कोरोना से हुई मौतों का सच छिपाने की मोदी सरकार की कोशिश बेनक़ाब!
अनेक रिपोर्टों ने साबित किया कि भारत में सरकारी आँकड़ों से 10 गुना ज़्यादा मौतें हुईं

– योगेश

फ़ासीवादी मोदी सरकार द्वारा देश में कोरोना महामारी से हुई मौतों को छुपाने व मौत के ग़लत आँकड़े पेश करने के बावजूद कई रिपोर्टों से अब यह साबित हो रहा है कि दुनिया में कोरोना महामारी से सबसे ज़्यादा मौतें, एक रिपोर्ट के मुताबिक़ लगभग 47 लाख, भारत में हुई हैं। मानवद्रोही व संवेदनहीन मोदी सरकार का यह दावा कि कोरोना की दूसरी लहर में देश में ऑक्सीजन की कमी से एक भी मौत नहीं हुई, महज़ एक लफ़्फ़ाजी है। इस साल के अप्रैल-मई माह में आपने स्वयं देखा-सुना होगा कि देशभर में लोग ऑक्सीजन की कमी से चीखते-चिल्लाते रहे, ऑक्सीजन सिलेण्डरों के केन्द्रों पर लम्बी-लम्बी लाइनें लगती रहीं। देशभर के अस्पतालों में डॉक्टर यही कहते दिखे कि मरीज़ को बचाना है तो ऑक्सीजन का इन्तज़ाम कर लो। उस समय के न्यूज़ चैनल व सोशल मीडिया पर आ रहे वीडियों में लोग रोते-बिलखते बता रहे थे कि उनके मरीज़ ऑक्सीजन की कमी के कारण मर गये। देश की राजधानी दिल्ली के ही दो निजी अस्पतालों बत्रा व जयपुर गोल्डन में ऑक्सीजन की कमी के चलते ही क्रमशः 12 व 20 मौतें हुईं जो उस समय की एक बड़ी ख़बर बनी। ऐसी ही कई मौतें देशभर के कई छोटे-बडे़ अस्पतालों में हुईं। उत्तर प्रदेश के कानपुर शहर में बीते अप्रैल और मई में ही सैंकड़ों मौतें सिर्फ़ ऑक्सीजन की कमी के चलते हईं; 22 जुलाई, 2021 के अमर उजाला के कानपुर संस्करण की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ इस साल अप्रैल-मई में कोरोना से जो मौतें हुईं, उनमें आधे से ज़्यादा ऑक्सीजन की कमी के कारण हुईं। देशभर में हो रही मौतों के इस मंज़र को देखकर भी हत्यारी फ़ासीवादी मोदी सरकार ही बेशर्मी के साथ यह बयान दे सकती है कि उस दौरान एक भी मौत ऑक्सीजन की कमी से नहीं हुई। हालाँकि मोदी सरकार इस बयान को लेकर देश में और दुनिया में अपनी थू-थू करवाने के बाद अब राज्‍य सरकारों से ऑक्सीजन की कमी से हुई मौतों की सूची माँग रही है।

कोरोना महामारी से दुनिया में सबसे ज़्यादा मौतें भारत में हुईं

भारत में कोरोना वायरस से अब तक हुई मौतों के आँकड़ों को लेकर कुछ नए शोध सामने आए हैं। ऐसी ही एक शोध में दावा किया गया है कि भारत में कोरोना से मरने वालों की संख्या कम से कम 27 लाख से 33 लाख है। यह शोध टोरण्टो विश्वविद्यालय में सेण्टर फ़ॉर ग्लोबल हेल्थ रिसर्च के डॉ. प्रभात झा और डॉ. पॉल नोवोसाद ने की है। टोरण्टो विश्वविद्यालय की यह शोध जून 2020 से 2021 के बीच भारत के आठ राज्यों और सात शहरों में दर्ज अतिरिक्‍त मृत्‍यु दर पर आधारित है। शोध में कहा गया है कि 2020 में भारत में कोरोना की पहली लहर दौरान दर्ज की गई औसत मृत्यु दर 22 फ़ीसदी थी। आन्‍ध्र प्रदेश में मृत्‍यु दर 63 फ़ीसदी थी जबकि केरल में यह 6 फ़ीसदी थी। इस साल अप्रैल और जून के बीच महामारी की दूसरी लहर के दौरान मृत्‍यु दर बढ़कर 46 फ़ीसदी हो गई और मध्य प्रदेश में 198 फ़ीसदी तक पहुँच गई। अतिरिक्‍त मृत्‍य दर 2020 और 2021 के दौरान किसी भी कारण से हुई मौतों और उसके पहले के वर्षों में हुई मौतों के बीच का अन्तर है। शोधाकर्ताओं का मानना है कि इनमें से अधिकतर अतिरिक्त मौतें कोविड-19 के कारण हुई हैं।
शोध में यह भी दावा किया गया है कि पिछले दो साल में 35 साल से अधिक उम्र के लोगों में अतिरिक्‍त मौतों का कारण कोरोना ही रहा है। यह शोध नागरिक रजिस्ट्रेशन प्रणाली के मृत्यु दर के आँकड़ों पर आधारित है। इस डेटा को स्वास्थ्य प्रबन्धन सूचना प्रणाली और टेलीफ़ोनिक सर्वेक्षण के माध्यम से एकत्र किया गया है, जो जन्म और मृत्यु के पूरे रिकॉर्ड रखता है। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाँच राज्यों मध्य प्रदेश, आन्ध्र प्रदेश, तमिलनाडु, केरल और हरियाणा में में 6.3 लाख अतिरिक्त मौतों का अनुमान लगाया है, जिसके लिए शोधकर्ताओं के पास दस या अधिक महीनों का डेटा उपलब्ध था। शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि राज्यों में इन अतिरिक्त मौतों में से अधिकतर यानी 4.5 लाख अप्रैल और मई के दौरान हुईं, जब महामारी की दूसरी लहर अपने चरम पर थी। एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक़ देशभर में कोरोना की पहली लहर के तुलना में दूसरी लहर में 21 से 50 उम्र के लोगों की मृत्यु की संख्या में 3 फ़ीसदी का बढ़ोत्तरी हुई है। (इण्डिया.स्पेण्ड.डॉट 28/06/21)।
मोदी सरकार द्वारा प्रचारित अन्य झूठों की ही तरह भारत में अब तक कोरोना से मरने वाले लोगों की संख्या को भी कम करके प्रस्तुत किया गया। मोदी सरकार के मुताबिक़ देश में कोरोना से अब तक मात्र 4 लाख 21 हजार मौतें हुई हैं, जबकि एक अमेरिकी शोध समूह की रिपोर्ट में इससे 10 गुना ज़्यादा मौतें होने का दावा किया गया है। भारत में कोरोना से मरने वाले ऐसे लोगों की संख्या भी बड़ी होगी, जिन्हें इस बीमारी से पीड़ित होने पर किसी अस्पताल में दाख़ि‍ला ही नहीं मिल पाया और उनकी मौत घर पर ही हो गई। शोधकर्ताओं के मुताबिक़ वास्तव में मौतों का आँकड़ा दसियों लाख में हो सकता है। अगर इस आँकड़े को देखा जाये तो भारत में आज़ादी और विभाजन के बाद से यह सबसे बड़ी त्रासदी है।
सेण्टर फ़ॉर ग्लोबल डेवलपमेण्ट स्टडी की ओर से जारी एक रिपोर्ट में सरकारी आँकड़ों, अन्तरराष्ट्रीय अनुमानों, सेरोलॉजिकल रिपोर्टों और घरों में हुए सर्वेक्षण को आधार बनाया गया है। इस रिपोर्ट की विशेष बात यह है कि इसको तैयार करने वालों में मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रहे अरविन्द सुब्रमण्यम भी शामिल हैं। शोधकर्ताओं का दावा है कि कोरोना से मृतकों की वास्तविक संख्या कुछ हज़ार या लाख नहीं बल्कि दसियों लाख में होगी। इसके पहले अन्तरराष्ट्रीय पत्रिका ‘द इकोनॉमिस्ट’ ने एक रिपोर्ट में कहा था कि भारत में कोरोना से हुई मौतों का वास्तविक आँकड़ा 5-7 गुना अधिक होगा। हालाँकि केन्द्र सरकार ने इस रिपोर्ट को सिरे से ख़ारिज कर दिया था। कोविड-19 से हुई मौतों के मामले में उत्तराखण्ड देश में दूसरे स्थान पर है। सबसे ज़्यादा मौतें पंजाब में हुई हैं। हालात ये हैं कि पहली और दूसरी लहर में उत्तराखण्ड में 30 जून तक कुल 7,316 लोगों की मृत्यु इस महामारी से हो चुकी थी। अहम बात यह है कि इनमें से अधिकांश मौतों को छुपाया गया है। मौत बैकलॉग के अब तक 1210 मामले सामने आ चुके हैं। हालाँकि सरकार कोरोना से मौत के आँकड़ों को छुपाने वालों पर कार्रवाई करने की बात कर रही है, लेकिन नौकरशाही केवल नोटिस जारी करने की खानापूर्ति ही कर रही है। अभी तक मौत का इतना बड़ा बैकलॉग सामने आने के बाद भी किसी भी अस्पताल के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई नहीं की गयी है।
इस जनसंहार के लिए मोदी सरकार की आपराधिक लापरवाही ज़िम्मेदार है।
वास्तव में, कोरोना संक्रमण का महामारी में तब्दील होना मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था की ही देन है जिसमें जनता के जीवन का कोई मूल्य नहीं है। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि महामारियों का पैदा होना भी एक पूर्णतः स्वतःस्फूर्त प्राकृतिक प्रक्रिया नहीं है। तमाम जीवविज्ञानी अब दिखला चुके हैं कि बढ़ते वायरल संक्रमणों और महामारियों और साथ ही उन पर क़ाबू पाने की अक्षमता के लिए मुनाफ़े की हवस में पर्यावरण और समूची प्रकृति की पूँजीवाद द्वारा तबाही ज़िम्मेदार है। उस पर हमारे देश में शासन कर रही मानवद्रोही फ़ासिस्ट मोदी सरकार ने इस महामारी को कई गुना और बढ़ा दिया है। दुनिया के बहुत सारे देशों में इस समय मास्क मुफ़्त में मिल रहे हैं। कई देश अपने ज़्यादातर नागरिकों को कोरोना वैक्सीन का टीका निःशुल्क दे चुके हैं। स्पेन जैसे पूँजीवादी देश तक ने तमाम प्राइवेट अस्पतालों का राष्ट्रीकरण करके उन्हें सरकारी नियंत्रण के मातहत ला दिया था। लेकिन हमारे यहाँ मोदी सरकार वैज्ञानिकों, स्वास्थ्यकर्मियों और विशेषज्ञों की बातों को दरकिनार करके भयंकर आपदा को न्योता दे रही थी।

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2021


 

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