स्वतंत्र पत्रकारिता पर हो रहे फ़ासीवादी हमलों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाओ!

– भारत

बीते दिनों न्यूज़क्लिक व न्‍यूज़लॉण्‍ड्री के दफ़्तर पर आयकर विभाग की छापेमारी हुई। कहने को तो आयकर विभाग इन न्यूज़ चैनलों के यहाँ “सर्वे” के लिए पहुँचा था लेकिन यह कैसा सर्वे था जिसमें आयकर विभाग इन न्यूज़ चैनलों की वित्तीय रिपोर्ट निकालने के बजाय वहाँ काम कर रहे लोगों के फ़ोन और लैपटॉप ज़ब्त कर रहा था? उनकी निजी जानकारियाँ इकट्ठा कर रहा था? यह बात साफ़ है कि आयकर विभाग को इन चैनलों की वित्तीय रिपोर्ट बनाने के लिए नहीं बल्कि यहाँ काम कर रहे लोगों को डराने-धमकाने और चुप कराने के लिए भेजा गया था। न्‍यूज़लॉण्‍ड्री पर 2014 में भी रेड डाली गयी थी, वहीं इसी साल फ़रवरी में न्यूज़क्लिक के दफ़्तर पर छापा पड़ा था।
मोदी सरकार के आने के बाद से अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले काफ़ी तेज़ हुए हैं। सरकारी नीतियों की आलोचना करने वाले इन न्यूज़ पोर्टल्स पर हमले बढ़े हैं। याद हो कि मोदी सरकार ने सत्ता में आते ही एनडीटीवी पर एक दिन का बैन लगा दिया था। गोदी मीडिया के अलावा बाक़ी सभी मीडिया हाउस इस फ़ासीवादी मोदी सरकार की आँखों की किरकिरी बनी हुई है। आज कुछ गिने-चुने स्वतंत्र मीडिया चैनल हैं जो यूट्यूब और अलग–अलग सोशल साइटों के ज़रिए इस साम्प्रदायिक भगवा गिरोह की सच्चाई दिखाते हैं और इसका ही ख़ामियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ रहा है।
पूँजीवादी मीडिया, जिसे वैसे तो पूँजीवादी जनतंत्र का चौथा खम्भा कहा जाता है, आज सार्विक तौर पर नंगा हो चुका है। मौजूदा दौर में गोदी मीडिया तो बस झूठी ख़बरें, फूहड़ विज्ञापन, साम्प्रदायिक-अन्धराष्ट्रवादी उन्माद की ख़ुराक दिखाने का तंत्र रह गया है । बढ़ती बेरोज़गारी, महँगाई जैसे मुद्दे बाहर न आ सकें इसलिए भाजपा सरकार लगातार तमाम न्यूज़ चैनलों, अख़बारों का इस्तेमाल कर अपने फ़ासीवादी सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रचार को बढ़ावा देने का काम कर रही है। साम्प्रदायिकता, उन्माद और अन्धराष्ट्रवाद के प्रचार के ज़रिए ये आम जनता की ज़िन्दगी के भौतिक और आर्थिक प्रश्नों को गोल कर जाते हैं। और इनके इस एजेण्डे के ख़िलाफ़ बोलने वाली हर आवाज़ इनके निशाने पर है।
विचारधारात्मक राज्य उपकरण ही अकेले जनता की चेतना का निर्माण नहीं करते; जनता के जीवन की स्थितियाँ सबसे पहले और निर्णायक तौर पर जनता की चेतना का निर्माण करती हैं। ऐसे में, जनता अपने शोषण और उत्पीड़न के ख़िलाफ़ अपने अनुभवों से चेतना से लैस होती है। निश्चित तौर पर, ऐसी चेतना के आधार पर वह स्वयं-स्फूर्त आन्दोलन ही कर सकती है, क्रान्ति नहीं। इस प्रतिरोध की चेतना को क्रान्तिकारी प्रचार के ज़रिए एक व्यवस्थित रूप दिया जा सकता है। यहीं पर वैकल्पिक मीडिया के कार्यभार आते हैं। वैकल्पिक मीडिया का कार्यभार है, जनता को ऐसा व्याख्यात्मक ढाँचा मुहैया कराना जिससे वह राज्य के विचारधारात्मक उपकरणों द्वारा दी जा रही परिभाषाओं और व्याख्याओं को ख़ारिज कर सके। आज के समय में जब देश की जनता आज़ाद होने के बावजूद देशी-विदेशी पूँजी के शोषण का शिकार है, तो एक बार नये सिरे से एक नये क़िस्म की परिवर्तनकामी चेतना उनमें पैदा किये जाने की ज़रूरत है। इसके लिए क्रान्तिकारी विचारों से लैस एक पूरे वैकल्पिक मीडिया की ज़रूरत है, जो आज एक तरह से अनुपस्थित है।
अतः आज यह ज़रूरी है कि ऐसी तमाम घटनाओं का पुरज़ोर विरोध किया जाये। इसके साथ ही फ़ासीवादियों के समूचे सांस्कृतिक व राजनीतिक प्रचार के मूल पर क़दम-व-क़दम हमला करना होगा और उनकी असलियत को जनता के सामने स्पष्ट करना होगा। तभी जाकर इस फ़ासिस्ट सरकार को इसके मंसूबों में नाकामयाब किया जा सकता है।
पूँजी की सेवा और मुनाफ़ा कमाने की अन्धी होड़ में लगी पूँजीवादी मीडिया के वर्चस्व के बरक्स एक वैकल्पिक क्रान्तिकारी मीडिया खड़ा करने का कार्यभार भी हमारे समक्ष है। देशभर के प्रगतिशील मीडिया संस्थानों की मुख्य ज़िम्मेदारी यह है कि उन्हें आज देश की मेहनतकश आबादी से जुड़ना होगा, उनकी समस्याओं को उजागर करना होगा। तभी जाकर इस पूँजीवादी मीडिया के नफ़रत के ज़हर के बरक्स जनता की असल समस्याएँ सही रूप में सामने आ पायेंगी और इन फ़ासीवादी हमलों का जवाब हम संगठित तौर पर दे सकेंगे।

मज़दूर बिगुल, अक्टूबर 2021


 

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