अर्थव्यवस्था की विकास दर बढ़ने के आँकड़े : जुमला सरकार का एक और झूठ

पि‍छले दिनों, चुनावों से ठीक पहले जुमला सरकार ने एक और फर्जी आँकड़ा जारी किया कि नोटबंदी से अर्थव्यवस्था की विकास दर और तेज हो गई! कॉर्पोरेट कारोबारी मीडिया में भी कोई इसको स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि दिसम्बर तिमाही में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 7% की बढ़ोत्‍तरी हो गयी। सच तो यह है कि हर कंपनी के इस तिमाही के नतीजे बता रहे हैं बिक्री में कमी आयी, चाहे साबुन-तेल-चाय पत्ती हो या स्कूटर-मोटर साइकिल या पेंट – मगर सरकार कहती है निजी खपत 10% बढ़ गई है! शायद लोगों ने नोटबंदी के वक्त बैंकों की लाइनों में लगकर भारी खरीदारी की, पर बिक्री हुई नहीं। खेतों में खड़ी फसल आयी भी नहीं थी मगर आँकड़ों में खेती में पिछले महीने से वृद्धि और भी बढ़ गई, रिकॉर्ड उत्पादन होने वाला है। अगर ऐसा है तो फिर सरकार 25 लाख टन गेहूँ आयात क्यों कर रही है, वह भी महँगे दामों पर?

सेंटर फ़ॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकॉनमी के आँकड़े कहते हैं कि नोटबंदी के बाद पूँजीगत खर्च में ज़बर्दस्त कमी आई है – पर सरकारी आँकड़ों के अनुसार 2 साल तक नकारात्मक रहने के बाद खास इसी तिमाही में पूँजीगत निवेश 3.5% बढ़ गया! कोई महामूर्ख ही विश्वास करेगा कि जब बिक्री नहीं हो रही थी, नकदी थी नहीं, सब लाइन में लगे थे, उस नवम्बर-दिसम्बर में कारोबारी नया निवेश कर रहे थे। औद्योगिक उत्पादन का इंडेक्स लगातार महीनेवार गिरावट बता रहा है और सरकार ने अचानक घोषण कर दी कि उत्पादन बढ़ गया। बिक्री नहीं हो रही थी फिर भी सेठ लोग जोरों से उत्पादन कर रहे थे, मोदी जी के आँकड़े सुधारने के लिए।

कमाल की बात यह कि पिछले साल इसी तिमाही में इन्होंने जो 7.9% की वृद्धि बताई थी, उसे चुपके से घटाकर 6.9% कर दिया गया। झूठे आँकड़ों से विकास दिखाने के लिए अभी और भी संशोधन होंगे, मगर झूठ सामने आ ही जायेगा।

इस पर यही कहा जा सकता है कि जीडीपी दर से मिलने वाली सीख है कि जिसका रोजगार छिन जाये उसकी आमदनी बढ़ जाती है; जिसके पास पैसा कम हो वो ज्यादा चीजें खरीदता है;  जब लोग सामान कम खरीदते हैं तो बिक्री ज्यादा होती है; अगर खाना कम और असंतुलित मिले तो लोगों की सेहत बेहतर होती है; किसानों की उपज की कीमत घट जाये तो वे ख़ुशी से पागल हो जाते हैं; ख़ुशी में पागल किसान आत्महत्याएं बहुत ज्यादा करते हैं; फ़ैक्टरी बंद रहे तो उत्पादन ज्यादा होता है, तब बैंक कर्ज न दें तो भी सेठ लोग नये-नये उद्योग लगाने लगते हैं। अगर पिछली वाली लंबी लाइन को मिटा कर छोटा कर दिया जाये तो अब की छोटी लाइन लंबी हो जाती है।

यह भी पूछा जाना चाहिए कि अगर अर्थव्यवस्था ऐसे कुलाँचे भर रही है तो बेरोजगारी का आँकड़ा क्यों बढ़ रहा है? किसानों की ख़ुदकुशी क्यों बढ़ रही है? कुपोषण क्यों बढ़ रहा है?

 

 

मज़दूर बिगुल, मार्च 2017

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