विज्ञान कांग्रेस में संघी विज्ञान के नमूने

सिमरन

फ़ेक न्यूज़ यानी फ़र्ज़ी ख़बरों और झूठ को सच बनाकर पेश करने का खेल अब व्हाट्सप्प से बाहर निकलकर विज्ञान के गलियारों और विश्वविद्यालयों तक पहुँच चुका है। हालाँकि इसकी शुरुआत काफ़ी पहले ही हो चुकी थी। आपको देश के प्रधान-सेवक का 2014 का वो बयान याद होगा, जिसमें उन्होंने गणेश को सबसे पहली प्लास्टिक सर्जरी का उदाहरण बताया था। नरेन्द्र मोदी के इस बयान के बाद नेताओं और मन्त्रियों के बीच जैसे अवैज्ञानिक और मूर्खतापूर्ण बयान देने की होड़ लग गयी। केन्द्रीय मन्त्री सत्यपाल सिंह का डार्विन के सिद्धान्त को ग़लत बताना, त्रिपुरा के मुख्यमन्त्री बिप्लब देव का महाभारत काल में इण्टरनेट होने का दावा करने का बयान आदि। इन सभी दावे करने के पीछे मंशा केवल एक ही है और वो है मिथ्याओं को वैदिक ज्ञान के रूप में परोसते हुए एक काल्पनिक हिन्दू कीर्तिपूर्ण इतिहास की छद्म रचना। इस पूरी क़वायद से संघ के फ़ासीवादी एजेण्डे को लोगों में आधार प्राप्त होता है। और गोएबेल्स की झूठ को दोहराकर उसे सच साबित करने की नीति से ज़्यादा और कुछ नहीं है। इस साल की शुरुआत में 3 से 7 जनवरी 2019 को पंजाब के जालन्धर की एक निजी यूनिवर्सिटी में आयोजित 106वीं भारतीय विज्ञान कांग्रेस में भी संघी विज्ञान का घोलमट्ठा ही परोसा गया। भारत के वैज्ञानिकों के लिए सबसे शर्मनाक बात यह है कि जब मंच पर विज्ञान के नाम पर अतार्किकता और मूर्खता का प्रदर्शन किया जा रहा था, तो वहाँ मौजूद किसी भी वैज्ञानिक ने उसका प्रतिकार तक नहीं किया।

आन्ध्रा यूनिवर्सिटी के कुलपति, जी. नागेश्वर राव ने महाभारत के कौरवों को भारत में हज़ारों वर्षों से स्टेम सेल पर शोध का नतीजा बताया। राव साहब इतने तक ही नहीं रुके, उन्होंने आगे कहा कि रावण के पास 24 प्रकार के विमान थे और लंका में कई हवाई अड्डे मौजूद थे। उन्होंने तो यह तक दावा किया कि भगवान विष्णु के दशावतार डार्विन के सिद्धान्त को ग़लत साबित करते हैं। लेकिन नागेश्वर राव को भी मात देते हुए तमिलनाडु के एक वैज्ञानिक के.जे. कृष्णन ने एक ही साँस में आइंस्टीन और न्यूटन को ग़लत ठहराते हुए, गुरुत्वाकर्षण तरंगों को “नरेन्द्र मोदी तरंगें” घोषित करने का आह्वान कर डाला। कृष्णन जी का कहना है कि आइंस्टीन और न्यूटन को भौतिकी के बारे में बहुत कम जानकारी थी।

सवाल उठता है कि क्या ऐसे बयान देने वाले लोग सिर्फ़ अपनी अज्ञानता के चलते इतने बड़े मंच से ऐसे बयान देते हैं या फिर क्या हमें इन अवैज्ञानिक मतों को सिर्फ़ हँसी में उड़ा देना चाहिए? दोनों सवालों का जवाब है, नहीं! भारतीय विज्ञान कांग्रेस में जो हुआ वह अपने आपमें कोई अपवाद नहीं है। चारों ओर चाहे स्कूलों में पढ़ाये जाने वाली किताबों में इतिहास को बदलने की बात हो या विज्ञान के नाम पर संघी अविज्ञान और झूठों का प्रचार यह सब संघ के एक बड़े एजेण्डे के भीतर एकदम फिट बैठता है। आज का भारत भुखमरी, बेरोज़गारी, ग़रीबी और बीमारी को लेकर सवाल न करें और अपने आने वाले कल के बारे में न सोचे, इसीलिए उसे एक ऐसे सुनहरे अतीत की तस्वीर दिखायी जाती है, जो कभी थी ही नहीं। एक फन्तासी रची जाती है कि वैदिक काल में जब भारत एक महान हिन्दू राष्ट्र था तब यहाँ अभूतपूर्व वैज्ञानिक उपलब्धियाँ थीं, जो आज इसीलिए नहीं हैं, क्योंकि भारत एक हिन्दुत्ववादी राष्ट्र नहीं है। और अगर हमें आज की सब समस्याओं से निजात पानी है तो हमें उसी अतीत वाले भारत जैसा बनना होगा। इसीलिए रामायण और महाभारत को मिथिकीय महाकाव्यों की जगह वास्तविक इतिहास बताया जाता है। फ़ासीवादियों द्वारा विज्ञान पर हरहमेशा हमले किये गये हैं। नाज़ियों द्वारा 1930 में किताबें जलाना हो या आज के भारतीय फ़ासिस्टों द्वारा भारतीय विज्ञान कांग्रेस जैसे अनुष्ठानों में संघी विज्ञान का प्रचार। लेकिन इतिहास गवाह है कि फ़ासीवादियों को अपने मंसूबों में कभी कामयाबी नहीं मिली है। लेकिन इसके बावजूद भारतीय विज्ञान कांग्रेस में जो संघी विज्ञान फैलाया गया उसके ख़िलाफ़ हर तर्कसंगत नागरिक को सचेत रहना होगा।

 

मज़दूर बिगुल, जनवरी 2019


 

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