विकराल बेरोज़गारी : ज़ि‍म्मेदार कौन? बढ़ती आबादी या पूँजीवादी व्यवस्था?

-अमित

पिछले 15 अगस्त को देश के 72वें स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने एक बार फिर से दहाड़ते हुए लम्बा-चौड़ा भाषण दिया और देश की “अल्पज्ञानी” जनता को ज्ञान के नये-नये पाठ पढ़ाये! इस बार माननीय प्रधानमंत्री जी ने ‘भारी जनसंख्या विस्फोट’ को लेकर विशेष चिन्ता भी ज़ाहिर की और उन्होंने जनता को ही इसके लिए ज़ि‍म्मेदार ठहराया। इस अल्पज्ञानी जनता से उन्होंने कहा कि आपकी ग़रीबी, बेरोज़गारी के लिए आप ही ज़ि‍म्मेदार हैं, इसके लिए हमारे प्रिय पूँजीपति मित्रों को दोष न दें! वे बेचारे तो आपको ग़रीबी से निजात दिलाने के लिए हर सम्भव कोशिश कर रहे हैं, लेकिन आप तो दिन पर दिन बच्चे पैदा करने में व्यस्त रहते हैं। बेचारे पूँजीपति कब तक मेहनत कर आपकी ग़रीबी और बेरोज़गारी दूर करते रहेंगे? इसलिए आप अपने गिरेबान में झाँकिए न कि उनको दोष दीजिए बल्कि उनका एहसान मानिये और उनकी मेहनत की इ्‍ज़्ज़त करना सीखिए!

सर्वहारा वर्ग के महान शिक्षक कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले कहा था कि शासक वर्गों के विचार ही शासक विचार होते हैं। यानी कि शासक वर्ग जनता के बीच अपने विचारों का वर्चस्व क़ायम करता है। वह सिर्फ़ हथियारों और डर के बल पर अपनी लूट को क़ायम नहीं रखता है, बल्कि जनता के दिमाग़ पर क़ब्ज़ा करके अपने शोषण को वैधता प्रदान करता है। अपने हितों को जनता के हितों की तरह पेश करता है और अपने कुकर्मों की ज़ि‍म्मेदारी बड़ी होशियारी से जनता के ऊपर ही थोप देता है। जनता उन्हीं विचारों को सहज बोध की तरह स्वीकार कर लेती है क्योंकि शासक वर्ग टीवी, अख़बार, इण्टरनेट आदि प्रचार माध्यमों, अपने शिक्षण संस्थानों, समाज में चलने वाले मुहावरों, कहावतों, धार्मिक संस्थानों के ज़रिये अपने पक्ष में जनता की सहमति बनवाता है।

‘आबादी की समस्या’ के बारे में भी जनता के बीच ज़बर्दस्त भ्रम का प्रचार-प्रसार किया गया है। जब भी लोगों से बेरोज़गारी, ग़रीबी, भुखमरी आदि समस्याओं पर बात की जाती है तो जनता की तरफ़ से ही यह बात आती है कि सरकार बेचारी क्या करेगी, देश की आबादी ही 130 करोड़ से ज़्यादा हो गयी है, ऐसे में कहाँ सबको रोज़गार, रोटी, शिक्षा आदि दे पाना सम्भव है? संसाधन तो सीमित हैं, उत्पादन की गति 1,2,3,4… के हिसाब से बढ़ती है जबकि जनसंख्या तो 1,2,4,8… के हिसाब से बढ़ती है। ऐसे में ग़रीबी, बेरोज़गारी तो रहेगी ही! लोग ख़ुद ही इसके लिए ज़ि‍म्मेदार हैं!

तो आइए, हम इस बात की जाँच पड़ताल करते हैं कि क्या वास्तव में ‘जनसंख्या विस्फोट’ हो रहा है, जैसाकि हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी हमें चेतावनी दे रहे हैं? बेइन्तहा बेरोज़गारी की ज़ि‍म्मेदार क्या वास्तव में बढ़ती जनसंख्या है? क्या वास्तव में संसाधनों की कोई कमी है? क्या सामाजिक उत्पादन की रफ़्तार जनसंख्या वृद्धि की रफ़्तार से धीमी है? बेरोज़गारी की समस्या की ज़ि‍म्मेदार मेहनत की लूट पर टिकी यह पूँजीवादी व्यवस्था है या बढ़ती आबादी?

पूँजीवादी व्यवस्था में उत्पादन का लक्ष्य निजी पूँजीपतियों के लिए अधिकतम सम्भव मुनाफ़ा कमाना होता है। यहाँ उत्पादन का लक्ष्य समाज में रह रहे लोगों की ज़रूरतों को पूरा करना हरगिज़ नहीं होता है। पूँजीवादी समाज में पूँजीपति वर्ग के बीच आपस में गलाकाटू प्रतियोगिता होती है। और इस प्रतियोगिता का मैदान होता है पूँजीवादी बाज़ार, जहाँ पूँजीपति बाज़ार में टिके रहने के लिए प्रति इकाई अपने माल की क़ीमत दूसरे पूँजीपति के मुक़ाबले कम रखने की कोशिश करता है। प्रति इकाई अपने माल की क़ीमत कम रखने के लिए प्रति इकाई उत्पादन की लागत भी कम से कम रखने की ज़रूरत होती है। पूँजीपति उत्पादन के लिए एक तरफ़ मशीनों, कच्चे मालों, ईंधन आदि में निवेश करता है दूसरी तरफ़ मज़दूरों को काम पर रखता है और अपनी पूँजी का एक हिस्सा मज़दूरी में निवेश करता है। मशीनों, कच्चे माल, ईंधन, सहायक माल आदि पर निवेश की गयी पूँजी के हिस्से को स्थिर पूँजी कहते हैं, जबकि मज़दूरी पर निवेश की गयी पूँजी को परिवर्तनशील पूँजी कहते हैं। स्थिर पूँजी अपने मूल्य को पक्के उत्पाद (अंतिम उत्पाद जिसे वह पूँजीपति बाज़ार में बेचता है) में बिना बढ़े ज्यों का त्यों हस्तान्तरित कर देती है जबकि परिवर्तनशील पूँजी अपने मूल्य से ज़्यादा मूल्य अन्ति‍म उत्पाद में हस्तान्तरित करती है। यही अतिरिक्त मूल्य पूँजीपतियों के मुनाफ़े का स्त्रोत होता है। स्थिर पूँजी और परिवर्तनशील पूँजी के इस अनुपात को हम पूँजी का आवयविक संघटन कहते हैं। मशीनों, कच्चे माल आदि (यानी उत्पादन के साधन) की मात्रा का मज़दूरों की संख्या के अनुपात को पूँजी का तकनीकी संघटन कहते हैं।

प्रति इकाई अपने माल की क़ीमत कम रखने के लिए एक तरफ़ तो पूँजीपति आधुनिक से आधुनिक मशीनें लगाता है, जो कम समय में अधिक से अधिक कच्चे माल को कम से कम मज़दूरों की सहायता से पक्के माल में परिवर्तित कर देती हैं। यानी उत्पादन का स्तर विस्तारित होता है और बड़े पैमाने पर होता है। कुल मिलाकर कहा जाये तो मज़दूरों की उत्पादकता बढ़ जाती है। इसका मतलब यह हुआ कि जो काम पहले अधिक मज़दूर मिल कर करते थे वही काम करने के लिए अब कम मज़दूरों की आवश्यकता होती है। मतलब अब पूँजीपति परिवर्तनशील पूँजी में निवेश को स्थिर पूँजी पर निवेश के मुक़ाबले कम कर देता है। यानी पूँजी के आवयविक संघटन में वृद्धि होती है। पूँजी के आवयविक संघटन में वृद्धि के साथ-साथ प्रति मशीन, कच्चे माल आदि (उत्पादन के साधनों) पर मज़दूरों की ज़रूरत कम हो जाती है यानी पूँजी के तकनीकी संघटन में भी परिवर्तन होता है। इस तरह हम देख सकते हैं कि पूँजीवादी प्रतियोगिता की वजह से उत्पादन का स्तर ऊँचा होता जाता है। उत्पादन बड़े पैमाने पर होता है, नयी-नयी आधुनिक मशीनों की मदद से उत्पादन की गति तेज़ हो जाती है, मज़दूरों की उत्पादकता में बेइन्तहा वृद्धि हो जाती है, समाज में वस्तुओं की उपलब्धता पहले के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा होती है लेकिन अब उत्पादन के लिए पहले से कम मज़दूरों की ज़रूरत होती है। यानी अब सापेक्षिक तौर पर अतिरिक्त मज़दूर आबादी पैदा होती है जो बेरोज़गारों और अर्द्ध-बेरोज़गारों की फ़ौज में शामिल हो जाती है। दरअसल पूँजीवादी समाज में दिख रही अतिरिक्त आबादी की वजह यही है। ज़्यादा मुनाफ़े और गलाकाटू प्रतियोगिता पर टिकी इस पूँजीवादी व्यवस्था की अराजक गति की वजह से बेरोज़गारी पैदा होती है, सापेक्षिक तौर पर अतिरिक्त आबादी दिखाई देती है। और इस बेरोज़गारी की वजह से मज़दूरों और पूँजीपतियों के बीच की प्रतियोगिता में पूँजीपति का हाथ ऊँचा रहता है और वह रोज़गारशुदा मज़दूरों को अपनी मनमानी दर से मज़दूरी देता है क्योंकि बाहर बेरोज़गारों की फ़ौज खड़ी रहती है! इसलिए समाज में सापेक्षिक तौर पर ग़रीबी बढ़ती जाती है।

बड़े पैमाने के उत्पादन और मशीनीकरण में तेज़ी से वृद्धि की वजह से छोटे पूँजीपति वर्ग का एक हिस्सा भी बाज़ार में पूँजीवादी प्रतियोगिता में पिछड़ जाता है और बर्बादी के कगार पर पहुँच जाता है। उसके एक हिस्से का भी सर्वहाराकरण होता है और मज़दूरों की फ़ौज में वह भी शामिल हो जाता है। सापेक्षिक रूप से अतिरिक्त आबादी की वृद्धि में इनका भी योगदान होता है। दूसरी तरफ़ अत्याधुनिक और स्वचालित मशीनों के इस्तेमाल से उत्पादन की कार्रवाई बेहद आसान हो जाती है, अब इन्सानों की कुशलता की ज़रूरत पहले से कम रह जाती है, और इसी प्रक्रिया में कुशल और प्रशिक्षित सफ़ेद कॉलर मज़दूरों और मध्यम वर्ग का एक हिस्सा भी बेरोज़गारों की फ़ौज में शामिल हो जाता है। आज के समय में ऑटोमोबाइल और आई. टी. सेक्टर में बढ़ रही बेरोज़गारी इस बात की सबसे बेहतरीन मिसाल है।

ऊपर पेश किये गये विश्लेषण के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि बेरोज़गारी और ग़रीबी की वजह कहीं से भी बढ़ती आबादी नहीं है, जैसाकि हमारे माननीय प्रधानमंत्री हमें चेतावनीभरा ज्ञान देते हैं, बल्कि ज़्यादा और गलाकाटू प्रतियोगिता पर टिकी पूँजी की अराजक गति है। जोकि एक तरह उत्पादन के स्तर को बेइन्तहा रूप से बढ़ाती है, समाज में सम्पत्ति की वृद्धि होती है, उत्पादन के नये-नये क्षेत्रों का विस्तार होता है, इन्सान के जीवन को आसान बनाने के साधनों का विस्तार होता है। लेकिन इसके बावजूद बेरोज़गारी बढ़ती जाती है। यानी पूँजीवादी समाज में बेरोज़गारी और ग़रीबी संसाधनों और संपत्ति की कमी की वजह से नहीं बल्कि इसकी अधिकता की वजह से होती है। आइए, अब हम आँकड़ों से भारत में हुई आबादी की वृद्धि और संसाधनों की वृद्धि का तुलनात्मक अध्ययन करते हैं।

आबादी की वृद्धि और संसाधनों और उत्पादन की वृद्धि का तुलनात्मक वर्णन

सबसे पहले हम पिछले 4 दशक के दौरान हुई भारत की आबादी की वृद्धि दर की चर्चा करेंगे। निरपेक्ष रूप से भारत की आबादी 1971 के दशक से 2011 में दो गुने से ज़्यादा गति से बढ़ी है लेकिन आबादी की वृद्धि दर तब से लगातार घटती रही है। तालिका-1 में हम ऐसा देख सकते हैं।

अगर हम प्रतिवर्ष आबादी की वृद्धि दर देखें तो पायेंगे कि यह 1982 में 2.35 प्रतिशत प्रति वर्ष से लगातार घटकर 2015 में 1.17 प्रतिशत हो गयी है और 2022 में इसके 1 प्रतिशत प्रति वर्ष से नीचे जाने की उम्मीद है और 2060 में इसके शून्य प्रतिशत प्रति वर्ष से भी नीचे जाने की सम्भावना है, यानी कि उस समय आबादी बढ़ने की बजाय निरपेक्ष रूप से घटनी शुरू हो जायेगी। इन आँकड़ों से हम साफ़ तौर पर देख सकते हैं कि फ़ासीवादी मोदी की हर गप्प की तरह जनसंख्या विस्फोट की उसकी यह बात भी एक कोरी गप्प भर है जिसका मक़सद अपने आक़ाओं यानी अम्बानी-अडानी द्वारा लूट की वजह से पैदा होने वाली बेइन्तहा बेरोज़गारी के लिए जनता को ही ज़ि‍म्मेदार ठहराना है।
आइए अब हम समाज में हुई सम्पत्ति की वृद्धि का अध्ययन करते हैं और आबादी की वृद्धि से इसकी तुलना करते हैं।

तालिका-2 से हम साफ़-साफ़ देख सकते हैं कि 1951 से 2017 के बीच आबादी की वृद्धि दर से कहीं अधिक अनाज, बिजली, कोयला, कच्चा तेल आदि के उत्पादन में वृद्धि हुई है।
अब हम अर्थव्यवस्था के दूसरे मानकों की वृद्धि दर पर एक नज़र डालते हैं और उसकी तुलना जनसंख्या की वृद्धि दर से करके देखते हैं।

तालिका-3 से हम साफ़-साफ़ देख सकते हैं कि सकल मूल्यवर्धन, प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय और सकल घरेलू पूँजी निर्माण की गति आबादी की वृद्धि की गति से कई गुना अधिक है। मतलब साफ़ है कि बढ़ती बेरोज़गारी और ग़रीबी का कारण आबादी नहीं बल्कि पूँजी संचय की प्रक्रिया है जिसकी वजह से चन्द पूँजीपतियों के हाथों में सारी सामाजिक सम्पत्ति सिमट जाती है।
अब हम सम्पत्ति के मुट्ठी भर पूँजीपतियों के हाथों केन्द्रीकृत हो जाने के आँकड़े पर कुछ चर्चा करते हैं। ऑक्सफ़ैम की एक रिपोर्ट के अनुसार ऊपर की 1 फ़ीसदी आबादी के पास कुल 58 फ़ीसदी सम्पत्ति पर क़ब्ज़ा है। देश के लगभग 100 पूँजीवादी घरानों के पास लगभग 25 फ़ीसदी सम्पति पर क़ब्ज़ा है। 1980 के दशक से लेकर अब तक मुनाफ़े और मज़दूरी के अनुपात में 10 गुने से ज़्यादा की वृद्धि हुई है।

अब अन्त में, हम यही कह सकते हैं कि बढ़ती बेरोज़गारी की वजह पूँजीवादी व्यवस्था है जहाँ उत्पादन सामाजिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए नहीं बल्कि मुट्ठीभर लुटेरों के मुनाफ़े के लिए होता है। इसलिए यहाँ मशीनीकरण और आधुनिक उत्पादन के साधनों के विकास ही आम जनता के दुःख और तकलीफ का कारण बन जाते हैं। पूँजीवादी व्यवस्था को उखाड़कर सामाजिक ज़रूरत के लिए उत्पादन करने वाली व्यवस्था के निर्माण से ही यही मशीनीकरण और आधुनिक उत्पादन के साधन बेरोज़गारी, ग़रीबी समेत अधिक कार्य दिवस की समस्या का समाधान किया जा सकता है।

किसी ने ठीक ही कहा था कि बीमारी की सही डॉयगनोसीस (यानी पहचान) करने से ही हम उसका सही उपचार कर सकते हैं। यह पहला और उचित कदम उठाये बिना उपचार करना, अन्धे के हाथ में छुरी पकड़ाने के बराबर है – मरीज़ की गर्दन भी कट सकती है। अब यह हम सब पर है कि हम अपनी सारी ऊर्जा, उद्यम इस बात पर लगायें कि हमारे सबसे अनमोल संसाधन – मानव, उसकी जिन्दगी कैसे और ख़ुशहाल बनायें, उनकी बुनियादी ज़रूरतें मूल अधिकार कैसे उपलब्ध करायें, ताकि हर बच्चा, बूढ़ा और युवा, नर-नारी, सभी अपनी सृजनशक्ति का भरपूर इस्तेमाल कर सकें और तमाम सम्भावनाएँ चारों तरफ विकसित हो पायें। या फिर एक विक्षिप्त शुतुरमुर्ग की तरह रेत में सर छुपाये इन सम्भावनाओं की निर्मम हत्या करने की योजना बनायें? फ़ैसला आप पर है।

मज़दूर बिगुल, अक्टूबर 2019


 

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