मई दिवस : मज़दूर वर्ग के महान पुरखों के गौरवशाली संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाने का दिन

आशीष

1 मई का दिन न तो महज़ छुट्टी का दिन है और न ही मई दिवस या मज़दूर दिवस केवल कुछ रस्मी क़वायदों तक सीमित रहने का दिन है। अफ़सोस की बात यह है कि आज मज़दूर वर्ग का एक बड़ा हिस्सा इस महान दिन के गौरवशाली इतिहास से परिचित नहीं है। मज़दूर वर्ग अपने अतीत के संघर्षों से बेख़बर रहे इसका प्रयास तो पूँजीवादी शिक्षा प्रणाली, पूँजीवादी मीडिया से लेकर सभी पूँजीवादी चुनावबाज़ पार्टियाँ और इनकी ट्रेड यूनियनें करती रहती हैं। इस काम में ग़द्दार संशोधनवादी पार्टियाँ और इनकी सेण्ट्रल ट्रेड यूनियनों की भूमिका सबसे बेशर्म क़िस्म की है। दक्षिणपन्थी सेण्ट्रल ट्रेड यूनियनें बीएमएस, इण्टक आदि से लेकर संशोधनवादी ट्रेड यूनियन सीटू, एटक, एक्टू आदि सभी मज़दूर वर्ग के राजनीतिक तौर पर जागरूक होकर संघर्ष करने की ताक़त को कुन्द करते हैं और हमेशा यह प्रयास करते हैं कि मज़दूर आन्दोलन को वेतन-भत्ते आदि की लड़ाई से आगे नहीं बढ़ने दिया जाये। 1 मई के अवसर पर भी एकदिवसीय हड़ताल आदि से आगे बढ़कर कभी भी ये लोग इस दिन के ऐतिहासिक व राजनीतिक महत्व के बारे में मज़दूरों के बीच बात नहीं करते।

इसके बावजूद उन्नत चेतना से लैस कई मज़दूर साथी मई दिवस के महान संघर्ष से परिचित है। कुर्बानियों की इस महान गाथा को मज़दूर वर्ग और समस्त मेहनतकश जनता तक ले जाना होगा। अपने जन्मकाल से ही मज़दूर वर्ग ने दुनियाभर में कई शानदार लड़ाइयाँ लड़ीं हैं। इस महान अतीत को जानकर हम अपनी पुरानी गलतियों पर ग़ौर करते हैं और भविष्य के लड़ाइयों के लिए साहस और भरोसा पाते हैं। इसलिए यहाँ हम मई दिवस के इतिहास की संक्षिप्त चर्चा रहे हैं।

अमेरिका में फै़क्ट्री व्यवस्था शुरू होने के साथ ही वहाँ मज़दूर आन्दोलन भी शुरू हुआ। पूरी दुनिया में जहाँ कहीं भी औद्योगीकरण के साथ कारख़ाना व्यवस्था की शुरुआत हुई वहाँ काम के घण्टों को कम करने को लेकर भी जल्द ही आन्दोलन की शुरुआत हुई। इंग्लैण्ड में इस माँग को लेकर जो आन्दोलन हुआ उसी के कारण इंग्लैण्ड के पूँजीपति को श्रम कानूनों में सुधार करते हुए काम के घण्टों को 10 घण्टों तक सीमित करना पड़ा था। अमेरिका में भी आन्दोलन के शुरुआती दिनों में अधिक तनख़्वाहों की माँग सबसे अधिक प्रचलित माँग थी लेकिन बाद में आन्दोलन काम के घण्टे कम करने की माँग पर केन्द्रित हो गया। अमेरिका में  “सूर्योदय से सूर्यास्त”  तक का जुमला प्रचलित था — यही उस समय काम के घण्टे थे, यानी सूरज के उगने से लेकर सूरज के डूबने तक। चौदह, सोलह यहाँ तक कि अट्ठारह घण्टे तक काम करवाना उस समय वहाँ आम बात थी। 1806 में अमेरिका की सरकार ने हड़ताली मोचियों के नेताओं पर साजि़श के मुक़दमे चलाये। इन मुक़दमों में यह बात खुलकर सामने आयी कि मज़दूरों से उन्नीस या बीस घण्टे तक काम कराया जा रहा था।

उन्नीसवीं शताब्दी के पहले, दूसरे और तीसरे दशक में अमेरिका में मज़दूरों के कई सारे संगठन व यूनियनें बनीं, जिनके नेतृत्व में काम के घण्टे कम करने की माँग को लेकर कई हड़तालें की गयीं। मज़दूर आन्दोलन के दबाव के चलते वॉन ब्यूरेन की सरकार को सभी सरकारी कर्मचारियों के लिए काम के घण्टे दस करने की घोषणा करनी पड़ी। यह आन्दोलन केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहा पूँजीवादी व्यवस्था के विस्तार के साथ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में मज़दूर वर्ग काम के घण्टे कम करने की माँग की लड़ाई को आगे बढ़ा रहे थे। ऑस्ट्रेलिया के निर्माण मज़दूरों ने ‘आठ घण्टे काम आठ घण्टे आराम और आठ  घण्टे मनोरंजन’ की माँग को लेकर संघर्ष किया और 1856 में ही उसे हासिल भी कर लिया था।

अमेरिका में जिन मज़दूरों ने अपने बलिष्ठ हाथों से अमेरिका के शहरों को खड़ा किया, रेल पटरियों का जाल बिछाया, नदियों को बाँधा, गगनचुम्बी इमारतों को बनाया, और पूँजीपतियों के लिए दुनियाभर के ऐशो-आराम खड़े किये उनकी जीवनस्थिति अभी भी बेहद भयावह थी। उस समय युवा मज़दूर अपने जीवन के 40 बसन्त भी नहीं देख पाते थे। अगर मज़दूर इसके खि़लाफ़ कोई भी आवाज़ उठाते थे तो उनपर निजी गुण्डों, पुलिस और सेना से हमले करवाये जाते थे! लेकिन इन सबसे अमेरिका के जाँबाज़ मज़दूर दबने वाले नहीं थे! उनके जीवन और मृत्यु में वैसे भी कोई फ़र्क नहीं था इसलिए उन्होंने लड़ने का फैसला किया! 1877 से 1886 तक मज़दूरों ने अमेरिका भर में अपने आपको आठ घण्टे के कार्यदिवस के लिए एकजुट और संगठित करना शुरू किया। 1886 में अमेरिका भर में मज़दूरों ने ‘आठ घण्टा समितियाँ’ बनायीं। शिकागो में मज़दूरों का आन्दोलन सबसे अधिक ताक़तवर था। वहाँ पर मज़दूरों के संगठनों ने तय किया कि 1 मई के दिन सभी मज़दूर अपने औज़ार रखकर सड़कों पर उतरेंगे और आठ घण्टे का कार्यदिवस के नारे को बुलन्द करेंगे। 1 मई के दिन शिकागो शहर में लाखों की संख्या में सभी पेशों के मज़दूर सड़कों पर एकजुट होकर उतरे। इसके दो दिनों बाद ही डरे हुए मालिकों ने अपने भाड़े के टट्टुओं से मज़दूरों की एक जनसभा पर हमला करवाया और इसमें छह मज़दूरों की हत्या कर दी गयी। अगले दिन शिकागो के हे मार्केट बाज़ार में मज़दूरों ने जब इस हत्याकाण्ड के विरोध में प्रदर्शन किया तो पुलिस ने उन पर हमला कर दिया। इसी दौरान पूँजीपतियों ने बम फिंकवा दिया जिसमें कुछ मज़दूर और पुलिस वाले मारे गये। इस बम काण्ड का आरोप चार मज़दूर नेताओं ऑगस्ट स्पाइस, एंजेल्स, फिशर और पार्संस पर डाल दिया गया।

इस झूठे आरोप में ही उन्हें फाँसी दे दी गयी, जबकि मुक़दमे में उनके खि़लाफ़ सुबूत नहीं मिला था।

शहीद ऑगस्ट स्पाइस ने मौत से पहले अपने बयान में कहा: “एक ऐसा समय आयेगा जब हमारी ख़ामोशी उन आवाज़ों से अधिक ताक़तवर होगी जिनका आज तुम गला घोंट रहे हो।” उनकी यह ललकार अमेरिका की सीमा से निकल कर पूरी दुनिया फ़ैल गयी। 1900 से 1960 के बीच में ही अधिकांश देशों की पूँजीवादी सरकार को मज़दूर वर्ग के संघर्षों के दबाव में 8 घण्टे का कार्यदिवस या 40-48 घण्टे के कार्यसप्ताह का क़ानून बनाना पड़ा। भारत में भी मज़दूरों के संघर्षों के फलस्वरूप काम के घण्टे 8 से लेकर कई प्रकार के श्रम क़ानून बने, हालाँकि ज़्यादातर मामले में यह श्रम क़ानून कागज़ों की ही शोभा बढ़ाते रहे और कभी भी गम्भीरता से इन्हें लागू नहीं किया गया। ज़्यादा से ज़्यादा इन्हें संगठित क्षेत्र के मज़दूरों के लिए लागू किया गया जो कुल मज़दूर आबादी का मात्र 7 प्रतिशत हैं। लेकिन 93 प्रतिशत ठेका, दिहाड़ी, कैजुअल मज़दूरों के लिए इनका आज भी कोई ख़ास मतलब नहीं है। और अब तो मोदी सरकार इस 8 घण्टे काम के कानून को कागज़ों से भी अपने नये लेबर कोड के साथ ग़ायब करने की तैयारी में है। ऐसे में, हम मज़दूरों के लिए मई दिवस के संघर्ष का एक नये दौर में नये सिरे से एक नया अर्थ पैदा हो चुका है। आज तो 8 घण्टे नहीं बल्कि 6 घण्टे के कार्यदिवस की माँग की जानी चाहिए क्योंकि पिछले 140 वर्षों में मज़दूरों के श्रम की उत्पादकता स्वयं मज़दूर वर्ग के ही द्वारा किये गये नवोन्मेषों के कारण कई गुना बढ़ चुकी है। आप खुद सोचें: 2019 में कुल सकल घरेलू उत्पाद में मज़दूरी का हिस्सा मात्र 0.52 प्रतिशत था। वहीं कुल राष्ट्रीय आय में मज़दूरी का हिस्सा 1981 के लगभग 39 प्रतिशत से घटकर 34 प्रतिशत के करीब रह गया था।

इस वर्ष का मई दिवस 137वाँ मई दिवस है। मई दिवस के शहीदों ने अपने ख़ून से जिस लाल झण्डे को लहराया था, संघर्ष की उस विरासत को आगे बढ़ाने में मज़दूर आन्दोलन आज विश्व स्तर पर ठहराव शिकार है। आज से पीछे मुड़कर देखें तो यह पता चलता है कि 1970 के बाद से अधिकांश पूँजीवादी देशों के शासक वर्ग ने नवउदारवादी नीतियों का अनुसरण किया। हमारे देश में भी 1980 के दशक की शुरुआत से ही कांग्रेस की सरकार ने इसी नीति को आगे बढ़ाया। जनता के ख़ून पसीने से खड़े किये गये सार्वजनिक उपक्रमों और सरकारी कम्पनियों आदि को कौड़ियों के दाम पूँजीपतियों के हवाले करने की मुहिम खुले तौर पर और बड़े पैमाने पर 1991 में कांग्रेस सरकार की नयी आर्थिक नीतियों के साथ शुरू हुई। इसी दौड़ में श्रम क़ानून जो पहले भी लागू नहीं होते थे उन्हें और अधिक लचीला बनाने का काम हमारे देश में बहुत तेज़ी से शुरू हुआ। लेकिन आज जिस तरह से भाजपा की मोदी-शाह सरकार मज़दूरों के हितों और अधिकारों पर हमला कर रही है उसकी तुलना में कांग्रेस द्वारा लागू की गयी नवउदारवादी नीतियाँ बौनी नज़र आती हैं।

2007-08 से ही आर्थिक संकट के साथ विश्व स्तर पर पूँजी के हित को साधने और मज़दूरों का बर्बरतम दमन करने वाली धुर-दक्षिणपन्थी एवं फ़ासीवादी शक्तियों का उभार देखा गया। मुनाफ़े की गिरती औसत दर से पैदा हुई मन्दी से बिलबिलाया पूँजीपति वर्ग एक तानाशाह किस्म का शासन चाहता था जो मज़दूरों के अधिकारों पर नंगे और बर्बर तरीके से हमला करे, प्रतिरोध को तोड़ने के लिए उसे धर्म के नाम पर बाँट दे, मज़दूर आन्दोलन के प्रतिभार के तौर पर टुटपुँजिया वर्गों का एक प्रतिक्रियावादी उभार खड़ा करे। यह काम भारत में भाजपा और संघ परिवार अपने साम्प्रदायिक फ़ासीवाद द्वारा कर सकते थे। यही कारण है कि आज हमारे देश में फ़ासीवादी ताक़तें यानी भाजपा और संघ परिवार पूँजीपतियों की पहली पसन्द हैं और ठीक इसी वजह से सत्तासीन है। 2014 में फ़ासीवादी मोदी सरकार सत्ता में क़ाबिज़ होने के बाद पूँजीपतियों के पक्ष में एक से बढ़कर एक ऐसी नीतियाँ बनायी हैं और ऐसा अभूतपूर्व भ्रष्टाचार किया है कि देश की पिछली सारी पूँजीवादी सरकारें शर्मा जाएँ।

मोदी सरकार के आने के बाद से सार्वजनिक उपक्रमों को धन्नासेठों के हाथों ओने पौने दामों में सौंपने की मुहिम बुलेट ट्रेन की रफ्तार से आगे बढ़ायी जा रही है, दूसरे शब्दों में कहें तो निजीकरण की आंधी चल रही है। श्रम कानूनों को ख़त्म करके चार लेबर कोड पास कराया गया है। कुछ राज्यों में क़ायम अन्य पूँजीवादी पार्टियों की सरकारों के द्वारा भी इसे पारित कराया ही जाएगा उन्हें भी श्रम कानूनों में छेड़छाड़ से कोई समस्या नहीं है। इस तथ्य को दो उदाहरणों से स्पष्ट समझा जा सकता है, पहला दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने चार लेबर कोड को लागू करने को लेकर ड्राफ्ट पारित कर दिया है और दूसरा उदाहरण तमिलनाडु, जहाँ की द्रमुक पार्टी की सरकार ने ‘फै़क्ट्री अधिनियम-1948’ में छेड़छाड़ करके काम के घण्टे को आठ से बढ़ाकर बारह करने के फ़ैसला लिया है। इसलिए अन्य पूँजीवादी दल भी जहाँ तक पूँजीपतियों की सेवा के लिए मज़दूरों के हक़ो-हुकूक पर हमले का सवाल है, भाजपा से प्रतिसपर्द्धा करते नजर आ रहे हैं।

भारत में विभिन्न क्षेत्रों में लगे मज़दूरों की संख्या 48 करोड़ से भी अधिक है। कुल मज़दूर आबादी का 94 फ़ीसदी असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं जहाँ मज़दूरों के लिए काम के घण्टे, न्यूनतम मज़दूरी, ओवरटाइम, सामाजिक सुरक्षा आदि के क़ानून मज़ाक के अलावा कुछ भी नहीं है। काम की बेहद ख़तरनाक स्थितियों में तथा सुरक्षा उपकरणों के अभाव में दुर्घटना के आँकड़े बढ़ते गये हैं, जिसमें मौत और अपंगता के मामलों में तेज़ बढ़ोत्तरी हुई है। मज़दूरी कम होने, मज़दूरी में मामूली बढ़ोत्तरी की तुलना में महँगाई में ज़्यादा तेज़ बढ़ोत्तरी होने, रोज़ाना काम ना मिलने और भयंकर बेरोज़गारी के कारण मज़दूर परिवारों की स्थिति काफ़ी भयावह है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो 2021 के आँकड़ों से पता चलता है कि 2019 से 2021 के बीच 1 लाख 12 हज़ार दिहाड़ी मज़दूरों ने आत्महत्या की है। इसी अवधि में खेती से जुड़े 31,839 लोगों ने आत्महत्या की जिसमें आधी संख्या खेतिहर मज़दूरों व आधी ग़रीब किसानों की है।

भारत में आज ग़रीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों की संख्या 23 करोड़ पहुँच चुकी है जो दुनिया में सबसे अधिक है। असल मायने में यह ग़रीबी रेखा भुखमरी रेखा ही है। वास्तविक ग़रीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों की तादाद तो भारत में इससे कहीं ज़्यादा होगी। अक्टूबर 2022 के वैश्विक भूख सूचकांक में 121 देशों की सूची में भारत 107वें स्थान पर है! वर्ष 2019 के अन्तिम आँकड़ों के अनुसार यहाँ 1 साल में 8,24,000 शिशु मौत के शिकार हुए। यानी हर दो मिनट में तीन बच्चों की मौत! भुखमरी और बाल मृत्यु दर में भारत अफ्रीका के ग़रीब देशों से भी पीछे है। 1981 में भारत के सबसे ऊपर के 10 प्रतिशत अमीरों की सम्पत्ति देश की कुल सम्पत्ति की 45 फ़ीसदी थी जो 2012 में बढ़कर 63 फ़ीसदी और 2022 में बढ़कर 80 फ़ीसदी से भी अधिक हो गयी। इस समय देश की कुल सम्पत्ति के 90 प्रतिशत पर ऊपर के सिर्फ़ 30 फ़ीसदी लोग कुण्डली मारे बैठे हैं। सबसे ऊपर के 1 प्रतिशत धन्नासेठों के पास देश की 40 फ़ीसदी से भी अधिक सम्पत्ति इकट्ठी हो गयी है जबकि नीचे से 50 प्रतिशत लोगों के पास कुल सम्पत्ति का मात्र 3 फीसदी है। एक तरफ धन-दौलत का बढ़ता ढेर और दूसरी तरफ भूख से दम तोड़ते बच्चे!

यह चन्द आँकड़े और तथ्य मज़दूर मेहनतकश जनता के तबाही बर्बादी की तस्वीर पेश करते है। आज हमें पस्ती और निराशा त्यागकर नये सिरे से एकजुट, जागृत, गोलबन्द और संगठित होना होगा। मई दिवस की विरासत से सीख लेते हुए अपने अधिकारों के लिए नये सिरे से एक आन्दोलन को खड़ा करना होगा, जिसकी संगठित शक्ति के सामने मौजूदा फ़ासीवादी निज़ाम के लाठी-डण्डे की ताक़त बौनी हो जाये। हममें यह ताक़त है। लेकिन एकजुट होने के लिए हमें यह समझ लेना होगा कि मज़दूर वर्ग को धर्म और जाति के नाम पर बिल्कुल नहीं बँटना है, कि देश में आज दो ही जमातों की बात की जा सकती है, एक, जो अपनी मेहनत की रोटी खाते हैं और लूट व शोषण का शिकार हैं, और दूसरे वे, जो मेहनतकश जनता के शरीर पर जोंक के समान चिपके हुए हैं और उनका खून पी रहे हैं। हमारे बीच फिरकापरस्त ताक़तों और हाफपैण्टिये साम्प्रदायिक फ़ासीवादियों द्वारा पैदा किये गये इन बँटवारों को तोड़ देना होगा और अपनी जुझारू वर्ग एकजुटता के आधार पर एक जुझारू मज़दूर आन्दोलन खड़ा करना होगा। क्या आज की चुनौतियों का सामना करने के लिए आप तैयार हैं? तो, पस्ती और निराशा को त्याग कर नयी शुरुआत करने का दिन है मई दिवस! मज़दूर वर्ग के महान पुरखों के गौरवशाली संघर्ष की विरासत को आगे बढ़ाने का दिन है मई दिवस!

मज़दूर बिगुल, मई 2023


 

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