द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर को दरअसल किसने हराया?
स्तालिनग्राद की गलियों में लड़ने वाले लाल योद्धाओं ने!
(तीसरी किस्‍त)

दुनिया का पूँजीवादी मीडिया एक ओर नये-नये मनगढ़न्त किस्सों का प्रचार कर मज़दूर वर्ग के महान नेताओं के चरित्र हनन में जुटा रहता है वहीं दूसरी ओर नये-नये झूठ गढ़कर उसके महान संघर्षों के इतिहास की सच्चाइयों को भी उसके नीचे दबा देने की कवायदें भी जारी रहती हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध के बारे में भी तरह-तरह के झूठ का प्रचार लगातार जारी रहता है। इतिहास की किताबों में भी यह सच्चाई नहीं उभर पाती कि मानवता के दुश्मन, नाजीवादी जल्लाद हिटलर को दरअसल किसने हराया?

अमेरिकी और ब्रिटिश मीडिया ख़ास तौर पर इस झूठ का बार-बार प्रचार करता है कि उनकी फौजों ने हिटलर को मात दी। इस झूठ को सच साबित करने के लिए वे उस तथाकथित ‘कयामत के दिन’ (डी-डे) 6 जून 1944 का बार-बार प्रचार करते हैं जब एक लाख पचास हज़ार की तादाद में ब्रिटिश-अमेरिकी सेनाएँ हिटलर की सेनाओं से लड़ने के लिए नारमैंडी (फ्रांस) में उतरी थीं। जोर-शोर से प्रचार यह किया जाता है कि इसी आक्रमण से यूरोप में द्वितीय विश्व युद्ध का पासा पलट गया था। जबकि सच्चाई यह है कि उस युद्ध का मुख्य मोड़बिन्दु तो वोल्गा नदी के किनारे बसे हुए एक रूसी शहर से आया था। 1942 में स्तालिनग्राद शहर की गलियों में 80 दिन और 80 रात जो लड़ाई चली, तत्कालीन सोवियत संघ के लाल सैनिकों और मज़दूरों ने परम्परागत देशी हथियारों से आधुनिकतम मानी जाने वाली जर्मन नाजी सेना का जिस तरह मुकाब़ला किया, वह विश्वयुद्ध का ऐतिहासिक मोड़बिन्दु था। यह कहानी विश्व इतिहास की एक महाकाव्यात्मक संघर्ष गाथा है जिसे दुनिया की मेहनतकश जनता की यादों से मिटा देने की कोशिशें दिन-रात चलती रहती हैं।

आज विश्व सर्वहारा क्रान्ति के इस नये चक्र में, जबकि नयी क्रान्तियों की तैयारियों का काल लम्बा खिंचता जा रहा है, यह बेहद ज़रूरी है कि नयी पीढ़ी के मेहनतकशों को अतीत के महान संघर्षों की विरासत और उपलब्धियों से लगातार परिचित कराते रहा जाये। यह नये सर्वहारा पुनर्जागरण और प्रबोधन का एक ज़रूरी कार्यभार है। अन्तरराष्ट्रीय मज़दूर वर्ग के महान शिक्षक और नेता स्तालिन की पचपनवीं पुण्यतिथि (6 मार्च) के अवसर पर हमने बिगुल के पाठकों के लिए इस विशेष सामग्री का धारावाहिक प्रकाशन शुरू किया था। इस अंक में हम लेख की तीसरी और आख़िरी किस्त दे रहे हैं। -सम्पादक

Stalingrad 1आमने-सामने लड़ाई की शैली

नाजियों के पास भारी संख्या में टैंक, तोपें और विमान थे। सोवियत कम्युनिस्ट फौजों के पास भी कुछ भारी हथियार थे-जिनमें विमानभेदी तोपें भी थीं-लेकिन उन्हें ज़्यादातर हल्के हथियारों-जैसे ग्रेनेडों, मोलोतोव कॉकटेलों और आज की मामूली बन्दूकों जैसी टॉमीगनों-पर भरोसा करना पड़ता था।

जर्मन साम्राज्यवादी सेना का विशाल शस्त्रगार उसे उसकी पसन्द के मुताबिक ‘‘लड़ाई का तरीका’’ चुनने का सुभीता प्रदान कर देता था-ठीक वैसे ही, जैसे आज अमेरिकी सेना का शस्त्रगार ऐसा सुभीता प्रदान करता है।

जर्मन वायुसेना आमतौर पर तबतक इन्तजार करती रहती जबतक कि सोवियत और नाजी ठिकानों के बीच एक स्पष्ट ‘‘निर्जन क्षेत्र’’ न मिल जाये-और जब यह सुलभ हो जाता था तब तो वह सोवियत खाइयों और किलेबन्दियों पर भीषण बमबारी करतीं। जर्मन टैंक-चालक आमतौर पर तबतक खुलकर नहीं आते जबतक कि जर्मन वायुसेना सोवियत ठिकानों पर बमबारी नहीं कर लेती और जर्मन पैदल सैनिक भी तबतक पूरे तौर से लड़ाई में शामिल नहीं होते, जबतक कि टैंक मोर्चाबन्दियों पर गोले नहीं बरसा लेते। लेकिन जब सोवियत सेना जर्मनों का इस ढंग से लड़ना असम्भव कर देती, तब जर्मन फौजें प्रायः लड़ाई बन्द कर देतीं और पीछे लौट जातीं।

सोवियत कामरेडों ने यह जान लिया था कि एकदम निकट होकर, आमने-सामने की लड़ाई की शैली जर्मनों के लिए ‘‘अपने ढंग से लड़ना’’ मुश्किल कर देती थी। स्तालिनग्राद स्थित बासठवीं सोवियत सेना के कमाण्डर, वासिली चुइकोव लिखते हैं:

‘‘इसलिए हमारी समझ में आ गया कि जहां तक सम्भव हो सके, हमें चाहिए कि हम ‘‘निर्जन क्षेत्र’’ को संकुचित करते हुए एक हथगोले की मार-सीमा तक कम कर दें।’’ सोवियत योद्धा दुश्मन के यथासम्भव निकट पहुंच जाने की कोशिश करते, ताकि जर्मन वायुसेना जर्मन सैनिकों के मारे जाने का जोखिम उठाये बिना सामने की सोवियत यूनिटों और खाइयों पर बमबारी न कर सकें।

चुइकोव यह भी लिखते हैं कि जर्मन आमने-सामने होकर लड़ने से कतराते थे, क्योंकि ‘‘उनमें यह नैतिक साहस नहीं था कि वे एक हथियारबन्द सोवियत सैनिक से आँख मिला सकें। दुश्मन सैनिक, खासतौर से रात में, काफी दूर अगली चौकी पर ही दिखायी पड़ता; वह अपना हौसला बढ़ाने के लिए, हर पाँच-दस मिनट पर, अपने टॉमीगन से लगातार एक धमाका कर दिया करता। हमारे सैनिक ऐसे ‘योद्धाओं’ को पाकर रेंगते हुए उन तक पहुँच जाते और गोली या संगीन से उनका काम तमाम कर देते।’’

battle-stalingrad-ww2-second-world-war-two-russian-eastern-front-unseen-pictures-photos-images.jpeg-soldiers-fightingरक्षात्मक लड़ाई के भीतर आक्रमण लड़ाई

स्तालिनग्राद में सोवियत संघ की बासठवीं सेना मुख्यतः एक रक्षात्मक लड़ाई लड़ रही थी-डटे रहने और जर्मन सेना को विलम्बित करते रहने की लड़ाई, ताकि दूसरी सोवियत सेनाएं जर्मनों को घेर सकें। लेकिन इस पूरी रक्षात्मक लड़ाई में भी निरन्तर आक्रमण करते रहना अत्यन्त आवश्यक था। आक्रामक कार्रवाइयाँ जर्मन सेना की पहलकदमी को-उनकी इस निर्णय कर पाने की क्षमता को सीमित कर देतीं कि लड़ाई कहाँ पर और कब होगी।

चुइकोव सोवियत सेना की सचेष्ट रक्षात्मक लड़ाई का वर्णन करते हुए कहते हैं: ‘‘जब कभी भी दुश्मन हमारी रक्षा-पंक्ति के भीतर घुसपैठ करता, उसका सफाया या तो गोलियों से भूनकर या ऐसे प्रत्याक्रमणों द्वारा कर दिया जाता जो, आकस्मिक आक्रमणों के रूप में, या तो दुश्मन के पार्श्व भागों पर किये जाते, या पिछले भाग पर।’’

लाल योद्धा जर्मन टैंकों पर घात लगाकर आक्रमण कर देते, क्योंकि वे ऐसे ही रास्तों पर चलते थे जिनका पूर्वानुमान किया जा सकता था। लाल योद्धा तबतक प्रतीक्षा करते रहते जबतक कि टैंक उनके बिलकुल करीब नहीं आ जाते-और तब उन्हें एक निकट मार-सीमा के भीतर पाकर टैंक-भेदी राइफलों और अधिक भारी टैंकभेदी अस्त्रें से बेकार कर देते। इससे जर्मन पैदल सेना ठिठककर रुक जाती, और आमतौर पर उन जलते हुए टैंकों के पीछे भीड़ लगा देती। तब सोवियत फौजों के लिए यह सम्भव हो जाता कि वे जर्मन पैदल सेना के निकट जा पहुँचे, जबकि जर्मन स्तूका आरै जे-88 लड़ाकू विमानों के लिए यह असम्भव होता कि वे सोवियत योद्धाओं पर हवाई हमले कर सकें।

चुइकोव लिखते हैं: ‘‘पैदल सेना और टैंकों के घुसपैठ करने पर उन्हें अलग-अलग नष्ट कर दिया जाताः टैंक तो पैदल सेना के बिना ज्यादा कुछ कर नहीं सकते थे और बिना कुछ हासिल किये, भारी नुकसान उठाकर पीछे लौट जाते थे…। प्रत्याक्रमणों से दुश्मन को हमेशा ही भारी नुकसान होता, और अक्सर ऐसा होता कि उसे एक दिये गये क्षेत्र में आक्रमण करने का इरादा छोड़, मोर्चे के इधर-उधर इस फिराक में दौड़ लगाने के लिये मजबूर हो जाना पड़ता कि कहीं उसे हमारी रक्षात्मक मोर्चाबन्दियों में कोई कमजोर बिन्दु मिल जाये। इससे उसका वक्त बर्बाद होता और आगे बढ़ने की उसकी रफ्तार घट जाती…। हमारा उद्देश्य प्रायः इतना ही नहीं होता कि दुश्मन का नुकसान करें, बल्कि यह भी कि हम अपनी पैदल सेना और टैंकों के आकस्मिक हमले द्वारा तथा गोलन्दाज फौज और वायुसेना की मदद से, दुश्मन के कूच करने के ठिकानों में घुसपैठ कर जायें, उसकी कतारबन्दियों को अस्तव्यस्त कर दें, और उसके आक्रमण की योजना को विफल करके मोहलत हासिल कर लें।’’

शहरी लड़ाई दोनों ही पक्षों के लिए फौजों की बड़ी-बड़ी कतारबन्दियों को कमान में रखना और संचालित करना कठिन बना देती थी। चुइकोव वर्णन करते हैं कि कैसे लाल योद्धाओं ने इस स्थिति का अपने हक़ में फायदा उठायाः ‘‘शहरी लड़ाई एक खास तरह की लड़ाई होती है। यहाँ चीजें ताक़त से नहीं, बल्कि कौशल, साधनसम्पन्नता और मुस्तैदी के द्वारा व्यवस्थित की जाती हैं… और इसीलिए यहाँ पैदल सैनिकों के छोटे-छोटे समूह, एकाकी बन्दूकची और टैंक ही युद्ध-मंच के केन्द्र पर कब्जा कर सकते थे।’’

सोवियत कमाण्डरों ने अपनी फौजों के कुछ भागों को ‘‘तूफानी टोलियों’’ नामक छोटी-छोटी सचल इकाइयों में संगठित करना सीख लिया था। चुइकाव लिखते हैं: ‘‘ये छोटे लेकिन शक्तिशाली ग्रुप थे, जो सांपों की भांति चपल-चालाक और कार्रवाई में अदम्य थे।’’ समयबद्धता, आकस्मिकता, रफ्तार और हिम्मत तूफानीटोलियों की कार्रवाइयों की सफलता की कुंजी थी।

इन तूफानी टोलियों पर हवाई वार कर पाना कठिन था। वे दुश्मन के ठिकानों पर वार करने के लिए उनकी किलेबन्दियों में पांव के सहारे रेंगते हुए गह्नरों और खण्डहरों में जा छिपते। रात में वे सुरंगें और दर्रे खोदते, और दिन में उन्हें ढँककर छिपा देते। तूफानी टोलियां अचानक जर्मन सेनाओं के मध्य से प्रकट हो जातीं-जहाँ जर्मन तोपें, हथियारबन्द गाड़ियाँ और हवाई शक्ति कोई काम न आती। लाल सैनिक अधिकतम फायदा उठाने की स्थिति में हमला करते-जब दुश्मन सो या खाना खा रहा होता, या पाली बदलने को होता। गोलियों, हथगोलों, छुरों और धारदार बनाये हुए बेलचों से आमने-सामने लड़ाई करते हुए लाल योद्धा नाजियों को उनके प्रमुख ठिकानों से खदेड़ देते-जो कि किसी तहखाने, किसी कमरे, या किसी गलियारे के लिए लड़ रहे होते हैं।

चुइकोव लिखते हैं: ‘‘रात और रात की लड़ाई हमारे लिए स्वाभाविक बात थी। दुश्मन रात में नहीं लड़ सकता था, लेकिन हम लोगों ने ज़रूरतवश इसका अभ्यास कर लिया था: दिनभर दुश्मन के विमान हमारी फौजों के ऊपर मंड़राते रहते, उन्हें अपने सिर तक उठाने की स्थिति नहीं बनती। लेकिन रात में हमें ‘लुफ्तवैफे’ (जर्मन वायुसेना) का कोई भय नहीं रहता।’’

कम्युनिस्ट पार्टी ने बासठवीं सेना के सैनिकों के बीच एक ‘‘स्नाइपर अभियान’’ चलाया। सैनिक प्रत्येक गोली को सार्थक करने की कोशिश करते-निशानेबाजी की ट्रेनिंग दी जाती और छिपकर सफलतापूर्वक गोली चलाने के बारे में लाल फौजों के बीच व्यापक विचार-विमर्श किया जाता। स्नाइपरों के छोटे-छोटे दस्ते कंकड़-पत्थरों की अन्तहीन ढेरियों में छिपकर आगे की ओर बढ़े चले आ रहे दुश्मन के काफी बड़े-बड़े समूहों को छिन्न-भिन्न करके टुकड़े-टुकड़े कर डालते। चुइकोव इसका सार प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि ‘‘हर जर्मन सैनिक को निश्चित रूप से यह अनुभव करा देना था कि वह रूसी बन्दूक की नली के नीचे जी रहा है, जो उसे गोली मारकर मौत की नींद सुला देने के लिए हमेशा तैयार है।’’

लाल सेना को उन जनसमुदायों पर भरोसा था जो दुश्मन द्वारा बनायी जाने वाली योजनाओं की महत्त्वपूर्ण सूचना एकत्र करने के लिए स्तालिनग्राद के पीछे जमे हुए थे। उदाहरण के तौर पर, एक साहसी महिला जर्मन कतारों के पीछे से, धुआँ और कंकड़-पत्थरों के ढेर के बीच से प्रकट हुई और एक आसन्न जर्मन आक्रमण के बारे में महत्त्वपूर्ण खुफियां सूचना दे गयी।

वोल्गा पार करने के लिए नावों का इन्तजार करते सोवियत सैनिकों को ऐसे पर्चे पढ़ने को मिलते जिनमें इस नज़दीकी लड़ाई की शैली का पूरा विवरण देते हुए लिखा होता था कि ‘‘शहरी लड़ाई में एक सैनिक को क्या-क्या बातें जाननी चाहिए और कैसे कार्रवाई करनी चाहिए।’’ इस तरह के जन-कार्रवाई के तरीकों से विजय में अधिकतकम योगदान देने के लिए साधारण सैनिकों और मेहनतकश जनता को भरपूर अवसर मिल जाता था। ‘‘अपने ढंग से लड़ते हुए’’ सोवियत सेनाएं दुश्मन की भारी मारक शक्ति को नाकाम कर देती थीं। लड़ाई की यह शैली उच्चस्तरीय चेतना और प्रचण्ड आत्म-बलिदान पर आधारित थी। बार-बार हासिल की जा रही विजयें, चाहे वे किसी तहखाने या बीहड़ को साफ करने से ही सम्बन्धित क्यों न रही हों, लाल फौजों के लड़ने के हौसले को नई बुलन्दी पर पहुँचा देती थीं।

इन सोवियत रणकौशलों के चलते जर्मन सैनिक बुरी तरह बौखला जाते। वे अक्सर अपने प्रमुख किलेबन्दी वाले ठिकानों को भी छोड़कर पीछे भाग खड़े होते।

नाजी-विरोधी किलेबन्दियों की व्यूहरचना

सोवियत कमाण्डर चुइकोव लिखते हैं कि ‘‘शहर की इमारतें तरंग-रोध की भांति होती हैं। वे दुश्मन की आगे बढ़ती कतारों को रोक देती हैं तथा उनके सैनिकों को गली के रास्ते चलने के लिए मजबूर कर देती हैं। अतः हमलोग मजबूत इमारतों के बीच दृढ़तापूर्वक जम गये थे, और उनमें हमने छोटी-छोटी रक्षक सेनाएं स्थापित कर ली थीं जो घिर जाने पर चौतरफा गोलीबारी कर सकती थीं। विशेष रूप से मजबूत इमारतें हमें मज़बूत रक्षात्मक अवस्थितियां अख्तियार करने में सहूलियत देती थीं, जहां से हमारे सैनिक मशीन-गनों और टॉमी-गनों के साथ आगे बढ़ते जर्मनों को मार गिरा सकते थे।’’

चुइकोव कहते हैं कि लाल योद्धा जली-झुलसी पत्थर की इमारतों को इस्तेमाल करना ज्यादा पसन्द करते, क्योंकि आक्रमण के दौरान नाजियों को रोशनी करने के लिए जलाने को कुछ भी नहीं मिल पाता। इनमें तरह-तरह के आकार की किलेबन्दियां की जातीं – जिनमें से कुछ की रक्षा जवानों का कोई एक छोटा दस्ता करता, तो कुछ की रक्षा एक पूरी बटालियन करती। किलेबन्दियों को इस प्रकार तैयार किया जाता कि उनसे चारों दिशाओं में गोलीबारी की जा सके और कई दिनों तक सम्पर्क-विच्छेद हो जाने के बाद भी लड़ाई जारी रखी जा सके।

लाल सैनिक खाइयां निर्मित करते तथा सीवरों का इस्तेमाल किलेबन्दियों को उनके इर्दगिर्द की इमारतों के साथ जोड़ने में करते। किलेबन्दियों के बीच से गुजरने की कोशिश करता हुआ दुश्मन चौतरफा गोलीबारी में फंस जाता। चुइकोव लिखते हैं: ‘‘किलेबन्दियों का एक ग्रुप, जिसका एक ही सामान्य फायरिंग नेटवर्क होता था, और चौतरफा रक्षण प्रदान करते हुए प्रतिरोध का एक केन्द्र भी होता था।’’

Stalingrad 2स्तालिनग्राद की युद्धरत महिलाएं

महिलाएं स्वेच्छा से सेना की मदद करतीं – वे प्रायः उन भारी नुकसानों की भरपाई कर देतीं जो युद्ध के आरम्भिक दौर में लाल सेना को उठाने पड़ रहे थे।

वासिली चुइकोव लिखते हैं: ‘‘यह कहने में कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि युद्ध में महिलाएं हर जगह पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर लड़ीं…। मोर्चे पर दौरा करने वाला कोई भी यह देख सकता था कि महिलाएं तोपरोधी इकाइयों में बन्दूकचियों का काम कर रही थीं, जर्मन हवाबाजों के विरुद्ध लड़ाई में विमानचालकों का काम कर रही थीं, हथियारबन्द नावों के कैप्टन के रूप में, वोल्गा जहाजी बेड़ों में काम करती हुईं, उदाहरण के तौर पर, नदी के बायें तट से दायें तट पर सामान नावों में लादकर आने-जाने को काम बेहद कठिन दशाओं में कर रहीं थीं।

‘‘स्तालिनग्राद के विमानभेदी दल के विमानभेदी तोपखाने और सर्चलाइट-दोनों ही जगहों पर तैनात बन्दूकचियों में ज्यादातर महिलाएं ही थीं…। जब उनके चारों तरफ बम फटने लगते और स्थिति यह हो जाती कि सिर्फ सही-सही निशाना साधकर फायर करना ही नहीं, बल्कि बन्दूक लिए खड़े रह पाना भी असम्भव लगने लगता, तब भी वे अपनी बन्दूकों से चिपकी रहतीं और फायरिंग करती रहतीं। आग और धुआं और फूटते बमों के बीच वे अन्त तक अपने स्थान पर ऐसे डटी रहतीं, मानो उन्हें यह मालूम ही न पड़ा रहा हो कि उनके इर्द-गिर्द की सभी चीजें विस्फोटित होकर हवा में उड़ रही हैं। यही वजह थी कि शहर पर (जर्मन वायुसेना के) हमलों से अपनी विमान-भेदी टुकड़ी की भारी क्षति उठाकर भी, वे उनपर जबर्दस्त गोलीबारी करतीं, जिससे हमेशा ही हमलावर विमान को भारी क्षति उठानी पड़ती। हमारी महिला विमानभेदी बन्दूकचियों ने जलते शहर के ऊपर दुश्मन के दर्जनों विमानों को मार गिराया।’’

सोवियत संघ के रात्रिकालीन उड़ान भरने वाले बमवर्षक विमानों के ज्यादातर मशहूर पायलटों में से कुछ तो महिलाएं ही थीं।

नाजियों पर घेरेबन्दी का कसता फन्दा

‘‘जर्मन बड़े मज़ाकिया जीव हैं, जो चमकदार लेदर बूट पहनकर स्तालिनग्राद जीतने चले आये हैं। उन्होंने समझा होगा कि यहाँ सैर-सपाटा करने को मिलेगा!’’

              -एक लाल सैनिक

19 नवम्बर को स्तालिनग्राद में हर किसी ने कहीं दूर तोप दगने की आवाज़ सुनी – महान सोवियत प्रत्याक्रमण चालू हो गया था। स्तालिनग्राद के बहादुर लाल योद्धा काफी लम्बे समय तक अपने मोर्चे पर डटे रहे थे ताकि उनके कामरेड इस पूरी जर्मन नाजी सेना पर अपनी घेरेबन्दी कस डालें।

जर्मन कमाण्डरों को पता था कि एक विशाल सोवियत सेना गठित हो रही थी-लेकिन उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि सोवियत जनता इतने बड़े पैमाने पर प्रत्याक्रमण संगठित कर लेगी। दस लाख से अधिक की संख्या में सोवियत फौजें अविश्वसनीय रफ्तार से स्तालिनग्राद के उत्तर और दक्षिण से आगे बढ़ीं। सिर्फ साढ़े चार दिनों में ही लाल सेना ने जर्मन की छठवीं सेना के सभी 3,30,000 सैनिकों को एक लौह शिकंजे में कस लिया। भाग निकालने की दो जर्मन कोशिशें नाकाम कर दी गयीं। शहर के अन्दर 31 जनवरी तक लड़ाई चलती रही, और अन्त में जर्मन जनरल फॉन पाउलस और उसके मुख्यालय को गिरफ्त में ले लिया गया।

यह इतिहास में एक महानतम विजय थी। स्तालिनग्राद की गलियों में लड़ने वाले योद्धाओं ने दुनिया को भौंचक्का कर दिया। यहाँ तक कि अमेरिकी शासक वर्ग के कट्टर साम्राज्यवादी जनरल डगलस मैकार्थर तक को कहना पड़ाः ‘‘जितने बड़े पैमाने पर और जिस शौर्य के साथ यह युद्ध लड़ा गया उससे जो सैनिक उपलब्धियां हासिल हुई हैं वे समूचे इतिहास में अप्रतिम हैं।’’

स्तालिनग्राद हिटलरवादी जर्मनी के अन्त की शुरुआत साबित हुआ। उसके बाद तो लाल सेना ने नाजी आक्रमणकारियों को सोवियत भूमि से निष्कासित करके बर्लिन तक खदेड़ दिया, जहां हिटलर और उसके शासन को नेस्तनाबूद कर दिया गया।

स्तालिनग्राद – दुनिया के भविष्य के लिए लड़ाई

जब 1941 में नाजियों ने सोवियत संघ पर आक्रमण किया तो पूँजीवादी जगत ने घोषणा कर दी कि साम्यवाद मर गया। लेकिन उन्होंने सोवियत समाजवाद की ताकत और अपने समाज की रक्षा करने वाले सोवियत जनगण की अकूत इच्छाशक्ति को कम करके आँका। स्तालिनग्राद के कंकड़-पत्थरों में आप इस सच्चाई का दर्शन कर सकते हैं कि जनगण हथियारों के जखीरे से लैस और तकनीकी रूप से उन्नत पूँजीवादी शत्रु को कैसे परास्त कर सकते हैं।

इस विजय की कुंजी कम्युनिस्ट पार्टी का नेतृत्व और दशकों तक चले क्रान्तिकारी वर्ग-संघर्ष के बाद तैयार हुए जनता के संगठन में थी। स्तालिन के आह्वान पर, हजारों कम्युनिस्ट फौज में भर्ती होकर मोर्चे पर जा पहुंचते। लड़ाई के हर मोर्चे पर, कम्युनिस्ट सबसे निडर और आत्म बलिदानी योद्धा के रूप में आगे बढ़ते जाते। जब लाल सेना को जर्मन कतारों में घुसपैठ करने के लिए स्पेशल स्काउट यूनिटों की आवश्यकता पड़ती तो वह कम्युनिस्ट युवा संगठन से ही तमाम भर्तियां कर लेती। गली-गली की लड़ाई की अफरा-तफरी के बीच, कम्युनिस्ट हर जगह राजनीतिक काम भी करते-जैसे वे युद्धरत जन समुदायों को यह समझने में मदद करते कि इस मारने और मरने में क्या उद्देश्य निहित था।

जहां जर्मन सैनिक निराशा और भय में डूब जाते, वहीं इसके विपरीत, लाल योद्धा साहसपूर्वक मौत का सामना करते और निडर होकर लड़ते, यहाँ तक कि उस हालत में भी, जब वे एक-एक करके कटने-मरने लगते और घिर जाते।

दुनिया के लोगों पर स्तालिनग्राद के याद्धाओं का भारी ऋण है: हिटलर पर उनकी विजय के लिए भी, और उनसे हमें विरासत में मिले क्रान्तिकारी शहरी युद्ध के सबकों के लिए भी।

    (समाप्त)

 

 

बिगुल, मई 2008

 


 

‘मज़दूर बिगुल’ की सदस्‍यता लें!

 

वार्षिक सदस्यता - 125 रुपये

पाँच वर्ष की सदस्यता - 625 रुपये

आजीवन सदस्यता - 3000 रुपये

   
ऑनलाइन भुगतान के अतिरिक्‍त आप सदस्‍यता राशि मनीआर्डर से भी भेज सकते हैं या सीधे बैंक खाते में जमा करा सकते हैं। मनीऑर्डर के लिए पताः मज़दूर बिगुल, द्वारा जनचेतना, डी-68, निरालानगर, लखनऊ-226020 बैंक खाते का विवरणः Mazdoor Bigul खाता संख्याः 0762002109003787, IFSC: PUNB0185400 पंजाब नेशनल बैंक, निशातगंज शाखा, लखनऊ

आर्थिक सहयोग भी करें!

 
प्रिय पाठको, आपको बताने की ज़रूरत नहीं है कि ‘मज़दूर बिगुल’ लगातार आर्थिक समस्या के बीच ही निकालना होता है और इसे जारी रखने के लिए हमें आपके सहयोग की ज़रूरत है। अगर आपको इस अख़बार का प्रकाशन ज़रूरी लगता है तो हम आपसे अपील करेंगे कि आप नीचे दिये गए बटन पर क्लिक करके सदस्‍यता के अतिरिक्‍त आर्थिक सहयोग भी करें।
   
 

Lenin 1बुर्जुआ अख़बार पूँजी की विशाल राशियों के दम पर चलते हैं। मज़दूरों के अख़बार ख़ुद मज़दूरों द्वारा इकट्ठा किये गये पैसे से चलते हैं।

मज़दूरों के महान नेता लेनिन

Related Images:

Comments

comments