हरियाणा में बेरोज़गारी के भयंकर होते हालात!

– इन्द्रजीत

सेण्टर फ़ॉर मॉनिटरिंग इण्डियन इकॉनमी (सीएमआईई) के ताज़ा आँकड़ों के अनुसार देश बेरोज़गारी की भयंकर दलदल में धँसता जा रहा है। सितम्बर 2021 में आये अगस्त माह के आँकड़ों के अनुसार देश में बेरोज़गारी की दर 8.3 प्रतिशत तक पहुँच गयी है। वहीं दूसरी ओर हरियाणा में बेरोज़गारी की दर 35.7 प्रतिशत तक जा पहुँची है जोकि देश के किसी भी राज्य में सबसे ज़्यादा और राष्ट्रीय बेरोज़गारी दर के चार गुणे से भी अधिक है। रोज़गार की इतनी बुरी स्थिति होने के बावजूद भी हरियाणा की खट्टर सरकार बड़ी ही बेशर्मी के साथ अपनी पीठ थपथपा रही है कि उसने हरियाणा के नौजवानों को रोज़गार दिये हैं! जबकि ज़िन्दगी के हालात और आँकड़े चीख़-चीख़कर कह रहे हैं कि रोज़गार पर इतना बड़ा संकट आज से पहले कभी नहीं आया था! विगत 30 अगस्त को ही हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने अपनी सरकार के 2,500 दिन पूरे होने का जश्न मनाया था। इस दौरान हज़ारों पुलिसकर्मियों के पीछे छिपकर खट्टर साहब ने अपनी ख़ूब पीठ थपथपायी थी। आँकड़ों की सरकारी बाज़ीगरी के भ्रमजाल से मुक्त होकर देखा जाये तो हमें यहाँ महँगाई, बेरोज़गारी, जातिवाद, नशाख़ोरी और बढ़ते अपराध के असल हालात आसानी से दिख जायेंगे।
हरियाणा की भाजपा-जजपा ठगबन्धन सरकार रोज़गार पर कोई ठोस तथ्य पेश करने की बजाय सीएमआईई की उक्त रिपोर्ट पर ही सवाल उठा रही है। हमें रोज़गार के हालात पर सुव्यवस्थित सरकारी आँकड़े नहीं मिलते हैं, लेकिन हाल की चन्द भर्तियों में किये गये आवेदनों से ही हम अनुमान लगा सकते हैं कि हरियाणा में रोज़गार के हालात कितने ख़राब हैं। यमुनानगर कोर्ट में चपरासी के महज़ 10 पदों के लिए आवेदन करने वालों की संख्या 7,000 थी। इसी तरह से पानीपत में भी कोर्ट चपरासी के कच्चे पदों के लिए आवेदन करने वालों की संख्या 13,000 थी। महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय में डीसी रेट पर चपरासी के ही 92 पदों के लिए 22,000 युवाओं ने आवेदन किया था। 2019 में चतुर्थ श्रेणी कर्मियों के 18,212 पदों के लिए निकली भर्ती के लिए भी तक़रीबन 20 लाख युवाओं ने आवेदन किया था। इसी तरह से क्लर्क के 4,858 पदों के लिए 15 लाख से ज़्यादा छात्र-युवाओं ने आवेदन किया था। अभी हाल में ही पुलिस उप-अधीक्षक के 453 पदों के लिए 3 लाख से ज़्यादा युवाओं ने आवेदन किये थे। खट्टर और दुष्यन्त चाहे जितना गाल बजा लें असल बात यह है कि हरियाणा में रोज़गार के हालात एक अनार सौ बीमार वाले हो गये हैं। जो थोड़ी-बहुत सरकारी नौकरियाँ निकलती भी हैं वे भी राम भरोसे ही होती हैं। कई सालों तक भर्ती प्रकिया को लटकाकर ही रखा जाता है। ज़्यादातर भर्तियाँ सरकार की घोर लापरवाही के चलते रद्द हो जाती हैं फिर दोबारा से उन्हीं पदों के लिए आवेदन माँगें जाते हैं और पहले से ही बेरोज़गारी की मार झेल रहे नौजवानों से ही करोड़ों रुपये की कमाई कर ली जाती है। जो भर्ती पूरी भी होती है उसमें भी भ्रष्टाचार का ही बोलबाला रहता है। आम घरों के नौजवानों के लिए पक्का रोज़गार हासिल करना कभी न पूरा होने वाला सपना बन चुका है। सालों साल मेहनत करके भी स्थायी रोज़गार न हासिल कर पाने के चलते बड़ी संख्या में नौजवान अवसाद का शिकार हो रहे हैं। इस स्थिति के चलते नौजवानों में अपराधीकरण, नशाख़ोरी और आत्महत्या की घटनाएँ लगातार बढ़ती जा रही हैं।
ऐसी बात नहीं है कि नौजवानों को रोज़गार देने के लिए हरियाणा प्रदेश में अवसरों की कोई कमी है। अकेले सरकारी महकमों में ही लाखों पद रिक्त पड़े हैं। शिक्षा विभाग के सम्बन्ध में एक आरटीआई के जवाब में हरियाणा सरकार ने पिछले दिनों ही यह माना था कि प्रदेश में स्कूली शिक्षकों के 31,232 पद रिक्त हैं जबकि 2017 की हरियाणा अध्यापक संघ की ‘डायरी’ की रिपोर्ट कहती है कि हरियाणा में शिक्षकों के कुल 1,28,405 पदों में से 44,962 पद रिक्त हैं। कॉलेज और विश्वविद्यालयों के स्तर पर भी हज़ारों पद ख़ाली पड़े हैं। महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय के बारे में 2016 की कैग की रिपोर्ट कहती है कि यहाँ पर शिक्षकों की कुल संख्या में से 54 प्रतिशत पदों पर कोई स्थायी भर्ती नहीं है। इनमें से 27 प्रतिशत पद एडहॉक पर हैं तो 27 प्रतिशत पद रिक्त हैं। ऐसा ही हाल रोडवेज़, बिजली, सिंचाई, पीडब्लूडी, हूडा इत्यादि विभागों का भी है। जनसंख्या के अनुपात के हिसाब से हरियाणा में 18,000 बसें होनी चाहिए परन्तु फ़िलहाल हरियाणा परिवहन के बेड़े में केवल 4,000 बसें ही हैं। एक बस पर 6 नये रोज़गार सृजित होते हैं। अतः इस लिहाज़ से देखें तो अकेले परिवहन विभाग में ही 80,000 से ज़्यादा पद सृजित किये जा सकते हैं। यही नहीं रोडवेज़ की वर्कशॉपों में काम करने वाले मैकेनिकों की तो पिछले तक़रीबन दो दशक से कोई भर्ती ही नहीं की गयी है। एक अन्य आरटीआई के माध्यम से मिले सरकारी जवाब से यह पता चलता है कि हरियाणा में जेबीटी शिक्षकों के भी 6,000 के क़रीब पद रिक्त पड़े हैं। अभ्यर्थियों की ओर से दायर याचिका की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट दो बार इन पदों को भरने के आदेश हरियाणा सरकार को दे चुका है, कोर्ट के द्वारा सरकार पर ज़ुर्माना भी लगाया जा चुका है परन्तु पिछले 8 साल से सरकारों ने जेबीटी भर्ती के लिए कान तक नहीं हिलाये! कोर्ट के आदेश का हवाला देकर 1,983 पीटीआई शिक्षकों के पेट पर लात मारने वाली खट्टर की खटारा सरकार को जेबीटी भर्ती से जुड़े कोर्ट के आदेश पर साँप सूँघ गया है। नवम्बर 2012 वाली जेबीटी भर्ती के चयनितों को भी पाँच सालों तक लटकाकर रखा गया और इनमें से 1,259 को तो लो मैरिट के नाम पर चयन के बाद भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, इन्हें तो और भी ज़्यादा धक्के खाने पड़े थे।
भाजपा ने चुनाव से पहले नौकरियाँ देने को लेकर लम्बी-चौड़ी डींगें हाँकी थी किन्तु पिछले विधानसभा चुनाव से चन्द रोज़ पहले जाकर कुछ हज़ार नौकरियों की कुछ भर्तियाँ पूरी हुई हैं। रोडवेज़, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य जैसे मूलभूत विभागों में ही लाखों-लाख पद अभी तक भी ख़ाली पड़े हैं। विभिन्न विभागों और महकमों के कर्मचारियों को पक्का करने का वायदा अधर में ही लटका है। प्रदेश के पढ़े-लिखे लाखों युवा लाचार हैं और छोटी-मोटी नौकरियों के पीछे दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। असल में हरियाणा भाजपा को जनता के काम करने में कम और जातिवाद की राजनीति तथा अपने झूठ बोलने के कौशल पर अधिक भरोसा है! हरियाणा में 1995-96 में सरकारी-अर्ध सरकारी 4,25,462 नौकरियाँ थी जोकि 20 साल बाद घटकर मात्र 3,66,829 रह गयीं। यानी प्रदेश की तमाम सरकारें हर साल औसतन 3,100 नौकरियाँ खा गयी हैं! 
भारतीय राज्य और सरकारें देश के संविधान को लेकर ख़ूब लम्बी-चौड़ी बातें करते हैं। संविधान का अनुच्छेद 14 कहता है कि सभी को ‘समान नागरिक अधिकार’ हैं और अनुच्छेद 21 के अनुसार सभी को ‘मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार’ है। किन्तु ये अधिकार देश की बहुत बड़ी आबादी के असल जीवन से कोसों दूर हैं। क्योंकि न तो देश स्तर पर एक समान शिक्षा-व्यवस्था लागू है तथा न ही सभी को पक्के रोज़गार की कोई गारण्टी है! हर काम करने योग्य स्त्री-पुरुष को रोज़गार मिलने पर ही उसका ‘जीने का अधिकार’ सुनिश्चित होता है। ‘मनरेगा’ में सरकार ने पहली बार माना था कि रोज़गार की गारण्टी देना उसकी ज़िम्मेदारी है किन्तु यह योजना भी भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी। न केवल ग्रामीण और न केवल 100 दिन बल्कि हरेक के लिए उचित जीवनयापन योग्य पक्के रोज़गार के प्रबन्ध की ज़िम्मेदारी भारतीय राज्य व सरकारों की बनती है। सभी को रोज़गार देने के लिए तीन चीज़ें चाहिए (1) काम करने योग्य हाथ (2) विकास की सम्भावनाएँ (3) प्राकृतिक संसाधन। क्या हमारे यहाँ इन तीनों चीज़ों की कमी है? जी, नहीं! क़त्तई नहीं! तो सवाल सरकारों की नीयत पर उठता है। पूँजीपरस्त और जनविरोधी नीतियों को लागू करने में कांग्रेस-भाजपा से लेकर तमाम रंगों-झण्डों वाले चुनावी दल एकमत हैं!
वैसे तो पूँजीवादी व्यवस्था के ख़ात्मे के साथ ही बेरोज़गारी के संकट को पूरी तरह से हल किया जा सकता है। किन्तु पूँजीवादी व्यवस्था के रहते हुए भी बिना एकजुटता और सही दिशा में संघर्ष के हम वह भी हासिल नहीं कर पाते जोकि इसी व्यवस्था के रहते हुए भी हासिल किया जा सकता है। जहाँ तक हरियाणा में रोज़गार के मसले पर जनान्दोलन की बात है तो फ़िलहाल स्थिति काफ़ी निराशाजनक है।
हरियाणा में ट्रेड यूनियन आन्दोलन लम्बे समय से ही और कहा जाये तो शुरू से ही जुझारू अर्थवाद और समझौतापरस्ती का शिकार रहा है। नकली लाल झण्डे वाली संशोधनवादी और संसदीय वामपन्थी पार्टी माकपा के कर्मचारी संघ का ही यहाँ कर्मचारियों के बीच ज़्यादा दबदबा है। इसका काम मज़दूरों-कर्मचारियों को राजनीतिक तौर पर शिक्षित-प्रशिक्षित करने की बजाय उन्हें अर्थवाद के गोल घेरे में घुमाते जाना ही रहा है। बेहद जुझारू और क़ुरबानी भरे संघर्षों के बावजूद भी कर्मचारी अपना अस्तित्व तक बचा पाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। ज़्यादातर भर्तियों को ठेकेदारी प्रथा के तहत लाकर सरकारी महकमों को लगातार बर्बाद किया जा रहा है। छात्र-युवा आन्दोलन भी फ़िलहाल बिखराव और ठहराव का ही शिकार है। निश्चय ही भविष्य में सही कार्यदिशा के आधार पर मज़दूरों-कर्मचारियों और छात्रों-युवाओं को नये सिरे से अपने संघर्ष संगठित करने होंगे। व्यापक एकजुटता और संघर्ष की सही कार्यदिशा के दम पर ही हम खट्टर-दुष्यन्त ही नहीं बल्कि किसी भी सरकार को झुका सकते हैं और अपने रोज़गार ही नहीं बल्कि अपने तमाम हक़-अधिकार हासिल कर सकते हैं।

मज़दूर बिगुल, नवम्बर 2021


 

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