उत्तर प्रदेश जनसंख्या विधेयक – 2021
बुनियादी मुद्दों से ध्‍यान भटकाने के लिए लाया गया यह क़ानून
जनता के जनवादी अधिकारों पर फ़ासीवादी हमला है!

– अमित

उत्तर प्रदेश कोरोना महामारी की रोकथाम और इलाज में देश में सबसे फिसड्डी राज्यों में साबित हुआ है। लोग दवा-अस्पताल और आक्सीजन के अभाव में दम तोड़ते रहे, लाशें नदियों में बहती रहीं और बालू में दबायी जाती रहीं और सरकार सिर्फ़ झूठे दावों और जुमलेबाज़ी में लगी रही। लाखों ज़िन्दगियों को तबाह कर देने के बावजूद आज तक कोई ठोस तैयारी नहीं की गयी है जबकि महामारी की तीसरी लहर सिर पर है। प्रदेश में बेरोज़गारी के हालात भयानक हो चुके हैं। करोड़ों लोगों को रोज़गार देने के योगी के दावे सिर्फ़ करोड़ों रुपये ख़र्च करके लगाये गये होर्डिंगों और विज्ञापनों तक सीमित हैं। अपराधी “सैंया भए कोतवाल…” गाते हुए प्रदेशभर में बेख़ौफ़ नंगा नाच कर रहे हैं। महँगाई और भ्रष्टाचार ने आम लोगों का जीना दूभर कर दिया है। किसानों की आय दोगुनी करने, बेरोज़गारी दूर करने, स्त्रियों को सुरक्षा देने, अपराध और भ्रष्टाचार पर रोक लगाने के भाजपा के सारे दावे झूठे साबित हो चुके हैं और लोगों में असन्तोष बढ़ता जा रहा है।
ऐसे में इन फ़ासिस्टों के पास असली मुद्दों से ध्यान भटकाने और मन्दिर-मस्जिद, लव जेहाद जैसे नारे उछालकर हिन्दू-मुस्लिम ध्रुवीकरण करने, हिन्दुओं में आतंकवाद का डर पैदा करने के लिए फ़र्ज़ी मुठभेड़ें और गिरफ़्तारियाँ कराने और चुनाव नज़दीक आने के साथ ही दंगे और तनाव भड़काने के सिवा कोई दूसरा रास्ता नहीं है। ध्यान भटकाने के ही एक हथकण्डे के रूप में योगी सरकार अब जनसंख्या क़ानून लेकर आयी है। दरअसल इसके बहाने ये एक तीर से दो शिकार करना चाहते हैं। एक तरफ़ संघी गिरोह इस प्रचार में लगा है कि मुसलमानों की आबादी ऐसे ही बढ़ती रही तो हिन्दू अल्पसंख्यक हो जायेंगे और यह क़ानून दरअसल मुसलमानों को अंकुश में रखने के लिए ही लाया गया है। दूसरी तरफ़ लोगों को यह बताया जा रहा है कि प्रदेश में ग़रीबी और बेरोज़गारी जैसी समस्याओं का असली कारण यह है कि आबादी बहुत ज़्यादा हो गयी है!
योगी सरकार ने हाल ही में उत्तर प्रदेश जनसंख्या (नियन्त्रण, स्थिरीकरण एवं कल्याण) विधेयक – 2021 का प्रारूप जारी किया है। यह विधेयक जनता के जनवादी अधिकारों पर एक फ़ासीवादी हमला है जिसमें यह प्रावधान करने का प्रस्ताव है कि दो से ज़्यादा बच्चों वाले माँ-बाप के निकाय चुनाव लड़ने, सरकारी सुविधाओं का लाभ लेने, सरकारी नौकरियों के लिए आवेदन करने और प्रमोशन हासिल करने आदि पर रोक लगा दी जायेगी। इतना ही नहीं, इस विधेयक में किसी भी परिवार में चार व्यक्तियों का ही राशन कार्ड बनाये जाने जैसे कई जनविरोधी प्रावधान किये गये हैं।
पूँजीवादी व्यवस्था के पैरोकारों द्वारा ग़रीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी आदि के लिए जनता को ही ज़िम्मेदार ठहराये जाने के लिए जनसंख्या को एक हथकण्डे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा, फ़ासीवादी भाजपा और संघ परिवार पिछले लम्बे समय से मुस्लिम आबादी की जनसंख्या बढ़ने के मिथक का प्रचार करके साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति करते रहे हैं। पाठ्यक्रम के माध्यम से जनसंख्या को एक समस्या के रूप में बचपन से ही दिमाग़ में बैठा दिया जाता है। ट्रेनों-बसों में यात्रा करते समय, अस्पताल की लाइनों में, परीक्षाओं का फ़ॉर्म भरते समय, रोज़गार की कतारों में भी हर जगह लोगों को यही महसूस होता है कि जनसंख्या बहुत बढ़ गयी है। वे यह नहीं समझ पाते कि हर जगह दिखती भीड़ की असली वजह समाज का यह ढाँचा है जिसमें रोज़गार के अवसर और सारे संसाधन कुछ ही जगहों पर केन्द्रित हैं और लोगों की ज़रूरत से बहुत कम मात्रा में हैं।
योगी सरकार के जनसंख्या विधेयक में कहा गया है कि प्रदेश में संसाधनों की बहुत कमी है और समान वितरण तथा सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए राज्य की जनसंख्या को नियंत्रित करना और स्थिर करना ज़रूरी है। ज़ाहिर है कि जनसंख्या को स्थिर करके समान वितरण और सतत विकास की बात सिर्फ़ एक सफ़ेद झूठ है। अगर अभी की स्थिति की बात करें तो काफ़ी पिछड़े ढंग से खेती के बावजूद उत्तर प्रदेश अनाज उत्पादन के मामले में देश के अग्रणी राज्यों में है। गेहूँ और गन्ना के उत्पादन में उत्तर प्रदेश पहले नम्बर पर और चावल के उत्पादन में दूसरे नम्बर पर है। मगर इस अनाज का बड़ा हिस्सा एफ़सीआई के गोदामों में सड़ता रहता है, उसे चूहे खाते हैं और शराब बनाने वाली कम्पनियाँ सस्ते दामों में ख़रीद ले जाती हैं। दूसरी ओर रोज़ भूख और कुपोषण से हज़ारों मौतें हो जाती हैं। प्रदेश में प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है। तमाम तरह के काम करने योग्य जन शक्ति मौजूद है। इसके बावजूद अगर ग़रीबी और बेकाी है, तो उसका कारण लोगों की ज़रूरतों के बजाय पूँजीपतियों के मुनाफ़े को ध्यान में रखकर बनायी गयी योजनाएँ हैं। पूरे देश पर भी यही बात लागू होती है।
इलाहाबाद के नैनी, कानपुर, बिजनौर, चित्रकूट, पूर्वी उत्तर प्रदेश में जगह-जगह चीनी मिलें, मिर्ज़ापुर में कृषि यंत्र कारखाने, गोरखपुर में खाद कारख़ाना, प्रतापगढ़ में एटीएल कारखाने सहित सैकड़ों छोटे-बड़े कारख़ाने पिछले कई सालों से बन्द पड़े हैं। वहाँ पड़ी मशीनें और पूरा ढाँचा बर्बाद हो रहा है। हर साल सरकार के मंत्री चाय-समोसे और यात्राओं में और फ़र्ज़ी दावों और एक-दूसरे को बधाई देने वाले होर्डिंग में जितना पैसा फूँक देते हैं, उतने में ही ज़रूरी सामानों का उत्पादन करने वाले और हज़ारों रोज़गार देने वाले कई कारख़ाने चालू हो सकते हैं। सरकार के पास न तो बुनियादी ढाँचे की कमी है और न ही पूँजी की। नीचे दी गयी तालिका 1 और 2 से यह बात और स्पष्ट हो जाती है।
देश स्तर पर बात की जाये तो आज़ादी के बाद से अब तक देश में खाद्यान्न, खनन और उद्योगों में आबादी की तुलना में कई सौ गुना की वृद्धि हो चुकी है। सांसदों-विधायकों की ऐय्याशी, चुनावी रैलियों में पानी की तरह बहाये जा रहे पैसे का कोई हिसाब ही नहीं है। लेकिन जब जनता की बात आती है तो संसाधनों की कमी पड़ जाती है। अगर इन पैसों और संसाधनों का ठीक से इस्तेमाल किया जाये तो करोड़ों नौजवानों को रोज़गार दिया जा सकता है। इतना ही नहीं, हर सरकारी विभाग में बड़े पैमाने पर पद खाली पड़े हैं, लेकिन इन पदों को भरने के बजाय सारा काम संविदा और ठेके पर कराया जा रहा है। पूरे का पूरा विभाग ही पूँजीपतियों की झोली में डाला जा रहा है। अगर इन खाली पदों को भरा जाये तो लाखों नौजवानों को रोज़गार दिया जा सकता है। सेण्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट, जिसको जारी रखने के लिए फ़ासिस्टों ने कोरोना महमारी के दौरान विशेष क़ानून तक बना दिया, में ख़र्च किये जा रहे रु. 20,000 करोड़ में, रु. 100 करोड़ की लागत वाले 200 अस्पताल बनाये जा सकते हैं। लेकिन इन सब बातों पर पर्दा डालने के लिए जनसंख्या का हौव्वा खड़ा किया जाता है।
दूसरे सरकार इस बिल को लाने के पीछे यह उद्देश्य बता रही है इस बिल के माध्यम से प्रदेश में कुल प्रजनन दर (टीएफ़आर) को 2.1 प्रतिशत पर लाया जाएगा। टीएफ़आर का 2.1 प्रतिशत होने का अर्थ है जनसख्या का स्थिर हो जाना। लेकिन वर्ल्ड बैंक 2018 के आँकड़ों के हिसाब से भारत की प्रजनन दर घटते हुए 2.2 पर पहुँच गयी है और इसमें भी उत्तर प्रदेश में इसके घटने की दर पूरे देश के औसत से कहीं ज़्यादा है। प्रजनन दर का 2.1 प्रतिशत होना जनसंख्या के स्थिर होने का मानक माना जाता है। इसी तरह के आँकड़े कई और सर्वे दिखा चुके हैं। साफ़ है कि देश की जनसंख्या आने वाले सालों में घटेगी। इतना ही नहीं, इन आँकड़ों की और गहराई से छानबीन की जाए तो संघ परिवार के मुस्लिम आबादी के बढ़ने के झूठे प्रचार की भी पोल खुल कर सामने आ जाती है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आँकड़ों के अनुसार 2005-06 से 2015-15 के दस सालों में जहाँ हिन्दू आबादी की टीएफ़आर में 0.5 प्रतिशत की कमी आई थी, वही मुस्लिम आबादी में यह कमी 0.8 प्रतिशत की है। बहुत से सर्वेक्षणकर्ताओं ने यह अनुमान लगाये हैं कि 2071 तक हिन्दू तथा मुस्लिम आबादी की जनसंख्या वृद्धि दर बराबर हो जाएगी। लेकिन संघ परिवार अपने आदर्श हिटलर और मुसोलिनी जैसे फ़ासिस्टों के नक्शे क़दम पर चलते हुए इस फ़ासीवादी मिथ्याप्रचार को हवा देता रहता है।
जनसंख्या को सभी समस्याओं का कारण बताकर जनता के सिर पर ठीकरा फोड़ने का काम पूँजीवादी व्यवस्था द्वारा बहुत लम्बे समय से किया जा रहा है। 18वीं सदी में माल्थस द्वारा दिए गए तर्क का भ्रम फ़ैलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता है कि बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुपात में उत्पादन में होने वाली वृद्धि बहुत कम होती है। माल्थस के अनुसार जनसंख्या 2, 4, 8, 16.. के हिसाब से यानी गुणोत्तर श्रेणी में बढ़ती है जबकि संसाधन में वृद्धि समान्तर श्रेणी यानी 1, 2, 3, 4… के रूप में होती है। माल्थस ने इस समस्या का बहुत ही मानवद्रोही हल दिया था जो कि अमीर तबकों व शासक वर्ग व उनके तलुआचाट बुद्धिजीवियों को बहुत भाता है। माल्थस का हल यह था कि महामारी आदि को रोकना नहीं चाहिए बल्कि महामारियों से होने वाली आम जनता की मौतों से व्यवस्था सही रहेगी। आज के वर्तमान फासीवादी उभार के दौर में यह तर्क नस्ल, धर्म आदि के नाम पर आबादी के क़त्ले-आम की तरफ ले जाता है। वास्तव में माल्थस का यह सिद्धान्त आँकड़ों की हेराफ़ेरी और झूठ पर आधारित था। माल्थस ने अपने इस सिद्धान्त को सही साबित करने के लिए आबादी में वृद्धि का आँकड़ा अमेरिका से लिया था और खाद्यान्न और आजीविका के साधनों की वृद्धि के लिए फ़्रांस को आधार बनाया था। ग़ौरतलब है कि अमेरिका की आबादी के बढ़ने की वज़ह प्राकृतिक नहीं बल्कि बड़े पैमाने पर वहाँ पर प्रवासियों का आना था। जबकि फ़्रांस के संसाधनों की फ़्रांस की आबादी से तुलना की जाये तो यह सामने आता है कि आबादी के अनुपात में संसाधन कहीं तेज़ी से बढ़ रहे थे। फ़िर भी इस झूठ को पूँजीवादी व्यवस्था के पैरोकारों द्वारा हाथोंहाथ लपक लिया गया।
आज पूरी दुनिया भर में आबादी में बढ़ोत्तरी का एक कारण ग़रीबों द्वारा ज्यादा बच्चा पैदा करना नहीं, बल्कि मृत्यु दर में आनेवाली कमी है। मसलन, 1950-55 में दुनिया भर का औसत संभावित जीवन तक़रीबन 46 साल हुआ करता था, जो कि 2000-05 में 65 साल हो गया। कई देशों में आबादी बढ़ोत्तरी दर शून्य से कम है। जिस रफ़्तार से आबादी से बढ़ रही है, उस रफ़्तार से 2040 तक आबादी करीब 7.6 अरब तक पहुंचेगी। उसके बाद यह घटेगी और 21वीं सदी के अंत में 5 अरब रह जायेगी। जिसमें बच्चे और नौजवान बहुत कम होंगे, बुजुर्गों की संख्या बहुत ज्यादा होगी। आज इन्हीं वज़हों से जापान और चीन जैसे देशों में जनसंख्या नीति में बदलाव किये गए हैं।
सच्चाई यह है कि भुखमरी, कुपोषण, बेरोज़गारी सहित सभी समस्याओं की असली वज़ह लूट और मुनाफ़े पर टिकी यह पूँजीवादी व्यवस्था है। इसलिए इन समस्याओं को हमेशा के लिए ख़त्म करने के लिए इस लुटेरी व्यवस्था को तबाह करके इसकी जगह पर समतामूलक समाज का सपना बनाने के लिए एकजुट होना होगा, जिसका सपना शहीदे-आज़म भगतसिंह जैसे क्रान्तिकारियों ने देखा था। आज छात्रों-युवाओं को न केवल जनता के बीच में जाकर जनसंख्या के सवाल फैलाये गये भ्रम को साफ़ करना चाहिए बल्कि संगठित होकर इस जनविरोधी बिल का विरोध करना चाहिए और अपनी एकजुटता के दम पर समान शिक्षा-सबको रोज़गार, भोजन, स्वास्थ्य और आवास के बुनियादी अधिकारों के लिए सरकार को मजबूर करना चाहिए।

मज़दूर बिगुल, अगस्त 2021


 

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