर रही थी, वह अगले दशक तक राजनीतिक संकीर्णता की शक्ल अख़्तियार कर चुकी थी। 1980 के दशक में पूरे देश में दर्जनों जनवादी अधिकार संगठन काम कर रहे थे, लेकिन वे किसी साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर एक साथ आने, या किसी फ़ेडरेशन या कॉन्फ़ेडरेशन जैसा ढाँचा बना पाने में असफल रहे। सच पूछें तो इस पर किसी का विशेष ज़ोर भी नहीं रहा। कई संगठन सिर्फ़ दमन-उत्पीड़न-विस्थापन की घटनाओं पर जाँच टीम बनाकर रिपोर्ट जारी करने, जनहित याचिकाएँ और बन्दी-प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ दाख़िल करने, ज्ञापन देने, प्रेस-विज्ञप्ति देने जैसी कार्रवाइयों तक सिमट कर रह गये। कुछ दूसरे थे जो केवल राजनीतिक बन्दियों की रिहाई, उनके उत्पीड़न और फ़र्ज़ी मुक़दमे हटाने जैसे सीमित मुद्दों पर ही काम करते रहे। इनमें से ज़्यादातर वे थे जो कमोबेश किसी मा-ले संगठन के फ़्रण्टल संगठन की तरह काम कर रहे थे। इससे कुल-मिलाकर, नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकार आन्दोलन के मूल लक्ष्य को क्षति ही पहुँची।
भारत जैसे देश में, (i) जहाँ संविधान आपको जो नागरिक और जनवादी अधिकार देता है, उनको छीन लेने के सभी उपाय और प्रावधान संविधान के भीतर ही मौजूद हों, (ii) जहाँ मुट्ठी भर पढ़े-लिखे लोगों को छोड़कर ‘जुडिशियल रेमेडी’ तक आम लोगों की पहुँच ही न हो और केवल ‘लीगल रेमेडी’ ही वे हासिल कर सकते हों, (iii) जहाँ तमाम छिटफुट सुधारों, पुलिस आयोगों की रपटों आदि के बावजूद क़ानून-व्यवस्था, आई.पी.सी.-सी आर.पी.सी आदि, पुलिस तंत्र और जेलों की व्यवस्था और नियमन औपनिवेशिक काल से, यूँ कहें कि उन्नीसवीं शताब्दी से ही, कमोबेश वैसी ही चली आ रही हो, (iv) जिस देश में अकेले आज़ादी के बाद, केन्द्र और राज्यों के स्तर पर बने काले क़ानूनों की संख्या दर्ज़न भर से भी अधिक हो, (v) जहाँ आम लोगों की ख़ुद अपने नागरिक और जनवादी अधिकारों के प्रति सजगता और जानकारी न के बराबर हो, (vi) जिस देश के उत्तर-औपनिवेशिक समाज के ताने-बाने में ही जनवादी मूल्यों और संस्कृति का अभाव हो जिसका क्रूरतम और वीभत्सतम रूप जाति-व्यवस्था, दलित-उत्पीड़न, जेण्डर-आधारित उत्पीड़न के रूप में रोज़ हमारे सामने आता हो, (vii) जिस देश में जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राष्ट्रों और राष्ट्रीयताओं के दमन का सात दशकों से भी लम्बा इतिहास हो और बहुसंख्यक आबादी को इस सच्चाई का पता ही न हो और इन इलाक़ों में सत्ता की सैन्य कार्रवाइयों को वह “अलगाववादी ताक़तों के ख़िलाफ़ सरकार की देशभक्तिपूर्ण कार्रवाई” के रूप में देखती रही हो, (viii) जो देश आज़ादी के बाद से ही बड़ी परियोजनाओं, खदानों, बाँधों आदि के निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर बलात् विस्थापन और पुनर्वास के झूठे वायदों का गवाह रहा हो, (ix) जिस देश ने तेलंगाना किसान संघर्ष के सैनिक दमन के बाद, 1960 और 1970 के दशक के बड़े पैमाने के पुलिसिया दमन, एनकाउण्टर्स, गिरफ़्तारियाँ और फिर आपातकाल के काले उन्नीस महीने देखे हों; उस देश के जनवादी चेतना सम्पन्न नागरिकों को पहले ही एक व्यापक जनाधार वाले जनवादी अधिकार आन्दोलन को संगठित करने के प्रोजेक्ट पर काम शुरू कर देना चाहिए था।
कहा जा सकता है कि तृणमूल स्तर से एक रेडिकल सामाजिक आन्दोलन खड़ा करने में और एक सांस्कृतिक आन्दोलन खड़ा करने में भारत की जनपक्षधर राजनीतिक शक्तियों और प्रगतिशील बौद्धिक समुदाय की जो विफलता रही है, वैसी ही विफलता जनवादी अधिकार आन्दोलन के सन्दर्भ में भी रही है!
इस चूक की सबसे बड़ी क़ीमत देश की जनता ने विशेष तौर पर 1990 के दशक से चुकानी शुरू की जब नव-उदारवाद के साथ-साथ हिन्दुत्ववादी कट्टरपन्थी फ़ासीवाद का प्रचण्ड उभार शुरू हुआ। सभी प्राकृतिक संसाधन कौड़ियों के मोल पूँजीपतियों को सौंपने के लिए, खदानें खोदने, कारख़ाने खड़े करने और बाँध बनाने के लिए, आदिवासियों को और सुदूर ग्रामीण इलाक़ों की ग़रीब ग्रामीण आबादी को लगभग उतने ही बर्बर तरीक़े से उजाड़ा गया जैसे यूरोपीय आक्रान्ताओं ने सत्रहवीं शताब्दी से लेकर अठारहवीं शताब्दी तक अमेरिकी महाद्वीप से मूल निवासियों को उजाड़ा था! नव-उदारवाद की इसी ज़मीन पर फ़ासिस्ट शक्तियों ने तेज़ी से पैर पसारे और आडवाणी की रथयात्रा, बाबरी मस्जिद ध्वंस, अटल की सरकार, गुजरात-2002 से होते हुए 2014 तक की यात्रा तय की। इस दौरान, कांग्रेस की बोनापार्टिस्ट क़िस्म की निरंकुश सत्ता भी दमन और काले क़ानूनों के मामले में फ़ासिस्टों से अधिक पीछे नहीं थी। चिदम्बरम के ‘ऑपरेशन ग्रीन हण्ट’ को और यू.पी.ए. काल के काले क़ानूनों को भला कोई कैसे भूल सकता है! इस बात को कैसे भूला जा सकता है कि जिस एन.आई.ए. और यू.ए.पी.ए. का मोदी-शाह बर्बर इस्तेमाल कर रहे हैं, वे यू.पी.ए. काल की ही देन हैं जब कांग्रेस के साथ कई क्षेत्रीय दल और संसदीय वाम दल भी सत्ता में भागीदार थे! नागरिकों के निजी जीवन पर साइबर निगरानी का तंत्र खड़ा करने के प्रोजेक्ट पर भी यू.पी.ए. शासनकाल में ही काम शुरू हो चुका था, जब आधार कार्ड की योजना बनी थी। हम यहाँ इस राजनीतिक विश्लेषण के विस्तार में नहीं जायेंगे, क्योंकि यह हमारा अभीष्ट नहीं है। गुज़रे तीन दशकों के नव-उदारवादी दौर, या देश की राजनीतिक परिस्थितियों के विश्लेषण पर हमारे ऐसे बौद्धिकों से कुछ मतभेद भी हो सकते हैं, जो प्रगतिशील हैं, फ़ासिस्ट दमन के विरोधी हैं, जनवादी अधिकार आन्दोलन के पुनर्निर्माण की ज़रूरत को शिद्दत के साथ महसूस करते हैं, लेकिन वे मार्क्सवादी नहीं हैं। यानी राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों और घटना-क्रम-विकास को लेकर बहस के जो मुद्दे हो सकते हैं, उन्हें हम यहाँ नहीं उठाना चाहते। उसके मंच कुछ और होंगे। यहाँ हम एक जनवादी अधिकार आन्दोलन के फ़्रेमवर्क के भीतर ही अपनी बात कहेंगे!
उपरोक्त पृष्ठभूमि की चर्चा हमने मात्र इस सन्दर्भ को स्पष्ट करने के लिए की है कि क्यों स्वातंत्र्योत्तर भारत में, कम से कम आपातकाल के अनुभव के बाद, एक व्यापक जनवादी अधिकार आन्दोलन को, वास्तव में आन्दोलन के रूप में, और विशेष तौर पर व्यापक जनता में व्यापक आधार वाले आन्दोलन के रूप में तृणमूल स्तर से संगठित किया जाना चाहिए था। अदालती-क़ानूनी स्तर पर लड़ने, शहरों के जागरूक नागरिकों में समर्थन-आधार बनाकर सत्ता पर दबाव बनाने और मीडिया के मोर्चे पर अपनी मुस्तैदी के साथ ही आम लोगों की शहरी-देहाती आबादी के बीच भी जनवादी अधिकार आन्दोलन का पैठना ज़रूरी था, और है! और यह काम तभी हो सकता है जब आम लोगों को उनके जनवादी अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने के लिए शिक्षा और प्रबोधन की व्यापक मुहिम चलायी जाये। दूसरे, यह भी ज़रूरी होगा कि जो सामाजिक संस्थाएँ-मूल्य-मान्यताएँ जाति और जेण्डर आधारित उत्पीड़न का कारक बनती हैं और दमनकारी राज्यसत्ता के लिए सामाजिक समर्थन-आधार का काम करती हैं; उनके विरुद्ध निरन्तर व्यापक अभियान चलाया जाये और दलित-उत्पीड़न तथा स्त्री-उत्पीड़न की आये दिन लगातार घट रही घटनाओं के विरुद्ध व्यापक जन-लामबन्दी की कोशिश की जाये। यह भी जनवादी अधिकार आन्दोलन का एक बुनियादी कार्यभार है! कह सकते हैं कि जनवादी अधिकार आन्दोलन और सामाजिक आन्दोलन के कार्यभार कई जगह ‘ओवरलैप’ करेंगे और कई बार ये दोनों हाथ में हाथ डाले साथ-साथ चलते हुए दिखाई देंगे। केवल तभी जाकर एक ऐसा व्यापक जनाधार वाला जनवादी और नागरिक अधिकार आन्दोलन खड़ा किया जा सकता है, जो उजाड़, विस्थापन, सैन्य-अर्द्ध-सैन्य बलों द्वारा दमन, अवैध गिरफ़्तारियों, राजनीतिक बन्दियों के उत्पीड़न, साम्प्रदायिक शक्तियों के ख़ूनी उत्पात, मॉब-लिंचिंग और काले क़ानूनों के ख़िलाफ़ मीडिया में बयान जारी करने, उच्च न्यायालय और मानवाधिकार आयोग के दरवाज़े खटखटाने, देश और दुनिया के गणमान्य बुद्धिजीवियों के बीच हस्ताक्षर अभियान चलाने और अन्तरराष्ट्रीय मंचों तक बात पहुँचाने तक ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि हज़ारों-हज़ार की संख्या में लोगों को सड़कों पर उतारने, जन-सत्याग्रह चलाने आदि में भी सक्षम होगा। और जब यह शक्ति हासिल कर ली जायेगी तो विरोध के जो तरीक़े आज प्रतीकात्मक प्रतीत होते हैं, उनकी शक्ति भी सौ गुना अधिक हो जायेगी। ज़ाहिर है कि यह एक दिन का काम नहीं है। यह एक लम्बा काम है जो निरन्तर सक्रियता की माँग करता है, कुछ समर्पित बुद्धिजीवी संगठनकर्ताओं की माँग करता है।
यह काम कोई संसदीय वामपन्थी दल नहीं कर सकता (सच यह है कि उन्होंने कभी अपनी चुनावी राजनीति से अलग, इस मोर्चे के बारे में गम्भीरता से सोचा ही नहीं), कोई एन.जी.ओ. भी नहीं कर सकता। कोई कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठन अगर संकीर्ण राजनीतिक रुझान का परिचय न दे और ऐसे किसी संगठन को मात्र बन्दी-मुक्ति या राजनीतिक बन्दी-उत्पीड़न तक ही सीमित न कर दे, या अपने ‘फ़्रण्टल ऑर्गेनाइज़ेशन’ जैसा न बना दे, तो भी इस काम को वह अपनी पहल पर हाथ में ले, यह आज के माहौल में उचित नहीं होगा, शायद इससे फ़ायदे के बजाय नुक़्सान ही हो जाये। यही नहीं, कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी संगठनों के सामने यह बात भी एकदम स्पष्ट होनी चाहिए कि अगर कोई संसदीय वाम या बुर्जुआ दल/व्यक्ति भी सत्ता के दमन-उत्पीड़न का शिकार होता है, या अगर किसी ऐसे आन्दोलन को भी सत्ता कुचलने की कोशिश करती है जिससे हम कदापि सहमत नहीं हैं (या जिसे वर्ग-चरित्र के हिसाब से हम जनता का आन्दोलन नहीं मानते), तो भी जनवादी और नागरिक अधिकार आन्दोलन ऐसे दमन-उत्पीड़न का जमकर विरोध करेगा। वाम विचारों के व्यापक दायरे के भीतर भी तीखे मतभेदों और वाद-विवाद के बहुत सारे मुद्दे हो सकते हैं (और हैं) लेकिन ऐसी बहसों के मंच अलग हैं। वहाँ ये ज़रूरी बहसें भरपूर ‘पैशन-इमोशन’ और कुशाग्र तर्कणा के साथ जारी रहनी चाहिए। लेकिन राजनीतिक सूझ-बूझ और दायित्वबोध का तक़ाज़ा यही है कि जनवादी अधिकार आन्दोलन के मंच पर ऐसी बहसें नहीं हो सकतीं और तमाम विचारधारात्मक और राजनीतिक मतभेदों के बावजूद, जनवादी अधिकार आन्दोलन के दायरे के भीतर साथ काम करने में कोई गुरेज़-परहेज़ नहीं होना चाहिए।

फ़ासिस्ट राज्यसत्ता के दमन-तंत्र के हमले के जवाब में साझा फ़ौरी कार्यभारों पर सोचना होगा!

ऊपर हमने नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकार आन्दोलन की एक दूरगामी दिशा, जनाधारित चरित्र और आम कार्यभारों की सामान्य चर्चा की है। इस दिशा में देशव्यापी विचार-मंथन के लिए बेहद ज़िम्मेदार, बौद्धिक दायरे में साख-रसूख़ वाले और जनवादी अधिकार के सवाल पर पहले से ही मुखर कुछ गणमान्य बुद्धिजीवियों की एक संयोजन/तालमेल कमेटी बनाकर संवाद और तैयारी की कार्रवाई शुरू की जा सकती है। यही तो हमारे समय की दुखद विडम्बना है कि जनवादी अधिकारों के सवाल पर और फ़ासिस्ट दमन एवं ख़ूनी उत्पातों के ख़िलाफ़ मुखर निर्भीक आवाज़ों की आज हमारे देश में कमी नहीं है। लेकिन चूँकि ये आवाज़ें बिखरी हुई हैं, और इनके पीछे किसी जनाधार या जनान्दोलन की ताक़त नहीं है, इसलिए फ़ासिस्ट सत्ता पर इनका यथोचित दबाव नहीं बन पाता।
अगर आज मुझे सुझाव देना हो तो मैं प्रशान्त भूषण, अरुन्धती रॉय, जगमोहन सिंह, आनन्द स्वरूप वर्मा, आनन्द पटवर्धन, राकेश शर्मा (फ़िल्मकार), राणा अय्यूब (‘गुजरात फ़ाइल्स’ की लेखिका), प्रतीक सिन्हा, प्रबीर पुरकायस्थ, नन्दिनी सुन्दर, हिमांशु कुमार, चमनलाल, पंकज बिष्ट, रूपरेखा वर्मा, रंगकर्मी अरविन्द गौड़, पत्रकारिता, थिएटर, सिनेमा और कला की दुनिया के कुछ अन्य चर्चित चेहरों आदि-आदि सहित कम से कम सौ नाम तो सुझा ही सकती हूँ! इसके अतिरिक्त जानकार लोग बंगला, मराठी, गुजराती, मलयाली, तमिल, तेलुगु, कश्मीर, उत्तर-पूर्व आदि क्षेत्रों के साहित्यिक-सांस्कृतिक-बौद्धिक जगत से अनेक नाम सुझा सकते हैं। इस मामले में मेरी जानकारी बहुत कम है। जनवादी अधिकार के मुद्दों पर सक्रिय देश के कम से कम सौ अग्रणी वकील तो होंगे ही, कुछ अवकाशप्राप्त जज भी हो सकते हैं और जिन जनवादी अधिकार कर्मियों को मोदी-शाह ने अभी भीमा-कोरेगाँव मामले में या अन्य किसी मामले में फँसाकर जेलों में ठूँस रखा है, उन्हें तो मैं इस पहल के लिए सम्पर्क किये जाने वालों की सूची में मानकर चल रही हूँ।
इतने व्यापक पैमाने पर अगर सम्पर्क किया जाये तो निश्चय ही पहल लेने लायक़ एक कोर-टीम खड़ी हो सकती है। निश्चय ही यह प्रक्रिया लम्बी होगी और अतीत के बिखराव के कारणों और संकीर्णता की प्रवृत्ति को लेकर पहले से ही सजग रहना होगा। मतभेद के मुद्दे आने पर इस प्रक्रिया को ही नहीं छोड़ दिया जाना चाहिए, बल्कि उन मुद्दों को छोड़कर आम सहमति का एक साझा न्यूनतम प्रोग्राम तैयार करने की कोशिश होनी चाहिए।
लेकिन यह पूरी प्रक्रिया तो लम्बी होगी, जबकि फ़ासिस्ट राज्यसत्ता के दमन-तंत्र ने जो हमला बोल दिया है, वह एक आसन्न चुनौती है। भीमा कोरेगाँव के फ़र्ज़ी मामले में जिन लोगों को फँसाया गया है वे सभी जाने-माने बुद्धिजीवी हैं जो बरसों से नागरिक आज़ादी और जनवादी अधिकारों के लिए आवाज़ उठाते रहे हैं। यही वे ‘अर्बन नक्सल’ हैं जो अब सीधे सरकार के निशाने पर हैं। अब इन्हीं ख्यात बुद्धिजीवियों को निशाने पर लिया गया है और देशद्रोह तथा प्रधानमंत्री पर हमले की साज़िश का आरोपी बनाया गया है, ताकि काले क़ानूनों के ख़िलाफ़ और पूरे देश में जारी बर्बर दमन-चक्र के ख़िलाफ़ बोलनेवाली सारी आवाज़ों को यह सन्देश दिया जा सके कि कालकोठरी और स्टैन स्वामी जैसी न्यायिक या सांस्थानिक हत्या से अगर बचना हो तो चुप्पी साध लो। स्टैन स्वामी अब हमारे बीच नहीं हैं। बड़ी मुश्किल से वरवर राव को छह महीने की मेडिकल बेल मिल सकी। तीन वर्ष बीत चुके हैं। पिछले साल अक्टूबर में एन.आई.ए. ने दस हज़ार पन्नों का अभियोग-पत्र दाख़िल किया है और मुक़दमे की सुनवाई तो अभी शुरू भी नहीं हुई है। जेल में बन्द दूसरे लोगों की ज़मानत की याचिकाएँ बार-बार ख़ारिज की जा चुकी हैं। इनमें से अधिकांश लोग साठ या सत्तर के पार उम्र वाले हैं और किसी न किसी ‘टर्मिनल डिज़ीज़’ के मरीज़ हैं। ज़ाहिर है, सरकार इन्हें लम्बे मुक़दमे के दौरान जेल में ही मार डालना चाहती है या उन्हें शारीरिक रूप से इतना जर्जर कर देना चाहती है कि वे फिर किसी तरह की सक्रियता लायक़ रह ही न जायें। शरीर से अस्सी प्रतिशत विकलांग जी.एन. साईंबाबा, यू.ए.पी.ए. के अन्तर्गत गिरफ़्तार के%A


 

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