लगातार बढ़ती मज़ूदरों की असुरक्षा

आनन्द सिंह

भारत जैसे देश में जहाँ 90 प्रतिशत से ज़्यादा मज़दूर अनौपचारिक क्षेत्र में काम करने को मजबूर हैं, मज़ूदरों का जीवन तमाम कि़स्मे की असुरक्षाओं से घिरा रहता है। वैकल्पिक रोज़गार की अनुपलब्धता, वेतन की कमी व अनियमितता, छँटनी का ख़तरा, कार्यस्थल पर सुरक्षा उपकरणों की कमी, अपर्याप्त स्वास्थ्य   सुविधाएँ, आवास की तंगी और सामाजिक असुरक्षा उनके जीवन के जोखिम को लगातार बढ़ाती रहती हैं। कार्यस्थल पर बदसलूकी, भेदभाव और महिलाओं के साथ छेड़छाड़ की घटनाएँ लगातार बढ़ती रही हैं। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में मज़दूरों की मुश्किल ज़ि‍न्दगी से वाकिफ़ कोई भी व्यक्ति जानता है कि मज़दूरों की बहुतायत निहायत ही असुरक्षित और यन्त्रणादायी परिस्थितियों में काम करने और रहने को मजबूर है। आये दिन मज़दूरों की सुरक्षा सम्बन्धी इन्तज़ाम न होने की वजह से देश के विभिन्न क्षेत्रों में कारख़ानों में भीषण दुर्घटनाएँ घटती रहती हैं। हाल ही में दो संस्थाओं की रिपोर्टें आयी हैं जो मज़दूरों की असुरक्षा और कार्यस्थल पर उनके साथ होने वाले अमानवीय बर्ताव की सच्चाई को आँकड़ों सहित पुष्ट करती हैं।

पहली रिपोर्ट अन्तरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) द्वारा निकाली गयी है। वर्ल्ड इम्लॉयमेण्ट एण्ड सोशल आउटलुक नामक इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2019 तक भारत में कुल कार्यबल के 77 प्रतिशत के रोज़गार की स्थिति असु‍रक्षित रहेगी। रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत के कुल 53.5 करोड़ श्रमिक कार्यबल में से 39.8 करोड़ लोगों के पास घटिया गुणवत्ता वाले काम रहेंगे। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि भारत में बेरोज़गारी की हालत बद से बदतर होने वाली है। ख़ासकर 15-24 वर्ष की आयु में बेरोज़गारी की दर में ज़्यादा वृद्धि की सम्भावना है। समूचे एशिया-प्रशान्त‍ क्षेत्र में पैदा होने वाली नौकरियों की गुणवत्ता का ज़ि‍क्र करते हुए रिपोर्ट बताती है कि ”क्षेत्र में पैदा होने वाली नौकरियों का बड़ा हिस्सा ख़राब गुणवत्ता वाला है। एशिया-प्रशान्त क्षेत्र में कुल मज़दूरों के लगभग आधे असुरिक्षत रोज़गार में लगे हैं, ऐसे पुरुष और स्त्री मज़दूरों की कुल संख्या 90 करोड़ पार कर गयी है। 2019 तक के प्रक्षेपण इंगित करते हैं कि दक्षिण एशिया में 72 फ़ीसदी, दक्षिण-पूर्व एशिया और प्रशान्त में 46 फ़ीसदी, पूर्वी एशिया में 31 फ़ीसदी लोगों के पास असुरक्षित रोज़गार रहेगा।” भारत में असुरक्षित रोज़गार का स्तर पूरी दुनिया के स्तर और दक्षिण एशिया के स्तर से भी कहीं ज़्यादा है। ये है उभरते हुए भारत की कड़वी सच्चाई!

आईएलओ की रिपोर्ट में भारत सहित एशिया के समूचे क्षेत्र में (पूर्वी एशिया को छोड़कर) रोज़गार की बढ़ती असुरक्षा के कारणों का ज़ि‍क्र करते हुए बताया गया है कि इस क्षेत्र में पूँजी और श्रमिकों का निम्न  मूल्य संवर्धन वाले सेक्टरों से अधिक मूल्य संवर्धन वाले सेक्टरों की ओर गमन बहुत धीमी गति से हो रहा है। भारत की बात करें तो ये इस देश के विकृत कि़स्म के पूँजीवादी विकास की ही तार्किक परिणति है। इस विकास का नतीजा यह हो रहा है कि मुठ्ठी भर धनपशुओं के पास अकूत सम्पत्ति का अम्बार खड़ा होता जा रहा है जबकि देश की अधिकांश आबादी नरक जैसे हालात में जीने को मजबूर है। इस गम्भीर परिस्थिति के बावजूद इस देश के हुक्मरान ‘मेक इन इण्डिया’, ‘स्किल इण्डिया’ आदि जुमले उछालते रहते हैं जिनको सु‍नकर अब उबकाई आने लगी है।

दूसरी रिपोर्टइण्डिया रिस्पांसबल बिज़नेस इण्डेक्सि’ (आईआरबीआई) की है जो यह दर्शाती है कि कर्मचारियों के कल्याण, सुरक्षा और अधिकारों को सुनिश्चित करने के तमाम दावों के बावजूद वास्तव में अधिकांश कम्पनियों द्वारा मज़दूरों के साथ बर्ताव में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है। आईआरबीआई बीएसई में सूचीबद्ध शीर्ष 100 कम्पनियों को सबको साथ में लेकर चलने वाले सप्लाई चेन, समुदाय की साझेदारी, सामुदायिक विकास, कर्मचारियों की गरिमा और मानवाधिकार एवं कार्यस्थल पर भेदभाव न करने के आधार पर रैंकिंग देता है। रिपोर्ट के अनुसार शीर्ष की 100 में से केवल 14 कम्पनियों ने न्यूनतम मज़दूरी देने की अपनी प्रतिबद्धता को पूरा किया है जबकि ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों को पीएफ़ और मेडिकल बीमा जैसी सुविधाएँ प्रदान करने के वायदे को सिर्फ़ 6 कम्पनियाँ पूरा कर रही हैं। अधिकांश कम्पनियों ने तो मज़दूर अधिकारों और श्रम सम्बन्धी मामलों की स्थिति से सम्बन्धित तथ्य  सार्वजनिक करने से इन्कार कर दिया। इसी तरह रिपोर्ट में यह इंगित किया गया है‍ कि अधिकांश कम्पनियों में महिलाओं की सुरक्षा और उनके साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के पुख्ता इन्तज़ाम ही नहीं है। विकलांग लोगों की ज़ि‍न्दगी आसान करने लिए भी अधिकांश कम्पनियों ने कोई ठोस क़दम नहीं उठाये हैं। इसी तरह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों के साथ होने वाले भेदभाव को रोकने के लिए भी अधिकांश कम्पनियों ने ठोस क़दम नहीं उठाये हैं।

जैसाकि उपरोक्त दो रिपोर्टों से स्पष्ट  है, भारत के मज़दूर वर्ग के जीवन व कार्य की परिस्थितियाँ इतनी सड़ान्ध भरी हो चुकी हैं कि उनकी बदबू को तमाम बुर्जुआ थिंकटैंक भी अपनी लेखनी के इत्र से दूर नहीं कर पा रहे हैं। ये बात दीगर है कि ये थिंकटैंक इन परिस्थितियों के लिए मुनाफ़े पर टिकी पूँजीवादी व्यवस्था  को जिृम्मेदार ठहराने की बजाय महज़ कुछ कम्पनियों को जि़म्मेेदार ठहराते हैं और व्यवस्था की आयु लम्बी करने के लिए कम्पनियों से गुहार लगाते हैं कि अपने लूटतन्त्र में थोड़ी मानवीयता दिखाओ अन्यथा मज़दूर इन अमानवीय हालात के ख़ि‍लाफ़ बग़ावत का बिगुल फूँक देंगे। लेकिन भीषण संकट से गुज़र रही पूँजीवादी व्यवस्था में कम्पनियाँ अपने मुनाफ़े की गिरती दर को रोकने के लिए मज़दूरों पर होने वाले ख़र्च में लगातार कटौती किये जा रही हैं। मज़दूरों की हालत पर घड़ि‍याली आँसू बहाने वाले बुर्जुआ थिंकटैंक हमें यह नहीं बताते कि इस अँधेरगर्दी भरी व्यवस्था में मुनाफ़े ही हवस मज़दूरों का ख़ून पीकर ही शान्त होती है। इस नंगी सच्चाई से मज़दूर वर्ग जितनी जल्दी अवगत हो जाये, उसके भविष्य के लिए उतना ही अच्छा है। मज़दूरों के कार्यस्थल और जीवन के हालात तो पूँजीवादी व्यवस्था  को ध्वस्त करके एक समाजवादी व्यवस्था में ही मानवीय हो सकते हैं, लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था के भीतर भी मज़दूरों को अपने काम की परिस्थितियों और जीवन के हालात में सुधार से जुड़ी ठोस माँगों के लिए तत्कालिक संघर्ष भी समय की माँग है।

मज़दूर बिगुल, मार्च 2018


 

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