यूक्रेन-रूस युद्ध की विभीषिका में साम्राज्यवादी गिद्ध हथियार बेच कमा रहे बेशुमार मुनाफ़ा

सनी

यूक्रेन और रूस के बीच फ़रवरी 2022 से शुरू हुए युद्ध का एक साल पूरा होने वाला है। इस युद्ध के पीछे की राजनीति और इसके कारण हो रही तबाही पर हम लिखते रहे हैं। इस बार हम पाठकों को बताना चाहते हैं कि साम्राज्यवादी गिद्ध किस तरह इस युद्ध में अरबों डॉलर के हथियार बेचकर बेहिसाब मुनाफ़ा बटोर रहे हैं।  

अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी ने हाल ही में यूक्रेन को और टैंक भेजने की माँग मान ली है। अमेरिका के एब्राहम, जर्मनी के ल्योपर्ड, और ब्रिटेन के चैलेंजर टैंक यूक्रेन भेजे जाएंगे। इसके साथ ही अन्य देश भी जिनके पास जर्मन हथियारों का ज़खीरा है, वे यूक्रेन को हथियार निर्यात कर सकेंगे। अभी यूक्रेन इन टैंकों की कम संख्या आयात कर रहा है क्योंकि यूक्रेनी सेना को इनके इस्तेमाल में अभ्यस्त हो जाने में समय लगेगा। आने वाली गर्मियों में नाटो देशों द्वारा अधिक संख्या में टैंक भेजे जायेंगे। इस लम्बे युद्ध अभियान में रूस के ख़िलाफ़ यह नाटो का बड़ा कदम है जिसमें आगे फ़्रांस के भी शामिल होने की भी सम्भावना है।

यूक्रेन इन टैंकों की माँग युद्ध शुरू होने के समय से कर रहा था जिसे युद्ध के 11 महीनों बाद नाटो के देश अब पूरा कर रहे हैं। सैन्यकरण की लहर इस समय रूस और नाटो देशों में उफान पर है। पश्चिमी यूरोप के देशों में न सिर्फ यूक्रेन को हथियार बेचने की होड़ मची हुई बल्कि अपने हथियारों का ज़खीरा भी बड़ा किया जा रहा है। जर्मनी का बढ़ता सैन्यकरण इसीका उदाहरण है। पिछले साल ही रूस में भी अनिवार्य सैन्य सेवा के ज़रिए आरक्षित सेना की संख्या बढ़ायी गयी और लोगों द्वारा इसका विरोध करने पर व्यापक गिरफ़्तारियाँ की गयीं। पोलैण्ड ने भी अपनी आरक्षित सेना की संख्या को गुणात्मक तौर पर बढ़ाया है। फ़्रांस भी अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने की योजना बना रहा है।

साम्राज्यवादी शक्तियों की ज़ोर-आज़माइश का एक और अखाड़ा दक्षिणी चीन सागर बना हुआ है जिसके चलते जापान भी सैन्यकरण की ओर कदम उठा रहा है। जापानी सरकार के अनुसार जापान 2027 तक अपने रक्षा बजट को नाटो में शामिल होने के स्तर तक ले जायेगा। रूस-यूक्रेन युद्ध में नाटो प्रत्यक्ष तौर पर शामिल नहीं है और नाटो के सदस्य पश्चिमी देश दोग़लेपन का परिचय देते हुए शान्ति की दुहाई भी देते रहे हैं। एक तरफ़ ये देश शान्ति का पैग़ाम देते हैं और दूसरी तरफ हथियारों की सौदेबाज़ी में लगे हैं।

रूसी राष्ट्रपति पुतिन इस साम्राज्यवादी युद्ध को बार-बार विशेष सैन्य अभियान कहते हैं और रूस में युद्ध को “युद्ध” कहने वालों को जेल भेज दिया जाता है। लेकिन हाल ही में पुतिन को भी इसे युद्ध कहना पड़ा। दूसरी ओर जर्मनी के वित्त मंत्री ने भी स्वीकारा कि वास्तव में यूरोप के देश रूस के साथ युद्धरत हैं। हालाँकि जर्मनी ख़ुद इस युद्ध में भागीदारी से इंकार करता रहा है। लेकिन इन साम्राज्यवादी देशों के हितों के हिसाब से शासक वर्ग के प्रतिनिधियों के मुँह से सच्चाई बाहर आ ही जाती है। आर्थिक संकट के चलते तीखी होते साम्राज्यवादी अन्तरविरोधों की वजह से ही यह युद्ध शुरू हुआ है। यह युद्ध यूक्रेन की जनता पर भयानक कहर बनकर टूटा है और इस बर्बादी में साम्राज्यवादी शक्तियों की रक्षा क्षेत्र की कम्पनियों ने जमकर मुनाफ़ा कमाया है।

इस समय युद्ध की मोर्चा दक्षिण-पूर्वी यूक्रेन लगभग 815 किलोमीटर लम्बाई में फैला हुआ है जिसकी ज़द में लाखों सैनिक और नागरिक फँसे हैं। रोज़ ही यूक्रेन के शहरों पर और कुछ सीमावर्ती रूसी इलाकों में बमबारी होती है। इस युद्ध में यूक्रेन की उत्पादक शक्तियों की भयानक बर्बादी हुई है और साथ ही हज़ारों की संख्या में बेगुनाह नागरिक मारे गये हैं। वहीं हज़ारों रूसी सैनिक भी रूसी साम्राज्यवादियों के युद्ध-यज्ञ की भेंट चढ़ चुके हैं। 24 फरवरी 2022 से शुरू हुए इस युद्ध में अब तक 5000 से ज़्यादा रूसी सैनिक और 13,000 से ज़्यादा यूक्रेनी सैनिक मारे जा चुके हैं। यूक्रेन के 7000 से ज़्यादा नागरिकों की मौत हुई है जिसमें लगभग 500 बच्चे भी हैं। यूक्रेन में 67 लाख लोग अपने ही देश में शरणार्थी बन गये हैं। युद्ध की त्रासदी बयान करता एक शहर मरियुपोल है जिसकी आबादी चार लाख से घटकर एक लाख से भी कम हो गयी है। अधिकतर लोग शहर छोड़कर जा चुके हैं। इस शहर का 80 प्रतिशत चिकित्सा तंत्र नष्ट हो चुका है। अब तक हुए रूसी हमलों में यूक्रेन के 170 स्वास्थ्य केन्द्र तबाह हो चुके हैं। यूक्रेन में सितम्बर 2022 तक ही करीब डेढ़ लाख इमारतें और घर तबाह हो चुके हैं। यूक्रेन का ऊर्जा तंत्र भी युद्ध के कारण बुरी तरह प्रभावित हुआ है और एक बड़ी आबादी बिना बिजली के और बहुत सीमित संसाधनों में जीने को मजबूर है। 

इस भयानक बर्बादी के बीच रूस और पश्चिमी देशों के रक्षा उद्योग की कम्पनियों ने ज़बरदस्त मुनाफ़ा कमाया है। टैंक, से लेकर ड्रोन, मिसाइल, मशीनगन, विमान तथा अन्य हथियारों का बाज़ार कुलाँचे मारकर आगे बढ़ रहा है। लॉकहीड मार्टिन, रेथ्योन, बोइंग और नॉर्थरोप ग्रुम्मन जैसी अमेरिकी हथियार कम्पनियों ने पिछले साल ज़बरदस्त मुनाफ़ा कमाया है। नॉर्थरोप ग्रुम्मन के शेयर 40 प्रतिशत बढ़ गये हैं जबकि लॉकहीड मार्टिन के शेयरों की कीमत में 37 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है। ब्रिटेन की रक्षा क्षेत्र की कम्पनी बीएई सिस्टम्स के शेयर में नये साल की शुरुआत से अब तक 36 प्रतिशत का इज़ाफ़ा हुआ है। ल्योपार्ड टैंक बनाने वाली जर्मनी की राईनमेटल कम्पनी ने भी पिछले साल जमकर मुनाफ़ा कमाया है। रूस की रक्षा कम्पनियों ने भी इस तबाही में ज़बर्दस्त मुनाफ़ा पीटा है। कलाशिनोव रूस की छोटे हथियार बनाने वाली सबसे बड़ी कंपनी है जो कि मोटरसाइकिल और मशीनों के पार्ट्स भी बनाती है। पिछले साल इसका हथियारों का उत्पादन बीस साल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गया जिसमें चालीस प्रतिशत से ज़्यादा सैन्य और  छोटे हथियारों का उत्पादन हुआ। पिछले साल ही कम्पनी के इतिहास के सबसे बड़े सौदे भी हुए जिसमें कम्पनी ने 45 सरकारी हथियार समझौते और 24 सैन्य तकनीकी सहयोग के समझौते किये और साथ ही नये हथियार बनाने का लाइसेंस भी हासिल किया। 

युद्ध से भविष्य में होने वाले मुनाफ़े का पूर्वानुमान लगाते हुए नाटो देशों और रूस ने अपने रक्षा बजट बढ़ा दिये हैं और इन देशों की हथियार बनाने वाली कम्पनियों ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा दी है। हाल ही में अमेरिकी सीनेट ने एक विधेयक पास किया जिसके तहत 858 अरब डॉलर रक्षा क्षेत्र में खर्च किये जायेंगे जो पिछले वर्ष से अधिक है। ब्रिटेन सरकार ने बीएई सिस्टम्स को बम बनाने का ऑर्डर दिया है जबकि स्वीडन की कम्पनी साब को ब्रिटेन और स्वीडन से टैंक मारक हथियार बनाने का ऑर्डर मिला है। जर्मनी ने 8 अरब डॉलर में लॉकहीड मार्टिन को लड़ाकू विमान बनाने का आर्डर दिया है। 2022 में रूस का रक्षा बजट 5 ट्रिलियन रूबल से ज़्यादा हो चुका है जो कि प्रस्तावित राशि 3.47 ट्रिलियन रूबल से बहुत अधिक है। 2025 तक रूस करीब 34 ट्रिलियन रूबल हथियारों पर ख़र्च करने की योजना बना रहा है। 

एक तरफ युद्ध से कराहते शहर और मरती जनता है तो दूसरी तरफ़ हथियारों की सौदेबाज़ी करते हुक्मरान लाशों से पटे शहरों पर गिद्ध की तरह मँडरा रहे हैं। साम्राज्यवाद के दौर में विश्व पूँजीवादी व्यवस्था लोगों को यही दे सकती है।

लेनिन ने कहा था कि साम्राज्यवाद का अर्थ ही युद्ध होता है। पूरी विश्व पूँजीवादी व्यवस्था आर्थिक संकट के जिस भँवर में फँसी हुई है, यह युद्ध उसकी ही पैदावार है। आर्थिक संकट के चलते ही तीखे हो चुके साम्राज्यवादी अन्तरविरोध युद्ध को जन्म दे रहे हैं। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सैकड़ों युद्ध होते रहे हैं। आज भी सीरिया, यमन, अफ़ग़ानिस्तान, सूडान, इथियोपिया सहित दुनिया के कई क्षेत्रों में साम्राज्यवादियों द्वारा भड़काये गये युद्ध जारी हैं। पूँजीवाद के आर्थिक संकट से निजात पाने का विध्वंसकारी तरीका भी युद्ध ही है जो उत्पादक शक्तियों की बर्बादी करता है और मुनाफ़े को बढ़ाने के रास्ते खोलता है। रूस-यूक्रेन युद्ध में भी रणक्षेत्र में बिछी लाशों पर मौज उड़ाने वाले साम्राज्यवादी गिद्धों ने न सिर्फ़ हथियार बेचकर भारी मुनाफ़ा कमाया है बल्कि उनकी नज़र तबाह शहरों के पुनर्निर्माण के ज़रिए भविष्य में होने वाले पूँजी निवेशों पर भी टिकी हुई है।

 

 

मज़दूर बिगुल, फरवरी 2023


 

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