फ़्रांस : होलान्दे की जीत सरकोज़ी की नग्न अमीरपरस्त और साम्राज्यवादी नीतियों के ख़िलाफ जनता की नफरत का नतीजा है, समाजवाद की जीत नहीं

 शिशिर

मई के पहले सप्ताह में फ़्रांस के राष्ट्रपति चुनाव के दूसरे चक्र के ख़त्म होने के साथ ही फ़्रांस को नया राष्ट्रपति मिल गया। पिछले पाँच वर्ष से फ़्रांस के राष्ट्रपति रहे निकोलस सरकोज़ी की हार वास्तव में फ़्रांस्वा होलान्दे की जीत नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में और विशेषकर आर्थिक मन्दी की शुरुआत के बाद से निकोलस सरकोज़ी की आर्थिक और राजनीतिक नीतियों, बयानों और अन्तरराष्ट्रीय नीतियों से जनता इतनी बुरी तरह नाराज़ थी कि उसे किसी भी कीमत पर सरकोज़ी से छुटकारा पाना था। सरकोज़ी के बरक्स कोई भी ऐसा उम्मीदवार खड़ा होता जो किसी दक्षिणपंथी या रूढ़िवादी पार्टी से न होता तो वह जीत ही जाता। सरकोज़ी एक सर्वेक्षण के अनुसार 1958 से लेकर अब तक फ़्रांस के सबसे अलोकप्रिय राष्ट्रपति सिद्ध हुए हैं। इसका कारण था सरकोज़ी का अमीर वर्गों के प्रति खुला प्रेम और स्नेह, जो कि उनके इस विचार से पैदा होता था कि समाज में जो सक्षम होते हैं वे अमीर हो जाते हैं और इस प्रतिस्पर्द्धा में वे लोग पिछड़कर नीचे चले जाते हैं और दरिद्र हो जाते हैं, जो अक्षम होते हैं! सरकोज़ी द्वारा सीरिया, ईरान और अफगानिस्तान के मसले पर अमेरिका का समर्थन करना और न सिर्फ साम्राज्यवादी युद्धों को राजनीतिक समर्थन देना बल्कि अफगानिस्तान में फ़्रांसीसी सैन्य मौजूदगी को बढ़ाना, फ़्रांसीसी जनता को नागवार गुज़रा था। सरकोज़ी ने जर्मनी की चांसलर एंजेला मरकेल के साथ मिलकर पूरे यूरोज़ोन पर जो ”मितव्ययिता की नीति” थोप रखी थी (जिसका मतलब था कि जनता अपने ख़र्चों में कटौती करे ताकि अमीरों की ऐयाशी और बैंकों और दलालों की सट्टेबाज़ी के लिए पैसों की कमी न रहे) उसके कारण पूरे यूरोप की मेहनतकश जनता को भारी परेशानी, कटौतियाँ, बेरोज़गारी और सामाजिक-आर्थिक अनिश्चितता झेलनी पड़ रही थी। ”मरकोज़ी” (मरकेल+सरकोज़ी) की इन नीतियों का मकसद था — जनता की कीमत पर वित्तीय पूँजी को बचाना और अमीर वर्गों को संरक्षण देना। खुलेआम इन नीतियों को लागू करने और अमीर वर्गों के प्रति अपने प्रेम के सार्वजनिक प्रदर्शन की कीमत सरकोज़ी को चुनाव में हार से चुकानी पड़ी।

Hollande

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि फ़्रांस की सामाजिक जनवादी पार्टी पार्ते सोशलिस्ते के फ़्रांस्वा होलान्दे को जनता पसन्द करती है। अगर ऐसा होता तो सरकोज़ी और होलान्दे की जीत के बीच लगभग दो प्रतिशत का मामूली-सा अन्तर नहीं होता। वास्तव में, होलान्दे की जीत फ़्रांस की पूँजीवादी राजनीति में विकल्पहीनता की स्थिति को दिखलाती है। जनता किसी भी कीमत पर सरकोज़ी से छुटकारा पाना चाहती थी, इसलिए उसने होलान्दे को वोट दिया हालाँकि कुछ नादान लोगों को छोड़ दिया जाये तो सभी जानते थे कि होलान्दे किसी भी रूप में सरकोज़ी से अलग किस्म की आर्थिक नीतियाँ लागू करने वाले नहीं हैं। चुनाव प्रचार के पहले दौर में होलान्दे ने कुछ ऐसी बातें कहीं थीं, जिससे कि फ़्रांस की जनता को यह ग़लतफहमी हो जाये कि वह सरकोज़ी की जनविरोधी आर्थिक नीतियों को छोड़ने जा रहे हैं। मिसाल के तौर पर, होलान्दे ने एक साक्षात्कार में कहा कि ”वित्त पूँजी उनकी सबसे बड़ी दुश्मन है”। लेकिन ठीक उसी समय होलान्दे ने ब्रिटिश अख़बार द गार्डियन को दिये एक बयान में कहा, ”हम समाजवादी इससे पहले 15 वर्ष लगातार सत्ता में थे जब हमने अर्थव्यवस्था का उदारीकरण किया, वित्तीय पूँजी और निजीकरण के लिए पूरी फ़्रांसीसी अर्थव्यवस्था को खोल दिया था। इसलिए (बैंकों और वित्तीय पूँजी को) हमसे डरने की कोई ज़रूरत नहीं है।” होलान्दे ने अपनी विजय पर कहा कि ”यूरोप के लिए मितव्ययिता की नीतियाँ एकमात्र विकल्प नहीं हैं।” साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि वह फ़्रांस के सबसे अमीर वर्गों पर 75 प्रतिशत तक के कर लगायेंगे। लेकिन जब होलान्दे जनता को ये गुलाबी सपने दिखा रहे थे, ठीक उसी समय वह वित्तीय पूँजी के सरदारों और कारपोरेट पूँजीपति वर्ग से क्या कह रहे थे? इंटरनेशनल हेराल्ड ट्रिब्यून ने समाचार एजेंसी ‘रायटर’ को भेजी गयी होलान्दे की विज्ञप्ति के आधार पर लिखा, ”बैंकों, वित्तीय संस्थानों और हेज फण्डों को होलान्दे के चुने जाने के साथ पेरिस से भागने की कोई ज़रूरत नहीं है…वास्तव में, होलान्दे जिन सुधारों का प्रस्ताव रख रहे हैं वे कोई ख़ास डरावने नहीं हैं, और जो थोड़ा-बहुत डरावने हैं, उन्हें लेकर होलान्दे स्वयं गम्भीर नहीं हैं।” वित्तीय पूँजी के सरदारों को अच्छी तरह से पता है कि होलान्दे चुनाव प्रचार में जो लोकरंजकतावादी बयानबाज़ी कर रहे थे, उसका मकसद महज़ सरकोज़ी से अलग दिखना और जनता का भरोसा जीतना था। वे भी जानते थे कि मौजूदा आर्थिक और राजनीतिक तन्त्र के ढाँचे को आमूलचूल बदले बग़ैर चुनाव और सरकारी सुधार के रास्ते जनता को कुछ भी नहीं दिया जा सकता है और न ही वित्तीय पूँजी से कुछ लिया जा सकता है। इसलिए बैंकों आदि को होलान्दे से कोई डर नहीं था।

जीत के बाद होलान्दे के बयानों ने वित्तीय पूँजी और कारपोरेट पूँजीपतियों के इस भरोसे को सही साबित किया है। होलान्दे इस समय एक ऑडिट करने वाले निकाय कुआ दे कॉम्प्ते की रिपोर्ट के आधार पर जनता को यह यक़ीन दिलाने में लगे हैं कि बजट घाटे को कम करने के लिए उनके पास सामाजिक सुरक्षा योजनाओं में कटौती करने के अलावा कोई रास्ता नहीं है। यानी कि शिक्षा, स्वास्थ्य, बेरोज़गारी भत्तो, बुज़ुर्ग पेंशन जैसे मदों में जो सरकारी ख़र्च होता है उसमें कटौती की जायेगी। इसके अलावा, उन्होंने साम्राज्यवादी युद्धों में लगी फ़्रांसीसी सेनाओं को वापस बुलाने के वायदे को भी कचरा पेटी के हवाले कर दिया है। अतिधनिक वर्गों पर जो 75 प्रतिशत कर लगाने का वायदा होलान्दे ने किया था, उसके बारे में अभी हाल ही में खुलासा हुआ है कि उस दायरे में पूरे फ़्रांस की आबादी के महज़ 3000 लोग आयेंगे! साफ है, कि होलान्दे चुनावों में विजय के साथ ही अपने अधिकांश वायदों से पलट चुके हैं। अधिक शिक्षकों की भर्ती, स्कूल शिक्षा को सब्सिडी आदि जैसी कुछ शर्तें हैं जिन पर होलान्दे अभी भी टिके हुए हैं। लेकिन मुख्य केन्द्रीय वायदे जो कि उन्हें सरकोज़ी से अलग दिखाते थे, अब ठण्डे बस्ते में डाले जा चुके हैं। फ़्रांसीसी जनता को भी होलान्दे से ज्यादा उम्मीदें नहीं थीं, लेकिन यह सारा काम इतनी बेशर्मी से किया जायेगा, शायद इसकी अपेक्षा भी उन्होंने नहीं की होगी।

फ़्रांस में सामाजिक जनवादियों की जीत वास्तव में पूँजीवाद के संकट का एक परिणाम है। विश्व पूँजीवाद मन्दी के जिस भँवर में फँसा हुआ है उसकी कुछ राजनीतिक कीमत तो उसे चुकानी ही थी। नवउदारवादी नीतियों का खुले तौर पर पालन करने वाली पार्टियाँ अलग-अलग देशों में चुनावों में हार रही हैं। यूनान में भी एक वामपंथी गठबन्धन ने चुनावों में प्रभावी प्रदर्शन किया। संकट के शुरू होने के बाद से यूरोप में 11 सरकारें बदल चुकी हैं। कुछ चुनाव के ज़रिये और कुछ शासक वर्ग के अलग-अलग धड़ों के बीच गठबन्धन के ज़रिये। आर्थिक संकट का पूरा बोझ पूँजीपति वर्ग जनता पर डाल रहा है। यह आर्थिक संकट बैंकों की सट्टेबाज़ी और जुआबाज़ी के कारण पैदा हुआ था। जब बैंकों के दिवालिया होने की हालत हुई तो वित्तीय इजारेदार पूँजी के इशारों पर चलने वाली सरकारों ने जनता के पैसों से बैंकों को बचाया। और जब सरकारी ख़ज़ाने में सरकारी कर्मचारियों को वेतन देने लायक पैसे की भी कमी पड़ने लगी तो फिर तमाम सरकारी कल्याणकारी नीतियों, सामाजिक सुरक्षा योजनाओं, शिक्षा, चिकित्सा, रोज़गार आदि के मद में कटौती की जाने लगी। मेहनतकश जनता समाज की सारी ज़रूरतों को पूरा करती है, सारे सामान बनाती है, सारी समृद्धि पैदा करती है और उस समृद्धि को संचित करने वाला पूँजीपति वर्ग जब अपने ही अति-उत्पादन और पूँजी की प्रचुरता के संकट का शिकार हो जाता है तो उस संकट का बोझ मेहनतकश जनता पर डाल दिया जाता है और उसको बताया जाता है कि यह ”राष्ट्रीय संकट” है और उन्हें अपनी ”देशभक्ति” का प्रमाण देने के लिए पेट पर पट्टी बाँध लेनी चाहिए! इस समय पूरे यूरोप में यही हो रहा है। बताने की ज़रूरत नहीं है कि पूँजीवादी व्यवस्था के दायरे के भीतर और कुछ हो भी नहीं सकता था। और पूँजीवादी चुनावों के रास्ते इस पूरी व्यवस्था को तहस-नहस कर समाजवादी व्यवस्था का निर्माण नहीं हो सकता है, जैसा कि दुनिया के सभी देशों में सामाजिक जनवादी दावा करते हैं। मिसाल के तौर पर, होलान्दे ने एक जगह कहा है कि समाजवाद का अर्थ उनके लिए यह है कि पूँजीवाद को लोकहित की सेवा में लगाया जाय! यह कितना बड़ा फरेब है, हम सभी समझते हैं। पूँजीवाद इसीलिए तो ‘पूँजीवाद’ है कि वह जनता के हितों की सेवा में लग ही नहीं सकता; वह सिर्फ जनता को लूट और निचोड़कर पूँजी के हितों की सेवा कर सकता है। हमारे देश में माकपा और भाकपा जैसे सामाजिक जनवादी भी इसी किस्म की बातें करके मेहनतकश जनता को बरगलाने की कोशिश करते हैं और पूरी दुनिया में सामाजिक जनवादियों की यही फितरत है। पूँजीवादी संकट के राजनीतिक नतीजे के तौर पर फिलहाल सामाजिक जनवादी पार्टियाँ कई यूरोपीय देशों में सत्ता में आ रही हैं; तार्किक रूप से इसका अगला चरण दक्षिणपंथी फासीवादी ताक़तों के नाम होने वाला है। मौजूदा चुनावों में भी फासीवादी ताक़तों का प्रदर्शन पहले से बेहतर हुआ है। जिन-जिन देशों में सामाजिक जनवादी सत्ता में आ रहे हैं, जैसे कि फ़्रांस, उन सभी देशों में वे वित्तीय पूँजी की चाकरी जारी रखेंगे और यह संकट को और अधिक गहरा बनायेगा। नतीजतन, फिर से सरकारें गिरेंगी और विकल्पहीनता की स्थिति में फासीवादी ताक़तें सत्ता में पहुँचेंगी।

मज़दूर वर्ग को यह समझना होगा कि मौजूदा संकट से निजात पूँजीवादी व्यवस्था के दायरे के भीतर कोई भी चुनावी पार्टी नहीं दिला सकती है। इस कुचक्र से बाहर निकलने का सिर्फ एक रास्ता है — समाजवाद और मज़दूर सत्ता। समाजवाद के निर्माण का कोई शान्तिपूर्ण संक्रमण वाला रास्ता नहीं है। एक नयी समाजवादी व्यवस्था के निर्माण का सवाल मज़दूर क्रान्ति का सवाल है, क्योंकि मौजूदा समाज के सम्पत्ति सम्बन्धों, उत्पादन सम्बन्धों और वितरण के सम्बन्धों को बदले बग़ैर समाजवादी व्यवस्था की बात करना बेकार है। यानी, सभी कल-कारख़ानों, खानों-खदानों को मज़दूरों के समूहों के हाथ में सौंपना और सारे खेतों को किसानों के समूहों के हाथ में सौंपना; यानी, उत्पादन के सभी साधनों का स्वामी मज़दूर वर्ग को बनाना; इसके बग़ैर समाजवाद की कोई भी बात बकवास है। और ऐसा तब तक नहीं हो सकता जब तक कि इस पूरे सामाजिक-आर्थिक ढाँचे की बलपूर्वक हिफाज़त करने वाली पूँजीवादी राजसत्ता को चकनाचूर न किया जाये। जैसा कि लेनिन ने कहा था, क्रान्ति का प्रश्न राजसत्ता का प्रश्न है और पूँजीवादी राजसत्ता को चकनाचूर किये बिना मज़दूर राज्य की स्थापना नहीं हो सकती है। और इसीलिए चुनावों के रास्ते ऐसा होना सम्भव नहीं है। ऐसे मज़दूर इंक़लाब के लिए क्रान्तिकारी विचारधारा, सही कार्यक्रम और सही रणनीति तथा आम रणकौशल से लैस मज़दूर वर्ग की क्रान्तिकारी पार्टी की ज़रूरत है। सामाजिक जनवादी पार्टी चाहे भारत की हो या फ़्रांस की, उसका मक़सद समाजवाद का नाम लेते हुए पूँजीवाद की सेवा करना है। ये पार्टियाँ संकट के दौर में और ठेठ पूँजीवादी पार्टियों के बेनक़ाब हो जाने और विश्वास खो देने के दौर में पूँजीवादी व्यवस्था की हिफाज़त करती हैं, जैसा कि पार्ते सोशलिस्ते होलान्दे के नेतृत्व में इस समय फ़्रांस में कर रही है। सामाजिक जनवाद पूँजीवादी व्यवस्था की दूसरी सुरक्षा पंक्ति का काम करता रहा है और आज भी कर रहा है। फ़्रांस की मेहनतकश जनता भी इस बात को समझ रही है। लेकिन उसके सामने विकल्पहीनता की स्थिति है। जब तक एक क्रान्तिकारी कम्युनिस्ट पार्टी का निर्माण नहीं होता, फ़्रांसीसी मज़दूर वर्ग की राजनीति पराजय और विपर्यय की स्थिति में ही रहेगी।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2012

 


 

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