बिगुल पुस्तिका – 16
फ़ासीवाद क्या है और इससे कैसे लड़ें?

अभिनव

2014 के लोकसभा चुनावों में फासीवादी शक्तियों की अभूतपूर्व जीत के बाद इस पुस्तिका के साथ एक पश्चलेख जोड़ा गया है। इसमें कुछ अहम छूटे हुए नुक्तों को जोड़ा गया है जो मोदी सरकार और फासीवाद के इस नये उभार के समकालीन सन्दर्भ में ज़रूरी महसूस हुए। उम्मीद करते हैं कि इससे हम अपनी समझदारी को और विस्तार के साथ व्याख्यायित कर पाये होंगे और साथ ही उसे विस्तार दे पाये होंगे। इस लेख को आप इस लिंक से पढ़ सकते हैं।

प्रकाशकीय (1-1-2010)

भारत के संसदीय चुनावों में धुर दक्षिणपन्थी शक्तियों की हार और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की राजनीतिक शाखा भारतीय जनता पार्टी के भीतर मची उठा-पटक से बहुत से लोगों को यह भ्रम हो सकता है कि भारत में फ़ासीवाद के उभार का ख़तरा अब कम हो चला है। लेकिन यह ख़ुशफ़हमी ख़तरनाक़ होगी।

सच तो यह है कि फ़ासीवाद के दो पूर्वाधारों में से पहला आज एक बार फिर अधिक उन्नत, अधिक सर्वग्रासी तथा अधिक संश्लिष्ट रूप में उपस्थित है। आवर्ती चक्रीय क्रम में आने वाला विश्व पूँजीवाद का संकट आज लगातार मौजूद रहने वाले ढाँचागत संकट में तब्दील हो चुका है। भूमण्डलीकरण के नये साम्राज्यवादी दौर में पूँजी अतिलाभ निचोड़ने की प्रक्रिया में मेहनतकश आबादी को कंगाली और बेरोज़गारी का शिकार बना रही है और इस प्रक्रिया में पुनः अपने पहले से ही मौजूद संकट को और अधिक गहरा बनाती जा रही है। ऐसी स्थिति में, परिस्थितियाँ अलग-अलग रूपों में पश्चिमी यूरोप से लेकर पूर्वी यूरोप के देशों तथा रूस और एशिया-अफ्रीका-लातिनी अमेरिका के बहुतेरे देशों में फ़ासीवादी ताक़तों को खाद-पानी दे रही हैं और बड़े पूँजीपति वर्ग पर भी यह दबाव डाल रही हैं कि वे फ़ासीवाद का इस्तेमाल करने के बारे में सोचें या फिर मुख्यधारा की पूँजीवादी पार्टियों को सीमित पैमाने पर फ़ासीवादी तौर-तरीके अपनाने के लिए तैयार करें।

फ़ासीवाद के उद्भव और विस्तार का दूसरा कारक तत्व – सर्वहारा वर्ग का क्रान्तिकारी आन्दोलन – हालाँकि आज लगभग अनुपस्थित और बिखराव का शिकार है, लेकिन भूमण्डलीकरण की नीतियाँ मेहनतकश वर्गों के विस्फोटों-उभारों की ज़मीन लगातार तैयार कर रही हैं, और यहाँ-वहाँ ऐसे विस्फोट शुरू भी हो चुके हैं। पूँजीपति वर्ग इसके प्रति लगातार सचेत है और ज़ंजीर से बँधे शिकारी कुत्ते की तरह वह फ़ासीवाद को मज़दूर वर्ग और व्यापक जनता के ख़ि‍लाफ़ तैनात रखना चाहता है।

इसीलिए, फ़ासीवाद के विरुद्ध लड़ाई में निश्चिन्तता का शिकार हो जाना और इसके विरुद्ध वैचारिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक प्रत्याक्रमण में ढिलाई बरतना आत्मघाती होगा।

प्रस्तुत पुस्तिका फ़ासीवाद के उभार के इतिहास के सामाजिक-आर्थिक- राजनीतिक कारणों के विश्लेषण के साथ ही जर्मनी और इटली में फ़ासीवाद के उभार और कार्यप्रणाली की चर्चा करती है तथा उनकी विशिष्टताओं के बारे में बताती है। यह भारत में फ़ासीवादी शक्तियों की जन्मकुण्डली का ब्योरा देते हुए यहाँ फ़ासीवाद की विशिष्टताओं के बारे में बताती है तथा इससे लड़ने की रणनीति और क्रान्तिकारी शक्तियों के कार्यभारों की भी चर्चा करती है।

यह निबन्ध मज़दूर अख़बार ‘नयी समाजवादी क्रान्ति का उद्घोषक बिगुल’ में जून 2009 से दिसम्बर 2009 के बीच छह किश्तों में प्रकाशित हुआ था। हमें विश्वास है कि यह पुस्तिका भारत में फ़ासीवाद की चुनौती को समझने और उससे लड़ने की तैयारी में काफ़ी मददगार साबित होगी।

दूसरे संशोधित संस्करण की भूमिका

यह पुस्तिका मूलतः 2009 में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की लगातार दूसरी चुनावी जीत के बाद एक लेख श्रृंखला के रूप में ‘नयी समाजवादी क्रान्ति का उद्घोषक बिगुल’ में छह किश्तों में प्रकाशित हुई थी। उस समय संशोधनवादियों और उदारपन्थी बुर्जुआ पार्टियों समेत बुद्धि‍जीवियों तक में यह उल्लासपूर्ण कोलाहल मच गया था कि संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन की लगातार दूसरी जीत फ़ासीवादी भाजपा और संघ परिवार और इस तरह फ़ासीवाद की निर्णायक हार है। हमने उस समय इस बात पर बल दिया था कि भाजपा की चुनावी हार को फ़ासीवाद की निर्णायक हार मानना एक प्राणान्तक भूल है। यह भूल यही प्रदर्शित कर रही है कि क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट दायरों और साथ ही संशोधनवादी वामपन्थी दायरों में फ़ासीवाद की समूची परिघटना और विशेष तौर पर इसकी भारतीय कि़स्म के बारे में समझदारी की गम्भीर कमी है। मई 2014 में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की ज़बरदस्त जीत के बाद यह बात स्पष्ट हो गयी है कि फ़ासीवाद उत्तरवर्ती पूँजीवादी समाज के सड़ते-गलते ढाँचे की स्थायी परिघटना है।
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध और बीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध के दौर में आने वाले पूँजीवादी संकट और 1970 के दशक के बाद आने वाले पूँजीवादी संकटों के चरित्र मे भी बुनियादी परिवर्तन आये हैं। अब पूँजीवादी अर्थव्यवस्था मन्दी और तेज़ी के बारी-बारी से आने वाले क्रमों की साक्षी नहीं बनती। अब मन्दी विश्व पूँजीवादी व्यवस्था की एक स्थायी चारित्रिक आभिलाक्षणिकता बन चुकी है। पूँजीवादी मन्दी के उपोत्पाद के रूप में पैदा होने वाले एक प्रतिक्रियावादी सामाजिक आन्दोलन के रूप में फ़ासीवादी आन्दोलन भी आज उत्तरवर्ती पूँजीवादी समाज की एक स्थायी परिघटना बन चुकी है। मन्दी और फ़ासीवाद, दोनों के ही प्रकट होने में जो आकस्मिकता का तत्व था वह आज समाप्त होने की ओर बढ़ रहा है। बजाय इन परिवर्तनों को समझने के, तमाम वामपन्थी बुद्धिजीवी या तो ‘डिनायल मोड’ में चले गये हैं और मौजूदा फ़ासीवादी उभार को देखने से ही इंकार कर रहे हैं, या फिर वे इसे कोई और नाम देने पर आमादा हैं। पहले कि़स्म के लोगों का यह दावा है कि भारत में जर्मनी या इटली जैसा “क्लासिकीय” फ़ासीवादी उभार सम्भव ही नहीं है क्योंकि भारत में जाति व्यवस्था की परिघटना इसके रास्ते में एक गम्भीर बाधा है; कुछ लोगों का यह भी कहना है कि भारत एक बहुराष्ट्रीय, बहुभाषी, बहुजातीय देश है और इसलिए यहाँ जर्मन या इतालवी कि़स्म का फ़ासीवादी उभार सम्भव नहीं है। पहली कि़स्म के ये लोग न तो यह समझते हैं कि जर्मनी और इटली में फ़ासीवादी उभार की आभिलाक्षणिकताओं में कई गुणात्मक अन्तर थे और न ही वे यह समझते हैं कि इन दोनों देशों में भी क्षेत्रीय, भाषाई, जातीय वैविध्य की कमी नहीं थी, हालाँकि वह भारत जितना नहीं था। ऐसे लोग यह भी नहीं समझ पाते हैं कि यह उम्मीद करना व्यर्थ है कि जर्मनी और इटली में घटित हुई फ़ासीवादी परिघटना दुहरायी जायेेगी। ऐसे लोग सादृश्य निरूपण करते हुए कहते हैं कि यहाँ यातना शिविर नहीं हैं, यहूदियों के समान मुसलमानों का उस प्रकार का जातीय सफाया नहीं किया जा रहा है, वगै़रह। इसलिए नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का उभार फ़ासीवादी उभार नहीं कहा जा सकता और यह नहीं कहा जा सकता कि भारत में फ़ासीवाद आ गया है। यह एक अनैतिहासिक दृष्टिकोण है जो यह नहीं समझता कि प्रगतिशील ताक़तों के ही समान प्रतिक्रियावादी ताक़तें भी इतिहास से सबक़ लेती हैं; क्रान्तिकारी विचारधारा व राजनीति के ही समान फ़ासीवादी विचारधारा और राजनीति भी ‘रिडेम्प्टिव एक्टिविटी’ करती है। इतिहास अपने आपको दुहराता नहीं है।
दूसरे कि़स्म के नववामपन्थी बुद्धिजीवी मौजूदा फ़ासीवादी उभार को फ़ासीवादी बोलने से घबराते हैं और कोई नयी कौड़ी ढूँढ़कर लाने के प्रयास में इसे ‘नवउदारवादी पूँजी की तानाशाही’ क़रार दे रहे हैं। यदि ऐसा है तो मनमोहन सिंह की सरकार के शासन को क्या कहा जायेेगा? क्या वह नवउदारवादी पूँजी की तानाशाही नहीं था? अगर था तो फिर मनमोहन सिंह की सरकार के दौर से अब के दौर में फ़र्क़ क्या है? ज़ाहिर है, इस प्रकार से नववामपन्थी सूत्रीकरण थोड़ा आगे बढ़ते ही असमाधेय अन्तरविरोधों के गड्ढे में जा गिरते हैं।
इन भ्रामक अवधारणओं और सूत्रीकरणों के मद्देनज़र यह और भी ज़रूरी हो गया है कि आज के फ़ासीवादी उभार को उसी ऐतिहासिकता और विशिष्टता में समझा जायेे और सूत्रबद्ध किया जाये। इक्कीसवीं सदी के उत्तरवर्ती पूँजीवाद के दौर में पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की कार्यपद्धति और चरित्र में आये महत्वपूर्ण परिवर्तनों को समझते हुए आज के दौर के फ़ासीवादी आन्दोलनों के चरित्र की मार्क्सवादी-लेनिनवादी पड़ताल करने की ज़रूरत आज पहले से कहीं ज़्यादा है।
ऐसे में, फ़ासीवादी उभार के प्रतिरोध और सर्वहारा क्रान्ति की रणनीतियों पर भी पुनर्विचार करने की आवश्यकता है। हम बीसवीं सदी के अनुभवों के आधार पर ही फ़ासीवाद-विरोधी मज़दूर आन्दोलन की रणनीतियाँ नहीं बना सकते। हमें नये का अनुसन्धान करना होगा और साथ ही निरन्तरता के तत्वों की भी सटीक पहचान करनी होगी।
इन्हीं चिन्ताओं को ध्यान में रखकर हमने जुलाई 2015 में इस पुस्तिका का एक पश्चलेख लिखा है और अब हम इस पुस्तिका को उस पश्चलेख के साथ प्रकाशित कर रहे हैं। साथ ही भारत में फ़ासीवादी उभार पर चली एक बहस हम परिशिष्ट में दे रहे हैं, जिसमें कि फ़ासीवादी उभार की एक उदार बुर्जुआ और निष्क्रिय उग्रपरिवर्तनवादी वाम व्याख्या की हमने एक आलोचना पेश की है। यह पश्चलेख व साथ ही परिशिष्ट में पेश लेख कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के समक्ष चर्चा व बहस के लिए एक प्रस्ताव है। लेकिन यह अपने आप में फ़ासीवाद के समूचे इतिहास, सिद्धान्त और व्यवहार और प्रतिरोध की रणनीति व आम रणकौशल पर अन्तिम शब्द पेश करने का दावा नहीं है। यह नुक्तों में पेश किये गये कुछ प्रेक्षण, आलोचनात्मक टिप्पणियाँ और कुछ प्रस्ताव हैं। हम उम्मीद करते हैं कि यह क्रान्तिकारी मज़दूर आन्दोलन व कम्युनिस्ट आन्दोलन में मौजूदा फ़ासीवादी उभार और उसके प्रतिरोध की रणनीतियों पर विचार-विमर्श, प्रयोग और अमल का एक प्रस्थान बिन्दु बनेगा।

– अभिनव
15 अप्रैल, 2016


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ये पुस्तक राहुल फाउण्डेशन, लखनऊ द्वारा प्रकाशित की गयी है। प्रिण्ट कापी ऑर्डर करने के लिए यहाँ क्लिक करें 


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जनवादियों और यहाँ तक कि क्रान्तिकारियों का एक हिस्सा इस बात को लेकर बेहद ख़ुश है कि भारतीय जनता पार्टी के रूप में साम्प्रदायिक फ़ासीवाद की पराजय हुई है और फ़ासीवादी ख़तरा टल गया है। चुनावों के ठीक पहले कई सर्वेक्षण इस बात की ओर इशारा कर रहे थे कि चुनावी नतीजे चौंकाने वाले हो सकते हैं और आडवाणी के नेतृत्व में राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्‍धन को भी विजय हासिल हो सकती है, या कम-से-कम उसे संयुक्त प्रगतिशील गठबन्‍धन के बराबर या उन्नीस-बीस के फर्क से थोड़ी ज्यादा या थोड़ी कम सीटें मिल सकती हैं। चुनाव के नतीजों ने इस बात को ग़लत साबित किया और कांग्रेस के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबन्‍धन को विजय प्राप्त हुई। चुनावी नतीजों के हिसाब से चला जाये तो भाजपा को भारी नुकसान उठाना पड़ा है और पराजय के बाद भाजपा में टूट-फूट, बिखराव और आन्तरिक कलह का एक दौर शुरू हो गया है। भाजपा के शीर्ष विचारकों में से एक सुधीन्द्र कुलकर्णी ने हार का ठीकरा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की रणनीति पर फोड़ते हुए काफी हंगामा खड़ा कर दिया। जसवन्त सिंह ने कहा है कि चुनाव में पराजय के कारणों पर भाजपा में खुली बहस होनी चाहिए। भाजपा नेताओं का एक बड़ा हिस्सा भाजपा अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह को काफी खरी-खोटी सुना रहा है और राजनाथ सिंह की स्थिति काफी दयनीय हो गयी है।

इस सारे घटनाक्रम को देखकर निश्चित तौर पर सन्तोष और ख़ुशी का अनुभव होता है। लेकिन क्या इन चुनावी नतीजों और उसके बाद भाजपा में मची उठा-पटक को देखकर यह कहना उचित है कि फ़ासीवाद भारत में उतार पर है? क्या यह नतीजा निकालना सही है कि भाजपा की पराजय भारत में फ़ासीवाद की पराजय है? इस प्रश्न का जवाब देने के लिए हमें यह समझना होगा कि फ़ासीवाद आख़िर है क्या? इसका इतिहास क्या है? यह कैसे पैदा हुआ? विभिन्न देशों में इसने क्या-क्या रूप ग्रहण किये? इन प्रश्नों के जवाब देने के बाद ही हम यह तय करने की स्थिति में होंगे कि भारत में फ़ासीवाद की ”नियति” क्या है।

इससे पहले कि हम फ़ासीवाद के इतिहास और उसके अर्थ पर जायें, कुछ और मुद्दों पर एक शुरुआती चर्चा करना ज़रूरी है। इस चर्चा के बाद हम फ़ासीवाद के विभिन्न पहलुओं को समझने के लिए एक बेहतर स्थिति में होंगे। यह चर्चा पूँजीवाद की प्रकृति, उसके स्वाभाविक संकट और उसकी सम्भावित परिणतियों पर है।

पूँजीवाद की स्वाभाविक परिणतियाँ पूँजीवादी-व्यवस्था किस प्रकार अपनी स्वाभाविक गति से संकट की ओर जाती है

हम एक पूँजीवादी व्यवस्था और समाज में जी रहे हैं। इसकी चारित्रिक विशेषताएँ क्या हैं? यह निजी मालिकाने पर आधारित एक व्यवस्था है जिसके केन्द्र में निजी मालिक का मुनाफ़ा है। निजी मालिकों का पूरा वर्ग आपस में प्रतिस्पर्द्धा करता है और इस प्रतिस्पर्द्धा का मैदान होता है पूँजीवादी बाज़ार। समाज के विभिन्न वर्गों की आवश्यकताओं का कोई विस्तृत मूल्यांकन और अनुमान नहीं लगाया जाता है। बाज़ार में माँग के परिमाण के एक मोटा-मोटी मूल्यांकन के आधार पर पूँजीपति यह तय करता है कि उसे क्या पैदा करना है और कितना पैदा करना है। लेकिन यह मूल्यांकन पूरा पूँजीपति वर्ग मिलकर नहीं करता है बल्कि अलग-अलग निजी पूँजीपति करते हैं और इसके आधार पर वे प्रतिस्पर्द्धा करने बाज़ार में उतरते हैं। इसलिए पूरे समाज में होने वाला उत्पादन योजनाबद्ध तरीके से नहीं होता है बल्कि अराजक तरीके से होता है। बाज़ार द्वारा बतायी जाने वाली माँग और आपूर्ति की स्थितियों के अनुसार हर पूँजीपति उत्पादन-सम्बन्‍धी निर्णय लेता है। बाज़ार में कई सेक्टर मौजूद होते हैं। इन सभी सेक्टरों को मोटे तौर पर दो हिस्सों में बाँटा जा सकता है उपभोग की वस्तुओं का उत्पादन और उत्पादन के साधनों का उत्पादन। उपभोग की वस्तुओं में आदमी की रोज़मर्रा की जीवन आवश्यकताओं की विभिन्न वस्तुएँ होती हैं, मिसाल के तौर पर, खाने-पहनने के सामान, फ्रिज-टी.वी.-वाहनों आदि जैसी उपभोक्ता सामग्रियाँ, मनोरंजन के सामान, आदि। हालाँकि, उपभोक्ता सामग्रियों को भी दो हिस्सों (टिकाऊ उपभोक्ता सामग्रियाँ और ग़ैर-टिकाऊ उपभोक्ता सामग्रियाँ) में बाँटा जाता है, लेकिन अभी इस विभाजन के विश्लेषण में जाने की हमें कोई आवश्यकता नहीं होती है। एक-एक उपभोक्ता सामग्री के उत्पादन में कई-कई पूँजीपति लगे होते हैं और अपने माल को बेचने के लिए प्रतिस्पर्द्धा करते हैं। इसके लिए वे अख़बारों, टी.वी., रेडियो, बिजली के खम्भों, होर्डिंगों, बस स्टापों और रेलवे स्टेशनों पर मौजूद प्रचार पट्टियों पर प्रचार करते हैं और अपने माल को सबसे अच्छा बताते हैं।

यही हाल, उत्पादन के साधनों के उत्पादन के सेक्टर में भी होता है, लेकिन थोड़ा भिन्न रूप में। इस सेक्टर में मशीनों, उपकरणों और औज़ारों और साथ ही कई प्रकार के माध्‍यमिक कच्चे माल का उत्पादन किया जाता है। यहाँ पर उत्पादित सामग्री का उपभोक्ता आम आदमी नहीं होता, बल्कि पूँजीपति वर्ग होता है जो अपने उत्पादन के लिए उत्पादन के साधनों को पूँजीपति वर्ग के उस हिस्से से ख़रीदता है जो उत्पादन के साधनों का उत्पादन करता है। आजकल यह विभाजन बहुत क्षीण हो गया है क्योंकि एक ही पूँजीपति ने उपभोक्ता सामग्रियों के उत्पादन में भी निवेश कर रखा है और उत्पादन के साधनों के उत्पादन में भी। लेकिन इससे विश्लेषण में कोई फर्क नहीं पड़ता है। उत्पादन के दोनों सेक्टरों में उत्पादन और श्रम की स्थितियों का विश्लेषण किया जा सकता है। लेकिन अभी हमारा उद्देश्य यह नहीं है। उत्पादन के साधन के उत्पादन के क्षेत्र में भी एक-एक मशीन या उपकरण के उत्पादन में कई-कई पूँजीपति लगे होते हैं और उपभोक्ता सामग्री का उत्पादन करने वाले पूँजीपति वर्ग को अपना उत्पाद बेचने के लिए लुभाने में लगे होते हैं।

विभिन्न वस्तुओं या उत्पादन के साधनों (मशीन, उपकरण आदि) के उत्पादन में अलग-अलग समय पर अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं। कभी किसी वस्तु का उत्पादन अधिक लाभदायी होता है तो कभी किसी और वस्तु का। मिसाल के तौर पर, अभी कुछ वर्षों पहले तक विश्व बाज़ार में सूरजमुखी और मेंथा की ज़बरदस्त माँग के कारण भारत में तमाम धनी किसानों और कुलकों ने इनकी खेती शुरू की। कृषि के क्षेत्र में सक्रिय पूँजीपतियों ने बाज़ार में माँग और आपूर्ति की स्थितियों को देखते हुए सूरजमुखी और मेंथा की खेती में पैसा लगाना शुरू किया। लेकिन इन स्थितियों का मूल्यांकन सभी कृषक पूँजीपतियों ने मिलकर संगठित रूप से नहीं किया, बल्कि अलग-अलग किया। जो-जो सूरजमुखी और मेंथा की खेती में आवश्यक भारी पूँजी निवेश और कुशल श्रम की आवश्यकता को पूरा करने में सक्षम था, उसने इसमें पूँजी लगायी। नतीजा यह हुआ कि इन दोनों ही मालों का अति-उत्पादन हुआ और उनके उत्पाद को ख़रीदने के लिए बाज़ार में पर्याप्त ख़रीदार नहीं रहे। बाज़ार में माँग और आपूर्ति की स्थितियाँ बदल गयीं। अब सूरजमुखी और मेंथा का बाज़ार उतना गर्म नहीं रहा। इस प्रक्रिया में तमाम धनी किसान तबाह हो गये, जिन्होंने भारी पैमाने पर निवेश के लिए बड़े-बड़े ऋण लिये थे। भारत में किसानों द्वारा आत्महत्या का एक बड़ा कारण यह भी रहा है। उनके तबाह होने के साथ खेती में लगी मज़दूर आबादी भी बड़े पैमाने पर बेरोज़गार हुई और छोटे किसान सर्वहाराओं की कतार में शामिल हुए। अब बाज़ार में दूसरे माल ज्यादा फ़ायदेमन्द बन गये हैं, जो शायद पहले उतने फ़ायदेमन्द नहीं थे। पहले उनमें पर्याप्त पूँजी लगी हुई थी और उनका उत्पादन माँग से ज्यादा हो रहा था। इसी कारण उनमें से पूँजी निकलकर उन फसलों के उत्पादन में लगी जिनकी माँग अधिक थी, लेकिन पूँजी निवेश कम था। इसी तरह से पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में पूँजी अधिक मुनाफे वाली वस्तुओं के उत्पादन के क्षेत्र की ओर स्वाभाविक गति करती रहती है। कहने की आवश्यकता नहीं कि ये क्षेत्र बदलते रहते हैं और पूँजी अराजक तरीके से कभी इस तो कभी उस क्षेत्र की ओर भागती रहती है। यह प्रक्रिया पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में एक सन्तुलनकारी प्रक्रिया होती है जिसे काग़ज़ पर देखा जाये तो बहुत सामान्य लगती है, लेकिन वास्तव में घटित होते हुए देखा जाये तो समझ में आता है कि यह कितनी तबाही लाने वाली प्रक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में लाखों-लाख मज़दूर तबाह होते रहते हैं, अपनी नौकरियों से हाथ धोते रहते हैं और नर्क जैसे जीवन की ओर धकेले जाते रहते हैं। यही पूँजीवादी व्यवस्था की अराजकता का मूल है। एक निजी मालिकाने पर आधारित व्यवस्था जिसमें समाज की आवश्यकताओं के अनुसार उत्पादन नहीं किया जाता, बल्कि हर पूँजीपति अपने मुनाफे की ख़ातिर बाज़ार में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्द्धा के लिए उतरता है। इस पूरी प्रक्रिया में पूँजीपतियों का एक हिस्सा तबाह होकर मध्‍यम वर्ग, निम्न मध्‍यम वर्ग और सर्वहारा वर्ग की कतार में शामिल होता रहता है और लाखों-करोड़ों की संख्या में मज़दूर अपना काम खोते हैं और बेरोज़गारों की कतार में शामिल होते रहते हैं। अपनी अराजक गति से पूँजीवाद मज़दूरों को बरबाद करता रहता है और उन्हें बेरोज़गारों की फौज में धकेलता रहता है। यह एक मानव-केन्द्रित नहीं बल्कि मुनाफ़ा-केन्द्रित व्यवस्था होती है।

पूँजीवाद में विभिन्न सेक्टरों में मन्दी की स्थिति तो आती-जाती रहती ही है। लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था में निश्चित अन्तरालों पर आम संकट की स्थिति पैदा होती रहती है, जब अधिकांश सेक्टरों में अति-उत्पादन हो जाता है और मन्दी पैदा होती है। यह कैसे होता है इसे समझ लेना भी यहाँ उपयोगी होगा।

प्रतिस्पर्द्धा में टिके रहने के लिए हर पूँजीपति अपने उत्पादन की लागत को घटाता है। लागत का अर्थ है उत्पादन में लगने वाली कुल पूँजी। इस पूँजी के दो हिस्से होते हैं पहला, स्थिर पूँजी जो मशीनों, इमारत, बिजली, पानी व कच्चे माल पर लगती है और दूसरा, परिवर्तनशील पूँजी जो पूँजीपति मज़दूरी के रूप में मज़दूरों को देता है। स्थिर पूँजी को स्थिर पूँजी इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह उत्पादन की प्रक्रिया के दौरान परिवर्तित नहीं होती है। उसका मूल्य सीधे-सीधे, बिना बढ़े हुए उत्पादित माल में स्थानान्तरित हो जाता है। इसमें से कुछ का मूल्य एक बार में भी माल में स्थानान्तरित हो जाता है, जैसे कच्चा माल, बिजली, आदि, और कुछ का मूल्य एक लम्बी प्रक्रिया में माल में स्थानान्तरित होता है, जैसे मशीनें और उपकरण आदि। इनका मूल्य तब तक माल में स्थानान्तरित होता रहता है जब तक कि वे घिसकर बेकार न हो जायें और उनकी उम्र पूरी न हो जाये। एक बार के उत्पादन में उसके कुल मूल्य का एक हिस्सा उत्पाद में जाता है। इसे घिसाई मूल्य (डेप्रिसियेशन वैल्यू) कहा जाता है। लेकिन यह मूल्य भी उत्पादन के दौरान बढ़ता-घटता नहीं है। यह ज्यों का त्यों उत्पाद में चला जाता है। इसीलिए मशीनों और कच्चे माल पर लगने वाली पूँजी को स्थिर पूँजी कहा जाता है। मज़दूरी के रूप में लगने वाली पूँजी को परिवर्तनशील पूँजी कहा जाता है, क्योंकि मज़दूर का श्रम ही वह चीज़ है जो वस्तुओं के एक अनुपयोगी समूह को मशीनों, उपकरणों आदि के इस्तेमाल से एक उपयोगी माल का रूप देता है। श्रम ही उत्पादन का वह कारक है जो किसी उत्पाद में उपयोग मूल्य पैदा करता है, यानी, उसे उपयोगी बनाता है। कोई कारख़ाना या मशीन अपने से कच्चे मालों को एक उपयोगी माल का रूप नहीं दे सकते। जब तक कच्चे मालों पर मानसिक और शारीरिक मानवीय श्रम नहीं लगता, वे मूल्यहीन बेकार वस्तुएँ होती हैं। जैसे ही उस मज़दूर की मेहनत लगती है वे आकार ग्रहण करने लगते हैं और मिलकर एक उपयोगी वस्तु बन जाते हैं। जब कोई वस्तु उपयोगी होगी तभी उसे बाज़ार में कोई ख़रीदेगा। वस्तु में उपयोग मूल्य मज़दूर की मेहनत पैदा करती है। एक पूँजीवादी समाज में मज़दूर की श्रम-शक्ति भी एक माल होती है और वह भी बाज़ार में बिकती है। इसका मूल्‍य भी किसी की अन्‍य माल के मूल्‍य के समान ही उसमें लगे प्रत्‍यक्ष व अप्रत्‍यक्ष श्रम से तय होता है और उसका बाज़ार मूल्‍य बाज़ार में मौजूद माँग और आपूर्ति से निर्धारित होता है।। उत्पादन की प्रक्रिया में श्रम-शक्ति ही वह कारक होती है जिसका मूल्य संवर्धित होकर, यानी बढ़कर माल में स्थानान्तरित होता है। इसीलिए श्रम-शक्ति को ख़रीदने के लिए पूँजीपति द्वारा लगायी गयी पूँजी को परिवर्तनशील पूँजी कहते हैं क्योंकि उत्पादन से पहले और उत्पादन के बाद इसका परिमाण बढ़ चुका होता है। यह बढ़ी हुई मात्रा अर्थशास्त्र की भाषा में अतिरिक्त मूल्य कहलाती है। यही अतिरिक्त मूल्य एक पूँजीवादी व्यवस्था में पूँजीपति वर्ग के मुनाफे का मूल होता है। यह पैदा मज़दूर के श्रम द्वारा होता है, लेकिन इसे पूँजीपति द्वारा हड़प लिया जाता है।

चूँकि अतिरिक्त मूल्य ही पूँजीपति के मुनाफे का मूल होता है, इसलिए वह उसे हर कीमत पर बढ़ाने का प्रयास करता है। इससे पूँजीपति वर्ग दो तरह से बढ़ाता है। एक, मज़दूर के काम के घण्टे को बढ़ाकर और उसकी मेहनत की सघनता को बढ़ाकर; और दूसरा, और अधिक उन्नत मशीनें लगाकर। पहले तरीके को समझना आसान है। अगर मज़दूर उसी मज़दूरी पर या थोड़ी-सी बढ़ी मज़दूरी पर अधिक देर तक काम करेगा तो अधिक अतिरिक्त मूल्य पैदा करेगा। यह एकदम सीधा मामला है। दूसरा तरीका थोड़ा जटिल है। आइये इसे भी समझ लें। अगर उन्नत मशीनें लगेंगी तो मज़दूर का श्रम अधिक उत्पादक हो जायेगा और वह अधिक दर से अतिरिक्त मूल्य पैदा करेगा। इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मान लीजिये कि एक सिलाई कारख़ाना है जहाँ मज़दूर पैर से चलने वाली सिलाई मशीन पर काम करते हैं। अभी एक मज़दूर 12 घण्टे में 10 कमीज़ें तैयार करता है। कारख़ाने का मालिक पैर से चलने वाली सिलाई मशीन को हटाकर बिजली से चलने वाली सिलाई मशीनें लगवा देता है। अब वही मज़दूर 12 घण्टे में 18 कमीज़ें बना लेता है। यानी मज़दूर के उत्पादन करने की गति को बढ़ा दिया गया। अब उत्पादन सीधे 1.8 गुना बढ़ गया। इससे पूँजीपति अपने माल की कीमत को घटाने में सफल होता है। लेकिन जब उन उद्योगों में मशीनीकरण के ज़रिए श्रम की उत्‍पादकता बढ़ती है जो कि मुख्‍य रूप से मज़दूरों के उपभोग की वस्‍तुएँ पैदा करते हैं, तो उन उपभोग की वस्‍तुओं का मूल्‍य भी कम हो जाता है। नतीजतन, श्रम शक्ति का मूल्‍य भी कम हो जाता है, क्‍योंकि वह उन वस्‍तुओं के मूल्‍य से ही निर्धारित होता है जो कि श्रम शक्ति के पुनरुत्‍पादन में लगती हैं। इस प्रकार वास्‍तविक मज़दूरी कम होती है, हालाँकि रुपये में अभिव्‍यक्‍त सांकेतिक मज़दूरी घटे यह ज़रूरी नहीं है; कई बार तो वह बढ़ भी सकती है, लेकिन उसके द्वारा ख़रीदी जा सकने वाली सामग्री का मूल्‍य पहले से कम हो जाता है। इस प्रकार वास्‍तविक मज़दूरी घट जाती है और पूँजीपति का मुनाफ़ा बढ़ जाता है। इसे सापेक्षिक अतिरिक्‍त मूल्‍य कहते हैं।इसके लिए पूँजीपति को एक बार थोड़ा निवेश करना पड़ता है, लेकिन बदले में लम्बे समय तक वह बढ़ी हुई उत्पादकता पर काम करवा सकता है। इसके बदले में पूँजीपति मज़दूर को या तो कुछ नहीं देता और या फिर उनकी मज़दूरी को नाममात्र के लिए बढ़ा देता है। मज़दूर यह समझ भी नहीं पाता कि उसका शोषण बढ़ गया है और वह स्वयं कुछ पाये बिना पूँजीपति के मुनाफे को कहीं तेज़ गति से बढ़ा रहा है।

स्पष्ट है कि पूँजीपति कुल उत्‍पादित मूल्‍य में लागत के अनुपात को घटाने के लिए अतिरिक्त मूल्य को विभिन्न तरीकों से बढ़ाता है। यह काम वह तभी कर सकता है जब वह उत्पादन को बड़े से बड़े पैमाने पर करे। उत्पादन जितने बड़े पैमाने पर होता है, लागत का अनुपात कुल निवेश में उतना कम होता जाता है। अतिरिक्त मूल्य को बढ़ाने के लिए पूँजीपति जिन तरीकों का उपयोग करता है, उससे उत्पादन स्वत: ही बड़े पैमाने पर होता जाता है। यानी, पूँजीपति लगातार इस होड़ में रहता है कि उत्पादन को अधिकतम सम्भव बड़े पैमाने पर किया जाये ताकि अतिरिक्त मूल्य को बढ़ाया जा सके और लागत के अनुपात को कुल पूँजी निवेश में घटाया जा सके। लेकिन उत्‍पादन को बढ़ाकर अपने मुनाफ़े को अधिकतम सम्‍भव बढ़ाने की अन्‍धी हवस में वह यह भूल जाता है कि उत्‍पादन व उपभोग दोनों के ही मालों को ख़रीदने के लिए बाज़ार में उतने पूँजीपति व अन्‍य वर्गों के उपभोक्‍ता भी होने चाहिए; पूँजीपति तभी निवेश करता है और उत्‍पादन के साधनों को ख़रीदता है जब निवेश के लिए लाभप्रद अवसर हों और व्‍यापक आबादी अपनी ख़रीद को तभी बढ़ा सकती है, जब उसके बीच पर्याप्‍त प्रभावी माँग हो। लेकिन चूँकि पूँजीवादी समाज में कोई एक पूँजीपति उत्‍पादन नहीं कर रहा होता बल्कि कई पूँजीपति आपस में मुनाफ़े के लिए प्रतिस्‍पर्द्धा करते हुए अपना-अपना उत्‍पादन कर रहे होते हैं। इसलिए ऐसा किसी एक पूँजीपति के साथ नहीं बल्कि समूचे पूँजीपति वर्ग के साथ होता है। आपसी प्रतिस्पर्द्धा और एक-दूसरे को लील जाने की हवस में हर पूँजीपति हर वस्तु के उत्पादन के क्षेत्र में उत्पादन को लाभदायक होने की हदों से आगे बढ़ाता जाता है और उस पूरे सेक्टर में ही अति-उत्पादन हो जाता है। यही प्रक्रिया सभी क्षेत्रों में घटित होती रहती है। और निश्चित अन्तरालों पर ऐसा होता है कि पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के अधिकांश क्षेत्र अति-उत्पादन का शिकार हो जाते हैं और पूरी अर्थव्यवस्था मन्दी का शिकार हो जाती है। यह अतिउत्‍पादन दरअसल मुनाफ़े की गिरती दर की एक अभिव्‍यक्ति होता है। मुनाफ़े की दर ठीक उन्‍हीं कारणों से गिरती जाती है, जिनसे पूँजीपति अतिरिक्‍त मूल्‍य की दर को बढ़ाता है और अन्‍य पूँजीपतियों से प्रतिस्‍पर्द्धा में माल की कीमत को कम करता है: यानी, मशीनीकरण और श्रम की उत्‍पादकता में बढ़ोत्‍तरी। इसके लिए वह मशीनों पर निवेश सापेक्षिक रूप से बढ़ाता है और श्रम शक्ति ख़रीदने पर निवेश को सापेक्षिक रूप से घटाता है। लेकिन हम देख चुके हैं कि नया मूल्‍य केवल श्रम शक्ति के उत्‍पादन में लगने से ही पैदा होता है और इसीलिए अतिरिक्‍त मूल्‍य का स्रोत केवल जीवित श्रम होता है। लेकिन यदि पूँजी के संघटन में श्रम शक्ति सापेक्षिक रूप से घटती जायेगी और मृत श्रम यानी कि मशीनें सापेक्षिक रूप से बढ़ती जायेंगी तो कुल अतिरिक्‍त मूल्‍य अवश्‍य बढ़ सकता है, लेकिन कुल पूँजी निवेश अन्‍तत: उससे तेज़ गति से बढ़ेगा और एक निर्णायक प्रवृत्ति के तौर पर लम्‍बी दूरी में मुनाफ़े की दर गिरती जायेगी। यही पूँजीवादी व्‍यवस्‍था के संकट का मूल है। इसकी अभिव्‍यक्ति एक ओर अति-उत्‍पादन है, तो दूसरी ओर व्‍यापक मेहनतकश अवाम का अल्‍पउपभोग, जिस पर हम अभी बात करेंगे। यह अल्‍पउपभोग अपने आप में पूँजीपति वर्ग के संकट का कारण नहीं है, बल्कि उसका लक्षण है। पूँजीपति वर्ग मज़दूरों के उपभोग हेतु उत्‍पादन नहीं करता है, बल्कि मुनाफ़े के लिए उत्‍पादन करता है। पूँजीपति वर्ग के लिए चिन्‍ता की बात मूलत: तब होती है जबकि पूँजीपति वर्ग द्वारा किया जाने वाला उत्‍पादक उपभोग, यानी कि उत्‍पादन के साधनों की ख़रीद में कमी आती है, यानी जब निवेश कम होता जाता है, जो कि मुनाफ़े की दर के गिरते जाने के कारण ही होता है। लेकिन व्‍यापक मेहनतकश जनता का अल्‍पउपभोग, जो कि समाज में मुनाफ़े की गिरती दर के संकट के दौर में बेरोज़गारी के बढ़ने और मज़दूरों की वास्‍तविक मज़दूरी में कमी आने का नतीजा होता है, एक वास्‍तविक परिघटना होता है और समाज में राजनीतिक व सामाजिक असन्‍तोष को बढ़ावा देता है और आर्थिक संकट को राजनीतिक व सामाजिक संकट में तब्‍दील करने में एक अहम भूमिका निभाता है। पूँजीपति मज़दूर को लगातार लूटकर ही अपने मुनाफे को बढ़ाता है। जब वह उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्नत मशीनों को लगाता है तो मज़दूरों के एक हिस्से को वह निकाल बाहर करता है, क्योंकि अब कम मज़दूर ही उन्नत मशीनों पर उत्पादन को पहले के स्तर से आगे बढ़ा सकते हैं। इस प्रक्रिया में समाज में बेरोज़गारों की फौज बढ़ती जाती है और बहुसंख्यक आबादी अपनी ख़रीदने की क्षमता से वंचित होती जाती है। इस तरह एक तरफ तो उत्पादन बढ़ता जाता है, बाज़ार सामानों से पटता जाता है और दूसरी तरफ उन्हें ख़रीदने वालों की संख्या लगातार घटती जाती है। इसके पीछे जो मूल कारण होता है वह है पूँजीवादी व्‍यवस्‍था में मुनाफ़े की गिरती दर, जो कि सामाजिक उत्‍पादक शक्तियों के सतत विकास से उत्‍पादन के लगातार अधिक से अधिक सामाजिक होते जाने और उसके पूँजीवादी उत्‍पादन व्‍यवस्‍था की सीमाओं के अति‍क्रमण कर जाने के रूप में प्रकट होता है। सामाजिक उत्पादन और निजी स्वामित्व के बीच का अंतर्विरोध अपने आप को अति-उत्पादन के संकट के रूप में अभिव्यक्त करता है। यही है पूँजीवाद का संकट जो उसे निश्चित अन्तरालों पर, पहले से भी भयावह रूप में आकर सताता रहता है और उसे लगातार उसकी कब्र की ओर धकेलता रहता है। यह एक ऐसा संकट है जिससे पूँजीवादी व्यवस्था लाख चाहने पर भी निजात नहीं पा सकती है, क्योंकि एक योजनाबद्ध मानव-केन्द्रित व्यवस्था में ही इससे निजात मिल सकती है, जो उत्पादन के साधनों और समाज के पूरे ढाँचे पर मज़दूरों के साझे मालिकाने के ज़रिये ही सम्भव है। पूँजीवाद अगर ऐसा हो जायेगा तो वह पूँजीवाद रह ही नहीं जायेगा और इस व्यवस्था को चलाने वाला पूँजीपति वर्ग कभी भी अपने निजी मुनाफे को छोड़ नहीं सकता। इसलिए पूँजीवादी व्यवस्था को सिर्फ तबाह किया जा सकता है, इसे सुधारा नहीं जा सकता क्योंकि यह परस्पर प्रतिस्पर्द्धा, निजी मालिकाने और निजी मुनाफे पर टिकी हुई व्यवस्था है।

साम्राज्यवाद के दौर में पूँजीवाद

पूँजीवाद के इसी संकट ने मानवता को दो विश्वयुद्धों की ओर धकेला। 1870 के दशक के बाद से यूरोपीय देशों में पूँजीवाद भयंकर रूप से इस अति-उत्पादन के संकट का शिकार हो गया था। ब्रिटेन, फ्रांस, हॉलैण्ड, पुर्तगाल, स्पेन जैसे कुछ देशों के पास 18वीं शताब्दी के समय से ही स्थापित उपनिवेश थे जिनके कारण वे मालों के अति-उत्पादन को अपने देश के बाहर अपने उपनिवेशों में भी बेच पा रहे थे। साथ ही, मालों के अतिरिक्त अब लागत को और घटाने के लिए सस्ते श्रम को निचोड़ने के लिए पूँजी को भी इन उपनिवेशों में निर्यात कर रहे थे, यानी, वहीं पर कारख़ाने लगाकर गुलाम देशों के सस्ते श्रम को निचोड़ रहे थे। जल्दी ही, यह सम्भावना भी निश्शेष हो गयी और 1910 का दशक आते-आते विश्व पूँजीवाद फिर से अति-उत्पादन और मन्दी के संकट का शिकार हो गया। साथ ही, कई ऐसे यूरोपीय पूँजीवादी देशों की शक्ति का उदय हुआ जिनके पास उपनिवेश नहीं थे। ऐसे देशों में अगुआ था जर्मनी। इन देशों में पूँजीवाद के संकट के पैदा होने के साथ और इनकी आर्थिक और सैन्य ताकत के पैदा होने के साथ विश्व पैमाने पर ग़रीब देशों की पूँजीवादी लूट के फिर से बँटवारे का सवाल पैदा हो गया। इसी सवाल को हल करने के लिए पूँजीवादी देशों के शासक वर्ग ने पूरी दुनिया को पहले साम्राज्यवादी महायुद्ध में धकेल दिया। इसमें जर्मनी और उसके मित्र देशों को पराजय का सामना करना पड़ा। लेकिन इस युद्ध ने रूस की महान क्रान्ति के लिए भी उपजाऊ ज़मीन तैयार की। दरअसल, यही ज़मीन जर्मनी में भी तैयार हुई थी, लेकिन वहाँ के सामाजिक जनवाद की ऐतिहासिक ग़द्दारी और काउत्स्की के नेतृत्व में पूरी सामाजिक जनवादी पार्टी के साम्राज्यवादी पूँजीवाद की गोद में बैठ जाने के कारण वहाँ क्रान्ति नहीं हो सकी, हालाँकि जर्मनी का मज़दूर आन्दोलन रूस के मज़दूर आन्दोलन से अधिक शक्तिशाली और पुराना था। विश्वयुद्ध में जर्मनी और ऑस्ट्रिया-हंगरी की पराजय के बाद के दौर में रूस में समाजवाद के तहत वहाँ के मज़दूर वर्ग ने अभूतपूर्व तरक्की करके पूरी दुनिया के सामने एक अद्वितीय मॉडल खड़ा कर दिया। दूसरी ओर, पहले विश्वयुद्ध में हथियार बेचकर और ऋण देकर संयुक्त राज्य अमेरिका ने ज़बरदस्त मुनाफ़ा कमाया। लेकिन एक दशक बीतते-बीतते संयुक्त राज्य अमेरिका में ही पूँजीवाद के अब तक के सबसे बड़े संकट का उदय हुआ जिसे महान मन्दी के नाम से जाना जाता है। यह 1929 से लेकर 1931 तक चली। इस मन्दी ने रूस को छोड़कर दुनिया के सभी देशों को गम्भीर रूप से प्रभावित किया। विशेष रूप से, अमेरिका और यूरोपीय देशों को। इस मन्दी के बाद ही जर्मनी और इटली में फ़ासीवाद ने मज़बूती से पैर जमा लिये। महामन्दी ने जर्मनी और इटली में फ़ासीवाद को कैसे पैदा और मज़बूत किया, अन्य देशों में फ़ासीवाद पाँव क्यों नहीं जमा पाया, इन सवालों पर हम आगे विचार करेंगे। पहले, द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद संकट के इतिहास पर, कुछ शब्द और।

द्वितीय विश्वयुद्ध में सबसे कम नुकसान संयुक्त राज्य अमेरिका को हुआ और सबसे अधिक नुकसान सोवियत रूस को। पूरा यूरोप भी खण्डहर में तब्दील हो चुका था। अमेरिका ने यूरोप और जापान के पुनर्निर्माण के ज़रिये निवेश की सम्भावनाओं का उपयोग किया और अपनी मन्दी को कम-से-कम तीस वर्षों के लिए टाल दिया। 1950 से लेकर 1970 तक अमेरिकी पूँजीवाद ने ख़ूब मुनाफ़ा पीटा। 1960 के दशक को तो अमेरिका में ‘स्वर्ण युग’ के नाम से जाना जाता है। अति-उत्पादन के संकट को दूर करने के लिए पूँजीवाद के दायरे के भीतर एक ही विकल्प होता है उत्पादक शक्तियों का बड़े पैमाने पर विनाश ताकि उनके पुनर्निर्माण के लिए बड़े पैमाने पर सम्भावनाएँ पैदा की जा सकें। यह विनाश समय-समय पर साम्राज्यवादी युद्धों के ज़रिये किया जाता है। 1970 का दशक आते-आते विश्व पूँजीवाद एक बार फिर संकट का शिकार हुआ। इसके बाद वह उबरा ही था कि 1980 के दशक के मध्‍य में फिर से मन्दी ने उसे ग्रस लिया। इसके बाद भूमण्डलीकरण की नीतियों की शुरुआत के साथ विश्व साम्राज्यवाद ने एक नये चरण में प्रवेश किया। भूमण्डलीकरण के दौर में पूँजीवाद ने मन्दी को दूर करने के लिए एक नयी रणनीति का उपयोग किया। वित्तीय पूँजी के प्रभुत्व के इस दौर में पूँजी की प्रचुरता और मन्दी के दोमुँहे संकट को दूर करने के लिए बैंकों के ज़रिये उपभोक्ताओं को ऋण देने की शुरुआत की गयी। मध्‍यम वर्ग तक के लोगों को माल ख़रीदने के लिए ऋण देने की प्रथा को विश्वभर में बड़े पैमाने पर शुरू किया गया। यानी पहले लोगों को ख़रीदने की ताकत से वंचित करके बाज़ार को मालों से पाट दिया गया और फिर जब ख़रीदार नहीं बचे तो ख़ुद ही सूद पर लोगों को पैसा देकर वह माल ख़रीदवाया गया, ताकि मन्दी को कुछ समय के लिए टाला जा सके। लेकिन जल्दी ही मध्‍यवर्ग के भीतर ऋण देकर माल ख़रीदवाने की सम्भावनाएँ समाप्त हो गयीं। इसके बाद, तमाम ऐसे लोगों को भी ऋण देने की शुरुआत की गयी जो उसका सूद चुकाने की क्षमता भी नहीं रखते थे, ताकि अस्थायी रूप से मन्दी का संकट दूर हो सके। जल्दी ही यह सम्भावना भी ख़त्म हो गयी और अब 2006 में शुरू हुई मन्दी के रूप में पूँजीवाद के सामने महामन्दी के बाद का सबसे बड़ा संकट खड़ा है, जिससे निपटने के लिए विश्व भर के पूँजीवादी महाप्रभु द्रविड़ प्राणायाम करने में लगे हुए हैं।

संक्षेप में, पूँजीवाद अपने स्वभाव से ही संकट को समय-समय पर जन्म देता रहता है। संकट से निपटने के लिए युद्ध पैदा किये जाते हैं। लेकिन यह एक अस्थायी समाधान होता है और बेताल फिर से आकर पुरानी डाल पर ही लटक जाता है। साम्राज्यवाद के दौर में विश्व पूँजीवाद ने अपनी कार्यप्रणाली को बदला लेकिन सवा सौ साल बीतते-बीतते उसकी हवा निकल गयी और वह फिर से उसी असमाधेय संकट के सामने खड़ा है।

पूँजीवादी संकट की सम्भावित प्रतिक्रियाएँ

संकट के दौर में बेरोज़गारी तेज़ी से बढ़ती है। संकट के दौर में अति-उत्पादन होने और उत्पादित सामग्री के बाज़ारों में बेकार पड़े रहने के कारण पूँजीपति का मुनाफ़ा वापस नहीं आ पाता है और माल के रूप में बाज़ार में अटका रह जाता है। नतीजतन, पूँजीपति अधिक उत्पादन नहीं करना चाहता है और उत्पादन में कटौती करता है। इसके कारण वह उत्पादन में निवेश को घटाता है, कारख़ाने बन्द करता है, मज़दूरों को निकालता है। 2006 में शुरू हुई मन्दी के कारण अकेले अमेरिका में करीब 85 लाख लोग जून 2009 तक बेरोज़गार हो चुके हैं। भारत में मन्दी की शुरुआत के बाद करीब 1 करोड़ लोग अपनी नौकरियों से हाथ धो चुके हैं। बेरोज़गारों की संख्या में पूरे विश्व में करोड़ों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है। इसके कारण न सिर्फ तीसरी दुनिया के ग़रीब पिछड़े पूँजीवादी देशों में बल्कि यूरोप के देशों में भी दंगे हो रहे हैं। यूनान, फ्रांस, इंग्लैण्ड, आइसलैण्ड, आदि देशों में पिछले दिनों हुए दंगे और आन्दोलन इसी मन्दी का असर हैं। इस मन्दी के कारण पैदा हुए जन-असन्तोष का पूरे विश्व के पूँजीवादी देशों में शासक वर्ग का जो जवाब सामने आया है उसमें कुछ भी नया नहीं है। यह जवाब है कल्याणकारी राज्य का कीन्सियाई नुस्खा। यह ”कल्याणकारी” राज्य क्या करता है, इसे भी समझना ज़रूरी है।

मन्दी के कारण जो वर्ग सबसे पहले तबाह होते हैं, वे हैं मज़दूर वर्ग, ग़रीब और निम्न मध्‍यम किसान, खेतिहर मज़दूर वर्ग, शहरी निम्न मध्‍यम वर्ग और आम मध्‍यम वर्ग। यह कुल जनता का करीब 90 प्रतिशत होते हैं। इसके अतिरिक्त, छोटे व्यापारियों और दलालों का भी एक वर्ग इसमें तबाह होता है। इसके कारण पूरे समाज में ही 90 प्रतिशत बहुसंख्यक आबादी के लिए एक भयंकर आर्थिक और सामाजिक असुरक्षा का माहौल पैदा होता है। इसके कारण भारी पैमाने पर व्यापक और सघन जन-असन्तोष पैदा होता है जो पूरी व्यवस्था के लिए ही एक ख़तरा साबित हो सकता है। इस ख़तरे से निपटने के लिए 1930 के दशक में पूँजीवाद के एक कुशल हकीम जॉन मेनॉर्ड कीन्स ने बताया कि अराजकतापूर्ण पूँजीवादी व्यवस्था को थोड़ा-थोड़ा व्यवस्थित करने की आवश्यकता होती है। अगर निजी प्रतिस्पर्द्धा वाले पूँजीवाद और इजारेदारियों को मुक्त बाज़ार में खुल्ला छोड़ दिया जायेगा तो पूँजी की अराजक गति आत्मघाती रूप से ऐसे हालात पैदा कर देगी जो पूँजीवाद को ही निगल जायेंगे। इसलिए थोड़ा संयम बरतने की ज़रूरत है। इस व्यवस्थापन के काम को पूँजीवाद राज्य को अंजाम देना होगा। इसे कुछ ऐसी नीतियों में निवेश करना होगा जो लोगों को थोड़ा सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा का आभास कराये। मिसाल के तौर पर, सार्वजनिक क्षेत्र (पब्लिक सेक्टर) को खड़ा करके उसमें रोज़गार देना होगा; बीमा योजनाएँ लागू करनी होंगी; कुछ अवसंरचनागत क्षेत्र जैसे परिवहन, संचार, आदि को सरकार को अपने हाथ में रखना होगा; निजी क्षेत्र पर कुछ लगाम रखनी होगी; लोगों को आवास आदि की कुछ योजनाएँ देनी होंगी; मज़दूरों की मज़दूरी को थोड़ा बढ़ाना होगा, आदि। यानी कुछ सुधार के कदम जो कुछ समय के लिए लोगों के असन्तोष पर ठण्डे पानी का छिड़काव कर सकें। ऐसे काम करने वाले राज्य को ही ”कल्याणकारी” राज्य कहा जाता है। कहने की ज़रूरत नहीं है कि यह कल्याणकारी राज्य पूँजीवाद के दूरगामी कल्याण के लिए और जनता के मन में फौरी कल्याण का एक झूठा अहसास पैदा करने के लिए खड़ा किया जाता है।

लेकिन इस कल्याणकारी राज्य के साथ दिक्कत यह होती है कि इसके अपने ख़र्चे बहुत होते हैं। तमाम कल्याणकारी नीतियों को लागू करने के लिए सरकार को पूँजीपतियों के मुनाफे पर थोड़ी लगाम कसनी पड़ती है और मज़दूरों को थोड़ी रियायतें और छूट देनी पड़ती है। जिन देशों में पूँजीवाद सामन्तवाद विरोधी क्रान्तियों के ज़रिये आया और जहाँ पूँजीवाद विकास की एक गहरे तक पैठी हुई लम्बी प्रक्रिया सामने आयी, वहाँ पर पूँजीपति वर्ग आर्थिक रूप से इस हालत में था कि कल्याणकारी राज्य के ”ख़र्चे उठा सके” और राजनीतिक रूप से भी इतना चेतना-सम्पन्न था कि कल्याणकारी राज्य को कुछ समय तक चलने दे और कुछ इन्तज़ार के बाद, दोबारा ”छुट्टा साँड ब्राण्ड” पूँजीवाद की शुरुआत करे। जिन देशों में पूँजीवाद किसी क्रान्तिकारी बदलाव के ज़रिये नहीं, बल्कि एक क्रमश: प्रक्रिया में आया वहाँ कल्याणकारी राज्य के कुछ और ही नतीजे सामने आये। इन देशों में जर्मनी और इटली अग्रणी थे। जर्मनी का पूँजीवाद में संक्रमण किसी पूँजीवादी क्रान्ति के ज़रिये नहीं हुआ। वहाँ पर क्रान्तिकारी भूमि सुधार नहीं लागू हुए, बल्कि सामन्ती भूस्वामियों को ही पूँजीवादी भूस्वामी में तब्दील हो जाने का मौका दिया गया। औद्योगिक पूँजीपति वर्ग राज्य द्वारा दी गयी सहायता के बूते खड़ा हुआ, न कि एक लम्बे पूँजीवादी विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया से, जैसाकि इंग्लैण्ड और फ्रांस में हुआ था। यहाँ के पूँजीपति वर्ग, कुलकों और धनी किसानों की कल्याणकारी राज्य के नतीजों पर इंग्लैण्ड, अमेरिका, और फ्रांस के पूँजीपति वर्ग से बिल्कुल भिन्न प्रतिक्रिया रही। इन शासक वर्गों की अलग किस्म की प्रतिक्रिया ने जर्मनी और इटली में फ़ासीवाद के उदय की ज़मीन तैयार की। इसके अतिरिक्त, एक और कारक था जिसने फ़ासीवाद के उभार में बहुत बड़ी भूमिका निभायी। यह कारक था जर्मनी और इटली के सामाजिक जनवादी आन्दोलन की ग़द्दारी और मज़दूर वर्ग के आन्दोलन का पूँजीवाद की चौहद्दियों के भीतर ही घूमते रह जाना। जर्मनी की सामाजिक जनवादी पार्टी के नेतृत्व में जर्मनी में एक बहुत शक्तिशाली मज़दूर आन्दोलन था जिसने 1919 से लेकर 1931 तक राज्य से मज़दूरों के लिए बहुत से अधिकार हासिल किये। जर्मनी में मज़दूरों की मज़दूरी किसी भी यूरोपीय देश से अधिक थी। कुल राष्ट्रीय उत्पाद में मज़दूर वर्ग का हिस्सा यूरोप के किसी भी देश के मज़दूर वर्ग के हिस्से से अधिक था। लेकिन इससे आगे सामाजिक जनवाद और कोई बात नहीं करता था। वह इसी यथास्थिति को बरकरार रखना चाहता था और इसलिए मज़दूर वर्ग के आन्दोलन को सुधारवादी संसदवाद और अर्थवाद की अन्‍धी चक्करदार गलियों में घुमाता रहा। लेकिन दूसरी तरफ जर्मनी का पूँजीपति वर्ग मज़दूर वर्ग को मिली इन रियायतों और सुविधाओं को बर्दाश्त करने की ताकत खोता जा रहा था, क्योंकि इसके कारण पूँजी संचय की उसकी रफ्तार बेहद कम हो गयी थी, यहाँ तक कि ठहर गयी थी। इसके कारण विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा में उसका टिक पाना बेहद मुश्किल हो गया था। 1928 आते-आते जर्मनी संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद सबसे अधिक औद्योगिक उत्पादन वाला देश बन चुका था और उत्पादकता की रफ्तार भी अमेरिका के बाद सबसे अधिक थी। इसके साथ ही जर्मनी की विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्द्धा भी अधिक से अधिक तीखी होती जा रही थी। लेकिन घरेलू पैमाने पर मज़दूर वर्ग के शक्तिशाली सुधारवादी आन्दोलन के कारण उसके मुनाफे की दर लगातार कम होती जा रही थी, जिसे इतिहासकारों ने लाभ संकुचन (”प्रॉफिट स्क्वीज़”) का नाम दिया है। ठीक इसी समय, विश्वव्यापी महामन्दी का प्रभाव जर्मनी की अर्थव्यवस्था पर पड़ा। लाभ संकुचन की मार से बिलबिलाये हुए जर्मन पूँजीपति वर्ग के लिए यह बहुत त्रासद था! इसके कारण सबसे पहले छोटा पूँजीपति वर्ग तबाह होना शुरू हुआ। बड़े पूँजीपति वर्ग को भी भारी हानि उठानी पड़ी। बड़े पैमाने पर बेरोज़गारी बढ़ी। शहरी वेतनभोगी निम्न मध्‍यम वर्ग में भी बेकारी द्रुत गति से बढ़ने लगी। जो काम कर भी रहे थे उनके सिर पर हर समय छँटनी की तलवार लटक रही थी। इस पूरे असुरक्षा के माहौल ने निम्न पूँजीपति वर्ग, सरकारी वेतनभोगी मध्‍यवर्ग, दुकानदारों, शहरी बेरोज़गारों के एक हिस्से के भीतर प्रतिक्रिया की ज़मीन तैयार की। यही वह ज़मीन थी जिसे भुनाकर राष्ट्रीय समाजवादी जर्मन मज़दूर पार्टी (हिटलर की नात्सी पार्टी) ने एक प्रतिक्रियावादी जन आन्दोलन खड़ा किया जिसकी अग्रिम कतारों में निम्न पूँजीपति वर्ग, वेतनभोगी मध्‍यम वर्ग, शहरी पढ़ा-लिखा मध्‍यम वर्ग, लम्पट सर्वहारा और यहाँ तक कि सर्वहारा वर्ग का भी एक हिस्सा खड़ा था।

इस असुरक्षा के माहौल के पैदा होने पर एक क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी का काम था पूरी पूँजीवादी व्यवस्था को बेनकाब करके जनता को यह बताना कि पूँजीवाद जनता को अन्तत: यही दे सकता है गरीबी, बेरोज़गारी, असुरक्षा, भुखमरी! इसका इलाज सुधारवाद के ज़रिये चन्द पैबन्द हासिल करके, अर्थवाद के ज़रिये कुछ भत्ते बढ़वाकर और संसदबाज़ी से नहीं हो सकता। इसका एक ही इलाज है मज़दूर वर्ग की पार्टी के नेतृत्व में, मज़दूर वर्ग की विचारधारा की रोशनी में, मज़दूर वर्ग की मज़दूर क्रान्ति। लेकिन सामाजिक जनवादियों ने पूरे मज़दूर वर्ग को गुमराह किये रखा और अन्त तक, हिटलर के सत्ता में आने तक, वह सिर्फ नात्सी-विरोधी संसदीय गठबन्‍धन बनाने में लगे रहे। नतीजा यह हुआ कि हिटलर पूँजीवाद द्वारा पैदा की गयी असुरक्षा के माहौल में जन्मे प्रतिक्रियावाद की लहर पर सवार होकर सत्ता में आया और उसके बाद मज़दूरों, कम्युनिस्टों, ट्रेड यूनियनवादियों और यहूदियों के कत्ले-आम का जो ताण्डव उसने रचा वह आज भी दिल दहला देता है। सामाजिक जनवादियों की मज़दूर वर्ग के साथ ग़द्दारी के कारण ही जर्मनी में फ़ासीवाद विजयी हो पाया। जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी मज़दूर वर्ग को संगठित कर पाने और क्रान्ति में आगे बढ़ा पाने में असफल रही। नतीजा था फ़ासीवादी उभार, जो अप्रतिरोध्‍य न होकर भी अप्रतिरोध्‍य बन गया।

अब तक हमने उन आर्थिक प्रक्रियाओं के बारे में पढ़ा जिनके नतीजे के तौर पर वे स्थितियाँ पैदा होती हैं जो फ़ासीवाद को भी जन्म दे सकती हैं। कोई जरूरी नहीं है कि ये आर्थिक परिस्थितियाँ अनिवार्य रूप से फ़ासीवाद को जन्म दें। फ़ासीवाद के उभार को रोका जा सकता है या नहीं, यह काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि संकटपूर्ण परिस्थिति का कोई क्रान्तिकारी विकल्प मौजूद है या नहीं। यदि क्रान्तिकारी विकल्प मौजूद नहीं होगा तो जनता को प्रतिक्रिया के रास्ते पर ले जाना फ़ासीवादी ताकतों के लिए आसान हो जायेगा। इस परिप्रेक्ष्य में भगतसिंह का वह कथन बरबस ही याद आता है जिसमें उन्होंने कहा था कि जब गतिरोध की स्थिति लोगों को अपने शिकंजे में जकड़ लेती है तो इंसानियत की रूह में क्रान्तिकारी स्पिरिट पैदा करने की जरूरत होती है, वरना प्रतिक्रियावादी शक्तियाँ जनता को ग़लत रास्ते पर ले जाने में सफल हो जाती हैं।

इस सामान्य रूपरेखा के बाद जर्मनी और इटली में फ़ासीवाद के उदय की स्थितियों और प्रक्रियाओं पर निगाह डालना उपयोगी होगा। जर्मनी फ़ासीवाद के उदय, विकास और सशक्तीकरण का सबसे प्रातिनिधिक उदाहरण है। हालाँकि इटली में फ़ासीवाद सत्ता में जर्मनी के मुकाबले पहले आया, लेकिन जर्मनी ही वह देश था जहाँ फ़ासीवादी उभार सबसे गहरे तक जड़ जमाये और जबरदस्त था। इसलिए हम अपना विश्लेषण जर्मनी से ही शुरू करते हैं।

जर्मनी में फ़ासीवाद

फ़ासीवादियों के बारे में अक्सर एक मिथक लोगों के दिमाग़ में होता है कि वे असांस्कृतिक, सनकी, झक्की होते हैं। जर्मनी का उदाहरण दिखलाता है कि फ़ासीवादियों की कतार में कोई पागलों या सनकियों की भरमार नहीं थी। बल्कि वहाँ बेहद पढ़े-लिखे लोगों की तादाद मौजूद थी जो समानता, जनवाद और आजादी के उसूलों के बेहद सचेतन विरोधी थे। जर्मनी में फ़ासीवादियों को तमाम सामाजिक तबकों से समर्थन प्राप्त था। इनमें नौकरशाह वर्ग, कुलीन वर्ग और पढ़े-लिखे अकादमिकों (विश्वविद्यालय, कॉलेज, स्कूल के टीचर, लेखक, पत्रकार, वकील आदि) की अच्छी-खासी संख्या शामिल थी। 1934 में करीब एक लाख लोगों को हिटलर की हत्यारी सेना ‘आइन्त्साजग्रुप्पेन ने या तो गिरफ्तार कर लिया था, या यातना शिविरों में भेज दिया था या फिर मार डाला था। आपको जानकर ताज्जुब होगा कि आइन्त्साजग्रुप्पेन के अधिकारियों का एक-तिहाई हिस्सा विश्वविद्यालयों से डिग्री प्राप्त किये हुए लोगों का था।

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जर्मनी में फ़ासीवाद को बड़े उद्योगपतियों से जबदरस्त समर्थन प्राप्त था। पूँजीपति वर्ग के जिस हिस्से ने हिटलर की राष्ट्रीय समाजवादी मजदूर पार्टी (नात्सी पार्टी) को सबसे पहले समर्थन दिया था, वह था घरेलू भारी उद्योगों का मालिक पूँजीपति वर्ग। बाद में पूँजीपति वर्ग के दूसरे सबसे बड़े हिस्से निर्यातक पूँजीपति वर्ग ने भी हिटलर को अपना समर्थन दे दिया। और इसके बाद उद्योग जगत के बचे-खुचे हिस्से ने भी नात्सी पार्टी को समर्थन दे दिया। इसके कारण साफ थे। हिटलर की नीतियों का सबसे ज्यादा फायदा बड़े पूँजीपति वर्ग को होना था। वैश्विक संकट के दौर में मजदूर आन्दोलन की शक्ति को खण्डित करके अपनी सबसे प्रतिक्रियावादी, सबसे नग्न और सबसे क्रूर तानाशाही को लागू करने के लिए जर्मनी के बड़े पूँजीपति वर्ग को जिस राजनीतिक समूह की जरूरत थी, वह था नात्सी पार्टी (जो पूँजीवाद से पैदा हुई आर्थिक-सामाजिक असुरक्षा के कारण निम्न पूँजीपति वर्गों, मध्‍यम वर्गों और मजदूर वर्ग के एक हिस्से में पनपने वाली प्रतिक्रिया का इस्तेमाल करके एक ग़ैरजनवादी, तानाशाह सत्ता स्थापित कर सके। जाहिर है, इस प्रतिक्रिया का निशाना किसी न किसी को बनाना था और जर्मनी में नात्सी पार्टी ने प्रतिक्रिया का निशाना जिन्हें बनाया वे थे नस्लीय अल्पसंख्यक, विशेष रूप से यहूदी, मजदूर व ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता (जिन्हें नात्सी पार्टी ने आर्थिक असुरक्षा और ठहराव का जिम्मेदार ठहराया) और कम्युनिस्ट। नात्सी पार्टी का फ़ासीवादी शासन अन्तिम विश्लेषण में निश्चित रूप से बड़े वित्तीय और औद्योगिक पूँजीपति वर्ग की तानाशाही का नग्नतम और क्रूरतम रूप था। इसे एक छोटे-से उदाहरण से समझा जा सकता है। जर्मन उद्योगपतियों ने नात्सी शासन के दौरान अपने कारखानों में ग़ुलामों से जमकर श्रम करवाया, जो कहने की आवश्यकता नहीं कि फ़ासीवादी राज्य उन्हें मुफ्त में मुहैया कराता था। ये दास श्रम करने वाले लोग थे हिटलर द्वारा यातना शिविरों में भेजे गये यहूदी, मजदूर, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता और कम्युनिस्ट। आम ग़ुलाम मजदूर की औसत आयु मात्र तीन महीने थी। तीन महीने इस किस्म का श्रम करने के बाद उनकी मौत हो जाया करती थी। इस ग़ुलाम श्रम का इस्तेमाल करने वाली कम्पनियों में आज के जर्मनी की तमाम प्रतिष्ठित कम्पनियाँ शामिल थीं, जैसे वोल्क्सवैगन और क्रुप। ये सिर्फ दो उदाहरण हैं। इस घिनौने कृत्य में जर्मनी के तमाम बड़े पूँजीपति शामिल थे। इन अमानवीय कृत्यों के विरुध्द लड़ने वाले लोग अधिकांश मामलों में कम्युनिस्ट थे। कम्युनिस्टों को ही सबसे बर्बर दमन का भी सामना करना पड़ा।

इतिहास गवाह है कि संकट के दौरों में, जब संसाधनों की ”कमी” (क्योंकि यह वास्तविक कमी नहीं होती, बल्कि मुनाफा-आधारित व्यवस्था द्वारा पैदा की गयी कृत्रिम कमी होती है) होती है, तभी धार्मिक और जातीय अन्तरविरोध और टकरावों के पैदा होने और बढ़ने की सम्भावना सबसे ज्यादा होती है। अगर जनता के सामने वर्ग अन्तरविरोध साफ नहीं होते और उनमें वर्ग चेतना की कमी होती है तो उनके भीतर किसी विशेष धर्म या सम्प्रदाय के लोगों के प्रति अतार्किक प्रतिक्रियावादी ग़ुस्सा भरा जा सकता है और उन्हें इस भ्रम का शिकार बनाया जा सकता है कि उनकी दिक्कतों और तकलीफों का कारण उस विशेष सम्प्रदाय, जाति या धर्म के लोग हैं। आज जिस तरह वैश्विक संकट के दौर में दुनिया भर में बेरोजगारी तेजी से बढ़ी है उसी प्रकार 1930 के दशक की मन्दी के समय भी दुनिया भर में बेरोजगारी तेजी से बढ़ी थी। शहरी ग़रीबों की संख्या में भारी बढ़ोत्तरी हुई थी। जिन देशों में औद्योगिक विकास का एक लम्बा और गहरा इतिहास था वहाँ पूँजीवादी विकास के कारण आम मेहनतकश जनता के उजड़ने की प्रक्रिया एक क्रमिक प्रक्रिया थी जो धीरे-धीरे और कई किश्तों में पूरी हुई। लेकिन जर्मनी में औद्योगिक विकास 1860-70 के पहले बेहद कम था जो राष्ट्रीय एकीकरण के बाद द्रुत गति से हुआ और उसने गाँवों में ग़रीब किसानों को और शहरों में आम मेहनतकश आबादी को इतनी तेज गति से उजाड़ा कि पूरे समाज में एक भयंकर असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल पैदा हुआ। जर्मनी में भी शहरी बेरोजगारी, और शहरी और ग्रामीण ग़रीबी में तेजी से वृध्दि हुई थी। अतिवादी नस्लवाद, सम्प्रदायवाद, या जातीयतावाद अक्सर आर्थिक और सामाजिक तौर पर उजड़े हुए लोगों के जीवन को एक ”अर्थ” प्रदान करने का काम करते हैं। यही कारण है कि ऐसे समाजों में जहाँ पूँजीवादी विकास क्रान्तिकारी प्रक्रिया के जरिये नहीं हुआ, जहाँ पूँजीवादी विकास की प्रक्रिया इतिहास के एक लम्बे दौर में फैली हुई प्रक्रिया के रूप में नहीं मौजूद थी, बल्कि एक असमान, अधूरी, और अजीब तरीके से द्रुत अराजक प्रक्रिया के रूप में घटित हुई, वहाँ फ़ासीवाद के सामाजिक आधार समाज में पैदा हुए।

जर्मनी में औद्योगीकरण की प्रक्रिया बहुत देर से शुरू हुई। इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति की शुरुआत 1780 के दशक में हो गयी थी। फ्रांस में 1860 आते-आते औद्योगिक क्रान्ति का एक दौर पूरा हो चुका था। दूसरी तरफ, इस समय तक जर्मनी एक एकीकृत देश के रूप में सामने तक नहीं आ पाया था। जर्मन एकीकरण के बाद एक जर्मन राष्ट्र राज्य अस्तित्व में आया। बिस्मार्क के नेतृत्व में पूँजीवादी विकास की शुरुआत हुई। जर्मनी में राष्ट्रीय पैमाने पर पूँजीवाद का विकास ही तब शुरू हुआ जब विश्व पैमाने पर पूँजीवाद साम्राज्यवाद, यानी कि एकाधिकारी पूँजीवाद, के दौर में प्रवेश कर चुका था। एकाधिकारी पूँजीवाद प्रकृति और चरित्र से ही जनवाद-विरोधी होता है। जर्मनी में पूँजीवादी विकास बैंकों की पूँजी की मदद से शुरू हुआ और उसका चरित्र शुरू से ही एकाधिकारी पूँजीवाद का था। नतीजतन, जर्मनी में पूँजीवाद का विकास 1880 के दशक से ही इतनी तेज गति से हुआ कि 1914 आते-आते वह यूरोप का सबसे अधिक आर्थिक वृध्दि दर वाला देश बन गया जिसका औद्योगिक उत्पादन अमेरिका के बाद सबसे अधिक था। लेकिन किसी जनवादी क्रान्ति के रास्ते पूँजीवाद के न आने के कारण समाज में जनवाद की जमीन हमेशा से ही कमजोर थी। जर्मनी के एक आर्थिक महाशक्ति के तौर पर उदय के बाद विश्व पैमाने पर साम्राज्यवादी प्रतिस्‍पर्द्धा का तीव्र होना लाजिमी था। उस समय ब्रिटेन दुनिया की सबसे बड़ी साम्राज्यवादी शक्ति था और उसका औपनिवेशिक साम्राज्य सबसे बड़ा था। जर्मनी विश्व पैमाने पर लूट का नये सिरे से बँटवारा करना चाहता था। जर्मनी की यह साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षा विश्व को पहले विश्वयुध्द की तरफ ले गयी। पहला विश्वयुध्द 1914 से 1919 तक चला जिसमें मित्र राष्ट्रों ने जर्मनी समेत धुरी राष्ट्रों को हरा दिया। वर्साई में युध्द के समाप्त होने के बाद सन्धि हुई जिसे वर्साई सन्धि के नाम से जाना जाता है। इस सन्धि में जर्मनी पर भारी शर्तें थोपी गयीं। उससे भारी युध्द हर्जाना वसूला गया। उसके सभी अधिकार-क्षेत्र उससे छीन लिये गये। उसके कुछ हिस्से अलग-अलग देशों को दे दिये गये। युध्द की समाप्ति के बाद जर्मनी की पूरी अर्थव्यवस्था छिन्न-भिन्न हो चुकी थी। इसके कारण जर्मन पूँजीवाद के समक्ष अस्तित्व का संकट पैदा हो चुका था। पुरानी विकास दर को हासिल करने के लिए जर्मन पूँजीवाद को मजदूरों के शोषण की ऐसी दर हासिल करनी पड़ती जो मजदूर आबादी को बग़ावत पर आमादा कर देती। लेकिन इसी समय जर्मन पूँजीपति वर्ग के सामने रूस का उदाहरण भी था, जहाँ साम्राज्यवादी युध्द ने सर्वहारा क्रान्ति को जन्म दिया। जर्मन पूँजीपति वर्ग को वही ग़लती करने से जर्मनी के सामाजिक जनवादियों ने बचा लिया। जर्मन बड़े पूँजीपति वर्ग के प्रतिनिधि ह्यूगो स्टिनेस और जर्मनी के सामाजिक जनवादी पार्टी के नेता कार्ल लीजन, जो ट्रेड यूनियनों और मजदूरों के प्रतिनिधि के तौर पर गये थे, के बीच एक समझौता हुआ। इस समझौते के तहत जर्मन पूँजीपति वर्ग जर्मन मजदूर वर्ग को तमाम रियायतें और सुविधाएँ देने के लिए तैयार हो गया। ये वे रियायतें व सुविधाएँ थीं जिन्हें देने के लिए जर्मन पूँजीपति वर्ग युध्द के पहले के तेजी के हालात में देने के लिए कभी तैयार नहीं होता। लेकिन अब अगर वह मजदूर वर्ग से टकराव मोल लेता तो किसी क्रान्तिकारी प्रहार को झेलने की ताकत युध्द के बाद उसमें बची नहीं थी। लेनिन ने 1919 में जर्मनी में वीमर गणराज्य के अस्तित्व में आने के बाद और जर्मन पूँजी और श्रम के बीच सामाजिक जनवादियों के मार्गदर्शन में समझौता होने के बाद ही कहा था कि जर्मन बड़े पूँजीपति वर्ग ने रूसी क्रान्ति के उदाहरण से सबक लिया और मजदूर वर्ग से सीधे तौर पर उलझने की बजाय समझौता करना उपयुक्त समझा। 1919 के जून में जर्मन लीग ऑफ इण्डस्ट्रीज के अध्‍यक्ष मण्डल के सदस्य अब्राहम फ्राउइन का यह कथन इस बात को अच्छी तरह दिखलाता है – ”सज्जनो, रूस में घटनाओं ने ग़लत मोड़ ले लिया, और शुरुआत से ही उद्योग ने क्रान्ति को खारिज किया। अगर हम – और यह काफी आसान होता – भी असहयोग की अवस्थिति अपनाते, तो मुझे पूरा यकीन है कि आज हमारे यहाँ भी वही स्थितियाँ होतीं जोकि रूस में हैं।” एक जर्मन उद्योगपति का यह कथन जर्मन संशोधनवादियों की मजदूर वर्ग से ग़द्दारी को साफ तौर पर दिखलाता है।

श्रम और पूँजी के बीच हुए समझौते ने जर्मनी में एक अन्तरविरोध को तीखा होने से कुछ समय तक के लिए टाल दिया। लेकिन इससे वह अन्तरविरोध खत्म नहीं हुआ और न ही हो सकता था। युध्द के बाद जर्मन पूँजी को श्रम के और तेज रफ्तार से शोषण की जरूरत थी। लेकिन जर्मन पूँजीवाद को बचाने के लिए मजदूर वर्ग को कई रियायतें देना पूँजीपति वर्ग की मजबूरी थी। इसके कारण जनवाद के सबसे धुर शत्रु वर्गों को अपने कई विशेषाधिकारों का परित्याग करना पड़ा। इन वर्गों में जर्मनी का युंकर वर्ग (धनी किसान वर्ग, जो पहले सामन्ती जमींदार हुआ करता था और जिसे क्रमिक भूमि सुधारों के रास्ते पूँजीवादी भूस्वामी वर्ग में तब्दील कर दिया गया) और जर्मनी का बड़ा पूँजीपति वर्ग जिसमें प्रमुख थे घरेलू भारी उद्योग के मालिक पूँजीपति। इन वर्गों का मजदूर वर्ग के साथ अन्तरविरोध समय-समय पर सिर उठाता रहता था, लेकिन संगठित मजदूर आन्दोलन के कारण हिटलर के आने से पहले के समय तक ये वर्ग मजदूरों का नग्न दमन और शोषण शुरू नहीं कर पाये। 1924 तक इन वर्गों की तरफ से कुछ तख्तापलट की कोशिशें भी हुईं जिनका लक्ष्य मजदूर वर्ग पर बुर्जुआ वर्ग की हिंस्र तानाशाही लागू करना था। लेकिन इनके बावजूद जर्मन प्रतिक्रियावादी बड़ा पूँजीपति वर्ग सफल नहीं हो पाया। 1924 से 1929 तक का दौर जर्मन पूँजीवाद में तुलनात्मक स्थिरता का दौर था जिसमें श्रम और पूँजी के बीच का समझौता कम-से-कम ऊपरी तौर पर सुगम रूप से चला और मजदूर वर्ग ने अपनी सहूलियतों और रियायतों को कायम रखा। लेकिन 1929 में महामन्दी आयी और उसने जर्मन पूँजीपति वर्ग को भारी धक्का दिया। इस धक्के के कारण जर्मन पूँजीपति वर्ग के लिए मुनाफे की दर को सम्मानजनक स्तर पर बनाये रख पाना असम्भव हो गया और यहीं से उस राजनीतिक संकट की शुरुआत हुई, जिसने अन्तत: हिटलर के नेतृत्व में नात्सी पार्टी को 1933 में सत्ता में पहुँचा दिया। 1927 तक जर्मनी ने अपना औद्योगिक उत्पादन उसी स्तर पर पहुँचा दिया था जिस स्तर पर वह प्रथम विश्वयुध्द से पहले था और जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी और दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी औद्योगिक महाशक्ति बन चुका था। लेकिन अन्दर से जर्मन पूँजीवाद मजदूर आन्दोलन के साथ समझौते के दबाव के कारण अभी भी उतना ही अस्थिर था। जर्मन पूँजीपति वर्ग की साम्राज्यवादी महत्वाकांक्षाएँ फिर से जोर मारने लगी थीं और जर्मन पूँजीपति वर्ग के कई प्रतिनिधियों की ओर से फिर से युद्धोन्मादी और अन्धराष्ट्रवादी नारे सुनायी देने लगे थे। विश्व स्तर पर साम्राज्यवादी प्रतिस्‍पर्द्धा में फिर से अपने वर्चस्व को स्थापित करने के लिए अब जर्मन पूँजीपति वर्ग को खुले हाथ की जरूरत थी, जिसके कारण मजदूर वर्ग से समझौते को खारिज कर देने का दबाव बढ़ता जा रहा था। यही कारण था कि जर्मन नेशनल पीपुल्स पार्टी और सेण्टर पार्टी के नेतृत्व में अन्धराष्ट्रवादी नेताओं की विजय हुई। 1928 में नात्सी पार्टी को चुनावों में काफी सफलता प्राप्त हुई। 1929 में महामन्दी की शुरुआत के बाद जर्मन पूँजीपति वर्ग के लिए मजदूरों को दी गयी सभी रियायतों को रद्द करना अस्तित्व का प्रश्न बन गया। अब वे इन रियायतों का खर्च नहीं उठा सकते थे। महामन्दी के कारण देश में बेरोजगारी और ग़रीबी तेजी से बढ़ी लेकिन मजदूर आबादी की मोलभाव करने की क्षमता इससे कम नहीं हुई क्योंकि उनका प्रतिरोध संगठित था। नतीजतन, महामन्दी का पूरा दबाव पूँजीपति वर्ग पर पड़ने लगा और उसके मुनाफे की दर में तेजी से कमी आयी। मजदूर वर्ग के खिलाफ कोई आक्रामक रवैया न अपना पाने के कारण आर्थिक संकट के दबाव को निम्न मध्‍यवर्ग और मध्‍यम वर्गों की ओर निर्देशित कर दिया गया। संकट के कारण जो वर्ग सबसे तेजी से तबाह होकर सड़कों पर आ रहा था वह था छोटे उद्योगपतियों और व्यापारियों का वर्ग। कारण यह था कि वह श्रम के शोषण की दर को बढ़ा पाने में पूरी तरह अक्षम था।

बड़े पूँजीपति वर्ग को इस समय किसी ऐसी राजनीतिक शक्ति की आवश्यकता थी जो तबाह हो रहे निम्न मध्‍यम वर्ग, आम शहरी मेहनतकश आबादी के एक हिस्से, मध्‍यम वर्गों की प्रतिक्रिया के निशाने पर संगठित मजदूर आन्दोलन को ला सके और उन्हें इस बात पर सहमत कर सके कि सारी दिक्कत की जड़ कम्युनिस्ट, ट्रेड यूनियन और संगठित मजदूर आबादी है। इस काम को नात्सी पार्टी से बेहतर कोई अंजाम नहीं दे सकता था।

इस संकट के दौर में यदि कोई क्रान्तिकारी नेतृत्व मजदूर आन्दोलन को मौजूदा व्यवस्था से बाहर ले जाने की ओर आगे बढ़ा पाता तो तस्वीर कुछ और होती, लेकिन सामाजिक जनवादियों की जकड़बन्दी में मजदूर आन्दोलन बस मिली हुई रियायतों और सहूलियतों से चिपके रहना चाहता था, उससे आगे नहीं जाना चाहता था। या यूँ कहें कि सामाजिक जनवादी नेतृत्व ने उसे पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर मिले सुधारों को ही बचाये रखने को प्रेरित किया, उससे आगे जाने को नहीं। लेकिन इन सुधारों को कायम रखने के लिए जर्मन पूँजीपति वर्ग अब तैयार नहीं था क्योंकि अब यह उसकी मजबूरी नहीं रह गया था और यह उसके लिए अब सम्भव भी नहीं रह गया था। वह हमले के लिए तैयार था। लेकिन मजदूर वर्ग वहीं का वहीं खड़ा रह गया। नतीजा यह हुआ कि आर्थिक संकट बढ़ने के साथ संगठित मजदूर वर्ग से बाहर की मजदूर आबादी, निम्न मध्‍यमवर्गीय आबादी और मध्‍यम वर्गीय आबादी के समक्ष बेरोजगारी, असुरक्षा और अनिश्चितता का संकट बढ़ता गया जिसने उस प्रतिक्रिया को जन्म दिया जिसका इस्तेमाल नात्सियों ने किया। इसी प्रतिक्रिया को उन्होंने एक नस्लवादी शक्ल भी दे दी क्योंकि इसके बिना उतने बड़े पैमाने पर प्रतिक्रियावादी गोलबन्दी सम्भव नहीं थी। नतीजतन, इस तमाम अनिश्चितता और असुरक्षा के लिए यहूदियों को जिम्मेदार ठहराया गया।

दूसरी ओर सामाजिक जनवादियों ने युंकरों और धनी किसानों के प्रभुत्व को कृषि क्षेत्र में तोड़ने वाले भूमि सुधारों के लिए भी सत्ता पर दबाव नहीं डाला। ग़ौरतलब है कि यह दबाव डालने के लिए सामाजिक जनवादियों के पास पर्याप्त ताकत थी। इसकी मिसाल तब देखने को मिली थी जब 1926 में राजकुमारों को राज्य से मिलने वाले खर्च को खत्म करने के लिए उन्होंने सफल आन्दोलन चलाया था। इसी जनवादीकरण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए वे रैडिकल भूमि सुधारों के जरिये शासक वर्गों के सबसे प्रतिक्रियावादी हिस्से ईस्ट एल्बे के युंकरों के प्रभुत्व को तोड़कर शासक वर्ग की ताकत को कमजोर कर सकते थे। ऐसा इसलिए भी आसान था क्योंकि युंकरों और बड़े पूँजीपति वर्ग और बैंकों के बीच पहले से ही अन्तरविरोध मौजूद थे। लेकिन सामाजिक जनवादियों ने ऐसा नहीं किया और बस मजदूर आन्दोलन को मिली रियायतों से चिपके रहने के हिमायती बने रहे। मिली हुई सहूलियतों को कायम रखने के लिए सामाजिक जनवादी बड़े पूँजीपति वर्ग की शर्तों पर उस समझौते को कायम रखना चाहते थे। जबकि पूँजीपति वर्ग इन सहूलियतों को खत्म कर अपना हमला करने की तैयारी कर चुका था। 1926 में पॉल सिल्वरबर्ग ने एक वक्तव्य जर्मन लीग ऑफ इण्डस्ट्रीज में दिया, जो ग़ौरतलब है। उन्होंने कहा, सामाजिक जनवाद को वास्तविकता में लौट आना चाहिए और रैडिकल सिद्धान्तवाद छोड़कर हमेशा नुकसानदेह रही सड़क और बल की नीति को छोड़ देना चाहिए। उसे जिम्मेदार तरीके से मालिकों के साथ उनके निर्देशन में सहयोग करना चाहिए। अब जरा इस कथन की तुलना बुद्धदेब भट्टाचार्य के उस कथन से कीजिये जो उन्होंने कुछ समय पहले ट्रेड यूनियन करने वालों की एक बैठक में दिया था। इसमें बुद्धदेब भट्टाचार्य ने कहा कि कम्युनिस्टों को बदले हालात को समझना चाहिए और मालिकों से सहयोग करना चाहिए। वर्ग संघर्ष का दौर अब बीत चुका है। आज श्रम को पूँजी के साथ विकास के लिए उसकी शर्तों पर सहयोग करना चाहिए!

1929 में जर्मन पूँजीपति वर्ग ने पहला बड़ा हमला करते हुए रेड फ्रण्‍ट यूनियन पर प्रतिबन्ध लगा दिया। दूसरी ओर नात्सियों के गुण्डों और हत्यारों के दस्ते छुट्टे घूम रहे थे। सामाजिक जनवादी चुप रहे। इसके बाद 1932 तक ऐसे हमले जारी रहे और सामाजिक जनवादी हाथ पर हाथ धरे बैठे रहे। कारण यह था कि इसका जवाब क्रान्तिकारी रास्ते से ही दिया जा सकता था और उस रास्ते पर सर्वहारा वर्ग के ग़द्दार संशोधनवादी चल नहीं सकते थे। अपनी इस चुप्पी से सामाजिक जनवादी उस संगठित मजदूर आन्दोलन में भी अपना आधार खोते गये जो उनका गढ़ था। मजदूर आबादी का भी एक हिस्सा नात्सियों के शिविर की ओर जाने लगा। नतीजा यह हुआ कि 1932 में वॉन पेपन नामक दक्षिणपन्थी नेता के नेतृत्व में तख्तापलट हुआ और वह गठबन्धन सरकार गिर गयी जिसका प्रमुख हिस्सा सामाजिक जनवादी थे। कुछ ही समय में वीमर गणराज्य के बुर्जुआ जनवादी संविधान की ही खामियों का फायदा उठाकर एक इनेबलिंग एक्ट लाया गया और संसदीय जनतन्त्र को तानाशाही में तब्दील कर दिया गया। संसद में सामाजिक जनवादियों और बुर्जुआ उदारवादियों के खिलाफ मुख्य तौर पर दो पार्टियाँ साथ आ गयीं – नेशनल जर्मन पीपुल्स पार्टी और नात्सी पार्टी। चुनावों के पहले सामाजिक जनवादियों और उदारवादियों के खिलाफ जबरदस्त प्रचार अभियान चलाया गया। उन्हें देशद्रोही और संकट का जिम्मेदार बताया गया। 1932 के चुनावों में इन दोनों पार्टियों को मिलाकर 42 प्रतिशत वोट मिले जिसमें से 33 प्रतिशत नात्सी पार्टी के थे। 1933 में फिर से चुनाव हुए जिसमें नात्सी पार्टी को अकेले 44 प्रतिशत वोट मिले। इसके साथ ही हिटलर सत्ता में आया और जर्मनी में फ़ासीवाद को विजय हासिल हुई।

जर्मनी में फ़ासीवाद की विजय के इस संक्षिप्त इतिहास पर निगाह डालने के बाद हम कुछ नतीजों को बिन्दुवार समझ सकते हैं।

जर्मनी में फ़ासीवाद की जमीन किस रूप में मौजूद थी? जर्मनी में पूँजीवादी विकास देर से शुरू हुआ। लेकिन शुरू होने के बाद यह बेहद द्रुत गति से हुआ और बिना किसी बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के हुआ। नतीजतन, दो परिघटनाएँ सामने आयीं। एक, पिछड़ापन तमाम क्षेत्रों और तमाम रूपों में छूट गया और आधुनिकीकरण और जनता की चेतना के जनवादीकरण के बिना ही अद्वितीय रफ्तार से पूँजीवादी विकास हुआ। इंग्लैण्ड और फ्रांस जैसे देशों में पूँजीवाद क्रान्तिकारी प्रक्रिया से आया और उसके बाद उसका एक लम्बा और गहराई से पैठा विकास हुआ जिसने सामन्ती और ग़ैर-जनवादी रुझानों को समाज के पोर-पोर से समाप्त कर दिया। दूसरी परिघटना यह थी कि इस तीव्र पूँजीवादी विकास ने जिस रफ्तार से गाँवों और शहरों में मेहनतकश जनता को उसकी जगह-जमीन से उजाड़ा, उसने भयंकर असुरक्षा और अनिश्चितता को जन्म दिया। कहने की आवश्यकता नहीं कि इस असुरक्षा और अनिश्चितता को पूँजीवादी व्यवस्था के खिलाफ एक क्रान्तिकारी ताकत में तब्दील किया जा सकता था। लेकिन सामाजिक जनवादी आन्दोलन की सर्वहारा वर्ग के साथ ग़द्दारी और जर्मन कम्युनिस्ट पार्टी की असफलता के कारण ऐसा नहीं हो सका। नात्सीवाद द्रुत गति से हुए उस पूँजीवादी विकास का प्रतिक्रियावादी जवाब था जिसने करोड़ों लोगों को आर्थिक-सामाजिक और भौगोलिक रूप से विस्थापित कर दिया था।

जर्मनी में भूमि सुधार क्रान्तिकारी तरीके से नहीं हुए, जिसमें जोतने वाले को ही जमीन का मालिक बना दिया गया हो। वहाँ प्रशियाई रास्ते से भूमि सुधार हुए जिसमें सामन्ती भूस्वामियों को ही पूँजीवादी कुलकों और फार्मरों में तब्दील हो जाने दिया गया। यह वर्ग भयंकर प्रतिक्रियावादी वर्ग था। इसके अलावा अधूरे भूमि सुधारों से एक धनी काश्तकारों का वर्ग पैदा हुआ। ये वर्ग पूँजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ गहराई से जुड़े हुए थे और अन्दर से धुर जनवाद-विरोधी थे। पूँजीवादी व्यवस्था के संकट के कारण पैदा हुई प्रतिक्रिया का एक अहम हिस्सा ये वर्ग थे। ये वर्ग नात्सी पार्टी के सामाजिक आधार बने। युंकरों के विशेषाधिकारों के बचे रहने के कारण सामाजिक जनवादियों का आम किसान आबादी में कोई आधार नहीं बन पाया। यह किसान आबादी फ़ासीवादी उभार के दौर में या तो निष्क्रिय पड़ी रही या फ़ासीवादियों की समर्थक बनी। उसे भी अपनी अनिश्चितता का इलाज एक फ़ासीवादी सत्ता में नजर आ रहा था। जाहिर है, बाद में यह एक भ्रम साबित हुआ, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी थी।

1919 के बाद वीमर गणराज्य की शुरुआत के साथ जो राज्य अस्तित्व में आया, वह एक कल्याणकारी राज्य था। कल्याणकारी नीतियाँ जर्मन पूँजीपति वर्ग की मजबूरी थीं, क्योंकि युध्द के बाद मजदूर आन्दोलन के साथ वह सीधा टकराव नहीं मोल ले सकता था और रूस का उदाहरण उसके सामने था। यह समझ बनाने में सामाजिक जनवादियों ने पूँजीपति वर्ग की काफी मदद की। मजदूर वर्ग को तमाम रियायतें दी गयीं। लेकिन पूँजीवादी विकास की अपनी एक गति होती है। मुनाफे की दर को बढ़ाते जाना साम्राज्यवादी दुनिया में जर्मन पूँजीपति वर्ग के लिए अस्तित्व की शर्त थी। मजदूर वर्ग को दी गयी छूटें उसके लिए जल्दी ही बोझ बन गयीं। कल्याणकारी नीतियाँ मुनाफे की दर पर एक ब्रेक के समान थीं। वित्तीय, औद्योगिक पूँजीपति वर्ग और कुलकों-युंकरों को जल्दी ही एक तानाशाह सत्ता की जरूरत महसूस होने लगी जो मजदूर वर्ग पर उनकी नग्न और क्रूर तानाशाही को लागू कर सके।

सामाजिक जनवाद ने मजदूर आन्दोलन को सुधारवाद की गलियों में ही घुमाते रहने का काम किया। उसने पूँजीवाद का कोई विकल्प नहीं दिया और साथ ही पूँजीवाद के भी पैरों में बेड़ी बन गया। उसका कुल लक्ष्य था पूँजीवादी जनवाद के भीतर रहते हुए वेतन-भत्ता बढ़वाते रहना और जो मिल गया है उससे चिपके रहना। लेकिन अगर पूँजीवादी व्यवस्था मुनाफा पैदा ही न कर पाये तो क्या होगा? इस सवाल का उनके पास कोई जवाब नहीं था। वे यथास्थिति को सदा बनाये रखने का दिवास्वप्न पाले हुए थे। जबकि पूँजीवाद की नैसर्गिक गति कभी ऐसा नहीं होने देती। पूँजीपति वर्ग को मुनाफे की दर बढ़ानी ही थी। उसका टिकाऊ स्रोत एक ही था – मजदूरों के शोषण को बढ़ाना। वह संगठित मजदूर आन्दोलन के बूते पर सामाजिक जनवादी करने नहीं दे रहे थे। अब मुनाफे की दर को बढ़ाने का काम पूँजीपति वर्ग जनवादी दायरे में रहकर नहीं कर सकता था। बड़े पूँजीपति वर्ग को एक सर्वसत्तावादी राज्य की आवश्यकता थी जो उसे वीमर गणराज्य नहीं दे सकता था, जो श्रम और पूँजी के समझौते पर टिका था। यह काम नात्सी पार्टी ही कर सकती थी।

पूँजीवादी राजसत्ता का काम होता है पूँजीवादी उत्पादन के सुचारू रूप से चलते रहने की गारण्टी करना और पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धों की हिफाजत करना। राजसत्ता के जरिये पूँजीपति वर्ग अपने वर्ग हितों को संगठित करता है और व्यक्तिगत पूँजीवादी हितों से ऊपर उठता है। बीच-बीच में आपसी अन्तरविरोध अधिक बढ़ते हैं, अराजकता फैलती है और राजसत्ता अपने हस्तक्षेप से चीजों को फिर से सही स्थान पर पहुँचाती है। साथ ही पूँजीवादी राजसत्ता मेहनतकश जनता को एक वर्ग के रूप में संगठित नहीं होने देती और उन्हें किसी राष्ट्र, समुदाय या धर्म के सदस्य के रूप में, यानी एक नागरिक के तौर पर अस्तित्वमान रखने का प्रयास करती है। वीमर गणराज्य के दौरान जर्मनी में पूँजीवादी राजसत्ता बुर्जुआ वर्गों के हितों को संगठित कर पाने में असफल रहा। कल्याणकारी नीतियों ने पूँजीपति वर्ग की राजनीतिक और आर्थिक एकता को तोड़ दिया। संकट के दौरों में पूँजीवादी हितों और जनता के हितों के बीच तारतम्य बैठा पाना कठिन हो जाता है। वहीं जनता की राजसत्ता से उम्मीदें बढ़ जाती हैं। जबकि राजसत्ता उन्हें पूरा कर पाने में और अधिक असमर्थ हो चुकी होती है। ऐसे में बुर्जुआ वर्ग के कुछ हिस्से राजसत्ता से अपने पक्ष में तानाशाहीपूर्ण रवैया अपनाने की उम्मीद रखते हैं। ऐसा न होने पर बड़ा पूँजीपति वर्ग अधिक से अधिक प्रतिक्रियावादी और अनुदार होता जाता है। वीमर गणराज्य में यही हुआ। श्रम और पूँजी के बीच का सामाजिक जनवादी समझौता राजसत्ता को बड़े पूँजीपति वर्ग की जरूरतों के मुताबिक खुलकर काम नहीं करने दे रहा था जिससे पूँजीवादी संकट गहराता जा रहा था। इस संकट के कारण जनता का एक खासा बड़ा हिस्सा उजड़ता जा रहा था और उसमें भी असन्तोष पैदा हो रहा था। बड़े पूँजीपति वर्ग ने नात्सी पार्टी के जरिये इसी असन्तोष का लाभ उठाया और उसे प्रतिक्रिया की लहर में तब्दील कर दिया। नात्सी पार्टी ने इसके लिए यहूदी-विरोध, नस्लीय श्रेष्ठता, कम्युनिज्म-विरोध, जनवाद-विरोध जैसे सिद्धान्तों का सहारा लिया।

सामाजिक जनवादियों के जुझारू अर्थवाद और ट्रेडयूनियनवाद के कारण मजदूरी बढ़ती रही, लेकिन पूँजीवादी संकट के कारण मुनाफे की दर ठहरावग्रस्त रही। इसके कारण एक लाभ संकुचन की स्थिति पैदा हो गयी। इसके कारण जो वर्ग सबसे पहले तबाह हुआ, वह था छोटे उद्यमियों का वर्ग। यह वर्ग आगे चलकर फ़ासीवाद का सबसे तगड़ा समर्थक बना। यह बात दीगर है कि फ़ासीवाद ने उसे बाद में कुछ भी नहीं दिया और वह पूरी तरह इजारेदार पूँजीवाद की सेवा में लगा रहा। बड़ा पूँजीपति वर्ग तबाह होकर सड़क पर तो नहीं आया लेकिन अगर वह नात्सी उभार का समर्थन नहीं करता तो सड़क पर आ जाता क्योंकि उसे अपने मुनाफे में भारी कमी का सामना करना पड़ रहा था। संगठित मजदूर आन्दोलन के कारण पूँजीपति वर्ग पर जो दबाव पड़ रहा था उसका अन्दाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि 1928 में कुल राष्ट्रीय उत्पाद का 67 प्रतिशत हिस्सा मजदूरों को मजदूरी के रूप में दिया जा रहा था। संकट के दौर में बढ़ी बेरोजगारी के बावजूद पूँजीपति वर्ग की मोलभाव करने की ताकत में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई क्योंकि एक मजबूत और जुझारू मजदूर आन्दोलन मौजूद था। कुलकों और युंकरों ने अपने विशेषाधिकारों को कायम रखने और संकट के दौर से निपटने के लिए नात्सियों का समर्थन किया। लेकिन यह मजबूत मजदूर आन्दोलन सामाजिक जनवाद के नेतृत्व में पूँजीवादी सुधारवाद की अन्धी गली में ही भटकता रह गया। पूँजीपति वर्ग को आक्रामक होने की पहल तोहफे के रूप में दे दी गयी और फ़ासीवाद का प्रतिरोध्‍य उभार अप्रतिरोध्‍य बन गया।

इटली में फ़ासीवाद 

इटली में फ़ासीवाद की हमारी चर्चा के इतना विस्तृत होने की कोई आवश्यकता नहीं है। हम यहाँ उन कारकों की चर्चा करेंगे जिनके मामले में इटली में फ़ासीवादी उभार जर्मनी से अलग था।

इटली में फ़ासीवादी आन्दोलन की शुरुआत 1919 में हुई। युद्ध की समाप्ति के बाद इटली के मिलान शहर में बेनिटो मुसोलिनी ने फ़ासीवादी आन्दोलन की शुरुआत करते हुए एक सभा बुलायी। इस सभा में कुल जमा करीब 100 लोग इकट्ठा हुए। इसमें से अधिकांश युद्ध में भाग लेने वाले नौजवान सिपाही थे। पहले विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों की तरफ से युद्ध में हिस्सा लेने के बावजूद इटली को उसका उचित पुरस्कार नहीं मिला जबकि युद्ध में उसे काफी क्षति उठानी पड़ी थी। इससे पूरे देश में एक प्रतिक्रिया का माहौल था, ख़ासकर सैनिकों के बीच। दूसरी तरफ, देश की आर्थिक स्थिति बुरी तरह से डावाँडोल थी। सरकार एकदम अप्रभावी और कमज़ोर थी और कोई भी कदम नहीं उठा पा रही थी। एक ऐसे समय में मुसोलिनी ने फ़ासीवादी आन्दोलन की शुरुआत की। मुसोलिनी ने इस सभा में खुले तौर पर ऐलान किया कि फ़ासीवाद मार्क्‍सवाद, उदारवाद, शान्तिवाद और स्वतन्त्रता का खुला दुश्मन है। यह राजसत्ता के हर शक्ति से ऊपर होने, उग्र राष्ट्रवाद, नस्ली श्रेष्ठता, युद्ध, नायकवाद, पवित्रता और अनुशासन में यकीन करता है। आर्थिक और सामाजिक तौर पर बिखरे हुए और असुरक्षा और अनिश्चितता का सामना कर रहे एक राष्ट्र को ऐसे जुमले आकृष्ट करते हैं, ख़ासतौर पर तब, जबकि कोई क्रान्तिकारी सम्भावना उनकी दृष्टि में न हो। फ़ासीवाद के आर्थिक और सामाजिक आधारों के बारे में हम आगे चर्चा करेंगे। पहले उसके वैचारिक आधारों की बात कर लें। मुसोलिनी पहले इतालवी समाजवादी पार्टी में शामिल था। 1903 से 1914 तक वह समाजवादी पार्टी का एक महत्वपूर्ण नेता था। इसके बाद वह जॉर्ज सोरेल नामक एक संघाधिपत्यवादी चिन्तक के प्रभाव में आया, जो कहता था कि संसदीय जनतन्त्र नहीं होना चाहिए और श्रम संघों द्वारा सरकार चलायी जानी चाहिए। मुसोलिनी पर दूसरा गहरा प्रभाव फ्रेडरिख नीत्शे नामक जर्मन दार्शनिक का था, जो मानता था कि इतिहास में अतिमानव और नायकों की केन्द्रीय भूमिका होती है, जिनमें सत्ता प्राप्त करने की इच्छाशक्ति होती है। इन सारे विचारों का मेल करके ही इटली में जेण्टाइल नामक फ़ासीवादी चिन्तक की सहायता से मुसोलिनी ने पूरे फ़ासीवादी सिद्धान्त की रचना की। यह सिद्धान्त मज़दूर-विरोधी, पूँजी के पक्ष में खुली तानाशाही, अधिनायकवाद, जनवाद-विरोध, कम्युनिज्म-विरोध और साम्राज्यवादी विस्तार की खुले तौर पर वकालत करता था।

लेकिन यह सिद्धान्त कोई जेण्टाइल और मुसोलिनी के दिमाग़ की उपज नहीं था। यदि जेण्टाइल व मुसोलिनी न होते तो कोई और होता क्योंकि समाज में इस प्रकार एक प्रतिक्रियावादी विचार और आन्दोलन की ज़मीन मौजूद थी। इस ज़मीन को समझकर ही इटली में फ़ासीवादी उभार को समझा जा सकता है।

जर्मनी के समान इटली में भी पूँजीवादी विकास बहुत देर से शुरू हुआ। इटली का एकीकरण 1861 से 1870 के बीच हुआ। जैसाकि हम पिछले उपशीर्षक में ही बता चुके हैं, इस समय तक ब्रिटेन, फ्रांस और हॉलैण्ड जैसे देश पूँजीवादी विकास की एक लम्बी यात्रा तय कर चुके थे और औद्योगिक क्रान्ति को भी अंजाम दे चुके थे। इन देशों में रैडिकल भूमि-सुधार लागू किये गये थे। पूँजीवादी विकास एक लम्बी प्रक्रिया में हुआ था, जिसके कारण इससे पैदा होने वाले सामाजिक तनाव को व्यवस्था जनवादी दायरे के भीतर रहते हुए ही झेल सकती थी। इटली में 1890 के दशक में औद्योगीकरण की शुरुआत हुई और जर्मनी के ही समान इसकी रफ्तार काफी तेज़ रही। जर्मनी से अलग इटली में यह विकास क्षेत्रीय तौर पर बहुत असमानतापूर्ण रहा। उत्तरी इटली में मिलान, तूरिन और रोम से बनने वाले त्रिभुजाकार इलाके में उद्योगों का ज़बरदस्त विकास हुआ और एक मज़दूर आन्दोलन भी पैदा हुआ जिसका नेतृत्व पहले इतालवी समाजवादी पार्टी कर रही थी और बाद में इसके नेतृत्व में इतालवी कम्युनिस्ट पार्टी का भी प्रवेश हुआ। उत्तरी इटली के क्षेत्रों में भूमि-सुधार भी एक हद तक लागू हुए और कृषि का वाणिज्यीकरण हुआ जिसके कारण कृषि में पूँजीवादी विकास हुआ। नतीजतन, औद्योगिक और कृषि क्षेत्र, दोनों में ही एक मज़दूर आन्दोलन पैदा हुआ। दूसरी ओर दक्षिणी इटली था जहाँ सामन्ती उत्पादन सम्बन्‍धों का वर्चस्व कायम था। यहाँ कोई भूमि-सुधार लागू नहीं हुए थे और बड़ी-बड़ी जागीरें थीं जिन पर विशाल भूस्वामियों का कब्ज़ा था। इसके अतिरिक्त, छोटे किसानों और खेतिहर मज़दूरों की एक विशाल आबादी थी जो पूरी तरह इन बड़े भूस्वामियों के नियन्त्रण में थी। इस नियन्त्रण को ये भूस्वामी अपने सशस्त्र गिरोहों द्वारा कायम रखते थे। इन्हीं गिरोहों को इटली में माफिया कहा जाता था जो बाद में स्वायत्त शक्ति बन गये और पैसे के लिए लूटने, मारने और चोट पहुँचाने का काम करने लगे। फ़ासीवादियों ने इन माफिया गिरोहों का ख़ूब लाभ उठाया। दक्षिणी इटली में औद्योगिक विकास न के बराबर था। इस फर्क के बावजूद, या यूँ कहें कि इसी फर्क के कारण फ़ासीवादियों को दो अलग-अलग प्रकार के प्रतिक्रियावादी वर्गों का समर्थन प्राप्त हुआ। वह कैसे हुआ इस पर हम बाद में आते हैं, पहले उस प्रक्रिया पर निगाह डालें जिसके ज़रिये मुसोलिनी सत्ता में आया।

1896 में इटली को इरिट्रिया से अपने साम्राज्य को इथियोपिया तक फैलाने के प्रयास में अडोवा नामक जगह पर एक शर्मनाक पराजय का सामना करना पड़ा। इसके कारण देश में चार वर्षों तक एक भयंकर अस्थिरता का माहौल पैदा हो गया। लेकिन 1900 से 1914 तक के दौर में उदारवादी पूँजीवादी प्रधानमन्त्री गियोवान्नी गियोलिटी के नेतृत्व में थोड़ी स्थिरता वापस लौटी और इटली में औद्योगिक विकास ने और गति पकड़ी। 1913 में सर्वमताधिकार के आधार पर इटली में पहले आम चुनाव आयोजित किये गये। लेकिन यह जनवादी संसदीय व्यवस्था अभी अपने पाँव जमा ही पायी थी कि 1915 में इटली ने मित्र राष्ट्रों की तरफ से प्रथम विश्वयुद्ध में प्रवेश किया। इसके बाद इटली में जो अस्थिरता पैदा हुई, उसने संसदीय व्यवस्था को जमने ही नहीं दिया। अक्टूबर 1917 में इटली कापोरेट्टो नामक जगह पर बुरी तरह हारते-हारते बचा। युद्ध के बाद इटली को कुछ ख़ास हासिल नहीं हुआ। इन सभी कारकों की वजह से पूरा देश विभाजित था। इसका प्रमुख कारण इटली का आर्थिक रूप से छिन्न-भिन्न हो जाना भी था। 1919 में जो चुनाव हुए, उसमें किसी को पूर्ण बहुमत नहीं मिला। समाजवादियों और उदारवादियों को सबसे अधिक वोट मिले थे, लेकिन वे साथ में सरकार बनाने को तैयार नहीं थे। समाजवादियों ने 1919 में बोल्शेविक क्रान्ति के प्रभाव में वक्त से पहले ही सशस्त्र संघर्ष शुरू कर दिया। 1919-20 में इटली की पो घाटी में यह संघर्ष काफी आगे तक गया। समाजवादियों ने कई शहरों पर एक तरह से कब्ज़ा कर लिया था। ऐसा लग रहा था कि इटली एक गृहयुद्ध की कगार पर खड़ा है। लेकिन समाजवादियों ने इस उभार को सँभाल पाने के लिए न अपनी तैयारी की थी और न ही जनता की। नतीजतन, यह उभार कुचल दिया गया। इसे कुचलने में जहाँ बुर्जुआ राजसत्ता ने एक भूमिका निभायी, वहीं फ़ासीवादी सशस्त्र गिरोहों ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1919 के चुनावों में फ़ासीवादियों को कोई विशेष सफलता नहीं मिली थी। लेकिन 1919-20 के मज़दूर उभार ने सम्पत्तिधारी वर्गों के दिल में एक ख़ौफ पैदा कर दिया था। रूस में जो कुछ हुआ था, वह उनके सामने था। ऐसे मौके पर उन्हें किसी ऐसी ताकत की ज़रूरत थी जो मज़दूर उभार को कुचलने के लिए एक वैकल्पिक गोलबन्दी कर सके। यह वायदा मुसोलिनी ने उनसे किया। मुसोलिनी ने उद्योगपतियों से वायदा किया कि अगर वे उसे समर्थन देते हैं तो वह औद्योगिक अनुशासन को फिर से स्थापित करेगा। इसके बाद से ही मुसोलिनी को उद्योगपतियों से भारी आर्थिक मदद मिलनी शुरू हुई जिसके बूते पर फ़ासीवादियों ने ज़बरदस्त प्रचार किया और जनता के दिमाग़ में ज़हर घोला। शहरों में फ़ासीवादियों के सशस्त्र दस्तों ने मज़दूर कार्यकर्ताओं, ट्रेडयूनियनिस्टों, कम्युनिस्टों, हड़तालियों आदि पर हमले और उनकी हत्याएँ करनी शुरू कीं। फ़ासीवाद पूँजी, और विशेषकर बड़ी पूँजी की सेवा में अपने हरबे-हथियारों के साथ हाज़िर था।

दक्षिणी इटली में बड़े भूस्वामी अपने तईं स्वयं फ़ासीवादी तरीकों से किसानों और खेतिहर मज़दूरों के संघर्ष का दमन कर रहे थे। फ़ासीवाद की यह किस्म जल्दी ही मुसोलिनी के फ़ासीवाद में समाहित हो गयी और बड़ा भूस्वामी वर्ग मुसोलिनी का एक बड़ा समर्थक बनकर उभरा। 1920 के अन्त में एक अन्य प्रतिद्वन्द्वी फ़ासीवादी संगठन जिसका नेता गेब्रियेल दि’ अनुंसियो था, मुसोलिनी की फ़ासीवादी धारा में शामिल हो गया। 1921 तक इतालवी समाजवादी पार्टी द्वारा बिना किसी तैयारी के किया गया सशस्त्र विद्रोह कुचला जा चुका था। शहरों में कायम हुआ मज़दूर नियन्त्रण योजना और हथियारबन्द तैयारी के अभाव में कुचला जा चुका था। फ़ासीवादी आन्दोलन की बढ़त स्पष्ट रूप से हासिल हो चुकी थी। अक्टूबर 1922 में मुसोलिनी ने नेपल्स में फ़ासीवादी पार्टी की कांग्रेस में निर्णय लिया कि फ़ासीवादी रोम पर चढ़ाई करेंगे। फ़ासीवादी सशस्त्र गिरोहों ने रोम पर चढ़ाई शुरू कर दी। राजा विक्टर इमानुएल तृतीय ने घुटने टेक दिये और मुसोलिनी को सरकार बनाने के लिए आमन्त्रित किया और इसके साथ 1922 में मुसोलिनी इटली का प्रधानमन्त्री बना। उसने एक गठबन्‍धन सरकार गठित की जिसमें इतालवी संशोधनवादी शामिल थे, जिस पर कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए! उनका मानना था कि मुसोलिनी को वे उदारवादी धारा का अंग बना लेंगे। इतिहास ने उनकी इस इच्छा को मूर्खतापूर्ण साबित किया।

1924 के चुनावों में फ़ासीवादी पार्टी को 65 प्रतिशत वोट प्राप्त हुए। हालाँकि, सामाजिक जनवादी नेता मात्तिओत्ती ने संसद में प्रमाण सहित साबित किया कि चुनाव में फ़ासीवादियों ने घपले और बल के आधार पर दो-तिहाई के करीब वोट हासिल किये हैं, लेकिन फ़ासीवादियों ने संसद में शोर मचाकर उसे आगे बोलने ही नहीं दिया। दो महीने बाद फ़ासीवादी गुण्डों ने मात्तिओत्ती को चाकू से गोद-गोदकर मार डाला। यही हाल जल्दी ही उन सभी राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों का हुआ जिन्होंने मुसोलिनी की मुख़ालफत की हिम्मत की। 1925 में मुसोलिनी ने अपनी खुली तानाशाही को स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू कर दी। एक-एक करके सभी अन्य पार्टियों पर प्रतिबन्‍ध लगा दिया गया। नवम्बर, 1926 में ”अपवादस्वरूप पेश कानूनों” के साथ यह प्रक्रिया पूरी हो गयी। इसके बाद के 17 वर्षों में मुसोलिनी ने अपने सभी राजनीतिक प्रतिद्वन्द्वियों को ख़त्म करने का काम किया और किसी को भी सिर नहीं उठाने दिया।

फ़ासीवादी शासन के सुदृढ़ रूप से स्थापित होने के बाद मज़दूर प्रतिरोध को बुरी तरह कुचल दिया गया। कहने के लिए मालिकों और मज़दूरों के संघ बनाए गये, जिसमें कि फ़ासीवादी पार्टी के लोग भी होते थे। इन संघों को ही निर्णय लेने का अधिकार था कि उत्पादन कितना, कैसे और किसके लिए किया जाये। लेकिन यह बात बस दिखावा थी। वास्तव में मज़दूर प्रतिनिधि इसमें कुछ भी नहीं बोल सकते थे। सारे निर्णय पूँजीपतियों के प्रतिनिधि फ़ासीवादियों के साथ मिलकर लेते थे। मज़दूरों के एक हिस्से को फ़ासीवादियों ने अपने साथ मिला रखा था जिसके कारण मज़दूर कोई संगठित प्रतिरोध नहीं खड़ा कर पाते थे। अपने साथ मज़दूरों को शामिल करने के लिए फ़ासीवादियों ने उनके बीच सुधार के काम किये और उनके मनोरंजन के लिए क्लब आदि बनाये। साथ ही, उनके बीच आपसी आर्थिक सहयोग के संगठन बनाये जिनका फायदा 10 से 15 फीसदी मज़दूरों को मिलता था। लेकिन सिर्फ इतने मज़दूरों को एक भ्रामक और बेहद मामूली फायदा पहुँचाकर और अच्छे-ख़ासे मज़दूरों को इस फायदे का सपना दिखलाकर वे मज़दूरों की वर्ग चेतना और एकजुटता को तोड़ने में सफल हो गये। यही कारण था कि ऐसे मालिक-मज़दूर संघों में मज़दूरों का ज़बरदस्त शोषण जारी रहा और उसका कोई कारगर प्रतिरोध भी नहीं हो सका। बाद में बात यहाँ तक पहुँच गयी कि हड़ताल पर प्रतिबन्‍ध लगा दिया गया, किसी भी प्रकार के प्रदर्शन या जुटान को अपराध घोषित कर दिया गया, ट्रेडयूनियनों पर रोक लगा दी गयी और उनकी जगह पूँजी के तलवे चाटने वाले मज़दूर संघों ने ले ली जिनमें फ़ासीवादी घुसे होते थे। फ़ासीवादियों ने वर्ग सहयोग के नाम पर उजरती श्रम की ग़ुलामी को और अधिक बढ़ाया और मज़दूरों को पूँजीपतियों का और अधिक ग़ुलाम बनाया।

इतालवी फ़ासीवाद को कृषक पूँजीपति वर्ग का भी ज़बरदस्त समर्थन प्राप्त था। हम पहले भी बता चुके हैं कि उत्तरी इटली में पूँजीवादी कृषि का विकास हो गया था और वहाँ एक उन्नत कृषक पूँजीपति वर्ग सामने आ चुका था। लेकिन साथ ही ग़रीब किसानों और खेतिहर मज़दूरों का एक आन्दोलन भी कम्युनिस्टों और समाजवादियों के नेतृत्व में पैदा हो चुका था। संगठित किसान व खेतिहर मज़दूर संघर्षों के कारण मुनाफे की दर कम होती जा रही थी। इससे निपटने के लिए इन पूँजीपतियों को राजसत्ता के समर्थन की आवश्यकता थी। लेकिन इतालवी एकीकरण के बाद उदारवादी पूँजीवादी राजसत्ता इतनी ताकतवर नहीं थी कि पूँजी के पक्ष में कोई खुला दमनात्मक कदम उठा सके। नतीजतन यहाँ पर फ़ासीवादियों के उभार की एक ज़मीन मौजूद थी। फ़ासीवादियों ने इन मज़दूर आन्दोलनों पर नकेल कसने का कृषक पूँजीपतियों से वायदा किया और इसके बदले में उन्हें उनका सहयोग-समर्थन प्राप्त हुआ। राज्य हस्तक्षेप की जगह फ़ासीवादियों के नग्न हस्तक्षेप ने ली। दक्षिणी इटली में बड़े भूस्वामी वर्ग को फ़ासीवादी पार्टी के समर्थन की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि वह सभी फ़ासीवादी कदम और हिंस्र हमले अपने माफिया गिरोहों के दम पर कर लेता था और अपने यहाँ की ग़रीब किसान व काश्तकार आबादी व खेतिहर मज़दूरों को कुचलकर रखता था। फ़ासीवादी पार्टी ने मुसोलिनी के नेतृत्व में कुशलता से फ़ासीवाद की इस अभिव्यक्ति को अपने में समाहित करा लिया। यहाँ का बड़ा भूस्वामी वर्ग भी फ़ासीवाद का ज़बरदस्त समर्थक बना।

इटली में फ़ासीवाद के उदय की पृष्ठभूमि और प्रक्रिया के इस विश्लेषण के बाद साफ है कि यहाँ पर भी फ़ासीवादी उभार की मूल वजहें कमोबेश वे ही रही हैं जो जर्मनी में थीं। जर्मनी में फ़ासीवाद के उदय का कालानुक्रम अलग था, लेकिन वहाँ पर भी प्रेरक शक्तियाँ कमोबेश वे ही थीं।

फ़ासीवादी उभार की ज़मीन हमेशा पूँजीवादी विकास से पैदा होने वाली बेरोज़गारी, ग़रीबी, भुखमरी, अस्थिरता, असुरक्षा, अनिश्चितता और आर्थिक संकट से तैयार होती है। फ़ासीवादी प्रतिक्रिया के पैदा होने की उम्मीद उन देशों में सबसे अधिक होती है जहाँ पूँजीवादी विकास किसी क्रान्तिकारी प्रक्रिया के द्वारा नहीं बल्कि एक विकृत, विलम्बित और ठहरावग्रस्त प्रक्रिया से होता है। जर्मनी और इटली विश्व इतिहास के पटल पर बहुत देर से पैदा होने वाले राष्ट्र थे। इन देशों में एकीकृत पूँजीवाद और उसकी मण्डी में पैदा होने वाला अन्‍धराष्ट्रवाद तब अस्तित्व में आया जब विश्व पैमाने पर पूँजीवाद अपनी चरम अवस्था साम्राज्यवाद, यानी इजारेदार पूँजीवाद, की अवस्था में प्रवेश कर चुका था। नतीजतन, इन दोनों ही देशों में पूँजीवादी विकास बेहद द्रुत गति से हुआ जिसने आम मेहनतकश आबादी, निम्न मध्‍यवर्गीय आबादी और आम मध्‍यवर्गीय आबादी को इस गति से उजाड़ा जिसे सोख पाने की क्षमता इन देशों के अविकसित पूँजीवादी जनवाद में नहीं थी। दूसरी तरफ, विश्वव्यापी पूँजीवादी मन्दी ने इन दोनों ही देशों के पूँजीपति वर्ग की हालत खस्ता कर दी। पूँजीपति वर्ग अब किसी उदारवादी पूँजीवादी जनवाद और उसकी कल्याणकारी नीतियों का ख़र्च उठाने के लिए कतई तैयार नहीं था। वह मज़दूरों को उनके श्रम अधिकार देने के लिए भी तैयार नहीं था। इसके लिए सभी जनवादी अधिकारों का दमन और मज़दूर आन्दोलन को कुचलना ज़रूरी था। इस आन्दोलन को एक प्रतिक्रियावादी आन्दोलन के ज़रिये ही कुचला जा सकता था। यह प्रतिक्रियावादी आन्दोलन निम्न पूँजीपति वर्ग, लम्पट सर्वहारा वर्ग, धनी और मंझोले किसान वर्ग की प्रतिक्रिया की लहर पर सवार होकर जर्मनी में नात्सी पार्टी और इटली में फ़ासीवादी पार्टी ने खड़ा किया। हालाँकि समय ने यह साबित किया कि फ़ासीवादी उभार ने निम्न पूँजीपति वर्ग और लम्पट सर्वहारा या मंझोले किसान को कुछ भी नहीं दिया। आगे चलकर उनका भी दमन किया गया। वास्तव में, फ़ासीवादी उभार ने हर हमेशा मुख्य तौर पर दो ही वर्गों को फायदा पहुँचाया क्योंकि वह उन्हीं का प्रतिनिधि था – वित्तीय और औद्योगिक बड़ा पूँजीपति वर्ग और धनी किसान, कुलक व फार्मरों का वर्ग, यानी बड़ा कृषक पूँजीपति वर्ग। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि इतिहास के समक्ष और कोई रास्ता नहीं था। सच्चाई तो यह है कि ऐसे देशों में पूँजीवादी संकट पैदा होने के बाद क्रान्तिकारी सम्भावना और प्रतिक्रियावादी सम्भावना, दोनों ही समान रूप से मौजूद रहती हैं। इटली और जर्मनी, दोनों ही देशों में फ़ासीवादी उभार का एक बहुत बड़ा कारण मज़दूर वर्ग के ग़द्दार सामाजिक जनवादियों की हरकतें रहीं। इन दोनों ही देशों में क्रान्तिकारी सम्भावना ज़बरदस्त रूप से मौजूद थी, लेकिन सामाजिक जनवादियों ने मज़दूर आन्दोलन को अर्थवाद, सुधारवाद, संसदवाद और ट्रेडयूनियनवाद की चौहद्दी में ही कैद रखा। पूरा मज़दूर आन्दोलन जर्मनी में सर्वाधिक संगठित था, लेकिन वह महज़ एक दबाव फैक्टर बनकर रह गया जो प्राप्त कर लिये गये जनवादी अधिकारों से चिपका रह गया, जबकि पूँजीवाद का संकट अब माँग कर रहा था कि पूँजीवाद का विकल्प दिया जाये। किसी विकल्प के पेश न होने की सूरत में वही क्रान्तिकारी सम्भावना प्रतिक्रियावाद की दिशा में मुड़ गयी और जर्मनी में नात्सी पार्टी और इटली में फ़ासीवादी पार्टी इसके इस्तेमाल के लिए तैयार खड़ी थीं।

अन्त में, समाहार करते हुए हम कह सकते हैं कि फ़ासीवादी उभार की सम्भावना ऐसे पूँजीवादी देशों में हमेशा पैदा होगी जहाँ पूँजीवाद बुर्जुआ जनवादी क्रान्ति के ज़रिये नहीं आया, बल्कि किसी भी प्रकार की क्रमिक प्रक्रिया से आया; जहाँ क्रान्तिकारी भूमि-सुधार लागू नहीं हुए; जहाँ पूँजीवाद का विकास किसी लम्बी, सुव्यवस्थित, गहरी पैठी प्रक्रिया के ज़रिये नहीं बल्कि असामान्य रूप से अव्यवस्थित, अराजक और द्रुत प्रक्रिया से हुआ; जहाँ ग्रामीण क्षेत्रों में पूँजीवाद इस तरह विकसित हुआ कि सामन्ती अवशेष किसी न किसी मात्रा में बचे रहे। ऐसे सभी देशों में पूँजीवाद का संकट बेहद जल्दी उथल-पुथल की स्थिति पैदा कर देता है। समाज में बेरोज़गारी, ग़रीबी, अनिश्चितता, असुरक्षा का पैदा होना और करोड़ों की संख्या में जनता का आर्थिक, सामाजिक और भौगोलिक तौर पर उजड़ना बहुत तेज़ी से होता है। ऐसे में पैदा होने वाली क्रान्तिकारी परिस्थिति को कोई तपी-तपायी क्रान्तिकारी पार्टी ही संभाल सकती है। फ़ासीवादी उभार होना ऐसी परिस्थिति का अनिवार्य नतीजा नहीं होता है। फ़ासीवादी उभार हर-हमेशा सामाजिक जनवादियों की घृणित ग़द्दारी के कारण और क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों की अकुशलता के कारण सम्भव हुआ है। जर्मनी और इटली दोनों ही इस तथ्य के साक्ष्य हैं। 

अब तक हमने फ़ासीवाद के उदय की आम पृष्ठभूमि और आर्थिक-सामाजिक स्थितियों के बारे में पढ़ा और साथ ही जिन दो देशों में फ़ासीवाद के क्लासिकीय विनाशकारी प्रयोग हुए उनके बारे में भी जाना, यानी, जर्मनी और इटली। इस बार हम भारत में फ़ासीवादी उभार के इतिहास, पृष्ठभूमि, विशेषताओं और उसके वर्तमान हालात के बारे में पढ़ेंगे।

भारत में फ़ासीवाद जर्मनी या इटली की तरह कभी सत्ता में नहीं आया। हालाँकि भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में एक गठबन्‍धन सरकार भारत में करीब 6 वर्षों तक रही लेकिन वह हिटलर या मुसोलिनी के सत्ता में आने से बिल्कुल भिन्न था। इसके अतिरिक्त, भाजपा ने अपने बूते सरकार नहीं बनायी थी। वह एक गठबन्‍धन सरकार थी जिसके अपने आन्तरिक खिंचाव और तनाव थे, जिनके कारण भाजपा अपने फ़ासीवादी एजेण्डे को खुलकर लागू नहीं कर सकती थी। लेकिन जितना भाजपा ने एक गठबन्‍धन सरकार के रहते किया, उतने से ही साफ हो गया था कि अगर वह पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आती तो क्या करती। जर्मनी या इटली की तरह फ़ासीवाद भारत में कभी सत्ता में नहीं आया लेकिन यह एक बड़ी ताक़त के रूप में, जो समाज के पोर-पोर में पैठी हुई है, भारत में लम्बे समय से मौजूद रहा है। सबसे पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में कुछ बुनियादी जानकारियाँ साझा कर लेना उपयोगी होगा। उसके बाद हम भारत में फ़ासीवाद के आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक उत्स के बारे में भी चर्चा करेंगे।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ : भारतीय फ़ासीवादियों की असली जन्मकुण्डली

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भारत में फ़ासीवाद का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है जितना कि जर्मनी और इटली में। जर्मनी और इटली में फ़ासीवादी पार्टियाँ 1910 के दशक के अन्त या 1920 के दशक की शुरुआत में बनीं। भारत में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना 1925 में नागपुर में विजयदशमी के दिन हुई। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक थे केशव बलिराम हेडगेवार। हेडगेवार जिस व्यक्ति के प्रभाव में फ़ासीवादी विचारों के सम्पर्क में आये थे वह था मुंजे। मुंजे 1931 में इटली गया था और वहाँ उसने मुसोलिनी से भी मुलाकात की थी। 1924 से 1935 के बीच आर.एस.एस. से करीबी रखने वाले अख़बार ‘केसरी’ ने मुसोलिनी और उसकी फ़ासीवादी सत्ता की प्रशंसा में लगातार लेख छापे। मुंजे ने हेडगेवार को मुसोलिनी द्वारा युवाओं के दिमाग़ों में ज़हर घोलकर उन्हें फ़ासीवादी संगठन में शामिल करने के तौर-तरीकों के बारे में बताया। हेडगेवार ने उन तौर-तरीकों का इस्तेमाल उसी समय से शुरू कर दिया और आर.एस.एस. आज भी उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करती है। 1930 के दशक के अन्त तक भारतीय फ़ासीवादियों ने बम्बई में उपस्थित इतालवी कांसुलेट से भी सम्पर्क स्थापित कर लिया। वहाँ मौजूद इतालवी फ़ासीवादियों ने हिन्दू फ़ासीवादियों से सम्पर्क कायम रखा।

लगभग इसी समय एक अन्य हिन्दू कट्टरपन्थी विनायक दामोदर सावरकर, जिनके बड़े भाई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापकों में से एक थे, ने जर्मनी के नात्सियों से सम्पर्क स्थापित किया। सावरकर ने जर्मनी में हिटलर द्वारा यहूदियों के सफाये को सही ठहराया और भारत में मुसलमानों की ”समस्या” के समाधान का भी यही रास्ता सुझाया। जर्मनी में ‘यहूदी प्रश्न’ का ‘अन्तिम समाधान’ सावरकर के लिए एक मॉडल था। सावरकर के लिए नात्सी राष्ट्रवादी थे जबकि यहूदी राष्ट्र-विरोधी और साम्प्रदायिक। लेनिन ने बहुत पहले ही आगाह किया था कि नस्लवादी अन्‍धराष्ट्रवादी पागलपन अक्सर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का चोला पहनकर आ सकता है। भारत में हिन्दू साम्प्रदायिक अन्‍धराष्ट्रवाद भी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जामा पहनकर ही सामने आ रहा था।

आर.एस.एस. ने भी खुले तौर पर जर्मनी में नात्सियों द्वारा यहूदियों के कत्ले-आम का समर्थन किया। हेडगेवार ने मृत्यु से पहले गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। गोलवलकर ने अपनी पुस्तक ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड’ और बाद में प्रकाशित हुई ‘बंच ऑफ थॉट्स’ में जर्मनी में नात्सियों द्वारा उठाये गये कदमों का अनुमोदन किया था। गोलवलकर आर.एस.एस. के लोगों के लिए सर्वाधिक पूजनीय सरसंघचालक थे। उन्हें आदर से संघ के लोग ‘गुरुजी’ कहते थे। गोलवलकर ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में मेडिकल की पढ़ाई की और उसके बाद कुछ समय के लिए वहाँ पढ़ाया भी। इसी समय उन्हें ‘गुरुजी’ नाम मिला। हेडगेवार के कहने पर गोलवलकर ने संघ की सदस्यता ली और कुछ समय तक संघ में काम किया। अपने धार्मिक रुझान के कारण गोलवलकर कुछ समय के लिए आर.एस.एस. से चले गये और किसी गुरु के मातहत संन्यास रखा। इसके बाद 1939 के करीब गोलवलकर फिर से आर.एस.एस. में वापस आये। इस समय तक हेडगेवार अपनी मृत्युशैया पर थे और उन्होंने गोलवलकर को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। 1940 से लेकर 1973 तक गोलवलकर आर.एस.एस. के सुप्रीमो रहे।

गोलवलकर के नेतृत्व में ही आर.एस.एस. के वे सभी संगठन अस्तित्व में आये जिन्हें आज हम जानते हैं। आर.एस.एस. ने इसी दौरान अपने स्कूलों का नेटवर्क देश भर में फैलाया। संघ की शाखाएँ भी बड़े पैमाने पर इसी दौरान पूरे देश में फैलीं। विश्व हिन्दू परिषद जैसे आर.एस.एस. के आनुषंगिक संगठन इसी दौरान बने। गोलवलकर ने ही आर.एस.एस. की फ़ासीवादी विचारधारा को एक सुव्यवस्थित रूप दिया और उनके नेतृत्व में ही आर.एस.एस. की पहुँच महाराष्ट्र के ब्राह्मणों से बाहर तक गयी। आर.एस.एस. सही मायनों में एक अखिल भारतीय संगठन गोलवलकर के नेतृत्व में ही बना। यही कारण है कि गोलवलकर आज भी संघ के लोगों में सबसे आदरणीय माने जाते हैं और अभी दो वर्ष पहले ही संघियों ने देश भर में उनकी जन्मशताब्दी मनायी थी।

आर.एस.एस. ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ किसी भी स्वतन्त्रता संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया। संघ हमेशा ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के साथ तालमेल करने के लिए तैयार था। उनका निशाना शुरू से ही मुसलमान, कम्युनिस्ट और ईसाई थे। लेकिन ब्रिटिश शासक कभी भी उनके निशाने पर नहीं थे। ‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ के दौरान संघ देशव्यापी उथल-पुथल में शामिल नहीं हुआ था। उल्टे जगह-जगह उसने इस आन्दोलन का बहिष्कार किया और अंग्रेज़ों का साथ दिया था। श्यामाप्रसाद मुखर्जी द्वारा बंगाल में अंग्रेज़ों के पक्ष में खुलकर बोलना इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण था। ग़लती से अगर कोई संघ का व्यक्ति अंग्रेज़ों द्वारा पकड़ा गया या गिरफ्तार किया गया तो हर बार उसने माफीनामा लिखते हुए ब्रिटिश शासन के प्रति अपनी वफादारी को दोहराया और हमेशा वफादार रहने का वायदा किया। स्वयं पूर्व प्रधानमन्‍त्री अटलबिहारी वाजपेयी ने भी यह काम किया। ऐसे संघियों की फेहरिस्त काफी लम्बी है जो माफीनामे लिख-लिखकर ब्रिटिश जेलों से बाहर आये और जिन्होंने भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम सेनानियों के ख़िलाफ अंग्रेज़ों से मुख़बिरी करने का घिनौना काम तक किया। ब्रिटिश उपनिवेशवादी राज्य ने भी इसी वफादारी का बदला चुकाया और हिन्दु साम्प्रदायिक फ़ासीवादियों को कभी भी निशाना नहीं बनाया। संघ आज राष्ट्रवादी होने का चाहे जितना गुण गा ले वह स्वतन्त्रता आन्दोलन में शामिल न होने और अंग्रेज़ों का साथ देने का दाग़ अपने दामन से कभी नहीं मिटा सकता है। इतिहास को फिर से लिखने के संघ के प्रयासों के पीछे का मुख्य कारण यही है। वे अपने ही इतिहास से डरते हैं। वे जानते हैं कि उनका इतिहास ग़द्दारियों और कायरताओं का एक काला इतिहास रहा है। हिंसा से उनको बहुत प्रेम है, लेकिन झुण्ड में पौरुष प्रदर्शन वाली हिंसा से। वे कभी किसी जनान्दोलन में शामिल नहीं हुए और उनमें किसी दमन को झेलने की ताक़त नहीं है। हमेशा सत्ता के साथ नाभिनालबद्ध रहते हुए व्यवस्था के ख़िलाफ लड़ने वालों पर कायराना हिंस्र हमले करना इनकी फितरत रही है। चाहे वे मुसलमान रहे हों, ईसाई या फिर कोई भी राजनीतिक विरोधी। बहादुराना संघर्ष से इनका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं रहा है, कभी नहीं।

संघ का पूरा ढाँचा शुरू से ही फ़ासीवादी रहा था। यह लम्बे समय तक सिर्फ पुरुषों के लिए ही खुला था। संघ की महिला शाखा बहुत बाद में बनायी गयी। संघ का पूरा आन्तरिक ढाँचा हिटलर और मुसोलिनी की पार्टियों से हूबहू मेल खाता है। हर सदस्य यह शपथ लेता है कि वह सरसंघचालक के हर आदेश का बिना सवाल किये पालन करेगा। सरसंघचालक सबसे ऊपर होता है और उसके नीचे एक सरकार्यवाह होता है जिसे सरसंघचालक ही नियुक्त करता है। एक केन्द्रीय कार्यकारी मण्डल होता है जिसे स्वयं सरसंघचालक चुनता है। अपना उत्तराधिकारी भी सरसंघचालक चुनता है। यानी पूरी तरह एक ‘कमाण्ड स्ट्रक्चर’ जिसमें जनवाद की कोई जगह नहीं है। नात्सी और फ़ासीवादी पार्टी का पूरा ढाँचा इसी प्रकार का था। नात्सी पार्टी में ‘फ्यूहरर’ के नाम पर शपथ ली जाती थी और फ़ासीवादी पार्टी में ‘डयूस’ के नाम पर शपथ ली जाती थी।

यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि यह हमेशा से सिर्फ हिन्दुओं के लिए खुला रहा है। यह खुले तौर पर कहता है कि यह हिन्दुओं के हितों की सेवा करने के लिए है। संघ ने कभी भी निचली जातियों या निचले वर्गों के हिन्दुओं के लिए कोई काम नहीं किया है। इनका समर्थन भी हमेशा से उजड़े टुटपुँजिया पूँजीपति वर्ग, नवधनाढ्यों और लम्पट सर्वहारा के बीच रहा है। संघ के सामाजिक आधार पर हम आगे आयेंगे। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भारत में फ़ासीवाद का अपना मौलिक संस्करण तैयार किया। इसकी हिटलर और मुसोलिनी के फ़ासीवाद से काफी समानताएँ थीं और उनसे इन्होंने काफी कुछ सीखा। गोलवलकर अपनी पुस्तक ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड’ में लिखते हैं – ”आज दुनिया की नज़रों में सबसे ज्यादा जो दूसरा राष्ट्र है, वह है जर्मनी। यह राष्ट्रवाद का बहुत ज्वलन्त उदाहरण है। आधुनिक जर्मनी कर्मरत है तथा जिस कार्य में वह लगा हुआ है, उसे काफी हद तक उसने हासिल भी कर लिया है… पितृभूमि के प्रति जर्मन गर्वबोध, जिसके प्रति उस जाति का परम्परागत लगाव रहा है, सच्ची राष्ट्रीयता का ज़रूरी तत्व है। आज वह राष्ट्रीयता जाग उठी है तथा उसने नये सिरे से विश्वयुद्ध छेड़ने का जोखिम उठाते हुए अपने ”पुरखों के क्षेत्र” पर एकजुट, अतुलनीय, विवादहीन, जर्मन साम्राज्य की स्थापना करने की ठान ली है।…” (गोलवलकर, ‘वी, ऑर अवर नेशनहुड डिफाइण्ड, पृ. 34-35)

गोलवलकर ने इसी पुस्तक में यहूदियों के कत्लेआम का भरपूर समर्थन किया और इसे भारत के लिए एक सबक मानते हुए लिखा – ”…अपनी जाति और संस्कृति की शुद्धता बनाये रखने के लिए जर्मनी ने देश से सामी जातियों – यहूदियों का सफाया करके विश्व को चौंका दिया है। जाति पर गर्वबोध यहाँ अपने सर्वोच्च रूप में व्यक्त हुआ है। जर्मनी ने यह भी बता दिया है कि सारी सदिच्छाओं के बावजूद जिन जातियों और संस्कृतियों के बीच मूलगामी फर्क हों, उन्हें एक रूप में कभी नहीं मिलाया जा सकता। हिन्दुस्तान में हम लोगों के लाभ के लिए यह एक अच्छा सबक है।” (गोलवलकर, वही, पृ. 35)। हिटलर की इसी सोच को गोलवलकर भारत पर लागू कैसे करते हैं, देखिये : ”…जाति और संस्कृति की प्रशंसा के अलावा मन में कोई और विचार न लाना होगा, अर्थात हिन्दू राष्ट्रीय बन जाना होगा और हिन्दू जाति में मिलकर अपने स्वतन्त्र अस्तित्व को गँवा देना होगा, या इस देश में पूरी तरह हिन्दू राष्ट्र की गुलामी करते हुए, बिना कोई माँग किये, बिना किसी प्रकार का विशेषाधिकार माँगे, विशेष व्यवहार की कामना करने की तो उम्मीद ही न करें; यहाँ तक कि बिना नागरिकता के अधिकार के रहना होगा। उनके लिए इसके अलावा और कोई रास्ता नहीं छोड़ना चाहिए। हम एक प्राचीन राष्ट्र हैं। हमें उन विदेशी जातियों से जो हमारे देश में रह रही हैं उसी प्रकार निपटना चाहिए जैसे कि प्राचीन राष्ट्र विदेशी नस्लों से निपटा करते हैं।” (गोलवलकर, वही, पृ. 47-48) बात बिल्कुल साफ है। मुसलमानों और ईसाइयों के प्रति संघ के विचार वही हैं जो यहूदियों के प्रति हिटलर के थे।

संघ का राष्ट्र कौन है?

हिन्दू, लेकिन सारे हिन्दू नहीं। उच्च जाति के पुरुष हिन्दू। स्त्रियों को हिटलर और मुसोलिनी के समान ही पुरुष का सेवक और स्वस्थ बच्चे पैदा करने के यन्त्र से अधिक और कुछ नहीं माना गया है। दूसरी बात, वे हिन्दू जिनके पास समाज के संसाधनों का मालिकाना है। मज़दूर वर्ग का काम है कि महान प्राचीन हिन्दू राष्ट्र की उन्नति और प्रगति के लिए बिना सवाल उठाये खटते रहें – 12 घण्टे और कभी-कभी तो 14-15 घण्टे तक। इस पर सवाल खड़े करना या श्रमिक अधिकारों की बात करना राष्ट्र-विरोधी माना जाएगा। हर कोई अपना ‘कर्म’ करे, सवाल नहीं! कर्म आपके जन्म से तय होता है। आप जहाँ जिस घर में, जिस परिवार में जन्मे आपको वैसा ही कर्म करना है। या फिर जैसा आपके राष्ट्र, धर्म और जाति का नेता आपसे कहे! प्रतिरोध, विरोध और प्रश्न राष्ट्रद्रोह है! श्रद्धा-भाव से कर्म कीजिये! मज़दूरों का यही धर्म है कि वे ‘राष्ट्र प्रगति’ में अपना हाड़-मांस गला डालें! बताने की ज़रूरत नहीं है कि संघ और भाजपा के लिए राष्ट्र का अर्थ है पूँजीपतियों, दुकानदारों, टुटपूँजियों की बिरादरी। जब ये मुनाफाखोर तरक्क्फ़ी करते हैं और मुनाफा कमाते हैं तो ही राष्ट्र तरक्‍की करता है। हिटलर और मुसोलिनी ने भी अपने-अपने देशों में मज़दूरों के प्रति यही रुख़ अपनाया था। इन देशों में फ़ासीवादी सत्ताएँ आने के साथ ही ट्रेड यूनियनों को प्रतिबन्धित कर दिया गया था। ट्रेड यूनियन आन्दोलन पर हिंस्र हमले इटली और जर्मनी में फ़ासीवादियों की गुण्डा फौजों ने तब भी किये जब वे सत्ता में नहीं थे। मुम्बई में ट्रेड यूनियन नेताओं, मज़दूरों और उनकी हड़तालों पर ऐसे ही हमले शिव सेना (जिसका फ़ासीवाद प्रेम जगजाहिर है) ने भी किये थे। देश भर में जगह-जगह बजरंग दल और विहिप के गुण्डों ने समय-समय पर पूँजीपतियों के पक्ष से मज़दूरों, उनके नेताओं और हड़तालों को तोड़ने का काम किया है। जब वे इस किस्म की आतंकवादी कार्रवाइयाँ नहीं कर रहे होते हैं तो वे मज़दूरों की वर्ग एकता को तोड़ने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। मिसाल के तौर पर, मज़दूरों के बीच ऐसे संगठन बनाये जाते हैं जो मज़दूरों की दुर्दशा के लिए पूँजीपति वर्ग को ज़िम्मेदार नहीं ठहराते। पूँजीपतियों से ख़ैरात लेकर और साथ ही मज़दूरों के बीच से पैसे जुटाकर ‘फण्ड पूल’ बनाये जाते हैं जो मज़दूरों को बेरोज़गारी और भुखमरी की हालत में कुछ पैसे दे देता है।

कई बार ये पैसे सूद पर भी दिये जाते हैं। इसके अतिरिक्त, धार्मिक अवसरों पर मज़दूरों के बीच पूजा आदि करवाना, कीर्तन करवाना – ये ऐसे संगठनों का मुख्य काम होता है। साथ ही मज़दूरों के दिमाग़ में यह बात भरी जाती है कि उनके हालात के ज़िम्मेदार अल्पसंख्यक हैं जो उनके रोज़गार आदि के अवसर छीन रहे हैं। इन फ़ासीवादी संगठनों के नेताओं के मुँह से अक्सर ऐसी बात सुनने को मिल जाती है – ”17 करोड़ मुसलमान मतलब 17 करोड़ हिन्दू बेरोज़गार।” यह बरबस ही फ्रांस के फ़ासीवादी नेता मेरी लॉ पेन के उस कथन की याद दिलाता है जिसमें उसने कहा था – ”दस लाख प्रवासी मतलब दस लाख फ्रांसीसी बेरोज़गार।” मज़दूरों के बीच सुधार के कार्य करते हुए ये संघी संगठन मज़दूरों की वर्ग चेतना को भोथरा बनाने का काम करते हैं। वे उन्हें हिन्दू मज़दूर के तौर पर संगठित करने की कोशिश करते हैं। और इस प्रकार वे मज़दूरों की वर्ग एकता को तोड़ते हैं। साथ ही, ‘कमेटी’ डालने (सूद पर पैसा देने वाली एक संस्था जिसे संघी संगठन मज़दूरों के पैसे से ही बनाते हैं, जो देखने में आपसी सहकार जैसी लगती है) जैसी गतिविधियों के ज़रिये थोड़ी देर के लिए ही सही, मगर पूँजीपति वर्ग से अन्तरविरोधों को तीख़ा नहीं होने देते। संघ का एक ऐसा ही संगठन है ‘सेवा भारती’। साथ ही संघी ट्रेड यूनियन भारतीय मज़दूर संघ अक्सर मुसोलिनी की तर्ज़ पर औद्योगिक विवादों के निपटारे के लिए ‘कारपोरेटवादी’ समाधान सुझाती है। इसमें फ़ासीवादी नेतृत्व में एक संघीय निकाय बनाया जाता है जिसमें मज़दूरों और पूँजीपतियों के प्रतिनिधि बैठते हैं। फ़ासीवादी पार्टी विवादों का निपटारा करती है और ऐसा वह हमेशा पूँजीपतियों के पक्ष में अधिक झुकते हुए करती है। या फिर हिटलर की तरह मज़दूरों पर पूर्ण नियन्त्रण के लिए विभिन्न आतंकवादी संगठन बनाने का रास्ता भी आर.एस.एस. हमेशा खोलकर रखता है। बजरंग दल एक ऐसा ही आतंकवादी संगठन है जो हर प्रकार के राजनीतिक विरोध को असंवैधानिक रास्ते से सड़क पर झुण्ड हिंसा के ज़रिये निपटाने के लिए संघ द्वारा खड़ा किया गया है। यह कम्युनिस्टों, उदारवादियों, साहित्यकारों समेत मज़दूरों और ट्रेड यूनियन प्रतिरोध को गुण्डों और मवालियों के झुण्ड के हिंस्र हमलों द्वारा शान्त करने में यकीन करता है। यानी, भारत के फ़ासीवादियों ने जर्मन और इतालवी तरीकों का मेल किया है।

संक्षेप में कह सकते हैं कि फ़ासीवादी हमेशा राष्ट्रवाद की ओट में पूँजीपति वर्ग की सेवा करते हैं। राष्ट्र से उनका मतलब पूँजीपति वर्ग और उच्च मध्‍यम वर्ग हैं, बाकी वर्गों की स्थिति अधीनस्थ होती है और उन्हें उच्च राष्ट्र की सेवा करनी होती है; यही उनका कर्तव्य और दायित्व होता है। प्रतिरोध करने वालों को ‘दैहिक और दैविक ताप से पूर्ण मुक्ति’ दे दी जाती है। फ़ासीवाद समाज में अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए हमेशा ही सड़क पर झुण्डों में की जाने वाली हिंसा का सहारा लेता है। जर्मनी और इटली में भी ऐसा ही हुआ था और भारत में भी संघ ने यही रणनीति अपनायी। संघ के आनुषंगिक संगठन जैसे विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल अक्सर इस तरीके को अपनाते हैं। भोपाल में प्रो. सभरवाल की हत्या इसी का एक उदाहरण था।

भारतीय फ़ासीवाद की कार्यपद्धति और उसके उभार का इतिहास

फ़ासीवाद ने भारत में जिस कार्यपद्धति को लागू किया उसकी भी जर्मन और इतालवी फ़ासीवादियों की कार्यपद्धति से काफी समानता रही है। जर्मनी और इटली की तरह यहाँ पर भी फ़ासीवाद ने जिन तौर-तरीकों का उपयोग किया, वे थे सड़क पर की जाने वाली झुण्ड हिंसा; पुलिस, नौकरशाही, सेना और मीडिया का फ़ासीवादीकरण; कानून और संविधान का खुलेआम मख़ौल उड़ाते हुए अपनी आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देना और इस पर उदारवादी पूँजीवादी नेताओं की चुप्पी; शुरुआत में अल्पसंख्यकों को निशाना बनाना और फिर अपने हमले के दायरे में हर प्रकार के राजनीतिक विरोध को ले आना; शाखाओं, शिशु मन्दिरों, सांस्कृतिक केन्द्रों और धार्मिक त्योहारों का उपयोग करते हुए मिथकों को समाज के ‘सामान्य बोध’ (कॉमन सेंस) के तौर पर स्थापित कर देना (जैसे, आज उदारवादी हिन्दुओं में भी यह धारणा प्रचलित है कि मुसलमान बहुविवाह करते हैं, ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं, शातिर होते हैं, हिन्दू राष्ट्र को निगल जाना चाहते हैं, गन्दे रहते हैं, आदि-आदि, जिनका सच्चाई से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है); झूठा प्रचार : यह दुनिया भर के फ़ासीवादियों की साझा रणनीति रही है; फ़ासीवादी हमले का निशाना संस्थाएँ नहीं बल्कि व्यक्ति हुआ करते हैं और भारत में भी विरोधियों को आतंकित करने की यही नीति फ़ासीवादियों द्वारा अपनायी गयी; अफवाहों का कुशलता से इस्तेमाल करना भी भारतीय फ़ासीवादियों की एक प्रमुख निशानी रही है; जर्मनी और इटली की तरह ही एक ही साथ कई बातें बोलना भी भारतीय फ़ासीवादियों ने ख़ूब लागू किया है; उनका एक नर्म चेहरा होता है, एक उग्र चेहरा, एक मध्‍यवर्ती चेहरा और जब जिस चेहरे की ज़रूरत पड़ती है उसे आगे कर दिया जाता है; भारत में भी संघ का कोई एक स्थायी संविधान नहीं रहा था; ये जब जैसी ज़रूरत वैसा चाल-चेहरा-चरित्र अपनाने के हामी होते हैं। क्योंकि सभी फ़ासीवादी अवसरवादी होते हैं और अपने तात्कालिक राजनीतिक हितों की पूर्ति के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं।

ये संघी फ़ासीवादियों की आम कार्यपद्धति रही है। इन तौर-तरीकों में से अधिकांश संघियों ने अपने जर्मन और इतालवी पिताओं से ही सीखा है। इन कार्यपद्धतियों के इस्तेमाल के ज़रिये फ़ासीवाद ने भारतीय समाज और जनमानस में जड़ें जमानी शुरू कीं।

आज़ादी के पहले 1890 के दशक और 1900 के दशक में भी हिन्दू और इस्लामी पुनरुत्थानवादियों के कारण हिन्दू-मुस्लिम तनाव पैदा हुए थे। लेकिन उस दौर में राष्ट्रवादी नेताओं द्वारा किये गये प्रयासों के चलते ये तनाव ज्यादा तीव्र नहीं हो सके। 1910 के दशक में भी ऐसे तनाव पैदा हुए थे लेकिन 1916 के लखनऊ समझौते और ख़िलाफत आन्दोलन और असहयोग आन्दोलन के मिलने से हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच सौहार्द्र की स्थिति थी और वे अपने साझा दुश्मन के तौर पर अंग्रेज़ी औपनिवेशिक सत्ता को देखते थे। इस दौरान भी हिन्दू महासभा नामक एक हिन्दू साम्प्रदायिक संगठन मौजूद था। लेकिन राष्ट्रवादी आन्दोलन द्वारा बनी साम्प्रदायिक एकता असहयोग आन्दोलन के पहले तक पूरी तरह टूट नहीं सकी, हालाँकि उसमें दरारें आनी शुरू हो गयी थीं। असहयोग आन्दोलन के अचानक वापस लिये जाने के साथ यह एकता टूटनी शुरू हो गयी। यही समय था जब देश में तमाम हिस्सों में हिन्दू पुनरुत्थानवादियों का उभार हो रहा था। सावरकर बन्‍धुओं का समय यही था। लगभग यही समय था जब बंकिम चन्द्र का उपन्यास ‘आनन्दमठ’ प्रकाशित हुआ और राष्ट्रवाद के स्वरूप को लेकर एक पूरी बहस देश भर में चल पड़ी। इसमें एक धारा कांग्रेस के राष्ट्रवाद की थी जो पूँजीपति वर्ग के हितों के नेतृत्व में आम जनता को साम्राज्यवाद के ख़िलाफ लेने की बात करता था। यह समझौतापरस्त था। यह सेक्युलर तो था मगर इसका सेक्युलरिज्म स्वयं हिन्दू पुनरुत्थानवाद की ओर झुकाव रखता था। जो कांग्रेसी नेता पुनरुत्थानवादी रुझान नहीं रखते थे उनका सेक्युलरिज्म पुंसत्वहीन था और कभी साम्प्रदायिक कट्टरता के ख़िलाफ लड़ नहीं सकता था। दूसरी अवस्थिति साम्राज्यवाद-विरोधी थी जो कम्युनिस्टों ने अपनायी। उन्होंने लगातार ईमानदारी से जनता को एकजुट करते हुए संघर्ष किया लेकिन तमाम रणनीतिक और कूटनीतिक मसलों पर साफ न हो पाने के कारण पूरे स्वतन्त्रता आन्दोलन के दौरान उनसे तमाम ग़लतियाँ हुईं जिसके कारण वे कभी भी आन्दोलन के नेतृत्व को अपने हाथ में नहीं ले सके। और तीसरा पक्ष था हिन्दू साम्प्रदायिकतावादियों का जिन्होंने अपनी फ़ासीवादी विचारधारा को हिन्दू राष्ट्रवाद के चोगे में पेश किया। वे कितने राष्ट्रवादी थे यह तो हम देख ही चुके हैं। उनका असली प्रोजेक्ट फ़ासीवाद का था जिसे राष्ट्रवाद के चोगे में छिपाया गया था।

1925 में आर.एस.एस. की स्थापना हुई। इस समय तक कांग्रेसी राष्ट्रवाद साम्प्रदायिक एकता को कायम रखने की इच्छा और इरादा दोनों ही खोने लग गया था। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने हिन्दू साम्प्रदायिकता और मुस्लिम साम्प्रदायिकता को बढ़ावा देने और उन्हें आपस में लड़ाने का शुरू से ही हर सम्भव प्रयास किया। कई इतिहासकार तो यहाँ तक मानते हैं कि भारत में हिन्दू-मुस्लिम साम्प्रदायिकता अंग्रेज़ों की ही पैदा की हुई चीज़ है। अंग्रेज़ों के आने से पहले किसी साम्प्रदायिक दंगे का कहीं कोई हवाला नहीं मिलता है। यह पुनरुत्थानवादी राष्ट्रवाद और अंग्रेज़ों के प्रयास के संगम से पैदा हुई थी। बंगाल का विभाजन करने के पीछे अंग्रेज़ों का सबसे बड़ा मकसद यही था। कहीं वे हिन्दू फ़ासीवादियों का साथ देते तो कहीं इस्लामी कट्टरपन्थियों का। जनगणना का भी अंग्रेज़ों ने साम्प्रदायिकता बढ़ाने के लिए बख़ूबी इस्तेमाल किया। कम्युनिस्टों ने इन प्रयासों का प्रतिरोध किया लेकिन फ़ासीवाद से लड़ने की कोई सुसंगत रणनीति न होने के कारण यह प्रतिरोध सफल न हो पाया।

साम्प्रदायिकता का कारगर विरोध और ध्‍वंस न होने का नतीजा यह था कि 1925 में संघ की स्थापना के 15 वर्ष बीतते-बीतते उसकी सदस्यता करीब एक लाख तक पहुँच चुकी थी। उस समय तक संघ एक हिन्दू पुनरुत्थानवादी और कट्टरपन्थी अवस्थिति को अपनाता और उसका प्रचार करता था। उसके निशाने पर मुसलमान प्रमुख तौर पर थे। औपनिवेशिक सत्ता का विरोध करना संघ ने कभी अपना कर्तव्य नहीं समझा और हमेशा अंग्रेज़ों का वफादार बना रहा। लेकिन हिन्दू राष्ट्रवाद की बात करना वह शुरू कर चुका था। उसके प्रचार में प्राचीन भारत के ”हिन्दू” गौरव का गुणगान होता था। अभी फ़ासीवादी विचारधारा को लागू करने में संघ स्वयं प्रशिक्षित हो रहा था। 1930 के दशक के अन्त तक गोलवलकर के नेतृत्व में संघ आधुनिक फ़ासीवादी विचारधारा और कार्यप्रणाली को भारतीय सन्दर्भों में लागू करने की शुरुआत कर चुका था। शाखाओं का विराट ताना-बाना देश के तमाम हिस्सों में फैलना शुरू हो चुका था। आज़ादी के आन्दोलन में अपनी शर्मनाक भूमिका को संघ ने आज़ादी के बाद अपने झूठे प्रचारों से ढँकना शुरू किया। यह काम संघ को आज तक करना पड़ता है क्योंकि संघ के नेताओं की ग़द्दारी के दस्तावेज़ी प्रमाण बड़े पैमाने पर मौजूद हैं, जैसे कि माफीनामे, मुखबिरी, वफादारी के वायदे, आदि, संघी फ़ासीवादियों ने अंग्रेज़ों से किये।

आज़ादी मिलने के बाद सत्ता कांग्रेस के हाथ में आयी और नेहरू प्रधानमन्‍त्री बने। गोलवलकर इस पर काफी हताश हुए और उन्होंने इसे मुसलमानों के हाथों से मिली हार माना। इसके बाद संघ ने अपने तमाम संगठनों की स्थापना शुरू की जिनमें विश्व हिन्दू परिषद प्रमुख था। बाद में बजरंग दल, वनवासी कल्याण परिषद, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद, दुर्गा वाहिनी, इत्यादि संगठनों की भी स्थापना की गयी। इन सभी संगठनों के ज़रिये संघ ने देश के कोने-कोने में और हर सामाजिक श्रेणी में अपने पाँव पसारने शुरू किये। संघ 1980 के आते-आते देश का सबसे बड़ा संगठन बन चुका था। भाजपा सत्ता में आये या न आये पूँजीवादी व्यवस्था के रहते संघी फ़ासीवादी हमेशा एक ख़तरे के तौर पर मौजूद रहेंगे। एक अर्थशास्‍त्री माइकल कालेकी ने सत्ता से बाहर फ़ासीवाद को ज़ंजीर से बँधे कुत्तो की संज्ञा दी थी। भारत में यह रूपक हूबहू लागू होता है। अगर यह कुत्ता ज़ंजीर से न बँधा रहे और इसके हाथ में पूरी सत्ता हो तो वह क्या कर सकता है यह जर्मनी और इटली में हम देख चुके हैं। लेकिन ज़ंजीर से बँधे होने की चिड़चिड़ाहट में भी यह कुत्ता बहुत से कुकृत्य कर सकता है, यह बात भारत के इतिहास से साबित होती है।

भारत में पिछले 4 दशकों में संघी फ़ासीवाद के अभूतपूर्व विस्तार के क्या कारण थे? भारत में फ़ासीवाद की ज़मीन क्या थी? कौन से वर्ग फ़ासीवाद के सामाजिक आधार बने? यह समझना फ़ासीवाद से मुकाबले की रणनीति बनाने में सबसे ज्यादा अहमियत रखता है।

भारतीय समाज में फ़ासीवाद की ज़मीन और उसके सामाजिक अवलम्ब

जर्मनी में फ़ासीवाद के लिए उपजाऊ ज़मीन की चर्चा करते हुए हमने बताया था कि किसी पूँजीवादी क्रान्ति, किसी क्रान्तिकारी भूमि सुधार और एक क्रान्तिकारी बुर्जुआ वर्ग की अनुपस्थिति; दो दशकों के भीतर अचानक तेज़ी से हुए अभूतपूर्व पूँजीवादी विकास और औद्योगिकीकरण के कारण बड़े पैमाने पर मज़दूरों का उजड़ना, बेरोज़गारी का बढ़ना, ग़रीबी का बढ़ना, असुरक्षा का बढ़ना, निम्न-पूँजीपति वर्ग का उजड़ना; किसी क्रान्तिकारी विकल्प के मौजूद न होने और सामाजिक जनवादियों द्वारा मज़दूर आन्दोलन को सुधारवाद की गलियों में भटकाते रहना और इसके कारण समाज में प्रतिक्रिया का आधार पैदा होना; बड़े पूँजीपति वर्ग का संकट की स्थिति में किसी नग्न बुर्जुआ तानाशाही की ज़रूरत और इसके कारण नात्सी पार्टी का समर्थन करना; समाज में जनवादी मूल्यों और संस्कृति का अभाव; क्रान्तिकारी भूमि सुधार न होने के कारण बड़े भूस्वामियों (युंकरों) के एक धुर प्रतिक्रियावादी वर्ग की मौजूदगी; एक प्रतिक्रियावादी मँझोले किसान वर्ग की मौजूदगी आदि ही वे कारण थे जिन्होंने जर्मनी में नात्सी पार्टी को सत्ता में पहुँचाया। इटली में औद्योगिक विकास जर्मनी के मुकाबले काफी कम था। उत्तरी इटली में कुछ औद्योगिक विकास हुआ था और वहाँ भी यह विकास बेहद द्रुत गति से हुआ था जिसने समाज में मज़दूर और निम्न-पूँजीपति वर्ग को उजाड़ने के कारण समाज में एक आम असुरक्षा का माहौल पैदा किया था। दूसरी ओर दक्षिणी इटली था जहाँ पर बड़े ज़मींदारों की बड़ी-बड़ी जागीरें थीं, जिन्हें लातीफुंदिया कहा जाता था। ये ज़मींदार भयंकर प्रतिक्रियावादी थे और इन्होंने शुरुआत में फ़ासीवादियों से अन्तरविरोध के बावजूद बाद में उनका पूरा साथ दिया। इटली में कम्युनिस्टों ने एक शानदार आन्दोलन चलाया और समाजवादी क्रान्ति के निकट तक पहुँचे। लेकिन अपरिपक्व सशस्त्र विद्रोह के कारण वह सफल नहीं हो पाया। तमाम शहरों में मज़दूरों की परिषदें खड़ी हुईं लेकिन उन्हें कुचल दिया गया। दूसरे इण्टरनेशनल में एक बार लेनिन ने इतालवी कम्युनिस्ट पार्टी के प्रतिनिधि मण्डल से काफी क्षुब्ध होकर कहा था कि ”क्रान्ति को पैदा करना होता है, यह उस तरह नहीं आती जैसे आप लोग उसे लाना चाहते हैं।” लेनिन का इशारा इसी अपरिपक्वता की तरफ था जिसके कारण इटली में आसन्न क्रान्ति को कम्युनिस्ट अंजाम नहीं दे सके। दूसरी तरफ इटली में समाजवादियों ने मज़दूर आन्दोलन के साथ वही किया जो जर्मनी में सामाजिक जनवादियों ने मज़दूर आन्दोलन के साथ किया था – ट्रेड यूनियनवाद, अर्थवाद, अराजकतावादी संघाधिपत्यवाद और सुधारवाद।

भारत में वे दोनों ही ज़मीनें मौजूद थीं जिन्होंने जर्मनी और इटली में फ़ासीवादी उभार को जन्म दिया। यहाँ पर जर्मनी जैसा औद्योगिक विकास है और दक्षिणी इटली जितना पिछड़ा कोई इलाका तो नहीं है मगर प्रशियाई मार्ग से हुए क्रमिक भूमि सुधारों के कारण युंकरों जैसा एक भूस्वामी वर्ग मौजूद है। इसके अलावा भारत में एक नया धनी किसान वर्ग भी है जो हरित क्रान्ति के बाद पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, और कई अन्य प्रान्तों में पैदा हुआ है। यह धनी किसान वर्ग व्यवस्था समर्थक है और इसकी व्यवस्था से रार सिर्फ इस बात पर होती है कि वह कृषि उत्पादों का अधिक मूल्य पाना चाहता है। अपनी इस माँग पर वह मँझोले और ग़रीब किसान को भी अपने साथ लेने में अक्सर सफल हो जाता है। चरण सिंह के दौर तक यह धनी किसान और युंकर वर्ग चरण सिंह के साथ रहा। लेकिन चरण सिंह के दौर के बाद यह या तो क्षेत्रीय पार्टियों जैसे तेलुगूदेशमसमाजवादी पार्टीआदि का आधार बना और या फिर भाजपाई फ़ासीवाद का। यह भी ग़ौरतलब है कि ये सभी किसानी क्षेत्रीय पार्टियाँ कई मौकों पर फ़ासीवाद का ही साथ देती हैं। दरअसल जर्मनी और इटली में भी यही हुआ था। ऐसे सभी दलों ने फ़ासीवादी पार्टी या नात्सी पार्टी का साथ दिया था। युंकरों, धनी किसानों और मँझोले और यहाँ तक कि ग़रीब किसानों तक का एक हिस्सा फ़ासीवाद का समर्थक बनता है। इसके दो प्रमुख कारण समझ में आते हैं, हालाँकि अलग-अलग क्षेत्रों में और कारण भी हो सकते हैं। पहला कारण है किसान वर्ग की पीछे देखने की अन्तर्निहित प्रवृत्ति। किसान वर्ग का कोई प्रगतिशील या भविष्योन्मुखी ‘यूटोपिया’ या स्वप्न नहीं होता। पूँजीवादी विकास के साथ किसानों का एक बड़ा हिस्सा उजड़ता है। ऐसे में वह स्वत:स्फूर्त तरीके से पूँजीवादी समाज के भीतर अपने सर्वहाराकृत हो जाने की नियति को नहीं समझता। अपने से तो वह ज़मीन के बचे-खुचे टुकड़े से चिपके रहना ही चाहता है (जो वास्तव में उसे कुछ नहीं देता)। वह अतीत के उन दिनों के बारे में बहुत लगाव के साथ सोचता है जब जीवन में पूँजीवादी गलाकाटू प्रतिस्पर्धा नहीं थी और वह अपने खेत पर चैन से गुज़र करता था (फिर से,ऐसा अतीत कभी था नहीं, यह उसकी रूमानी कल्पनाओं में ही होता है)। जब भी कोई पुनरुत्थानवादी ताकत अतीत की ओर पश्चगमन के नारे देती है, स्वदेशी का राग अलापती है और इस सारी लफ्फाज़ी को धर्म की चाशनी में लपेटती है तो वह बरबादी की कगार पर खड़े किसानों समेत मँझोले और धनी किसानों को बहुत रुचता है। दूसरा कारण होता किसानी जीवन का सांस्कृतिक पिछड़ापन। फ़ासीवादी ताकतें किसानों के जीवन और संस्कृति में जनवादी मूल्यों की कमी, पिछड़ेपन और निरंकुशता का पूरा लाभ उठाती हैं और उन्हें सहयोजित करती हैं, यानी अपना लेती हैं। फ़ासीवाद एक आधुनिक विचारधारा है जो पुरातनपन्थी और आधुनिकता-विरोधीजनवाद और समानता विरोधी विचारों का अवसरवादी इस्तेमाल करते हुए एक आधुनिक किस्म की राजसत्ता की स्थापना करता है और सबसे नग्न किस्म की तानाशाही को लागू करके पूँजीवादी हितों की रक्षा करता है। किसानों के इन विभिन्न संस्तरों को, जो फ़ासीवाद का सम्भावित सामाजिक आधार हो सकते हैं, आप ग्रामीण निम्न-पूँजीपति वर्ग के रूप में गिन सकते हैं। यह वर्ग 1980 के दशक के मध्‍य से भाजपा का समर्थक बनने लगा था। उस समय तक चरण सिंह की राजनीति हाशिये पर जा चुकी थी और धनी किसान हितों को बुर्जुआ जनवादी प्रफ़ेमवर्क के भीतर पेश करने वाली कोई प्रभावी ताकत राष्ट्रीय पैमाने पर मौजूद नहीं थी। भाजपा ने इसी ख़ालीपन का लाभ उठाते हुए धनी किसान लॉबी को अपने साथ लेना शुरू किया और किसानों के सभी संस्तरों के बीच अपना फ़ासीवादी प्रचार शुरू किया।

ग्रामीण निम्न-पूँजीपति वर्ग के अतिरिक्त शहरों का निम्न-पूँजीपति वर्ग भी फ़ासीवाद का ज़बर्दस्त समर्थक होता है। बल्कि यों कहें की फ़ासीवाद का सबसे ताकतवर और परम्परागत सामाजिक आधार यही वर्ग मुहैया कराता है। इस वर्ग में छोटे पूँजीपति, दुकानदार, दलाल, एजेण्ट, निम्न माल उत्पादन करने वाले छोटे उत्पादक, सरकारी वेतनभोगी वर्ग, कर्मचारी वर्ग और सफेद कॉलर वाले वे मज़दूर होते हैं जिन्हें मज़दूर अभिजात्य वर्ग कहा जा सकता है। 1980 के दशक के पहले यह पूरा वर्ग कांग्रेस का परम्परागत समर्थक रहा था। उस समय तक सार्वजनिक क्षेत्र के पूँजीवाद का ज़माना था। नेहरू के ज़माने की परछाइयाँ अभी पूरी तरह से धूमिल नहीं हुई थीं। आज़ादी के बाद समृद्धि, प्रगति और विकास के जो सपने सार्वजनिक क्षेत्र, बैंकों के राष्ट्रीयकरण, और ”समाजवाद” और कल्याणकारी राज्य के नारे के साथ दिखलाये गये थे, वे टूटने शुरू हो चुके थे लेकिन अभी ग़ायब नहीं हुए थे। 1980 के दशक के मध्‍य तक भारतीय पूँजीवाद सार्वजनिक क्षेत्र की चौहद्दी के भीतर बड़ा होते-होते कसमसाने लगा था। 1947 से 1980 तक के दौर में पब्लिक सेक्टर भारतीय पूँजीवाद की ज़रूरत थी। ग़ुलामी से बौने और अधमरे हुए यहाँ के पूँजीपति वर्ग को अपने पैरों पर खड़ा करने के लिए पहले राज्य को ही एक बड़े पूँजीपति की भूमिका निभानी थी। यही समय इंस्पेक्टर राज और लाइसेंसी राज का था। बाद में सार्वजनिक क्षेत्र का यह पिंजड़ा, जो पहले पूँजीपति वर्ग की सुरक्षा के लिए बनाया गया था, उसके आगे विकास में बाधक बनने लगा। भारतीय निजी पूँजी अब इस पिंजड़े में ठीक से साँस नहीं ले पा रही थी और उसे खुले बाज़ार और खुली प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता महसूस होने लगी थी। अगर यह नहीं होता तो वह पूँजी के जीवन के लिए घातक होता। नतीजतन, भारतीय पूँजीपति वर्ग के नुमाइन्दे भारतीय राज्य ने सार्वजनिक क्षेत्र, विनियमन, लाइसेंसी राज, इंस्पेक्टर राज की दीवारों को गिराना शुरू किया। जब तक कल्याणकारी पब्लिक सेक्टर वाले राज्य का ढाँचा कायम था, जीवन निम्न-पूँजीपति वर्ग के लिए अपेक्षाकृत आसान था और असुरक्षा और अनिश्चितता उसके लिए उतनी अधिक नहीं थी। लेकिन ज्यों ही उदारीकरण और निजीकरण की नीतियाँ लागू होनी शुरू हुईं वैसे ही उसकी ऑंच इन वर्गों तक भी पहुँचने लगी। कम ही लोग जानते हैं कि भारतीय पूँजीवादी राज्य ने पहली बार ‘नई आर्थिक नीति’ के जुमले का इस्तेमाल 1991 में नरसिंह राव-मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान नहीं किया था। 1985 में राजीव गाँधी की सरकार के दौरान पहली बार नई आर्थिक नीति का नाम लिया गया और उदारीकरण और निजीकरण को शुरू करने की बात की गयी। राजीव गाँधी तमाम सभाओं और जमावड़ों में लाइसेंसी राज और इंस्पेक्टर राज को विकास-विरोधी करार देते थे और उदारीकरण करने की ओर इशारा करते थे। 1986 में नयी शिक्षा नीति द्वारा इसी काम को आगे बढ़ाया गया। इसके बाद 1991 में यह प्रक्रिया सार्वजनिक क्षेत्र पूँजीवाद के भयंकर आर्थिक संकट के बाद पूँजीपति वर्ग ने खुलेआम शुरू की। इसके सूत्रधार थे तत्कालीन वित्त मन्त्री मनमोहन सिंह जो आज देश के प्रधानमन्त्री हैं। तब से लगभग 18 वर्ष बीत चुके हैं। लेकिन नयी आर्थिक नीति की शुरुआत 1980 के दशक के मध्‍य को माना जाना चाहिए। अगर हम ऐसा मानते हैं तो उदारीकरण की नीतियों को लागू होने की शुरुआत हुए करीब 25वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान पूरे देश में ग़रीबी और बेरोज़गारी अभूतपूर्व रफ्तार से बढ़ी है। 1980 के दशक के आते-आते मध्‍यम वर्ग और निम्न-पूँजीपति वर्ग और साथ ही आम जनता के सभी सपने भी धूल-धूसरित होने लगे थे जिसने पूरी आम जनता में एक हताशा और निराशा को जन्म दिया था। स्वदेशी और छोटे उद्योग-धन्धों के हित की बात करते हुए भाजपा ने भी अपनी गठबन्धन सरकार के काल में भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की नीतियों को तेज़ रफ्तार से लागू किया। बल्कि भाजपा के नेतृत्व में ही पहली बार विनिवेश मन्त्रालय अरुण शौरी के नेतृत्व में बनाया गया,जिसे कायदे से निजीकरण-बेरोज़गारी मन्त्रालय कहा जाना चाहिए। छोटी पूँजी की बात करते हुए भाजपा ने बड़ी पूँजी की किसी भी पार्टी से ज्यादा चाकरी की। ऐसे में फ्रांसीसी मार्क्‍सवादी इतिहासकार डेनियल गुएरिन का वह कथन बरबस ही याद आता है – फ़ासीवाद न सिर्फ बड़ी पूँजी का चाकर होता हैबल्कि साथ ही यह टुटपुंजिये वर्ग का रहस्यवादी उभार भी होता है।” भूमण्डलीकरण और उदारीकरण के 25 वर्षों ने बड़े पैमाने पर छोटे पूँजीपति वर्ग को उजाड़ा, छोटे पैमाने के उत्पादकों, दुकानदारों, वेतनभोगियों को उजाड़ा और साथ ही ग्रामीण निम्न-पूँजीपति वर्ग को भी उजाड़ा है। बड़े पैमाने पर लोग सड़कों पर आ गये और जो सड़कों पर नहीं आये, उनके सिर पर भी लगातार छँटनी और तालाबन्दी,नौकरी से निकाल दिये जाने, ठेके पर कर दिये जाने की तलवार लटकी रहती है। यानी पूरे निम्न-पूँजीपति वर्ग के सामने भविष्य की असुरक्षा और अनिश्चितता बेहद तेज़ रफ्तार से बढ़ी है। ऐसे में यदि कोई क्रान्तिकारी ताकत आम जनता और इन वर्गों में इस बात को बिठाने के लिए मौजूद नहीं है कि इस सारी असुरक्षा और अनिश्चितता का असली ज़िम्मेदार पूँजीवाद है और पूँजीवादी व्यवस्था के दायरे के भीतर निम्न-पूँजीपति वर्ग की यही नियति है कि उसके मुट्ठी भर हिस्से को ऊपर की ओर जाना है और बाकी विशाल हिस्से को सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा की कतार में शामिल हो जाना है, तो निश्चित रूप से उसके भीतर एक प्रतिक्रिया की ज़मीन भी मौजूद रहती है जो लम्बी असुरक्षा और अनिश्चितता के कारण पैदा हुई चिड़चिड़ाहट और हताशा से तैयार होती है। इसी ज़मीन का फायदा फ़ासीवादी ताकतें उठाती हैं और उन्होंने भारत में भी उठाया। इस पूरे ग़ुस्से का निशाना संघ ने अल्पसंख्यकों को और विशेषकर मुसलमानों और शरणार्थियों को बनाया। गतिरोध की स्थिति में जनता के गुस्से को अतार्किक और प्रतिक्रियावादी रास्ते पर ले जाना फ़ासीवादियों के लिए ख़ास तौर पर आसान होता है। संघ इसकी पृष्ठभूमि तो अपने जन्म के बाद से ही तैयार कर रहा था। अपनी शाखाओं, संस्कृति केन्द्रों,शिशु मन्दिरों में लगातार मुसलमानों को अतीत से लेकर वर्तमान तक हिन्दुओं की सारी तकलीफों का ज़िम्मेदार बताया जा रहा था। 1980 के बाद दिमाग़ों में बोये गये ज़हर के इस बीज के अंकुरित होने के लिए सभी अनुकूल परिस्थितियाँ तैयार होने लगीं। यही कारण है कि संघ की मौजूदगी तो आज़ादी के बाद से लगातार बनी रही थी और साम्प्रदायिक तनाव फैलाने में हमेशा उसकी भूमिका रही थी, लेकिन 1980 के पहले तक संघ को एक ब्राह्मण-बनिया संगठन के रूप में जाना जाता था। लेकिन 1980 के बाद संघ की अपील कहीं ज्यादा व्यापक हुई और फ़ासीवाद का उभार एक परिघटना के रूप में वास्तविकता बनकर उभरा। रामजन्मभूमि आन्दोलन, रथयात्राओं, बाबरी मस्जिद धवंस, 1991 के संकट के बाद और 1995 तक उदारीकरण-निजीकरण के विनाशकारी परिणामों के बाद भारत में फ़ासीवादी आन्दोलन हिन्दुत्ववाद,स्वदेशीवाद और राष्ट्रवाद के चोगे में कहीं ज्यादा ताकतवर होकर उभरा। 1980 के बाद फ़ासीवाद का एक आन्दोलन की शक्ल में आना कोई संयोग नहीं था। (यहां यह स्‍पष्‍ट कर देना जरूरी है कि ‘आन्‍दोलन’ शब्‍द का उपयोग हमेशा ऐसे किया जाता है मानो वह कोई अनिवार्य रूप से सकारात्‍मक वस्‍तु हो, जबकि इस शब्‍द में ऐसा कुछ नहीं है जो इसे अपने आप में सकारात्‍मक बना देता हो। यह निर्भर करता है कि वह आन्‍दोलन कियका है और किसके नेतृत्‍व में है।) यह आर्थिक और भौतिक तौर पर फ़ासीवाद की ज़मीन के मज़बूत होने के कारण आन्दोलन की शक्ल अख्तियार कर पाया था।

उदारीकरण और निजीकरण के एक चौथाई दशक ने भारतीय समाज में भी लोगों को बड़े पैमाने पर अपनी जगह-ज़मीन और काम-धन्धे से उजाड़कर वैसी ही असुरक्षा और अनिश्चितता का माहौल निम्न-पूँजीपति वर्ग, मज़दूर वर्ग और अन्य मध्‍यम वर्गों में पैदा किया जो जर्मनी में 20 वर्षों के द्रुत औद्योगिकीकरण के बाद पैदा हुआ था। यह सच है कि इस प्रक्रिया का पैमाना उतना ज्यादा नहीं था जितना कि यह जर्मनी में था। कुछ मार्क्‍सवादी सिद्धान्तकार यह बात समझ नहीं पाये हैं। ऐसे ही एक सिद्धान्तकार प्रभात पटनायक और उन्हीं के साथ एजाज़ अहमद इस तथ्य पर काफी चकित दिखलायी पड़ते हैं कि भारत में औद्योगिकीकरण उतना द्रुत तो था नहीं जितना कि वह जर्मनी में था (नतीजतन, भारत में बेरोज़गारी, उजड़ना और ग़रीबी भी उतनी तेज़ रफ्तार से नहीं पैदा हुई थी जितनी तेज़ रफ्तार से जर्मनी में (फिर भारत में इसने फ़ासीवादी उभार को जन्म कैसे दिया? लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि भारत के औपनिवेशिक इतिहास के कारण भारतीय समाज को दीर्घकालिक और भयंकर रूप से पैठी हुई ग़रीबी और बेरोज़गारी विरासत में मिली थी। यहाँ पर ग़रीबी और बेरोज़गारी पहले से ही जड़ जमाये हुए थी जिसे निजीकरण और उदारीकरण ने और भयंकर रूप दे दिया। जर्मनी या इटली के समाज की तरह ये समस्याएँ किसी एक औद्योगिकीकरण के दौर की ही पैदावार नहीं थीं, ये पहले से मौजूद थीं। जो काम जर्मनी और इटली में द्रुत औद्योगिकीकरण की प्रक्रिया ने किया था वह काम यहाँ पर भूमण्डलीकरण, उदारीकरण और निजीकरण की प्रक्रियाओं ने किया – पूरे समाज में असुरक्षा और अनिश्चितता के माहौल को पैदा करके फ़ासीवादी प्रतिक्रिया की ज़मीन को पैदा करना।

कुछ मार्क्‍सवादी सिद्धान्तकारों ने जर्मनी और इटली से एक और फर्क की ओर इशारा किया है। इन लोगों का कहना है कि जर्मनी और इटली में जिस समय फ़ासीवादी उभार हुआ उस समय एक शक्तिशाली समाजवादी देश और साथ ही इन्हीं देशों में शक्तिशाली कम्युनिस्ट आन्दोलन मौजूद थे। जर्मनी और इटली में बड़े पूँजीपति वर्ग ने बेहद तत्परता से फ़ासीवाद का साथ दिया तो इसका एक कारण यह भी था कि वे समाजवाद और आसन्न मज़दूर क्रान्तियों से डरे हुए थे। भारत में ऐसा नहीं है। लेकिन भारत में बड़े पूँजीपति वर्ग ने इतनी तत्परता के साथ फ़ासीवाद का साथ दिया भी नहीं है। उसने बीच-बीच में अलग-अलग मौकों पर भाजपा का साथ दिया है लेकिन पूँजीपति वर्ग ने वक्त और ज़रूरत के मुताबिक कांग्रेस का भी साथ दिया है। मिसाल के तौर पर, आज कल्याणकारी राज्य और नीतियों की ज़रूरत है। इस बात को पूँजीपति वर्ग का एक बड़ा हिस्सा भी समझ रहा है। संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार के दिखावटी सुधारवाद को पूँजीपति वर्ग अभी समर्थन दे रहा है। दूसरी बात यह है कि साथ ही यह सरकार क्रान्तिकारी ताकतों के ऊपर शिकंजा कसने का काम भी कर रही है। नरेगा और खाद्य सुरक्षा जैसी कुछ नीतियों के साथ सरकार उदारीकरण और निजीकरण को खुले तौर पर जारी रख रही है और उसके पास अभी यह क्षमता भी है कि वह ऐसा कर सके। इसलिए आज नग्न पूँजीवादी तानाशाही की कोई आवश्यकता नहीं है। यही कारण है कि भाजपा आज राष्ट्रीय पैमाने पर दयनीय हालत में पहुँच गयी है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का फ़ासीवादी नेटवर्क अपनी पूरी ताकत के साथ मौजूद है। ज्यों ही कल्याणकारी राज्य की सम्भावनाएँ रिक्त होंगी वैसे ही पूँजीपति वर्ग को फ़ासीवादी चाल-चेहरे की आवश्यकता पड़ सकती है। और जब वह सत्ता में नहीं है तब भी ज़ंजीर से बँधे कुत्तों की भूमिका तो वह आज भी निभाता रहता है। मज़दूर आन्दोलन में इसे ख़ास तौर पर देखा जा सकता है। साथ ही, पूरे समाज में संघी आतंक समूहों की मौजूदगी क्रान्तिकारी शक्तियों के लिए एक ‘काउण्टर वेट’ का काम करती रहती है। हमने पिछले अंकों में जर्मनी के उदाहरण से समझाया था कि कल्याणकारी पूँजीवादी राज्य की परिणति अक्सर अधिक प्रतिक्रियावादी पूँजीवादी राज्य के रूप में होती है। भारत में इसकी पर्याप्त सम्भावनाएँ मौजूद हैं। मौजूदा वैश्विक साम्राज्यवादी आर्थिक संकट तो बीत जाएगा लेकिन चक्रीय क्रम में आने वाला संकट इससे भी भयंकर होगा, इसके संकेत अभी से ही मिलने लगे हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था वित्तीय बाज़ारों से पूरी तरह न जुड़ी होने के कारण थोड़ी-सी बची रही लेकिन आगे यह सम्भव नहीं होगा। भारतीय अर्थव्यवस्था के किसी गहरे संकट में फँसने के साथ ही बेरोज़गारी और ग़रीबी, जो पहले ही ख़तरे के निशान से ऊपर है, और ज्यादा बढ़ेगी। ऐसे में, क्रान्तिकारी सम्भावना भी पैदा होगी, यानी जनअसन्तोष को एक तार्किक दिशा में मोड़ते हुए, गोलबन्द और संगठित करते हुए व्यवस्था परिवर्तन की दिशा में ले जाने की सम्भावना (और साथ ही, फ़ासीवादी सम्भावना भी पैदा होगी, यानी किसी क्रान्तिकारी नेतृत्व की ग़ैर-मौजूदगी में पूरे समाज में मौजूद हताशा और असुरक्षा की भावना को प्रतिक्रियावादी दिशा में मोड़ते हुए नग्न पूँजीवादी फ़ासीवादी तानाशाही की ओर ले जाना। दूसरी सम्भावना को वास्तविकता में बदलने वाली नेतृत्वकारी फ़ासीवादी ताकत आज देश में बड़े पैमाने पर मौजूद है। लेकिन ऐसी कोई अखिल भारतीय क्रान्तिकारी पार्टी मौजूद नहीं है। अब सारा भविष्य इसी बात पर निर्भर करता है कि हम ऐसी ताकत को खड़ा करने की ज़िम्मेदारी अपने कन्धों पर लेने को तैयार हैं या नहीं।

आखिरी फर्क जिसकी ओर कुछ मार्क्‍सवादी विचारकों द्वारा इशारा किया जाता है वह यह है कि पहले यूरोपीय फ़ासीवादी उभार के समय जिस किस्म की महामन्दी विश्व पूँजीवाद झेल रहा था वैसी कोई मन्दी आज नहीं है। हालाँकि, मौजूद वैश्विक मन्दी में उन्हें अपने शब्दों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पड़ रही है। लेकिन यह सच है कि वैसी चीज़ दुबारा नहीं आने वाली। इतिहास अपने आपको दुहराता नहीं है। अब विश्व साम्राज्यवाद में हुए परिवर्तनों के मद्देनज़र कुछ बातें साफ हैं। विश्व पूँजीवाद में अब मन्दी और तेज़ी का चक्र नहीं चलता। एक मन्द मन्दी लगातार बनी रहती है जो बीच-बीच में गहराती रहती है। 1995 से 2006 के बीच चार बड़ी मन्दियाँ आयीं जिसमें ये नयी वाली सबसे भयंकर थी। अब तेज़ी का दौर पूँजीवाद में नहीं आता। जितना रोज़गार पूँजीवाद पहले दे सकता था अब वह किसी हालत में नहीं दे सकता क्योंकि पूँजी कहीं ज्यादा परजीवी हो चुकी है और उत्पादक निवेश की सम्भावनाएँ नहीं के बराबर रह गयी हैं। इसलिए बेरोज़गारी अचानक होने वाले विस्फोट की तरह नहीं बढ़ी बल्कि वह सघन रूप में एक स्थायी परिघटना बन चुकी है। जो इतिहासकार नये फ़ासीवादी उभार की हर विशेषता को इतिहास में ढूँढ़ना चाहते हैं उन्हें काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ेगा। क्योंकि इतिहास में दुहराव नहीं हो सकता। कोई ज़बरन करने की कोशिश करेगा तो वह मार्क्‍स के शब्दों में प्रहसन बन जाएगा। यान्त्रिक मार्क्‍सवादी विश्लेषकों के साथ यही दिक्कत है। आज का फ़ासीवादी उभार भी पहले जैसा नहीं होगा। विश्व पूँजीवाद में भूमण्डलीकरण के दौर में जो परिवर्तन आये हैं उनके अनुसार फ़ासीवादी उभार के स्वरूप में भी निश्चित रूप में परिवर्तन आयेंगे। यह एक अलग चर्चा का विषय है जिसपर इस लेख के दायरे में बात नहीं हो सकती। यह एक अलग लेख की माँग करता है। एक महत्तवपूर्ण कारक की ओर इशारा करके हम आगे बढ़ना चाहेंगे। जर्मनी में नात्सी पार्टी को और इटली में फ़ासीवादी पार्टी को संकट का समाधान राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के दायरे में करना था। जर्मनी और इटली में फ़ासीवाद के 20 से 25 वर्षों के भीतर ही सत्ता में आ जाने का कारण यही था कि उस समय पूँजीवादी अर्थव्यवस्था में राष्ट्र-राज्य की भूमिका बेहद ज्यादा थी। वह आज भी है लेकिन बदल चुकी है। पूँजी के लिए साँस लेने की जगह कहीं ज्यादा कम थी। उसके विपरीत, भूमण्डलीकरण के दौर में पूँजी के राष्ट्रीय सीमाओं के आर-पार खुले प्रवाह के साथ पूँजी के लिए अपने अन्तरविरोधों और संकटों को निपटाने का मंच राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था नहीं बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था है। इसलिए फ़ासीवाद भूमण्डलीकरण के दौर में उतनी द्रुत गति से और उस तरह से सत्ता में नहीं आ सकता है जैसे जर्मनी और इटली में आया था। फ़ासीवाद अगर फिर सत्ता में आता है तो उसका रूप क्या होगा यह बता पाना मुश्किल है। लेकिन यह बात सच है कि जिस प्रकार राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था की सीमाएँ सन्तृप्त हो गयी थीं वैसे ही वैश्विक अर्थव्यवस्था की सीमाएँ भी सन्तृप्त हो जायेंगी और होने लगी भी हैं, जैसा कि नवीनतम साम्राज्यवादी संकट ने दिखलाया है। अब इस नये वैश्विक राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक विधान में फ़ासीवाद के सत्ता में आने की सूरत में पूरा रूप और रास्ता क्या होगा, यह अलग से शोध का विषय है।

फ़ासीवाद के उभार के कुछ बुनियादी कारणों की हमने व्याख्या की है जो कहीं भी फ़ासीवाद के उभार का सामान्य कारण होते हैं। वे कारण जर्मनी में भी मौजूद थेइटली में भी मौजूद थे और भारत में भी मौजूद थे। सामाजिक जनवाद की ग़द्दारी इसमें हमारे लिए सबसे महत्तवपूर्ण कारण है। यह भारत में भी मौजूद है। सी.पी.आई. और सी.पी.एम. के नेतृत्व में ट्रेड यूनियन आन्दोलन भारत में भी वही भूमिका निभा रहा है जो वह जर्मनी में निभा रहा था। यहाँ भी संशोधनवाद और ट्रेड यूनियन नेतृत्व मज़दूर आन्दोलन को सुधारवाद, अर्थवाद और अराजकतावादी संघाधिपत्यवाद की गलियों में घुमा रहा है। यहाँ पर ट्रेड यूनियन आन्दोलन और सामाजिक जनवाद पूँजीपति वर्ग को उस किस्म के सौदे पर मजबूर नहीं कर सकता जैसा कि जर्मनी में किया था। लेकिन भारत का पूँजीपति वर्ग तत्कालीन जर्मनी के पूँजीपति वर्ग से कहीं कमज़ोर है और जितना दबाव ट्रेड यूनियन आन्दोलन से भारत में पूँजी पर बना है वह उसके मुनाफे के मार्जिन को सिकोड़ने के लिए काफी है। श्रम कानूनों के कारण भारतीय पूँजी का दम काफी घुटता है। ग़ौरतलब है कि भारत में आज मौजूद श्रम कानून उस समय के जर्मनी या इटली में मौजूद श्रम कानूनों से पीछे नहीं हैं बल्कि कई मायनों में ज्यादा आगे हैं। हाल ही में फिक्की के एक पूँजीपति ने कहा भी था कि श्रम कानूनों के चलते हमें ”प्रॉफिट स्क्वीज़” का सामना करना पड़ रहा है। हूबहू यही शब्द जर्मन पूँजीपतियों ने भी इस्तेमाल किया था। यह कोई संयोग नहीं है। इसलिए भारत का संशोधनवाद और सामाजिक जनवाद उतना ताकतवर नहीं है जितना कि जर्मनी का सामाजिक जनवाद था, लेकिन भारत का पूँजीवाद भी उतना शक्तिशाली नहीं है जितना कि जर्मनी का पूँजीवाद था। अनुपात उन्नीस-बीस के अन्तर से समान ही मिलेगा!

भारत में भी कोई जनवादी क्रान्ति नहीं हुई जिसके कारण पूरे समाज में जनवादी चेतना की एक भारी कमी है और भयंकर निरंकुशता है जो फ़ासीवाद का आधार जनता के मनोविज्ञान में तैयार करती है। यहाँ पर भी क्रान्तिकारी भूमि सुधार नहीं हुए और क्रमिक भूमि सुधारों ने प्रतिक्रियावादी युंकर वर्ग को और हरित क्रान्ति ने प्रतिक्रियावादी आधुनिक धनी किसान वर्ग को जन्म दिया। यहाँ भी निम्न-पूँजीपति वर्ग और छोटे उत्पादकों की एक भारी तादाद मौजूद है जो पूँजीवादी विकास के साथ तेज़ी से उजड़ती है और प्रतिक्रियावाद के समर्थन में जाकर खड़ी होती है। साथ ही यहाँ भी ऊपर की ओर गतिमान एक प्रतिक्रियावादी नवधनाढय वर्ग है जो भूमण्डलीकरण के रास्ते हो रहे विकास की मलाई चाँप रहा है। इनमें मोटा वेतन पाने वाला वेतनभोगी वर्ग, ठेकेदार वर्ग, व्यापारी वर्ग, नौकरशाह, आदि शामिल हैं। यहाँ पर मज़दूर वर्ग का एक बहुत बड़ा हिस्सा है जो किसानी मानसिकता का शिकार है और पूरी तरह उत्पादन के साधनों से मरहूम नहीं हुआ है। वह भौतिक स्थितियों से सर्वहारा चेतना की ओर खिंचता है और अतीतोन्मुखी आकांक्षाओं और दो-चार मामूली उत्पादन के साधनों का स्वामी होने के कारण निम्न-पूँजीवादी चेतना की ओर खिंचता है। नतीजतन, सर्वहारा चेतनाकरण की प्रक्रिया मुकाम तक नहीं पहुँचती और इस आबादी का भी एक हिस्सा फ़ासीवादी प्रचार और प्रतिक्रिया के सामने अरक्षित होता है और उसका अक्सर शिकार बन जाता है। भारत में भी एक बड़ी लम्पट सर्वहारा उजड़ी आबादी है जो फ़ासीवादी भीड़ का हिस्सा बनती है। ये कुछ आम कारक हैं जो फ़ासीवाद के उभार की ज़मीन तैयार करते हैं। आज के ज़माने में भी ये कारक तो लागू होते ही हैं। आज के सम्भावित फ़ासीवादी उभार में नयेपन और परिवर्तन के कुछ तत्वों की ओर हमने संक्षेप में इशारा किया है,जो पूँजीवाद की कार्यप्रणाली में बदलाव के कारण पैदा होते हैं। इन पर कभी आगे।

यहाँ भारत में फ़ासीवादी उभार के इतिहास, प्रकृति, चरित्र और सम्भावित भविष्य पर हमने संक्षेप में चर्चा की। ज़ाहिर है यहाँ हम उसके हर पहलू पर चर्चा नहीं कर सकते हैं। वह अपने आपमें एक वृहत पुस्तक या शोध-प्रबन्ध का विषय बन सकता है। मिसाल के तौर पर, दलितों और स्त्रियों के प्रति फ़ासीवादियों के घृणास्पद रुख़ पर भी चर्चा ज़रूरी है। उनके द्वारा बच्चों और किशोरों के दिमाग़ में ज़हर घोले जाने की पूरी प्रक्रिया को भी विस्तार से समझना ज़रूरी है। ऐसे और भी कई पहलू हैं। यहाँ पर हमारा मकसद दो चीज़ें थीं। पहला, फ़ासीवाद के उभार की आर्थिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि को समझना और दूसरा, उसके सामाजिक आधार का विश्लेषण। इसके तमाम सांस्कृतिक पहलू भी हैं जिनपर अलग से समीक्षा की आवश्यकता होगी। साथ ही, हमने भारत में फ़ासीवादी उभार और जर्मनी और इटली में हुए फ़ासीवादी उभार की समानताओं और अन्तरों की भी संक्षेप में चर्चा की। चलते-चलते हमने कुछ मार्क्‍सवादी विश्लेषकों की मार्क्‍सवादी आलोचना भी की। इतनी चर्चा के बाद हम अगले अंक में अपने ठोस नतीजों के बारे में बातचीत कर सकते हैं, जो निम्न प्रकार से हैं।

आज के भारत में फ़ासीवादी रुझान का मुकाबला करने के लिए कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों को क्या करना होगा? हमें मज़दूरों, छात्रों, युवाओं, स्त्रियों, दलितों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के बीच सर्वहारा क्रान्तिकारी संगठन कैसे खड़े करने होंगे?मज़दूर मोर्चे से लेकर अन्य सभी मोर्चों पर हमें फ़ासीवादियों को शिकस्त कैसे देनी होगी? फ़ासीवादी आतंक समूहों का मुकाबला कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों को कैसे करना होगा? निम्न-पूँजीपति वर्ग के सवाल पर हमारा रुख़ क्या होना चाहिए?मज़दूर आबादी में फ़ासीवादी विचारधारा की घुसपैठ को रोकने के लिए हमें कौन-से कदम उठाने होंगे? शहरी मध्‍यमवर्गीय आबादी में फ़ासीवादी विचारधारा को शिकस्त देने के लिए हमें क्या करना होगा?

ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब हमें देना ही होगा और अगले अंक में हम यही प्रयास करेंगे। हमने पहले बताया है कि पूँजीवादी संकट फ़ासीवादी प्रतिक्रिया की भी ज़मीन तैयार करता है और मज़दूर क्रान्ति की भी। सवाल यही होता है कि क्रान्तिकारी नेतृत्व तैयार है या नहीं। हम डेनियल गुएरिन के एक कथन के साथ यहाँ रुकेंगे – अगर हमने समाजवाद की घड़ी को निकल जाने दियातो हमारी सज़ा होगी फ़ासीवाद।

फ़ासीवाद का मुकाबला कैसे करें? 

इटली, जर्मनी और भारत में फ़ासीवाद के पैदा होने से लेकर उसके विकास तक का ऐतिहासिक विश्लेषण करने के बाद हमने फ़ासीवादी उभार के प्रमुख सामान्य ऐतिहासिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक कारणों को समझा। एक सामान्य निष्कर्ष के तौर पर यह बात हमारे विश्लेषण से सामने आयी कि पूँजीवादी व्यवस्था का संकट क्रान्तिकारी और प्रतिक्रियावादी, दोनों ही सम्भावनाओं को जन्म देता है। अगर किसी समाज में क्रान्तिकारी सम्भावना को मूर्त रूप देने के लिए एक अनुभवी और विवेक-सम्पन्न कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी पार्टी मौजूद नहीं है, और फ़ासीवादी शक्तियों ने समाज के पोर-पोर में अपनी पैठ बना ली है, तो प्रतिक्रियावादी सम्भावना के हकीकत में बदल सकती है। जर्मनी और इटली में यही हुआ था और एक दूसरे किस्म से भारत में भी भगवा फ़ासीवादी उभार के पीछे एक बड़ा कारण किसी क्रान्तिकारी नेतृत्व का ग़ैर-मौजूद होना भी था। इस बात को हम पहले ही विस्तार में समझ चुके हैं। दूसरी बात, जो हमने समझी वह यह थी कि मज़दूर आन्दोलन में सामाजिक-जनवादियों और संशोधनवादियों की ग़द्दारी एक बड़ा कारण थी जिसने एक रोके जा सकने वाले फ़ासीवादी उभार को न रोके जा सकने वाले फ़ासीवादी उभार में तब्दील कर दिया। ज़ाहिर है कि यह दूसरा कारण पहले कारण से नज़दीकी से जुड़ा हुआ है। मज़दूर आन्दोलन का नेतृत्व पूँजीवादी संकट की स्थिति में अगर क्रान्तिकारी विकल्प मुहैया नहीं कराता है और पूरे आन्दोलन को सुधारवाद, पैबन्दसाज़ी, अर्थवाद, अराजकता- वादी संघाधिपत्यवाद और ट्रेड-यूनियनवाद की अन्‍धी गलियों में घुमाता रहेगा तो निश्चित रूप से अपनी गति से पूँजीवाद अपनी सबसे प्रतिक्रियावादी तानाशाही की ओर ही बढ़ेगा। बल्कि कहना चाहिए एक संगठित और मज़बूत, लेकिन अर्थवादी, सुधारवादी और ट्रेड-यूनियनवादी मज़दूर आन्दोलन पूँजीवाद को संकट की घड़ी में और तेज़ी से फ़ासीवाद की ओर ले जाता है (जर्मनी और इटली में फ़ासीवादी उभार के विश्लेषण वाले हिस्से को देखें)। तीसरी बात : यह सच है कि फ़ासीवाद अन्त में और वास्तव में बड़ी पूँजी के हितों की सेवा करता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि इसका सामाजिक आधार महज़ बड़ा पूँजीपति वर्ग होता है। बड़े पूँजीपति वर्ग को मज़दूर आन्दोलन के दबाव को तोड़ने के लिए एक ऐसी ताकत की ज़रूरत होती है जिसका व्यापक सामाजिक आधार हो। फ़ासीवाद के रूप में उसे वह ताकत मिलती है। पूँजीवादी संकट बड़े पैमाने पर शहरी और ग्रामीण निम्न पूँजीपति वर्ग और मध्‍यम वर्गों को उजाड़कर असुरक्षा और अनिश्चितता की स्थिति में पर्हुंचा देता है। दिशाहीन शहरी बेरोज़गार युवा आबादी, शहरी और ग्रामीण निम्न पूँजीपति वर्ग के बीच में फ़ासीवादी ताकतें अपना प्रचार करती हैं और उनकी निगाहों में किसी अल्पसंख्यक समुदाय को और संगठित मज़दूर आन्दोलन को निशाना बनाती हैं। असुरक्षा और अनिश्चितता से चिड़चिड़ाये और बिलबिलाये टटपुँजिया वर्ग में प्रतिक्रिया की ज़मीन पहले से तैयार होती है और वह फ़ासीवादी प्रचार का शिकार बन जाता है। फ़ासीवाद ग्रामीण और शहरी मध्‍य वर्गों, निम्न पूँजीपति वर्गों और लम्पट सर्वहारा वर्ग के जीवन की दिशाहीनता, हताशा, लक्ष्यहीनता और सांस्कृतिक पिछड़ेपन का फायदा उठाते हुए उनके बीच लम्बी तैयारी के साथ प्रतिक्रिया की ज़मीन तैयार करता है। इसी प्रक्रिया का नतीजा होता है एक फ़ासीवादी आन्दोलन का पैदा होना, जिसके सामाजिक अवलम्ब के तौर पर ये वर्ग होते हैं। फ़ासीवाद की विजय या उसके सत्ता में आने के साथ ही ये वर्ग इस सच्चाई से वाकिफ हो जाते हैं कि फ़ासीवाद वास्तव में बड़ी पूँजी का सबसे निर्मम और बर्बर चाकर है और उससे दूर भी होने लगते हैं। लेकिन यह तो बाद की बात है। प्रभावी क्रान्तिकारी प्रचार और पार्टी के अभाव में फ़ासीवाद उभार की ज़मीन भी इन्हीं वर्गों के बीच तैयार होती है।

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चौथी बात जो हमने नतीजे के रूप में समझी, वह यह थी कि जिन देशों में पूँजीवाद किसी क्रान्ति के ज़रिये सत्ता में नहीं आया, वहाँ पूरी अर्थव्यवस्था, समाज और राजनीति में ग़ैर-जनवादी और निरंकुश प्रवृत्तियों का बोलबाला होता है। यहाँ तक कि भावी समाजवादी क्रान्ति के मित्र वर्गों में भी इन प्रवृत्तियों ने जड़ जमा रखी होती है। रैडिकल भूमि सुधार के अभाव में गाँव में युंकरों और नये धनी किसानों का एक पूरा वर्ग होता है जो फ़ासीवाद के लिए एक मज़बूत सामाजिक आधार का काम करता है। मँझोले किसानों का एक बड़ा हिस्सा भी क्रान्तिकारी प्रचार, आन्दोलन और संगठन के अभाव में फ़ासीवादी प्रचार में बह जाता है। पूँजीवादी जनवादी क्रान्ति के अभाव में शहरी मध्‍यवर्गों में भी जनवादी विचारों और प्रथाओं का भारी अभाव होता है। यह मध्‍यवर्ग उस यूरोपीय मध्‍यवर्ग के समान नहीं है जिसमें तार्किकता, वैज्ञानिकता और गतिमानता कूट-कूट कर भरी हुई थी और जो मानवतावाद और जनवाद के सिद्धान्तों का जनक था। आर्थिक तौर पर यह मध्‍यवर्ग बन चुका है, लेकिन वैचारिक और आत्मिक तौर पर उसमें ऐसा कुछ नहीं है जिसे आधुनिक मध्‍यवर्ग जैसा कहा जा सके। यही कारण है कि यह शहरी पढ़ा-लिखा मध्‍यवर्ग भी फ़ासीवादी प्रचार के समक्ष अरक्षित होता है और उसके प्रभाव में आ जाता है। पूँजीवादी क्रान्ति का अभाव ही था जिसने जर्मनी और इटली को फ़ासीवाद के उदय और विकास की ज़मीन बनाया और फ्रांस को नहीं। यह बेवजह नहीं था कि फ्रांस में फ़ासीवादी समूहों को कभी कोई बड़ी सफलता नहीं मिली।

ये कुछ प्रमुख नतीजे थे जिन पर हम अपने विश्लेषण के ज़रिये पहुँचे थे। अपने इन नतीजों के आधार पर ही हमें यह तय करना होगा कि हमें फ़ासीवाद से किस प्रकार लड़ना है। ज़ाहिर है कि हमें फ़ासीवाद पर विचारधारात्मक और राजनीतिक चोट करनी ही होगी; हमें पूरी फ़ासीवादी विचारधारा के वर्ग मूल और चरित्र को आम जनता के सामने उजागर करना होगा; हमें फ़ासीवादियों की असली जन्मकुण्डली और उनके इतिहास को जनता के समक्ष खोलकर रख देना होगा; हमें उनके भर्ती केन्द्रों पर चोट करनी होगी और उन सभी वर्गों के बीच सघन और व्यापक राजनीतिक प्रचार चलाना होगा जो उनका सामाजिक अवलम्ब बन सकते हैं; हमें मज़दूर आन्दोलन के अन्दर ज़बरदस्त राजनीतिक प्रचार चलाते हुए मज़दूर वर्ग को उसके ऐतिहासिक लक्ष्य और उत्तरदायित्व, यानी, समाजवादी क्रान्ति और कम्युनिज्म की ओर आगे बढ़ने से, अवगत कराना होगा; इसी प्रक्रिया में हमें मज़दूर वर्ग के भीतर मौजूद वर्ग विजातीय प्रवृत्तियों पर चोट करनी होगी और उसे अर्थवाद, संशोधनवाद और सुधारवाद के गङ्ढे में जाने से बचाना होगा; हमें सामाजिक जनवादियों और संशोधनवादियों को पूरी जनता के सामने नंगा करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़नी होगी; हमारा विश्लेषण हमें स्पष्ट तौर पर दिखलाता है कि फ़ासीवाद को एक अप्रतिरोध्‍य उभार बनाने में अगर किसी एक शक्ति की सबसे अधिक भूमिका थी तो वह संशोधनवाद ही था। भारत में भी इस मामले में कोई अपवाद नहीं है। आज मज़दूर आन्दोलन के भीतर भारतीय मज़दूर संघ सबसे बड़ी ट्रेडयूनियन बन चुका है तो इसकी ज़िम्मेदार एटक, सीटू और एक्टू जैसी अर्थवादियों-सुधारवादियों-ट्रेडयूनियनवादियों और संशोधनवादियों की ग़द्दार यूनियनें ही हैं। इन बातों को हम अच्छी तरह समझते हैं, लेकिन फिर भी कम्युनिस्ट कतारों और कार्यकर्ताओं के लिए बिन्दुवार कुछ ठोस बातों को समझ लेना बहुत ज़रूरी है। हमारी समझ में ये कुछ चन्द ज़रूरी बातें हैं, जिन पर अमल फ़ासीवाद को शिकस्त देने के हमारे संघर्ष में हमारी भारी मदद कर सकता है।

1) मज़दूर मोर्चे पर जो सबसे अहम कार्यभार कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के सामने है, वह है मज़दूर आन्दोलन और ट्रेडयूनियन आन्दोलन के भीतर संशोधनवाद, ट्रेडयूनियनवाद, अर्थवाद, सुधारवाद और अराजकतावादी संघाधिपत्यवाद के ख़िलाफ फैसलाकुन, समझौताहीन और निर्मम संघर्ष। यही वे भटकाव हैं जो मज़दूर वर्ग को फ़ासीवाद के राक्षस के समक्ष वैचारिक और राजनीतिक तौर पर अरक्षित छोड़ देते हैं। इन भटकावों को मज़दूर आन्दोलन के भीतर घुसाने और पैदा करने का अपराध और ग़द्दारी जिन ताकतों ने की है, वे हैं इस देश की संसदीय वामपन्थी पार्टियाँ जो अरसे पहले मार्क्‍सवाद का दामन छोड़ संशोधनवाद का रास्ता चुन चुकी हैं। मज़दूर वर्ग के बीच भारत की कम्युनिस्ट पार्टी, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी), भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी) लिबरेशन जैसी पार्टियों की ग़द्दारी और उनके दोगलेपन को नंगा कर देना कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों के लिए सबसे ज़रूरी काम है। फ़ासीवाद से लड़ने के लिए मज़दूर वर्ग को जिस स्वप्न की ज़रूरत होती है, ये पार्टियाँ उस स्वप्न की हत्या करती हैं। हमें उसी स्वप्न को मज़दूर वर्ग के बीच पुनर्जीवित करना और फैलाना है। इसके बग़ैर हम फ़ासीवाद से लड़ने के लिए मज़दूर वर्ग की जुझारू और लड़ाकू एकता और संगठन खड़े नहीं कर सकते। हमें मज़दूर वर्ग के भीतर अराजनीतिक प्रवृत्तियों का भी ज़बरदस्त विरोध करना चाहिए। अराजनीतिक प्रवृत्तियों में सबसे प्रमुख है अराजकतावाद और अराजकतावादी संघाधिपत्यवाद जो मज़दूर वर्ग के ऐतिहासिक लक्ष्य के प्रति उसके सचेत होने को भारी नुकसान पहुँचाता है। ये मज़दूर वर्ग के बीच ग़ैर-पार्टी क्रान्तिवाद और मज़दूर वर्ग के ”स्वायत्त” संगठन की सोच को प्रोत्साहित करता है। स्वायत्त का अर्थ है विचारधारात्मक और राजनीतिक रूप से अनाथ! इस स्वायत्तता की लफ्फाजी का पर्दाफाश करना चाहिए और मज़दूर वर्ग में क्रान्तिकारी विचारधारा और पार्टी की ज़रूरत को हर-हमेशा रेखांकित किया जाना चाहिए। ज्ञात हो कि अराजकतावादी संघाधिपत्यवादी जॉर्ज सोरेल के अधिकांश अनुयायी इटली में फ़ासीवादियों की शरण में चले गये थे। यह अनायास नहीं था।

2) मज़दूर मोर्चे के बाहर भी आम मध्‍यवर्ग और निम्न मध्‍यवर्ग और साथ ही ग्रामीण क्षेत्र की सर्वहारा, अर्द्धसर्वहारा, ग़रीब और मँझोले किसानों की आबादी में भी हमें संशोधनवादी संसदीय वामपन्थी पार्टियों को नंगा करना होगा और बताना होगा कि ये छद्म कम्युनिस्ट हैं और कम्युनिस्ट विचारधारा और मज़दूर वर्ग के साथ ग़द्दारी कर चुके हैं। शहरी और ग्रामीण मध्‍यवर्ग के हितों की नुमाइन्दगी करने के इनके दावे भी खोखले हैं और वास्तव में इनका लक्ष्य इसी पूँजीवादी व्यवस्था की रक्षा करना है जिसके भीतर आम मध्‍यवर्ग का भी कोई भविष्य नहीं है और उसकी नियति में बरबाद होकर सर्वहारा और अर्द्धसर्वहारा की कतारों में शामिल होते जाना ही लिखा है। यह इसलिए भी बेहद ज़रूरी बन जाता है क्योंकि मध्‍यवर्ग और आम मेहनतकश जनता का एक बड़ा हिस्सा संशोधनवादी नेतृत्व की कारगुज़ारियों को देखकर संसदीय वामपन्थी पार्टियों से तो नफ़रत करता है, वह अज्ञानता में समाजवाद और कम्युनिज्म के आदर्शों से भी दूर हो जाता है। इसलिए छद्म मार्क्‍सवादियों को मज़दूर वर्ग में ही नहीं बल्कि भावी समाजवादी क्रान्ति के सभी मित्र वर्गों के सामने नंगा करना बेहद ज़रूरी कार्यभार बन जाता है।

3) सबसे प्रमुख तौर पर मज़दूर वर्ग में, लेकिन साथ ही शहरी और ग्रामीण निम्न पूँजीपति वर्ग, अर्द्धसर्वहारा आबादी, ग़रीब और मँझोले किसानों, खेतिहर मज़दूरों और वेतनभोगी निम्न मध्‍यवर्ग के बीच क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी को लगातार राजनीतिक प्रचार की कार्रवाइयाँ चलाते हुए यह दिखलाना होगा कि पूँजीवाद एक परजीवी और मरणासन्न व्यवस्था है जो अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाकर अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है। अब यह जनता को बेरोज़गारी, महँगाई, ग़रीबी, भुखमरी, असुरक्षा, अनिश्चितता आदि के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं दे सकता। यह अपनी जड़ता की ताकत से टिका हुआ है और इसकी सही जगह इतिहास का कूड़ेदान है। पूँजीवादी समाज और व्यवस्था की रोज़मर्रे की और प्रतीक घटनाओं के ज़रिये लगातार उसे नंगा करना होगा। मज़दूरों, युवाओं, छात्रों, बुद्धिजीवियों और स्त्रियों की पत्र-पत्रिकाओं के माध्‍यम से हर सम्भव मौके पर पूँजीवाद की ऐतिहासिक व्यर्थता को प्रदर्शित करना होगा। पूँजीवादी संकट के दौर में और पूँजीवादी चुनावों के दौर में इस व्यवस्था और समाज का क्रान्तिकारी विकल्प लेकर ज़ोरदार तरीके से आम मेहनतकश जनता के सभी वर्गों में जाना होगा। ये वे वक्त होते हैं जब जनता राजनीतिकरण के लिए मानसिक तौर पर खुली और तैयार होती है। लेकिन जब ऐसे मौके न हों तब भी निरन्तरता के साथ, बिना थके और तात्कालिक परिणामों की आकांक्षा किये बग़ैर पूँजीवाद विरोधी कम्युनिस्ट राजनीतिक प्रचार को जारी रखना होगा, कभी विलम्बित ताल में तो कभी द्रुत ताल में। लेकिन बिना रुके, बिना थके।

4) मज़दूर वर्ग की पार्टी को मज़दूर मोर्चे, छात्र-युवा मोर्चे, बुद्धिजीवी मोर्चे, स्त्री मोर्चे समेत सभी मोर्चों पर उन अतार्किक, अवैज्ञानिक और निरंकुश विचारों के ख़िलाफ प्रचार चलाना होगा जिनका इस्तेमाल फ़ासीवादी ताकतें निम्न पूँजीपति वर्गों, मध्‍यम वर्गों, लम्पट सर्वहारा, आदि को साथ लेने के लिए करती हैं। मिसाल के तौर पर, नस्लवाद, साम्प्रदायिकतावाद, क्षेत्रवाद, भाषाई कट्टरता, जातीयतावाद, जातिवाद आदि। ये वे विचारधाराएँ हैं जिनका इस्तेमाल कर फ़ासीवादी ताकतें जन असन्तोष की दिशा को पूँजीवादी व्यवस्था की दिशा में मुड़ने से रोकती हैं और उन्हें किसी अल्पसंख्यक समुदाय या जाति की ओर मोड़ देती हैं और एक निरंकुश प्रतिक्रियावादी और बहुसंख्यावादी राजनीति करते हुए फ़ासीवादी सत्ता कायम करती हैं। इन विचारधाराओं का विरोध हमें बुर्जुआ मानवतावाद और धर्मनिरपेक्षता की ज़मीन पर खड़ा होकर नहीं बल्कि सर्वहारा वर्ग की वर्ग चेतना की ज़मीन पर खड़ा होकर करना होगा। बुर्जुआ मानवतावादी अपीलें और धर्मनिरपेक्षता का राग अलापना कभी भी साम्प्रदायिक फ़ासीवाद का मुकाबला नहीं कर पाया है और न ही कर पायेगा। सर्वहारा वर्ग चेतना की ज़मीन पर खड़ा होकर किया जाने वाला जुझारू और आक्रामक प्रचार ही इन विचारों के असर को तोड़ सकता है। हमें तमाम आर्थिक और सामाजिक दिक्कतों के ड्डोत को आम जनता के सामने नंगा करना होगा और साम्प्रदायिक प्रचार के पीछे के असली इरादे पर से सभी नकाब नोच डालने होंगे। साथ ही, यह प्रचार करने वाले व्यक्तियों की असलियत को भी हमें जनता के बीच लाना होगा और बताना होगा कि उनका असली मकसद क्या है। धार्मिक कट्टरपन्थी फ़ासीवाद का मुकाबला इसी ज़मीन पर खड़े होकर किया जा सकता है। वर्ग निरपेक्ष धर्म निरपेक्षता और ‘मज़हब नहीं सिखाता’ जैसी शेरो-शायरी का जनता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है।

5) फ़ासीवाद के सत्ता में रहने पर या उसके सत्ता में रह चुके होने पर उसकी सच्चाई को जनता के सामने उजागर करना अधिक आसान होता है। भाजपा के नेतृत्व में छह वर्षों तक राजग सरकार के चलने से वे काम हो गये जो सामान्य परिस्थितियों में करने पर किसी क्रान्तिकारी ताकत को दुगुना वक्त लगता। सत्ता में आते ही फ़ासीवादियों का धनलोलुप, पतित, चरित्रहीन, सत्ता-लोलुप, कुर्सी-प्रेमी, अनैतिक चरित्र सामने आने लगता है और उनके चेहरे पर से धार्मिक पावनता, नैतिकता, और अनुशासन का सारा नकाब चिथड़ा हो जाता है। इस कारक का क्रान्तिकारी ताकतों को पूरा इस्तेमाल करना चाहिए और जनता के हर हिस्से में फ़ासीवादियों के भ्रष्टाचार, अनैतिकता, पतन और धनलोलुपता को जमकर निशाना बनाना चाहिए और उनका भण्डाफोड़ करना चाहिए। ऐसा प्रचार निरन्तरता के साथ लम्बे समय तक चलाया जाना चाहिए। इससे हम उनकी विश्वसनीयता को प्राणान्तक चोट पहुँचा सकते हैं। यह बेहद ज़रूरी है कि फ़ासीवादियों को जनता के बीच किसी भी रूप में पैर न जमाने दिया जाये। इस मकसद में यह प्रचार बहुत बड़ी भूमिका निभाएगा।

6) फ़ासीवाद के सामाजिक अवलम्बों में जिन वर्गों को फ़ासीवाद अपनी पेशीय शक्ति के रूप में भ्रष्ट करता है वे हैं आर्थिक और क्षेत्रीय रूप से पूँजीवादी विकास के कारण उजड़े हुए वर्ग। क्रान्तिकारी पार्टी को इन वर्गों को संगठित करने का प्रयास एकदम शुरू से कर देना चाहिए और उनके बीच शुरू से ही पूँजीवाद-विरोधी राजनीतिक प्रचार करना चाहिए। उन्हें पहले कदम से ही यह दिखलाना होगा कि उनके उजड़ने, उनके जीवन की असुरक्षा और अनिश्चितता और दर-बदर होने के लिए और कोई नहीं बल्कि पूँजीवादी व्यवस्था ज़िम्मेदार है। यह और कुछ कर भी नहीं सकती है। ऐसे वर्गों में लम्पट सर्वहारा वर्ग, असंगठित और अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने वाला सर्वहारा वर्ग, शहरी निम्न मध्‍यवर्गीय बेरोज़गार और अर्द्ध-बेरोज़गार, गाँवों में उजड़े हुए या उजड़ते हुए ग़रीब किसान आदि प्रमुख हैं।

7) लेनिन ने बहुत पहले बताया था कि फ़ासीवाद और प्रतिक्रियावाद दस में से नौ बार जातीयतावादी, नस्लवादी, साम्प्रदायिकतावादी सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का चोला पहनकर आता है। वैसे तो हमें शुरू से ही बुर्जुआ राष्ट्रवाद के हर संस्करण का पुरज़ोर विरोध करना चाहिए, लेकिन ख़ास तौर पर फ़ासीवादी प्रजाति का सांस्कृतिक अन्धराष्ट्रवाद मज़दूर वर्ग के सबसे बड़े शत्रुओं में से एक है। हमें हर कदम पर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, प्राचीन हिन्दू राष्ट्र के गौरव के हर मिथक और झूठ का विरोध करना होगा और उसे जनता की निगाह में खण्डित करना होगा। इसमें हमें विशेष सहायता इन सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों की जन्मकुण्डली से मिलेगी। निरपवाद रूप से अन्धराष्ट्रवाद का जुनून फैलाने में लगे सभी फ़ासीवादी प्रचारक और उनके संगठनों का काला इतिहास होता है जो ग़द्दारियों, भ्रष्टाचार और पतन की मिसालें पेश करता है। हमें बस इस इतिहास को खोलकर जनता के सामने रख देना है और उनके बीच यह सवाल खड़ा करना है कि यह ”राष्ट्र” कौन है जिसकी बात फ़ासीवादी कर रहे हैं? वे कैसे राष्ट्र को स्थापित करना चाहते हैं? और किसके हित में और किसके हित की कीमत पर? ”राष्ट्रवाद” के नारे और विचारधारा का निर्मम विखण्डन – इसके बिना हम आगे नहीं बढ़ सकते। राष्ट्र की जगह हमें वर्ग की चेतना को स्थापित करना होगा। बुर्जुआ राष्ट्रवाद की हर प्रजाति के लिए ”राष्ट्र” बुर्जुआ वर्ग और उसके हित होते हैं। मज़दूर वर्ग को हाड़ गलाकर इस ”राष्ट्र” की उन्नति के लिए खपना होता है। इसके अतिरिक्त कुछ भी सोचना राष्ट्र-विरोधी है। राष्ट्रवाद मज़दूरों के बीच छद्म गर्व बोध पैदा कर उनके बीच वर्ग चेतना को कुन्द करने का एक पूँजीवादी उपकरण है और इस रूप में उसे बेनकाब करना बेहद ज़रूरी है। यह न सिर्फ मज़दूरों के बीच किया जाना चाहिए, बल्कि हर उस वर्ग के बीच किया जाना चाहिए जिसे भावी समाजवादी क्रान्ति के मित्र के रूप में गोलबन्द किया जाना है।

8) सामाजिक जनवादी और संशोधनवादी मज़दूर आन्दोलन में सर्वहारा वर्ग चेतना को कुन्द करने का हर सम्भव प्रयास करते हैं। वे वर्ग संघर्ष की बजाय वर्ग सहयोग की कार्यदिशा को आन्दोलन के बीच पैठाने का काम करते हैं, हालाँकि बौद्धिक विमर्शों में वे भी वर्ग संघर्ष की बातें करते हैं। मज़दूरों को वर्ग सहयोग का उपदेश देते हुए पश्चिम बंगाल के मुख्यमन्त्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने कुछ समय पहले कहा था कि हमें समझ लेना चाहिए कि वह दौर अब चला गया जब रूस या चीन की तरह हिंसक तरीके से क्रान्ति हो सके। मज़दूर वर्ग को पूँजीपति वर्ग के साथ सहयोग के दृष्टिकोण को लागू करना चाहिए। उद्योग की उन्नति में ही दोनों वर्गों का हित है। यहाँ पर बुद्धदेव भट्टाचार्य ने लगभग-लगभग शब्दश: वही बात कही थी जो एक जर्मन सामाजिक-जनवादी नेता ने कही थी। कार्ल लीज़न ने उद्योगपतियों से समझौते के समय कमोबेश यही बात जर्मनी में कही थी। कार्ल लीज़न जर्मन सामाजिक जनवादी पार्टी के एक नेता थे। कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों को वर्ग सहयोग के ऐसे हर प्रयास को बेनकाब करना चाहिए और संशोधनवादियों की असलियत को मज़दूरों के सामने उघाड़कर रख देना चाहिए। उन्हें मज़दूर वर्ग को समझाना होगा कि श्रम और पूँजी की शक्तियों के बीच कोई समझौता नहीं हो सकता। ऐतिहासिक तौर पर ये दोनों अन्तरविरोधी ताकतें हैं और इतिहास ने उनके सामने एक ही विकल्प रखा है – संघर्ष, और इस संघर्ष में अन्तत: विजय श्रम की शक्तियों की होनी है।

9) हम कम्युनिस्ट क्रान्तिकारियों को पूँजीवादी विकास के मौजूदा दौर में अनौपचारिक व असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों पर विशेष रूप से ज़ोर देना होगा। आज भारत के मज़दूर वर्ग का 90 फीसदी से भी अधिक हिस्सा असंगठित क्षेत्र में आता है। संगठित मज़दूरों की बड़ी आबादी सफेद कॉलर के मज़दूरों में तब्दील हो रही है। यह आबादी अपने आपको मज़दूर की बजाय कर्मचारी कहलवाना पसन्द करती है और इसका बड़ा हिस्सा या तो संशोधनवादी ट्रेड यूनियनों का हिस्सा बन चुका है या फिर फ़ासीवादी भारतीय मज़दूर संघ का, जो अब भारत की सबसे बड़ी ट्रेड यूनियन है। अनौपचारिक व असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के बीच फ़ासीवादी ताकतें लगातार सुधार की गतिविधियों और कीर्तन-जागरण आदि जैसे धार्मिक क्रियाकलापों के ज़रिये आधार बनाने का प्रयास कर रही हैं। इस आबादी के फ़ासीवादीकरण के लिए उनके बीच सेवा भारती आदि जैसे उपक्रम चलाए जा रहे हैं और उन्हें भ्रष्ट करने की कोशिश की जा रही है। यह सही है कि मज़दूर आबादी के इस हिस्से का फ़ासीवादीकरण सबसे मुश्किल है लेकिन फिर भी हमें निरन्तरता के साथ इस आबादी को संगठित करने का प्रयास सबसे पहले करना होगा। वैसे भी असंगठित मज़दूर कुल मज़दूर आबादी की बहुसंख्या का निर्माण करते हैं, इसलिए हमें उनके इलाकाई संगठन बनाने, उनके बीच बच्चों के लिए स्कूल खोलने, सुधार की कार्रवाइयाँ करने और उनके बीच अदम्य और शक्तिशाली सामाजिक आधार बनाने की कार्रवाइयाँ करनी चाहिए। उनके बीच हमें निरन्तर, व्यापक और सघन राजनीतिक प्रचार करना होगा। पुराने असंगठित मज़दूर वर्ग की तरह यह नया असंगठित मज़दूर वर्ग वर्ग असचेत नहीं है, बल्कि घुमन्तू मज़दूर होने के कारण पूरे पूँजीपति वर्ग को अपने दुश्मन के तौर पर देखता है और संगठित होने की सम्भावना से सम्पन्न है। दूसरी बात यह है कि इस मज़दूर वर्ग का बड़ा हिस्सा युवा है जो हमारे लिए एक अच्छी बात है। इसी हिस्से के बीच से हम मज़दूर वर्ग के सबसे जुझारू संगठन बना सकते हैं और हमें बनाने होंगे। ज़ाहिर है कि असंगठित क्षेत्र के मज़दूरों के बीच कारख़ाना आधारित ट्रेड यूनियनें नहीं बन सकती हैं। इसलिए उनके बीच हमें इलाकाई ट्रेड यूनियनें बनानी चाहिए। ट्रेड यूनियन के अतिरिक्त, इलाकाई पैमाने के जुझारू लड़ाकू संगठन खड़े किये जाने चाहिए। जिस प्रकार जर्मनी में कारख़ानों में फैक्ट्री ब्रिगेडें बनायी गयी थीं, उसी प्रकार हमें असंगठित मज़दूरों के रिहायशी इलाकों में ऐसे लड़ाकू संगठन खड़े करने चाहिए, जो उनकी ट्रेड यूनियन से अलग हों। ट्रेड यूनियनों का एक विशेष काम होता है और उन्हें उसी काम के लिए उपयोग में लाया जाना चाहिए। फ़ासीवादी हमलों को नाकाम करने के लिए मज़दूर वर्ग के अपने अलग लड़ाकू-जुझारू संगठन होने चाहिए।

10) फ़ासीवाद की कार्यनीति की एक ख़ास बात यह होती है कि अपने राजनीतिक और सांगठनिक हितों की पूर्ति और अपने दुश्मनों के सफाए के लिए यह आतंक की रणनीति का इस्तेमाल करता है। जर्मनी और इटली की ही तरह भारत के फ़ासीवादियों ने भी बजरंग दल, विश्व हिन्दू परिषद और वनवासी कल्याण आश्रम के नाम पर अपने आतंक समूह बना रखे हैं। ये आतंक समूह बुर्जुआ राज्य के उपकरणों के दायरे से बाहर बुर्जुआ वर्ग की तानाशाही को लागू करने का काम करते हैं। मज़दूर नेताओं, ट्रेड यूनियन नेताओं, कम्युनिस्टों, उदारपन्थियों पर हमले और उनकी हत्याओं का इतिहास भारत में भी मौजूद है। हड़तालों को तोड़ने के लिए ऐसे आतंक समूहों का इस्तेमाल फ़ासीवादियों ने भारत में भी किया है। महाराष्ट्र में हड़ताली मज़दूरों और उनके नेताओं पर शिवसेना की गुण्डा वाहिनियों के हमले को कौन भूल सकता है? हमें फ़ासीवाद को विचारधारा और राजनीति में तो परास्त करना ही होगा, लेकिन साथ ही हमें उन्हें सड़क पर भी परास्त करना होगा। इसके लिए हमें मज़दूरों के लड़ाकू और जुझारू संगठन बनाने होंगे। ग़ौरतलब है कि जर्मनी के कम्युनिस्टों ने फ़ासीवादी गिरोहों से निपटने के लिए कारख़ाना ब्रिगेडें खड़ी की थीं, जो सड़क पर फ़ासीवादी गुण्डों के हमलों का जवाब देने और उन्हें सबक सिखाने का काम कारगर तरीके से करती थीं। बाद में यह प्रयोग आगे नहीं बढ़ सका और फ़ासीवादियों ने जर्मनी में अपनी सत्ता कायम कर ली। मज़दूर वर्ग का बड़ा हिस्सा वहाँ अभी भी सामाजिक जनवादियों के प्रभाव में ही था और क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों की पकड़ उतनी मज़बूत नहीं हो पायी थी। लेकिन उस छोटे-से प्रयोग ने प्रदर्शित किया था कि फ़ासीवादी गुण्डों से सड़क पर ही निपटा जा सकता है। उनके साथ तर्क करने और वाद-विवाद करने की कोई गुंजाइश नहीं होती है। साम्प्रदायिक दंगों को रोकने और फ़ासीवादी हमलों को रोकने के लिए ऐसे ही दस्ते छात्र और युवा मोर्चे पर भी बनाए जाने चाहिए। छात्रों-युवाओं को ऐसे हमलों से निपटने के लिए आत्मरक्षा और जनरक्षा हेतु शारीरिक प्रशिक्षण और मार्शल आट्र्स का प्रशिक्षण देने का काम क्रान्तिकारी छात्र-युवा संगठनों को करना चाहिए। उन्हें स्पोट्र्स क्लब, जिम, मनोरंजन क्लब आदि जैसी संस्थाएँ खड़ी करनी चाहिए, जहाँ राजनीतिक शिक्षण-प्रशिक्षण और तार्किकता व वैज्ञानिकता के प्रसार का काम भी किया जाये।

11) हमें उदारवादी बुर्जुआ राज्य को लेकर जनता में मौजूद सभी विभ्रमों को खण्डित करने का काम करना होगा। हमें दिखाना होगा कि किस प्रकार पूँजीवाद की नैसर्गिक गति के कारण उदारवादी या कल्याणकारी बुर्जुआ राज्य की नियति में ढह जाना ही लिखा है। इसकी नैसर्गिक गति पतन की तरफ होती है। फ़ासीवाद पूँजीवादी अर्थव्यवस्था और राजसत्ता के ढहने और पतन की सूरत में ही पैदा होता है। वही स्थिति जो क्रान्तिकारी सम्भावना को जन्म देती है, प्रतिक्रियावादी सम्भावना को भी जन्म देती है। हमें उदारवादी पूँजीवाद की असलियत को जनता के सामने हर सम्भव मौके पर लाते हुए बताना होगा कि यह जनता को कुछ नहीं दे सकता और यह लगातार संकट के दलदल में धाँसता जायेगा और इसके द्वारा मिलने वाले श्रम अधिकार, जनवादी अधिकार, नागरिक अधिकार लगातार ख़त्म होते जायेगे।

12) हमें जनवादी, नागरिक व मानव अधिकारों के क्षरण और पतन के ख़िलाफ़ अपने नागरिक-जनवादी अधिकार संगठनों के ज़रिये संघर्ष करना होगा, जो हम जानते हैं कि एक हारी हुई लड़ाई होती है। लेकिन इसी हारी हुई लड़ाई को हम अपनी लम्बी लड़ाई में जीत का एक उपकरण बना सकते हैं। हमें इन अधिकारों के हनन और सिकुड़ते जनवादी स्पेस पर जनता के बीच लगातार प्रचार करना चाहिए और ख़ास तौर पर शिक्षित शहरी मध्‍यवर्ग के बीच यह प्रचार करना चाहिए। इसके ज़रिेये हमें पूरे पूँजीवादी जनवाद की असलियत को जनता के सामने बेनकाब करना चाहिए और इसके बेहतर और ऐतिहासिक तौर पर प्रगतिशील सर्वहारा जनवाद के विकल्प को पेश करना चाहिए। इसके अलावा, हमें श्रमिक अधिकारों के हनन और पतन पर भी लगातार संघर्ष और प्रचार करते हुए राज्य को मजबूर करना चाहिए कि वह श्रमिक अधिकारों की पूर्ति करे। इसके अतिरिक्त, हमें सभी अपूर्ण जनवादी कार्यभारों को पूरा करने के लिए संघर्ष करना चाहिए। जिन देशों में पूँजीवाद किसी क्रान्ति के ज़रिये नहीं आया, उन सभी देशों में अपूर्ण जनवादी कार्यभारों की एक लम्बी सूची है। हमें इन अधिकारों के लिए संघर्ष करना चाहिए। इसके दो मकसद हैं। एक तो यह पूँजीवादी राजसत्ता के ”ब्रीदिंग स्पेस” को घटाकर उसके लिए घुटन भरी स्थितियाँ पैदा करता है और दूसरा यह कि जनवादी कार्यभारों के पूरा होने के साथ समाज में तमाम वर्गों में प्रतिक्रिया का आधार कमज़ोर पड़ता है। यही कारण है कि अपूर्ण और अधूरे भूमि सुधारों को लागू करना भी क्रान्तिकारी कम्युनिस्टों की एक माँग बनता है। यह गाँवों में प्रतिक्रिया की ज़मीन को कमज़ोर करता है और वर्ग चेतना को उभारता है। यहाँ एक बात ग़ौर करने वाली यह होती है कि बुर्जुआ व्यवस्था के बीच जनवादी अधिकारों की लड़ाई को लेकर मज़दूर आन्दोलन में एक सर्वखण्डनवादी अराजकतावादी नज़रिया कभी-कभी प्रभावी हो जाता है और हम सिकुड़ते जनवादी स्पेस के ख़तरों को समझ नहीं पाते हैं। हमें लगता है कि कुछ ठोस वर्ग संघर्ष किया जाये, नागरिक व जनवादी अधिकारों पर हमले के ख़िलाफ संघर्ष हमें अप्रासंगिक सा लगने लगता है। यह बहुत ख़तरनाक भटकाव है। हंगेरियाई कम्युनिस्ट जॉर्ज लूकाच ने इस प्रवृत्ति के ख़िलाफ़ अपनी ”ब्लम थीसिस” में आगाह किया था और इसे आत्मघाती बताया था। जनवादी स्पेस के सिकुड़ने के साथ मज़दूर वर्ग को गोलबन्द और संगठित करने का काम भी कठिन होता जाता है। लेनिन ने यूँ ही नहीं कहा था कि बुर्जुआ जनवाद सर्वहारा वर्ग के लिए सर्वश्रेष्ठ युद्धभूमि है। इसलिए मज़दूर आन्दोलन को न सिर्फ श्रमिक अधिकारों पर हमले के ख़िलाफ लड़ना चाहिए, बल्कि उन्हें नागरिक व जनवादी अधिकारों पर हमले के ख़िलाफ भी लड़ना चाहिए। यह नागरिक पहचान पर उनका एक शक्तिशाली दावा भी होगा जो राजनीतिक संघर्ष को आगे ले जाने और मज़दूर वर्ग में राजनीतिक चेतना को विकसित करने का एक अहम कदम होगा।

 


 

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