तेल की लगातार बढ़ती क़ीमत : वैश्विक आर्थिक संकट और मोदी सरकार की पूँजीपरस्त नीतियों का नतीजा

अमित

मई के महीने में तेल की क़ीमत में लगातार 16 दिनों तक वृद्धि हुई, और नतीजतन पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमत अपने रिकॉर्ड स्तर पर पहुँच गयी और 2014 के बाद अपने सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया। दिल्ली में पेट्रोल 78 रुपये प्रति लीटर और डीज़ल 69 रुपये प्रति लीटर से ज़्यादा पहुँच गया। इस बढ़ोतरी को मोदी-परस्त मीडिया ने इस तरह दिखाया कि यह पूर्णतः वाजिब था और मोदी सरकार तेल की बढ़ती क़ीमतों के ज़रिये भी देश का ‘विकास’ कर रही है। परन्तु इस बात में सच्चाई नहीं है। निश्चित ही तेल की बढ़ती क़ीमतों के पीछे अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में जारी कशमकश है। अप्रैल 24 को ब्रेण्ट क्रूड, कच्चे तेल की कि़स्म, जो वैश्विक तेल क़ीमतों को निर्धारित करने का मापदण्ड है, की क़ीमत 75 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच गयी थी। यह 2014 के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच गया और कच्चे तेल की क़ीमतों के उछाल का दौर फिर से लौटने के संकेत दे रहा है। ब्रेण्ट क्रूड की मौजूदा प्रति बैरल क़ीमत में 10 महीने पहले की न्यूनतम क़ीमत से 30 डॉलर प्रति बैरल या 66 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कच्चे तेल की क़ीमत में हुई इस वृद्धि का कारण तेल की वैश्विक आपूर्ति में कमी है। इस आपूर्ति में कमी का कारण वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव रहा है। वैश्विक आर्थिक संकट के कारण साम्राज्यवादी देशों के तीखे होते अन्तरविरोध और आपसी सिरफुटव्वल की कई अभिव्यक्तियों में से एक तेल की क़ीमतों में हुई वृद्धि भी है। सऊदी अरब और रूस और दूसरे तेल उत्पादक देशों से बाज़ार में तेल की आपूर्ति की कमी और वेनेज़ुएला द्वारा कच्चे तेल की आपूर्ति में कमी और ट्रम्प का ईरान को परमाणु समझौता रद्द कर फिर से प्रतिबन्ध लगाने की धमकी देना, अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में हुई वृद्धि का मुख्य कारण रहा है। इन कारणों ने भारत में तेल की क़ीमतों पर कितना असर डाला है, यह देखने के लिए भारत की तेल सम्बन्धी नीतियों पर नज़र डालना होगा। भारत एक प्रमुख तेल आयत करने वाला देश है, लेकीन साथ ही पेट्रोल और डीज़ल पर सबसे ज़्यादा टैक्स लगाने वाले देशों में से भी एक है। ख़ासकर पिछले 4 साल से मोदी सरकार के ‘अच्छे दिन’ वाले शासन के दौरान पेट्रोल और डीज़ल पर एक्साइज़ और कस्टम ड्यूटी में भारी वृद्धि हुई है, जिसका नतीजा यह रहा है कि 2014 में अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में भारी कमी होने पर भी भारत की जनता को उसका लाभ नहीं मिला। टैक्स में हुई इस वृद्धि को मोदी और इनके अन्धभक्त बहुत कुतर्क के साथ सही बता रहे हैं। उनका कहना है कि इस कर-वृद्धि का इस्तेमाल आधारभूत अधिरचना के विकास और जनता के कल्याण मसलन शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार आदि के लिए किया जा रहा है। यह सरासर झूठ है। इस झूठ का भण्डाफोड़ विस्तार से लेख में आगे करेंगे। इसके अलावा भक्तों का एक प्रचार यह भी रहा है कि यूपीए सरकार ईरान पर 43,000 करोड़ का क़र्ज़ा छोड़कर गयी है और महान ‘मोदी जी’ को ये क़र्ज़ चुकाना पड़ रहा है। इस वजह से ही देश के लिए पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमत में वृद्धि हुई है। इस झूठ और कुतर्क का भी हम आगे पर्दाफ़ाश करेंगे। इसके अलावा सब्सिडी और तेल कम्पनी के घाटे का मिथक जानबूझकर फैलाया जाता है और हमें यह बताया जाता है कि कैसे सरकार और पूँजीपति आम ग़रीब जनता पर अहसान करते हैं और घाटा उठाकर सस्ते में पेट्रोल, डीज़ल और रसोई गैस देते हैं। इस भ्रम का भी पर्दाफ़ाश हम आगे करेंगे।

अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में उछाल और अस्थिर अन्तरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक संकट : इतिहास और कारण

इस साल 24 अप्रैल की सुबह, ब्रेण्ट क्रूड की क़ीमत 75 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुँच गयी जो 2014 के बाद सबसे ऊँचे स्तर पर है और तेल की ऊँची क़ीमतों के युग की वापसी के संकेत दे रहा है। 2014 के अन्तिम तिहाई में कच्चे तेल की क़ीमत में अचानक से तेज़ गिरावट आयी थी। एक महीने के भीतर कच्चे तेल की क़ीमत 110 डॉलर प्रति लीटर से 50 डॉलर प्रति लीटर से भी कम पर पहुँच गयी। अमेरिकी शेल उद्योग ने तेल का उत्पादन बहुत तेज़ कर दिया और तेल निकालने की तकनीक में सुधार की वजह से कच्चे तेल के लागत मूल्य में कमी आ गयी। नतीजतन, सऊदी अरब और दूसरे ओपेक देशों को तेल बाज़ार की मूल्य प्रतियोगिता में टिके रहने और अपने बाज़ार को बनाये रखने के लिए तेल की आपूर्ति और तेज़ कर दी। इस कारण बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में ज़बरदस्त गिरावट देखने को मिली।

सऊदी अरब की वित्त व्यवस्था पर इस का गहरा असर पड़ा। सऊदी अरब एक प्रमुख तेल उत्पादक और निर्यातक है और सरकार की राजस्व की निर्भरता तेल के व्यापार पर टिकी है। तेल की क़ीमत कम होने की वजह से जनता को दी जाने वाली सुविधाओं के लिए राजस्व के एक हिस्से के रूप में सब्सिडी क़ायम रखना मुश्किल हो रहा था। साथ ही सऊदी अरब पर राष्ट्रीय ऋण बढ़ता जा रहा था। इसलिए सरकार ने सरकारी कम्पनी सऊदी अरामको के 5 प्रतिशत हिस्से को शेयर बाज़ार में सार्वजानिक विनिवेश का निर्णय लिया। सऊदी अरामको सऊदी अरब के बजट का 80 प्रतिशत इस कम्पनी के राजस्व से ही मिलता है। इस विनिवेश को अधिक ख़रीददार का मिलना या यूँ कहें कि इसके शेयर में उछाल तेल की क़ीमतों की वृद्धि पर निर्भर करता है। फ़ाइनेंशियल टाइम्स के एक आकलन के अनुसार – अगर कच्चे तेल की क़ीमत 64 डॉलर प्रति बैरल से बढ़कर 93 डॉलर प्रति बैरल तक पहुँच जाती है तो सऊदी अरामको का मूल्यन 1.1 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 1.5 ट्रिलियन डॉलर हो जायेगा। यानी इस संकट से उबरने के लिए सऊदी अरब को तेल की क़ीमत में बढ़ोतरी की ज़रूरत थी, जिसके लिए तेल की आपूर्ति को कम करना ज़रूरी था। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सऊदी अरब ने नवम्बर 2016 को रूस के साथ एक गँठजोड़ किया। रूस भी एक बड़ा तेल उत्पादक और निर्यातक देश है। दिसम्बर 2016 को समझौता हुआ कि वे 5,58,000 बैरल प्रति दिन तेल की आपूर्ति कम करेंगे, इसमें से रूस 300,000 बैरल प्रति दिन के हिसाब से कम करेगा। इसके अलावा दूसरे ओपेक देशों ने भी 1.2 मिलियन बैरल प्रतिदिन की तेल की आपूर्ति कम की है।

तेल के क़ीमत में वृद्धि का दूसरा बड़ा कारण वेनेज़ुएला का राजनीतिक और सामाजिक संकट तथा ट्रम्प द्वारा लगाया गया प्रतिबन्ध है। 2014 के शेल उद्योग परिघटना की वजह से तेल की क़ीमत में भारी गिरावट आयी। तेल के कारोबार पर टिकी हुई वेनेज़ुएला की अर्थव्यवस्था चरमराने लगी जिस कारण कल्याणकारी नीतियों को जारी रखना मुश्किल हो गया व मादुरो की लोकप्रियता कम होने लगी। इस वजह से वेनेज़ुएला अपने तेल निर्यात में कमी कर उसकी क़ीमत में फिर से वृद्धि करने की कोशिश की। इसी बीच, हाल में हुए चुनाव में मादुरो फिर से जीत गया पर ट्रम्प प्रशासन ने चुनाव को धाँधली से जीता हुआ और अवैध क़रार दिया और वेनेज़ुएला द्वारा प्रायोजित तेल आधारित क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबन्ध लगा दिया। नतीजतन वेनेज़ुएला के तेल निर्यात में कमी आ गयी है। दो साल में तेल निर्यात 2.2 मिलियन बैरल प्रति दिन से घटकर इस साल फ़रवरी तक 1.54 मिलियन डॉलर प्रति दिन तक आ गया। यह भी तेल की क़ीमत के उछाल का एक बड़ा कारण बना।

तेल की क़ीमत में उछाल का तीसरा बड़ा कारण ट्रम्प द्वारा ईरान से परमाणु डील को रद्द कर उस पर फिर से प्रतिबन्ध लगा देना है, इससे ईरान द्वारा किये जाने वाले तेल निर्यात में कमी आयी है। यह मध्यपूर्व में रूस-र्इरान-सीरिया-हिजबुल्ला की मजबूत होती अवस्थिति के खि़लाफ़ अमरीका द्वारा उठाया गया क़दम है। कुल मिलाकर, तेल एक राजनीतिक माल है जो अन्तरराष्ट्रीय साम्राज्यवादी सरफुटव्वल प्रतियोगिता का एक मैदान बना रहता है। और जब तक पूँजीवाद और साम्राज्यवाद रहेगा, ऐसा होने की सम्भावना बनी रहेगी।

भारत में मोदीजी के कारनामे और तेल का खेल

2014 में जब मोदी चुनाव जीत कर आया, ठीक उसी समय शेल परिघटना घटित होती है और अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल की क़ीमत में भारी गिरावट आती है। तेल की क़ीमत 110 डॉलर प्रति बैरल से घटकर 45 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास आ जाती है। नतीजतन घरेलू बाज़ार में भी पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतों में कमी आती है, लेकिन यह कमी कच्चे तेल की क़ीमत में कमी के अनुपात से बेहद कम होती है। इस समय ही एक चुनावी सभा को सम्बोधित करते हुए झूठ-सम्राट मोदी ने कहा – “भाइयो बहनो! पेट्रोल के दाम कम हुए कि नहीं हुए! डीज़ल के दाम कम हुए कि नहीं हुए! आपका फ़ायदा हुआ कि नहीं हुआ! अगर मेरे नसीब से देश की जनता को फ़ायदा होता है तो इससे अच्छा नसीब की बात और क्या होगी”। अब क्या हमें मोदीजी से यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि “अब तो मोदी जी आपकी ही बदनसीबी से पेट्रोल, डीज़ल के दाम बढ़ रहे हैं! अगर अब आपकी बदनसीबी जनता का नुक़सान कर रही है तो इस बदनसीबी से पीछा छुड़ा लेना चाहिए न!” ख़ैर मोदीजी इस मुद्दे पर मौन हैं। अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में क़ीमत कम होने के बावजूद जनता को उतनी राहत इसलिए नहीं मिली, क्योंकि मोदी सरकार ने एक्साइज़ और कस्टम ड्यूटी या यूँ कहें कि जनता से पेट्रोलियम उत्पाद पर टैक्स बहुत बढ़ा दिया है। मोदी सरकार के आने के समय पेट्रोल और डीज़ल पर एक्साइज़ ड्यूटी 9.48 रुपया और 3.56 रुपया क्रमशः थी, जोकि आज बढ़कर 21.48 रुपया और 17.33 रुपया हो गयी है। भारत उन देशों में से एक है, जहाँ पेट्रोल और डीज़ल पर टैक्स दुनिया में सबसे ज़्यादा है। जनता को महँगा तेल बेचकर वसूले गये टैक्स का इस्तेमाल पूँजीपतियों को टैक्स माफ़ी करने में किया जा रहा है। देखते हैं कि भारत में पड़ोसी देशों के मुकाबले पेट्रोल-डीज़ल की क़ीमत कितनी ज़्यादा है :

उपरोक्त तालिका से आप देख सकते हैं कि सापेक्षत: ग़रीब पड़ोसी देशों में पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें भारत के मुकाबले कम हैं। इसमें एक बात और जोड़ देना ज़रूरी है कि श्रीलंका भारत से पेट्रोल और डीज़ल आयात करता है, फिर भी वहाँ पर क़ीमत भारत से कम है। आप इसी बात से अन्दाज़ा लगा सकते हैं कि मोदी सरकार जनता से कितना टैक्स वसूल रही है।

अगर हम अमीर देशों से तुलना करें तो हम पायेंगे कि पेट्रोल, डीज़ल की क़ीमतें और प्रति व्यक्ति आय का अनुपात भारत में वहाँ से 40 गुने से अधिक है। मतलब भारत के लोग अपनी आय की तुलना में पेट्रोल-डीज़ल पर कई गुना ज़्यादा कर देते हैं।

मोदी और भक्तों का झूठ कि पेट्रोल और डीज़ल से अर्जित राजस्व मूलभुत संरचना के विकास और जन कल्याण कार्यों में लगाया जा रहा है!

मोदी और इसके भक्तों के मुँह से ये अक्सर सुनने को मिलता है कि पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें देशहित में बढ़ायी जा रही हैं और आप इस वृद्धि की शिकायत न करें और देश के लिए थोड़ी कुर्बानी करें। ये पैसा वापस देश के “विकास” के लिए ही ख़र्च होता है, मूलभूत संरचना का निर्माण हो रहा है जोकि मोदीजी से पहले कभी नहीं हुआ! 1200 वर्षो की गुलामी के बाद अब पहली बार पिछले 4 वर्षो से देश फिर से विश्व विजयी और जगत गुरु बनने की ओर अग्रसर है। यहाँ पहली बार गाँव में बिजली पहुँच रही है, सड़क बन रही है, पुल का निर्माण हो रहा है, आपके बच्चों के लिए शिक्षा का इन्तज़ाम किया जा रहा है, स्वास्थ्य पर ख़र्च किया जा रहा है। भक्त नाक भसोड़ते हुए कहते हैं कि इतना पैसा क्या राहुल गाँधी के नानीघर इटली (वैसे भक्तों को शायद पता नहीं है कि इटली मुसोलिनी का यानी इनके आकाओं का भी नानीघर रहा है!) से आयेगा! ऊपर से कांग्रेस की पिछली सरकार में ईरान का 43,000 करोड़ का क़र्ज़ हमारे ऊपर थोप दिया है और देश का नाम पूरी दुनिया में खराब कर दिया। आखि़र महान मोदीजी को ये क़र्ज़ चुकाना पड़ रहा है, इसके लिए थोडा सब्र भी नहीं कर सकते! आइए साथियो, हम एक-एक कर मोदी के कुकर्म और भक्तों के कुतर्क की पोल खोलते हैं। आइए देखते हैं कि कैसे गोएबेल्स की ये औलादें झूठ और फ़रेब के प्रचार में अपने बाप से भी कई गुना आगे निकल गये हैं!

आइए सबसे पहले हम देखते हैं कि केन्द्र सरकार के राजस्व में पेट्रोलियम सेक्टर से पिछले 4 वर्षों में कितनी कमाई हुई है। पेट्रोलियम सेक्टर से मोदी कार्यकाल में 5 लाख करोड़ की अतिरिक्त कमाई हुई है, मतलब अगर मोदीकाल के 4 वर्षों के पेट्रोलियम सेक्टर से प्राप्त राजस्व को जोड़ दें तो यह कमाई पिछले 4 वर्षों के कुल प्राप्त राजस्व से 5 लाख करोड़ अधिक है। आइए हम इसे निम्न अंक तालिका से समझने का प्रयास करते हैं।

 

पेट्रोलियम सेक्टर से कस्टम और एक्साइज़ ड्यूटी की वसूली

 

वित्त वर्ष            कुल राशि (करोड़ रुपये में)

2011-12          95,229

2012-13          98,603

2013-14          1,o4,163

2014-15          1,22,926

2015-16          2,13,995

2016-17          3,00,295

2017-18          2,30,807                                     (अप्रैल-दिसम्बर)                  

(स्रोत – पेट्रोलियम मन्त्रालय)

 

हम साफ़तौर पर देख सकते हैं कि पेट्रोलियम सेक्टर से मोदी काल में सरकार की आमदनी में पहले के मुकाबले 270-300 प्रतिशत की भारी वृद्धि हुई है। क्या इतना सारा पैसा सरकार में मूलभूत संरचना के विकास में लगाया है ? आइए इसकी भी हम जाँच करते हैं। हम निम्न तालिका में देखेंगे कि मूलभूत संरचना के निर्माण में ख़र्च की वृद्धि की दर कितनी रही है। क्या इस दर में वृद्धि भी उसी हिसाब से हुई है, जिस हिसाब से सरकार ने पेट्रोलियम से टैक्स की वसूली की है या फिर कुछ गोलमाल है!

केन्द्र सरकार द्वारा मूलभूत पूँजी में ख़र्च की प्रवृत्ति

वित्तीय वर्ष          ख़र्च (करोड़ रुपये में)                                          वृद्धि प्रतिशत

2015-16    2,37,718                            2016-17 2,61,416                9.9

2017-18    2,73,445            4.6

2018-19    2,91,944(BE*)  6.7

औसत वृद्धि  -7.06%

(स्रोत – केन्द्रीय बजट,
*Budget Estimate)

साफ़़ है कि मूलभूत संरचना में ख़र्च करने की बात सफ़ेद झूठ है। एक बात और ग़ौर करने वाली है कि सरकार ने 2017-18 के बजट में आवण्टित पैसों में से बाद में संशोधित बजट में 36,556 करोड़ रुपये की कटौती कर दी। यहाँ एक बात पर और चर्चा करना बेहद ज़रूरी है कि, हर साल जो बजट में आवण्टित राशि अलग-अलग मद में दी जाती है, सरकार बाद में उसमें परिवर्तन कर संशोधित बजट कर किसी और मद में हस्तान्तरित कर सकती है। ऊपर की तालिका से साफ़ तौर पर पता चलता है कि मोदीकाल में आधारभूत पूँजी-निवेश में सिर्फ़़ 7 प्रतिशत सालाना के हिसाब से मामूली वृद्धि हुई है, जोकि बेहद सामान्य है जो पहले से भी होती रही है। मसलन साफ़ है कि पेट्रोल से कमाई गयी राशि का इस्तेमाल आधारभूत पूँजी निर्माण में नहीं हुआ, बल्कि कहीं और हुआ है। इस झूठ के पुलिन्दे के कफ़न में आखि़री कील ठोकने के लिए ये तर्क भी बेहद उचित है कि अगर सड़क निर्माण के लिए पेट्रोलियम से अधिक टैक्स वसूले जा रहे हैं तो टोल टैक्स और रोड टैक्स किसलिए वसूला जाता है?

ईरान को मोदी द्वारा 43 हज़ार करोड़ रुपये का पुराना क़र्ज़ लौटाने का भ्रामक प्रचार

भक्तों का एक और झूठ बहुत प्रचलित हो रहा है कि पिछली सरकार ने ईरान से 43,000 करोड़ का क़र्ज़ नहीं चुकाया था इसलिए पेट्रोल और डीज़ल की क़ीमतें बढ़ रही हैं। आइए इस झूठ का भी पर्दाफ़ाश करते हैं। 2011 में अमेरिका और नाटो ने ईरान पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, क्योंकि ईरान 2006 से ही अपने लिए परमाणु हथियार बना रहा था। ईरान भारत को 4,00,000 बैरल प्रतिदिन तेल भेजता था, जो घटकर 1,00,000 बैरल प्रतिदिन पर आ गया। भारत ईरान से ख़रीदे गये तेल का 55 प्रतिशत हिस्सा तुर्की के हल्क बैंक के ज़रिये भुगतान करता था। और बाक़ी की बची 45 प्रतिशत रक़म भारत यूको बैंक के ज़रिये रुपये में ईरान को देता था। 2013 में अमेरिका ने ईरान पर और भी प्रतिबन्ध लगा दिये, जिसकी वजह से ईरान को भुगतान हल्क बैंक के ज़रिये नहीं हो पा रहा था। नतीजा यह हुआ कि भारत पर ईरान का कुल 6.4 बिलियन डॉलर बकाया हो गया। इस बकाये में तेल कम्पनी मंगलोर रीफ़ाइनरी एण्ड पेट्रोकेमिकल लिमिटेड को 500 मिलियन डॉलर, निजी कम्पनी एस्सार आॅयल को 500 मिलियन डॉलर और इण्डियन आॅयल कारपोरेशन को क़रीब 250 मिलियन डॉलर देने थे। इसके अलावा हिन्दुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन को 642 करोड़ रुपये  और एचपीसीएल मित्तल एनर्जी को 200 करोड़ और इनके अलावा दूसरी कम्पनियों पर भी ईरान का बकाया था। ये प्रतिबन्ध 14 जुलाई 2015 तक जारी रहे। इसके बाद ईरान से कुछ प्रतिबन्ध हटा लिये गये, लेकिन हल्क बैंक के ज़रिये पेमेण्ट पर रोक बरक़रार रही। इस दौरान ईरान ने प्रतिबन्ध हटने के बाद से नियमों में बदलाव कर दिया। पहले तो ईरान भारत को दिये जाने वाले तेल पर आधा ही ट्रांसपोर्टेशन चार्ज लेता था, लेकिन अब पूरा किराया लेना शुरू कर दिया। इस तरह हम देख सकते हैं कि ईरान का कोई क़र्ज़ नहीं था, सिर्फ़ पेमेण्ट के चैनल बन्द हो गये थे, इसलिए उसे भुगतान नहीं हो पा रहा था, जो पेट्रोल डीज़ल आम जनता ख़रीद चुकी थी, उसका पैसा तो तेल कम्पनियों के पास जमा था, बस वो ईरान को दे नहीं पा रहे थे। इसमें क़र्ज़ वाली कोई बात नहीं है जो ये झूठे भक्तगण फैला रहे थे।

यानी कुल मिलकर बात यह है कि मोदी सरकार तेल की अन्तरराष्ट्रीय बाज़ार में घटती-बढ़ती क़ीमतों से इतर हमें बेइन्तहा लूट रहे हैं और इस लूट को वैध क़रार देने के लिए मोदी का गोदी मीडिया, भाजपा का आईटी सेल और संघी जमकर झूठ का कीचड़ फैला रहे हैं। परन्तु सच यह है कि संघी सरकार कॉरपोरेट घरानों के तलवे चाट रही है और देश को लूट और बर्बाद कर इन्हें आबाद कर रही है। इस लूटतन्त्र और झूठतन्त्र से सत्यापित करने के प्रयास को हमें बेनकाब करते रहना होगा।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2018


 

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