डेंगू — लोग बेहाल, “डॉक्टर” मालामाल और सरकार तमाशाई

डॉ. अमृतपाल

हर साल की तरह इस वर्ष भी डेंगू देश के बहुत से शहरों, कस्बों में फैला हुआ है और आम लोगों में डेंगू की दहशत फैली हुई है। किसी को कोई बुखार हुआ नहीं कि डेंगू का ख़ौफ़ उसके मन में बैठ गया और खौफ़ज़दा आदमी से डॉक्टर क्या नहीं करवा सकता, डेंगू इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। धड़ाधड़ लेबोरेट्री टेस्ट हो रहे हैं, लोगों के “सैल” कम आ रहे हैं और जो जाल में फँसा (100 में से 95 फँस ही जाते हैं), उसको लिटाया, ग्लूकोज़ लगाया और दो-चार हज़ार रुपये मरीज़ की जेब से “डॉक्टर” की जेब में “ट्रांसफर” हो जाते हैं। अमीरों, मध्यवर्गीय इलाकों में प्राइवेट अस्पताल, क्लीनिक और मज़दूर-गरीब इलाकों में झोला-छाप डॉक्टर, सब का “सीज़न” चल निकला है, सब ख़ुश हैं। सरकारें ऐलान पर ऐलान कर रही हैं, मगर आम आदमी परेशान है, बेहाल है। महँगाई ने पहले से जीना मुश्किल कर रखा है, ऊपर से बीमारी का खर्चा और काम से भी छुट्टी। आखिर ये “सैल” कम होने का माजरा क्या है, क्या हर बुखार डेंगू होता है, और ये ग्लूकोज़, ये कौन सी “संजीवनी बूटी” है जो हर बुखार का इलाज है? इन्हीं सवालों पर हम चर्चा करेंगे।

सैल कम” का मतलब क्या है और इसके लिए क्या करना होता है?

आम लोगों द्वारा “सैल” कही जाने वाली चीज़ असल में आदमी के ख़ून में मौजूद कई किस्म की कोशिकाओं में से एक है और डॉक्टरी भाषा में इसका नाम ‘प्लेटलेट’ है। जब कभी भी हमें कहीं चोट या कट लगता है तो ख़ून को बहने से रोकने के लिए सब से पहले यही ‘प्लेटलेट’ सक्रिय होते हैं और चोट के स्थान पर ख़ून का थक्का बनाकर ख़ून बहना रोक देते हैं। अगर इनकी संख्या कम हो जाये तो ख़ून का थक्का बनने में देर लगेगी या फिर थक्का बनेगा ही नहीं, इसलिए ख़ून बहने से आदमी का ब्लडप्रेशर कम हो जायेगा, बेहोशी आयेगी और कोई इलाज न मिलने की हालत में आदमी की मौत भी हो सकती है। आम लोगों में इनकी औसत संख्या डेढ़ से साढ़े चार लाख प्रति माइक्रोलिटर होती है। लेकिन ऐसा नहीं है कि प्लेटलेट डेढ़ लाख से नीचे होते ही आदमी की जान को ख़तरा हो जाता है। असल में, अगर प्लेटलेट सैलों में कोई अन्य विकार नहीं है तो इन सैलों की संख्या पचास हज़ार से ऊपर होने पर किसी किस्म की कोई गड़बड़ी नहीं होती और आदमी को कोई ख़तरा नहीं होता तथा न ही घबराने की ज़रूरत होती है। अगर ‘प्लेटलेट’ की संख्या पचास हज़ार से नीचे से है मगर 25,000 से ऊपर है तो आम तौर पर ऐसे लोग भी कुछ दिनों के बाद ठीक हो जाते हैं, ऐसे लोगों को सिर्फ निगरानी में रखने की ज़रूरत होती है। अगर, सैलों की संख्या इससे नीचे चली जाती है तो आदमी को तुरन्त अस्पताल ले जाना चाहिए और ऐसे लोगों को अक्सर बाहर से ‘प्लेटलेट’ लगाने पड़ते हैं।

मगर हमारे यहाँ क्या हो रहा है? जिन लोगों के ‘प्लेटलेट’ की संख्या 50,000 से ऊपर है, यहाँ तक कि 80,000-90,000 होती है, उनको “सैल कम” कहकर डरा दिया जाता है और इसके इलाज के लिए ग्लूकोज़ लगाना ज़रूरी बताया जाता है जो सरेआम धोखाधड़ी है, लूट है और डॉक्टरी विज्ञान के पूरी तरह से उलट है। जिस मरीज के भी प्लेटलेट कम होते हैं उसे डेंगू का नाम लेकर डरा दिया जाता है।

Dengue patients 1 Dengue patients 2

कब-कब कम होते हैं सैल”?

सैल यानि ‘प्लेटलेट’ न सिर्फ डेंगू में, मगर और भी बहुत से बुखारों में भी कम हो जाते हैं जिन में चिकनगुन्या बुखार, खसरा, चिकनपाक्स, टाईफाइड और कई किस्म के वाइरल बुखार शामिल हैं। यहाँ तक कि बहुत से मामलों में तो एक आम सर्दी-जुकाम भी “सैल” कम कर सकता है। बहुत सी दवाएँ भी ऐसी हैं जो ‘प्लेटलेट’ कम कर देती हैं। इसलिए सैल कम होने का मतलब डेंगू बिलकुल भी नहीं है, और तो और, सैल कम होने के बहुत कम मामलों में मरीज़ को डेंगू होता है। बुखार के हर मरीज़ का तो टेस्ट करवाना भी ज़रूरी नहीं होता, एक पढ़ा-लिखा डॉक्टर (बशर्ते कि वो अपनी पढ़ाई का इस्तेमाल करता हो और उसकी नजर मरीज़ पर हो, न कि मरीज़ की जेब पर) आसानी से पता लगा लेता है कि किस-किस मरीज़ को टेस्ट की ज़रूरत है, कब ज़रूरत है और कितनी बार टेस्ट करवाने की ज़रूरत है। असल में, डेंगू के सीज़न में टेस्ट करवाने के पीछे मेडिकल ज़रूरत कम, मरीज़ को डराने तथा पैसे बनाने की ज़रूरत ज्यादा होती है। और वैसे भी, डॉक्टरों का लैबोरेट्री से आधा-आधा हिस्सा बँधा होता है,  ऐसा ही एक मामला टाईफाइड के एक टेस्ट का भी है, जिसका नाम है “विडाल टेस्ट”। इसकी रिपोर्ट पॉज़िटिव बताकर ग्लूकोज़ और तरह-तरह के टीके लगाकर लोगों की अच्छी-खासी लूट होती है। असल में यह टेस्ट अक्सर किसी भी बुखार में पॉज़िटिव आ जाता है, और एक बार टाईफाइड होने पर लम्बे समय तक यहाँ तक कि एक साल तक भी पॉज़िटिव बना रहता है। इतना ही नहीं, भारत में बहुत से लोगों में यह टेस्ट ऐसे ही पॉज़िटिव आ जाता है। इस टेस्ट को विदेशों में तो किया ही नहीं जाता, और भारत में भी जब इसका इस्तेमाल होता है तो इस टेस्ट को कैसे देखना है, यह सिर्फ डॉक्टरी की पढ़ाई तथा ट्रेनिंग हासिल किये हुए डॉक्टर ही जानते हैं। इसलिए इस लूट तथा धोखाधड़ी से भी सावधान!

corporates n doctor nexus

डेंगू के लक्षण क्या हैं?

पहली बात तो यह कि अगस्त-नवम्बर के दौरान होने वाले सभी बुखार डेंगू नहीं होते, इन में से बहुत थोड़े ही डेंगू के मामले होते हैं। बाकी बुखार और कई किस्म के वायरल बुखार होते हैं और मज़दूर-ग़रीब इलाकों में टाईफाइड तथा मलेरिया भी बुखार का कारण हो सकते हैं। डेंगू बुखार एक किस्म के मच्छर के काटने से फैलता है जो दिन में काटता है और साफ रुके हुए पानी पर पलता है। इसके लक्षण होते हैं – सरदर्द और खास तौर पर आँखों के पीछे होने वाला सरदर्द, तेज़ बुखार, कई बार आँखें लाल होना, शरीर दर्द बहुत ज़्यादा होना खास तौर पर पीठ में जिसे “हड्डियाँ तोड़ने वाला” दर्द कहा जाता है। बुखार के सातवें दिन चमड़ी पर एक ख़ास किस्म के छोटे-छोटे लाल धब्बे पेट से बनना शुरू होते हैं और टाँगों, बाज़ुओं तथा चेहरे तक फैल जाते हैं। जहाँ भी डेंगू बुखार होने का अंदेशा होता है, उस मरीज़ का डेंगू का टेस्ट करवाना होता है ताकि यह तय हो सके कि मरीज़ को डेंगू है या नहीं। लेकिन यहाँ उल्टा होता है, डेंगू का टेस्ट करवाया नहीं जाता (जो महँगा भी है, लगभग 1000-1500 रुपये), सिर्फ प्लेटलेट का टेस्ट करवाकर डेंगू होने का ऐलान कर दिया जाता है। दूसरा, डेंगू बुखार का खतरा सैल कम होना नहीं है, बल्कि इसका ख़तरा इस में है कि डेंगू बुखार के कुछ मामले डेंगू हेमोरेजिक फीवर तथा डेंगू शॉक सिंड्रोम तक चले जाते हैं। ऐसे मरीज़ों में, चमड़ी के नीचे, आँत से या शरीर के किसी और हिस्से में ख़ून का रिसाव शुरू हो जाता है। ऐसे मरीज़ों को डॉक्टर अपनी क्लीनिक में ही “टारनीक्यूएट टेस्ट” से या फिर चमड़ी पर पड़े लाल धब्बों से भी कुछ हद तक पहचान सकता है। ज़्यादा गम्भीर मामलों में, ब्लडप्रेशर कम होना, नब्ज़ तेज चलना, फेफड़ों तथा पेट में पानी भरना, जिगर का बड़ा हो जाना, चमड़ी के नीचे ख़ून के रिसाव से बड़े-बड़े धब्बे बनना, आँत से ख़ून का बहना शामिल हैं। ऐसे मरीज़ों को ही ग्लूकोज़ की ज़रूरत होती है और साथ में आक्सीजन तथा दूसरी डॉक्टरी देखभाल की भी ज़रूरत होती है जो अच्छे-बड़े अस्पताल में ही सम्भव है। यह भी एक तथ्य है कि डेंगू हेमोरेजिक फीवर तथा डेंगू शॉक सिंड्रोम के मरीज़ों की पहचान, इलाज तथा निगरानी के लिए प्लेटलेट संख्या एकमात्र पैमाना नहीं है और न ही सबसे अच्छा पैमाना है। इसके अलावा और भी कई पैमाने हैं जो प्लेटलेट की संख्या के पैमाने से बेहतर माने जाते हैं।

ऐसे बुखारों का इलाज कैसे हो?

जिस मरीज़ में डेंगू के लक्षण नहीं है और हल्का या थोड़ा ज़्यादा सरदर्द, शरीर दर्द, बुखार तथा सर्दी-ज़ुकाम हो, या फिर डेंगू हेमोरेजिक फीवर तथा डेंगू शॉक सिंड्रोम के बिना डेंगू हो तो आम तौर पर सिर्फ क्रोसीन (पैरासिटामोल) की गोली से ही काम चल जाता है। साथ में कुछ दिनों का आराम, अच्छा भोजन तथा काफी मात्रा में पानी ख़ास तौर पर नींबू पानी काफी होता है। सैलों की संख्या 50,000 से ऊपर हो तो, इतने इलाज से मरीज़ ठीक हो जाता है। सैल कम होने पर सरदर्द तथा शरीरदर्द के लिए आम इस्तेमाल होने वाली दर्द की दवाएँ नहीं लेनी चाहिए क्योंकि ये नुक्सान कर सकती हैं।

ग्लूकोज़ कब लगाया जाता है?

डेंगू बुखार में ग्लूकोज कब लगाया जाता है, इसकी बात ऊपर आ ही चुकी है। झोला-छाप डॉक्टरों, कैमिस्टों तथा छोटी क्लीनिकों में ग्लूकोज़ लगाना दो तरह से ग़लत है। पहली बात तो यह कि ये लोग ग्लूकोज़ तब लगाते हैं जब मरीज़ को इसकी कोई ज़रूरत होती ही नहीं, और दूसरी बात यह कि, जब किसी मरीज़ को ग्लूकोज़ लगाने की ज़रूरत पड़ेगी तो ऐसी जगहों पर ऐसे गम्भीर मरीज़ों का इलाज सम्भव ही नहीं है क्योंकि तब मरीज़ को ग्लूकोज़ के अलावा और भी बहुत सारी डॉक्टरी देखभाल तथा निगरानी की ज़रूरत होती है जो ये लोग मरीज़ को दे ही नहीं सकते। इस तरह इन लोगों द्वारा डेंगू के नाम पर ग्लूकोज़ लगाना पूरी तरह लूट का कारोबार है। किसी भी बुखार, दस्त, पेचिश में भी बिना किसी मेडिकल ज़रूरत के ग्लूकोज़ लगाना आम बात है, यह भी लूट और धोखाधड़ी है। ग्लूकोज़ आम तौर पर सिर्फ तब लगाया जाता है जब आदमी का ब्लडप्रेशर इतना कम हो कि ओ.आर.एस. के घोल या फिर घर में बनाये जा सकने वाले नमक-चीनी के घोल से न बढ़ सकता हो, मरीज़ बेहोश हो, मरीज़ को बहुत ज्यादा उल्टियाँ आ रही हो जिसकी वजह से उसको मुँह से कुछ भी खाने-पीने में दिक्कत आ रही हो। और तो और, गली-मुहल्ले में बैठे कई “डॉक्टर” मरीज़ में “ताकत डालने” के लिए ही ग्लूकोज़ लगा देते हैं, जो कि सरासर ग़लत है। असल में ग्लूकोज़ के बारे में लोगों को जानकारी ही नहीं है कि यह है क्या? ग्लूकोज़ और कुछ नहीं, सिर्फ चीनी-नमक की खास मात्रा (कई बार तो सिर्फ चीनी ही) का पानी की ख़ास मात्रा में बनाया घोल है जो बोतल में पैक रहता है। इसके अलावा, ग्लूकोज़ की एक किस्म में नींबू में मिलने वाला पोटाशियम रहता है। बस यही है ग्लूकोज़ का रहस्य जिसको इधर-उधर बैठे झोला-छाप डॉक्टर शरीर में ताकत भरने वाली दवा बनाकर पेश करते हैं और मज़दूरों से मोटी रकम वसूलते हैं। ज़रूरत पड़ने पर, यह घोल वैसे ही पिया जा सकता है, और मुँह से पीने से इसका फ़ायदा भी ज़्यादा होता है।

सरकारें क्या कर रही हैं?

सही-सही कहा जाये तो सरकारें डेंगू की बीमारी और इसका ख़ौफ़ फैलने में तथा “डॉक्टरों” को “कमाई” करने में उनकी ख़ूब मदद कर रही हैं। सरकार का काम है कि वह लोगों को बीमारी के बारे में सही जानकारी दे और बीमारी होने से रोकने के इन्तज़ाम करे, सरकार इनमें से कोई भी काम नहीं करती। इसका मतलब है कि बीमारी फैलने तथा लोगों की बदहाली और लूट में सरकार पूरी तरह से शामिल है। जानकारी के नाम पर कुछ पर्चे इधर-उधर दो-चार जगह चिपका दिये जाते हैं जो एक तो वैसे ही छोटे-छोटे होते हैं और ऊपर से अक्षरों का आकार इतना छोटा होता है कि बहुत नजदीक से पता चलता है कि अरे, यह तो डेंगू के बारे में “सरकारी” जानकारी है!! मच्छर मारने के लिए फॉगिंग करना तो सरकारें भूल ही चुकी हैं, खासकर ग़रीबों और मज़दूरों के इलाके में। झोला-छाप डॉक्टरों और कैमिस्टों की (और “पढ़े-लिखे डॉक्टरों” की भी) मचाई लूट को स्वास्थ्य विभाग रोक ही कैसे सकता है क्योंकि इससे स्वास्थ्य विभाग के अफसरों और कर्मचारियों की कमाई भी बन्द हो जायेगी। बीमारी फैलने पर इससे निपटने के लिए अस्थायी क्लिनिक, डिस्पेंसरी और डेंगू तथा प्लेटलेट टेस्ट करने की सस्ती या नि:शुल्क सुविधा देने के लिए अस्थायी लैबोरेट्री बनायी जा सकती हैं, और साथ ही ऐसे समय में प्रभावित इलाकों में डॉक्टर तथा अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की ड्यूटी भी लगनी चाहिए। मगर यह सम्भव नहीं क्योंकि एक तो सरकार चाहती ही नहीं, और दूसरे उसके पास आम लोगों के लिए खज़ाने में पैसा ही नहीं होता, क्योंकि पैसा तो सारा पूँजीपतियों की तिजोरियों तथा नेताओं-अफसरों की जेबों में चला जाता है। दूसरा, बहुत से डॉक्टर भी नहीं चाहेंगे कि उनको ग़रीबों की बस्तियों में जाकर रातें बितानी पड़ें। मामला साफ है कि डेंगू की बीमारी तथा डेंगू का ख़ौफ़ लोगों में फैलता रहेगा जब तक आम मेहनतकश लोग खुद एकजुट होकर सरकार और स्वास्थ्य विभाग को होश में लाने के लिए “ग्‍लूकोज़” नहीं लगायेंगे। एक बात और, डेंगू तथा इस से जुड़ा हुआ पूरा मामला एक बार फिर यह दिखलाता है कि पूँजीवाद में इलाज का उद्देश्य मुनाफा कमाना है और चिकित्सा विज्ञान मुनाफ़ाख़ोरों की रखैल बन चुकी है। जो विज्ञान पूरी मानवता के लिए है, वह कुछ लोगों के लिए बना दिया गया है। यही है जो पूँजीवाद आज मानवता को दे सकता है, अपनी ढेर सारी बुराइयाँ, और जो अच्छी चीजें थी, उनको भी इस आदमखोर व्यवस्था ने उलट रूप में बदल दिया है। पूँजीवाद का ख़ात्मा आज चिकित्सा विज्ञान को बचाने का ही नहीं, पूरे विज्ञान को बचाने का सवाल भी बन चुका है।

 

मज़दूर बिगुलअक्‍टूबर  2013

 


 

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