एक बार फिर विकल्पहीनता की स्थिति से गुज़रती श्रीलंका की जनता

लता

गोटाबाया राजपक्षे को राष्ट्रपति पद से हटाने के बाद भी श्रीलंका की जनता सड़कों पर है। श्रीलंका की संसद ने रानिल विक्रमसिंघे को राष्ट्रपति चुना है लेकिन जनआन्दोलन अभी भी जारी है। लोगों का कहना है कि रानिल विक्रमसिंघे जनता द्वारा चुना गया प्रतिनिधि नहीं है इसलिए लंका की जनता उसे राष्ट्रपति की तरह नहीं स्वीकार करेगी। विक्रमसिंघे के चुने जाने से भी जनता को किसी भी तरह के परिवर्तन की कोई उम्मीद नहीं है। यह सही भी है क्योंकि रानिल विक्रमसिंघे उसी सम्भ्रान्त शासक परिवार का हिस्सा है जो देश के संसाधनों और मज़दूर-मेहनतकश जनता की मेहनत को लूटने वाली देशी-विदेशी पूँजी की ख़िदमत में आज़ादी के बाद से लगा हुआ है। पहले भी चार बार प्रधानमंत्री रह चुके व्यक्ति से जनता क्या उम्मीद कर सकती है। विक्रमसिंघे उसी दक्षिणपन्थी पार्टी से है जिसके नेतृत्व में ही देश में 1977 में नवउदारवादी नीतियों की शुरुआत हुई थी। आज स्थिति यह है कि इस पार्टी से बस रानिल ही एकमात्र सांसद के तौर पर संसद में पहुँचा है। इतनी अप्रिय पार्टी के किसी व्यक्ति को श्रीलंका की जनता शीर्ष पर मंज़ूर नहीं कर सकती है। लेकिन जनता के पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं है। सभी पार्टियों ने मज़दूर और मेहनतकश जनता का एक समान शोषण-उत्पीड़न किया है।
श्रीलंका की जनता के दु:खों का अभी कोई निकट भविष्य में अन्त होता दिखाई नहीं दे रहा है। ईंधन, खाद्य पादार्थ, दवाओं आदि की किल्लत बनी हुई है। देश की 70 प्रतिशत आबादी दिन में एक बार भोजन कर रही है। महँगाई दर 54 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। हर दिन कई-कई घण्टे बिजली नहीं रहती। बिजली की कमी से सड़कों पर रात में अँधेरा रहता है। पेट्रोल-डीज़ल नहीं मिल रहे हैं। बच्चे स्कूल नहीं जा रहे हैं। अस्पतालों में दवा-इलाज नहीं हो रहा। जनता त्राही-त्राही कर रही है और वहीं संकट की आहट मिलते ही देश के बड़े पूँजीपतियों ने अपने पैसे देश से निकाल लिये और कुछ स्वयं भी बाहर जा रहे हैं। जनता के सामने क्रान्तिकारी राजनीति की विकल्पहीनता है। यदि सही मायने में कोई क्रान्तिकारी विकल्प जनता के सामने होता तो वह सबसे पहले पूँजीपतियों की धन-सम्पदा छीनकर जनता की स्थिति में सुधार करने का प्रयास करता। लेकिन कोई भी पार्टी जनता से ऐसी बात करती नज़र नहीं आ रही है। जनता विमुक्ति पेरुमना पार्टी (जेवीपी) की ओर नौजवानों का झुकाव बढ़ रहा है। यह तथाकथित वाम पार्टी भी ऐसी कोई बात करती नज़र नहीं आ रही है। ऐसे काल में संशोधनवादी पार्टियों का भी चरित्र एकदम उजागर हो जाता है। झूठी गर्म-गर्म बातें करना और सत्ता में बैठकर पूँजी की सेवा यही इनका असली रंग होता है। किसी संसदमार्गी संशोधनवादी पार्टी के पास मज़दूर-मेहनतकश की परेशानियों का कोई समाधान हो ही नहीं सकता। ख़ैर जो भी हो श्रीलंका की जनता के पास अभी कोई भी क्रान्तिकारी विकल्प नहीं दिख रहा है। ज़्यादा से ज़्यादा यह सम्भव होगा कि कोरोना महामारी के कम होने की स्थिति में एक बार फिर पर्यटन पर ज़ोर बढ़ाया जायेगा। लेकिन राजनीतिक उथल-पुथल की स्थिति बरक़रार रहने पर यह भी सम्भव नहीं होगा। कुछ विदेशी मदद की बैसाखी और जनता के घोर शोषण के आधार पर अर्थव्यवस्था को कुछ सामान्य करने की कोशिश की जायेगी। लेकिन ऐसी बैसाखी लम्बी चलेगी नहीं। सत्ता वर्ग जनता के बीच धर्म, रंग आदि के आधार पर भेद-भाव का ज़हर फैलायेगा और देशी-वेदशी पूँजी की लूट जारी रखेगा। देशी पूँजीपति वर्ग, विदेशी व साम्राज्यवादी पूँजी के साथ मिलकर देश के मज़दूर और मेहनतकश वर्ग का शोषण-उत्पीड़न जारी रखेगा। इनका प्रतिनिधित्व करने वाली राजनीतिक पार्टियाँ इनका हित साधती रहेंगी और जनता को आपस में बाँटकर शोषण की चक्की जारी रखेगी।

श्रीलंका के संकट का इतिहास

श्रीलंका में उत्पन्न संकट की जड़ मुनाफ़े की गिरती दर से पैदा पूँजीवादी संकट ही है। मुनाफ़े की गिरती दर पूँजीवादी उत्पादन पद्धति का आम नियम है। मुनाफ़े की गिरती दर का यह संकट पैदा होने के साथ उत्पादक निवेश कम करते हैं और निवेश कम होने की सूरत में बेरोज़गारी बढ़ती है, ग़रीबी बढ़ती है, अल्पउपभोग होता है, बाज़ार में सुस्ती आ जाती है। श्रीलंका की स्थिति में भी हम इसी प्रक्रिया का दुहराव देखते हैं। नवउदारवादी नीतियों के लिए दक्षिण एशिया में सबसे पहले दरवाज़ा खोलने वाली पूँजीवादी अर्थव्यवस्था अपनी आन्तरिक गति से बेहद कमज़ोर थी। कुछ बेहद अल्पजीवी राहत के दौर के अलावा यह लगातार संकट के दौर से गुज़रती रही है। राहत के दौर जो भी रहे उसमें मज़दूर और मेहनतकश वर्गों की स्थिति में कोई सुधार नहीं आया। लेकिन आर्थिक संकट के दौर दक्षिणपन्थी राजनीति को हवा देते रहे और उसमें आम मेहनतकश मज़दूर आबादी निश्चित पिसती, क़त्ल होती रही। इतिहास गवाह है पूँजीवादी संकट ने आम तौर पर हर जगह तानाशाही, अन्धराष्ट्रवाद और फ़ासीवाद की राजनीति को जन्म दिया है इसे पाला-पोसा है। एशिया, अफ़्रीका और लातिन अमेरिका के देशों में नवउदारवादी नीतियों की शुरुआत के बाद तानाशाही, फ़ासीवादी, दक्षिणपन्थी व अन्धराष्ट्रवादी राजनीति को जम कर हवा दी गयी। श्रीलंका की राजनीति भी इसी प्रक्रिया का एक प्रातिनिधिक उदाहरण है। जैसा कि हमने पहले भी कहा दक्षिण एशिया में नवउदारवादी नीतियों के प्रयोग का प्रथम चरागाह श्रीलंका बना। चन्द एक वर्षों में ही नवउदारवादी नीतियों का हवाई महल काफ़ूर हो गया और बच गयी मन्दी, बेरोज़गारी, महँगाई, छँटनी और तालाबन्दी। इसके साथ ही श्रीलंका के राजनीतिक परिदृष्य में सिंहली अन्धराष्ट्रवाद और तमिल अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नफ़रत को हवा दी गयी। यह घोर प्रतिक्रियावादी राजनीति भी औपनिवेशिक काल से ही चली आ रही थी। इसे भी फूट डालो और राज करो की नीति के तहत हम देख सकते हैं जिसे आज़ादी के बाद श्रीलंका के शोषक वर्ग ने औपनिवेशिक धरोहर की तरह अपनाया। इस पर हम लेख में आगे चर्चा करेंगे। फ़िलहाल, संकट के मूल कारण पर लौटते हुए आज़ादी के बाद श्रीलंका में लम्बे समय तक दो पार्टियों संयुक्त राष्ट्रीय पार्टी (यूनाइटेड नेशनल पार्टी) और श्रीलंका स्वतंत्रता पार्टी (श्रीलंका फ़्रीडम पार्टी) का शासन रहा। यूएनपी बाग़ान मालिकों, सामन्तों के हितों की रक्षा करती थी और दूसरी ओर एसएलएफ़पी अपने शुरुआती दौर में समाजवादी व कल्याणकारी राज्य के आवरण तले पूँजीवाद की दूरदर्शी पार्टी की भूमिका में रही। नवउदारवादी नीतियों की शुरुआत के बाद दोनों की राजनीति में कोई ख़ास परिवर्तन नहीं रह गया। पार्टी चाहे कोई भी रही हो नेता-मंत्री उसी कुलीन शासक वर्ग के रहे जो आज़ादी के समय से ही सत्ता में क़ाबिज़ थे। इस वर्ग का देश के उद्योग और व्यापार पर भी ख़ासा नियंत्रण है। इनके बीच से आया कोई भी नेतृत्व श्रीलंका की जनता को उनके कष्टों से निजात नहीं दिला सकता।
1948 में आज़ादी हासिल करने के बाद सत्ता में संयुक्त राष्ट्रीय पार्टी आयी। अंग्रेज़ों ने संयुक्त राष्ट्रीय पार्टी को भविष्य के अपने हितों को देखते हुए सबसे उपयुक्त पाया और इसलिए आज़ादी के समय सत्ता इसे सौंपी। आज़ादी प्राप्त होने के बाद आम जनता की उम्मीदों के विपरीत सेनानायके के नेतृत्व वाली संयुक्त राष्ट्रीय पार्टी ने औपनिवेशिक काल की अर्थव्यवस्था ही जारी रखी। चाय, रबर और नारियल के बाग़ान व बाग़ान आधारित उद्योग पर निर्भर निर्यात अर्थव्यवस्था जारी रही। बाग़ानों के मज़दूरों का भयंकर शोषण जारी रहा और किसानों के बीच सुसंगत रूप से बुर्जुआ भूमि सुधार भी नहीं हुए। 1948 से 1956 तक स्टिफ़ेन सेनानायके और उसके बेटे ड्युडली सेनानायके सत्ता में इसी अर्थव्यवस्था के साथ बने रहे। श्रीलंका मुख्यत: बाग़ान व कृषि आधारित अर्थव्यवस्था थी जिसमें आधारभूत औद्योगिक विकास न के बराबर था। इसकी वजह से श्रीलंका की अन्य सभी ज़रूरतों की पूर्ति के लिए आयात पर निर्भरता बनती थी। इस निर्भरता को समाप्त करने के लिए देश में आधारभूत औद्योगिक विकास की आवश्यकता थी जिसे संयुक्त राष्ट्रीय पार्टी ने टाला था।
पूँजीवाद के ज़्यादा दूरदर्शी राजनीतिक प्रतिनिधि की तरह 1960 में सिरीमावो भण्डारनायके सत्ता में आयी और आयात-प्रतिस्थापन आधारित औद्योगिकीकरण की नीति अपनायी। यानी आयात पर निर्भरता को कम करने के लिए उद्योगों का विकास। भण्डारनायके गुटनिरपेक्ष आन्दोलन की संस्थापक सदस्य भी थीं। दोनों विश्वशक्तियों के साथ मोल-भाव की नीति इन्होंने अपनायी। अपने तथाकथित समाजवादी आवरण वाले पूँजीवादी विकास के लिए संशोधनवादी सोवियत रूस से मदद मिली। इस्पात, टायर व चीनी उद्योग स्थापित करने में रूस ने श्रीलंका की मदद की। आईएमएफ़ से भी इस दौरान क़र्ज़ लिये गये।
लेकिन भारत की तरह ही इस समाजवादी आवरण की ज़िन्दगी बेहद लम्बी नहीं रही। श्रीलंका की स्थिति कई मायनों में जटिल थी। स्वतंत्र पूँजीवादी विकास के लिए पर्याप्त मात्रा में पूँजी और तकनोलॉजी उसके पास थी नहीं। दोनों विश्व शक्तियों के बीच मोलभाव करने के बावजूद कच्चे माल तक के लिए भी श्रीलंका को आयात पर निर्भर रहना पड़ता था। 1965-66 में श्रीलंका भयंकर भुगतान सन्तुलन घाटे से गुज़र रहा था। यानी देश में आने वाले धन की तुलना में देश से बाहर जाने वाला धन अधिक था। ऐसी स्थिति में श्रीलंका को अन्तर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से क़र्ज़ लेने की नौबत आ गयी। आज़ादी के बाद लम्बे समय तक श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भण्डार का 90 फ़ीसदी हिस्सा केवल रबर, चाय, नारियल के निर्यात पर निर्भर था। इस निर्यात से होने वाली आय का 10 फ़ीसदी हिस्सा उत्पादन और आधारभूत संरचनाओं के विकास में लगाया जाता था। बाक़ी का 90 फ़ीसदी हिस्सा पूँजीवादी चुनावों, चुनावी वायदों को पूरा करने, घपले-घोटाले, और पूँजीवादी राज्य मशीनरी, नेताशाही-नौकरशाही आदि का ख़र्च उठाने की भेंट चढ़ जाता था। इस प्रकार आय का बड़ा हिस्सा अनुत्पादक क्षेत्रों में लगाया जाता रहा है जिसकी वजह से सरकारी ख़र्च हमेशा आय से ज़्यादा रहा है और बजट घाटे में रहा। इस घाटे को कम करने के लिए और उद्योगों के विकास पर अधिक बल देने के लिए पूँजीवादी घरानों, कॉरपोरेट घरानों पर प्रत्यक्ष कर लगाना चाहिए था। यह किसी भी सरकार ने नहीं किया। अब बजट घाटे को पाटने के लिए और 1973 में तेल झटके की वजह से बिगड़े हुए भुगतान सन्तुलन के संकट से निपटने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री जेआर जयवर्धने ने क़र्ज़ के लिए अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ़) की शरण ली।

नवउदारवादी नीतियों की शुरुआत

1977 में संयुक्त राष्ट्रीय पार्टी ने रोज़गार और समृद्धि के सपने दिखाते हुए जेआर जयवर्धने के नेतृत्व में आधिकारिक तौर पर नवउदारवादी नीतियों की शुरुआत की। देशी-विदेशी पूँजी के लिए सारे दरवाज़े खोल दिये गये। 10 वर्ष के लिए सभी पूँजी निवेश को टैक्स हॉलिडे (कर से छुट्टी) दिया गया। नियम क़ानूनों को निवेश के मद्देनज़र पूरा लचीला बनाया गया। देशी-विदेशी पूँजी निवेश और मुनाफ़े के लिए फ़्री ट्रेड ज़ोन (मुक्त व्यापार क्षेत्र) व इन्वेस्टमेण्ट प्रमोशन ज़ोन (निवेश प्रोत्साहन क्षेत्र) बनाये गये। लेकिन नवउदारवादी नीतियों को अपनाया ही पूँजी को संकट से उबारने के लिए गया था। ऐसी स्थिति में उन्हीं क्षेत्रों में निवेश की सम्भावना बन सकती थी जो तत्काल मुनाफ़ा कमा सकें व जिनका बाज़ार अभी बन रहा है। अपने परम्परागत चाय, रबर व नारियल बाग़ान के अलावा श्रीलंका ने इस दौरान कपड़ा उद्योग में देशी-विदेशी पूँजी निवेश देखा। पर्यटन के क्षेत्र में भी निवेश हुआ। अर्थव्यवस्था का असमान विकास कुछ राहत के दौर दे सकता है लेकिन यह लम्बे दौर में संकट को समाप्त या कम नहीं कर सकता। देश के आधारभूत औद्योगिक विकास, शोध, अर्थव्यवस्था के विविधिकरण की अनुपस्थिति में विदेशी निवेश के लिए श्रीलंका बेहद उर्वर ज़मीन नहीं साबित हुआ। जल्द ही निवेश श्रीलंका से बाहर जाने लगे या बड़ी पूँजी ने निवेश ही नहीं किया।
सिंहली-तमिल संकट ने निवेश की स्थिति को और भी कमज़ोर कर दिया। देश के बुर्जुआ वर्ग की नीतियों के कारण पहले से आधारभूत रूप से कमज़ोर अर्थव्यवस्था संकट के सामने टिक नहीं पायी। पूँजीवाद अपनी गति से संकट पैदा करता है। कोई भी पूँजीवादी अर्थव्यवस्था संकट से बच नहीं सकती। लेकिन आन्तरिक तौर पर कमज़ोर अर्थव्यवस्था संकट के सामने धराशाई हो जाती है। ऐसे में श्रीलंका जैसे देशों की विश्व पूँजीवादी आर्थिक तंत्र पर निर्भरता बढ़ जाती है। श्रीलंका के बुर्जुआ वर्ग ने भारत के बुर्जुआ वर्ग जैसी दूरदर्शिता नहीं दिखायी, जिसने नेहरू के नेतृत्व में “समाजवाद” का जुमला उछालकर आयात-प्रतिस्थापन, संरक्षणवाद और राज्यनीत पूँजीवादी विकास के ज़रिए उत्पादक शक्तियों के आधार को उद्योगों में विस्तारित किया। श्रीलंका में हमें ऐसा देखने को नहीं मिलता है। नवउदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद तो इसकी सम्भावना नगण्य रह गयी। आर्थिक संकट से निपटने के लिए जयवर्धने ने तीन बड़े क़र्ज़ आईएमएफ़ से लिये : पहला 1977-78, दूसरा 1979-82 और 1983-84। 1977 से 1983 आते आते नवउदारवादी नीतियों के विकास का गुब्बारा फूटने लगा। अर्थव्यवस्था में भुगतान संकट, बेरोज़गारी, महँगाई खुलकर सामने आने लगी। आर्थिक संकट से निपटने के लिए सिंहला-तमिल विवाद को ज़ोर की हवा दी गयी। 1983 में तमिल आबादी का ब्लैक जुलाई (काला जुलाई) नरसंहार हुआ और यहाँ से गृहयुद्ध की शुरुआत हुई जो 26 वर्षों तक चला। इस दौरान तमिल आबादी का भयंकर नरसंहार चला, मानवाधिकारों की धज्जियाँ उड़ायी गयीं, सेना को जघन्य अमानवीय अत्याचारों की पूरी छूट दी गयी थी। इस युद्ध में जनता का पैसा पानी की तरह बहाया गया। 1982 तक जिस सरकार के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 4.4 फ़ीसदी रक्षा बजट हुआ करता था वह 1996 आते-आते 21.6 फ़ीसदी हो गया। समझा जा सकता है कि यह युद्ध सिंहली और तमिल दोनों आबादी के मेहनतकश वर्गों के लिए ही घातक था। लेकिन निश्चित ही मौत, हिंसा, बलात्कार व विस्थापन के जिस दौर से तमिल आबादी गुज़री है उसकी तुलना हम नहीं कर सकते। लेकिन इतना कहा जा सकता है कि सत्ता द्वारा भड़कायी जाने वाली अन्धराष्ट्रवाद और रंग भेद की राजनीति हमेशा से मज़दूरों और आम मेहनतकश आबादी के हितों के ख़िलाफ़ होती है। इस राजनीति के झाँसे में आकर हम अपने अधिकारों से हाथ धो बैठते हैं।
बहरहाल, पहले से ही गतिरोध की शिकार अर्थव्यवस्था गृहयुद्ध के भारी बोझ को सँभाल सकने में अक्षम थी। राजकोषीय घाटा तेज़ी से बढ़ने लगा। ऐसी स्थिति में श्रीलंका की निर्भरता विदेशी ऋणों पर बढ़ती चली गयी। विदेशी ऋण अपनी शर्तों के साथ आते हैं। अर्थव्यवस्था को ज़्यादा से ज़्यादा पूँजी निवेश के लिए आसान बनाना, बाधाओं को समाप्त करना तथा श्रम के बेरोकटोक शोषण की शर्तों के साथ ही आते हैं। कमज़ोर अर्थव्यवस्था वाले श्रीलंका के सामने नवउदारवाद के दौर में ऋणों के भुगतान का कोई श्रोत नहीं रह गया और यह ज़्यादा से ज़्यादा ऋणों के बोझ तले दबती चली गयी। 43 हज़ार तमिल नागरिको के क़त्लेआम के बाद गृहयुद्ध समाप्त हुआ। जर्जर अर्थव्यवस्था को चलाने के लिए महिन्दा राजपक्षे की सरकार ने एकबार फिर आईएमएफ़ से 2.6 बिलियन डॉलर का क़र्ज़ लिया। विश्व पूँजीवादी आर्थिक व्यवस्था से नाभिनालबद्ध श्रीलंका की अर्थव्यवस्था में तेज़ी सट्टेबाज़ वैश्विक वित्तीय पूँजी की वजह से 2009 से 2012 के बीच आयी। लेकिन 2012 में एक बार फिर विश्व स्तर पर प्राथमिक मालों की क़ीमतों में गिरावट से श्रीलंका के विदेशी मुद्रा भण्डार में गिरावट आयी और अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। इस अल्पकालिक उछाल के बाद श्रीलंका के सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में गिरावट लगातार जारी है। 2016 में श्रीलंका ने 16वीं बार क़र्ज़ लिया। 2016 से 2019 तक तीन सालों की अवधि के लिए 150 करोड़ डॉलर का लोन आईएमएफ़ से लिया जा चुका है।
श्रीलंका आज़ादी के बाद 1960 के दशक तक औपनिवेशिक काल की अर्थव्यवस्था में कुछ छोटे-मोटे बदलाव के साथ मुख्यत: बाग़ान व खेती आधारित अर्थव्यवस्था ही बना रहा। देश के औद्योगीकरण व भूमि सुधारों की शुरुआत हुई। लेकिन इस औद्योगीकरण और भूमि सुधार की सीमा रही। “समाजवादी” आवरण वाले पूँजीवादी विकास व राष्ट्रीयकरण का दौर अल्पजीवी रहा, जिसकी चर्चा हम ऊपर कर चुके हैं। आधारभूत उद्योगों का कम विकास, अर्थव्यवस्था के विविधिकरण को नज़रन्दाज़ किया जाना तथा पूँजीपतियों को लूट की खुली छूट देना समय-समय पर श्रीलंका की अर्थव्यवस्था को संकट के कगार पर लाता रहा। साथ ही, भारी-भरकम नौकरशाही, चुनाव, संसद व चुनावी वायदे सभी मिलकर ऐसे संकट का निर्माण करते हैं जो आईएमएफ़ व विश्व बैंक से ऋण लेना अपरिहार्य बना देते हैं। राजपक्षे की सनक-भरी नीतियों या कोरोना काल के लॉकडाउन अपने आप में इस संकट का कारण नहीं हैं लेकिन इन्होंने आग में घी डालने का काम किया है। असमान पूँजीवादी विकास से गुज़र रहा देश अपनी कमज़ोर स्थिति की वजह से विश्व पूँजीवादी आर्थिक तंत्र से नाभिनालबद्ध हो गया है। इस प्रकार श्रीलंका का मौजूदा आर्थिक संकट देश के अनियमित पूँजीवादी विकास की कोख से पैदा हुआ है जिसे गोटाबाया राजपक्षे सरकार की आत्मघाती आर्थिक नीतियों, कोरोना महामारी और रूस यूक्रेन यद्ध ने विस्फोटक स्थिति में पहुँचा दिया है।
आज श्रीलंका की आम जनता के पास कोई विकल्प नहीं है। जनता के बीच, ख़ासकर नौजवानों के बीच विमुक्ति पेरुमना पार्टी की लोकप्रियता बढ़ रही है। लेकिन यह पार्टी भी अपने शुरुआती जुझारू दौर को छोड़ दें तो कई बार साझा सरकार का हिस्सा रही है और आज भी यह किसी आमूलगामी बदलाव की बात नहीं कर रही है। जनता के पास कोई भी क्रान्तिकारी विकल्प नहीं है जो पूँजीवादी सत्ता के विनाश और समाजवाद की स्थापना की राह दिखाये। मज़दूर और आम मेहनतकश जनता को पूँजीवादी शोषण से मुक्ति तो एक सर्वहारा क्रान्ति ही दे सकती है। लेकिन ऐसी किसी भी क्रान्ति के लिए क्रान्तिकारी पार्टी मौजूद होनी चाहिए। लेकिन अभी श्रीलंका में हमें ऐसी कोई उम्मीद नहीं दिख रही है। ऐसा लगता है कि अभी जनता को लम्बा इन्तज़ार करना होगा। लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि सर्वहारा वर्ग की हिरावल पार्टी की ग़ैर-मौजूदगी में श्रीलंका में क्रान्तिकारी स्थिति गुज़र रही है, जिसकी सज़ा वहाँ के सर्वहारा वर्ग और आम मेहनतकश जनता को आने वाले समय में किसी न किसी बुर्जुआ प्रतिक्रिया के रूप में चुकानी पड़ सकती है।

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2022


 

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