माँगपत्रक शिक्षणमाला – 11
स्वतन्त्र दिहाड़ी मज़दूरों से जुड़ी विशेष माँगें

 

मज़दूर माँगपत्रक 2011 क़ी अन्य माँगों — न्यूनतम मज़दूरी, काम के घण्टे कम करने, ठेका के ख़ात्मे, काम की बेहतर तथा उचित स्थितियों की माँग, कार्यस्थल पर सुरक्षा और दुर्घटना की स्थिति में उचित मुआवज़ा, प्रवासी मज़दूरों के हितों की सुरक्षा, स्त्री मज़दूरों की विशेष माँगों, ग्रामीण व खेतिहर मज़दूरों, घरेलू मज़दूरों, स्वतन्त्र दिहाड़ी मज़दूरों की माँगों के बारे में विस्तार से जानने के लिए क्लिक करें। — सम्पादक

 

देश में स्वतन्त्र दिहाड़ी मज़दूरों की बहुत बड़ी संख्या है जिनके पास कोई निश्चित काम नहीं होता। वे रोज़ चौराहों पर खड़े होकर काम की तलाश करते हैं या थोड़े-थोड़े दिनों तक कभी कोई तो कभी कोई काम करते रहते हैं। सभी शहरी इलाक़ों में ”लेबर चौक” पर रोज़ खड़े होने वाले ऐसे मज़दूरों की कुल संख्या का कोई ब्योरा सरकार के पास भी नहीं है लेकिन इनकी संख्या दसियों लाख में है। ये किसी भी श्रम क़ानून के दायरे में नहीं आते और इनकी स्थिति बेहद असुरक्षित होती है। इनके काम के घण्टे, मज़दूरी, काम की परिस्थितियाँ कुछ भी तय नहीं होता। सबकुछ इनके श्रम को ख़रीदने वाले मालिक की मर्ज़ी पर होता है। अलग-अलग होने की वजह से इनकी मोलभाव करने की शक्ति भी बहुत कम होती है। काम पर दुर्घटनाओं या बीमारी की स्थिति में इन्हें कोई मुआवज़ा भी नहीं मिल पाता। अक्सर इन्हें दुर्व्‍यवहार और मार-पीट का भी सामना करना पड़ता है। ये किसी भी तरह की सामाजिक सुरक्षा से वंचित हैं। ट्रेड यूनियनें भी इनके सवालों को कभी नहीं उठाती हैं।

मज़दूर माँगपत्रक–2011 में ऐसे सभी मज़दूरों से जुड़ी विशेष माँगों को एक अलग शीर्षक के तहत रखकर प्रमुखता के साथ उठाया गया है। इसमें सबसे पहले यह माँग की गयी है कि चौराहों पर खड़े होकर काम तलाशने वाले स्वतन्त्र दिहाड़ी मज़दूरों के ज़िलाधिकारी कार्यालयों में पंजीकरण की केन्द्रीय श्रम मंत्रालय की विचाराधीन योजना को जल्द से जल्द अमली जामा पहनाया जाये और इसके दायरे में रिक्शा चलाने वाले, हाथ-ठेला व रिक्शा-ठेला चलाने वाले, लोडिंग-अनलोडिंग करने वाले सभी स्वतन्त्र दिहाड़ी मज़दूर भी लाये जायें। इन्हें पंजीकरण के बाद कार्ड जारी किये जायें जिसके आधार पर इन्हें सामाजिक सुरक्षा योजनाओं का लाभ मिल सके। कार्यस्थल पर सुरक्षा और दुर्घटना की स्थिति में मुआवज़े आदि के लिए इन्हें भी ठेका मज़दूर क़ानून तथा वर्कमेन्स कम्पनसेशन ऐक्ट के दायरे में लाया जाये। पंजीकृत मज़दूरों के लिए वर्ष में न्यूनतम 200 दिन रोज़गार की गारण्टी करना सरकार की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए।

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इसकी दूसरी माँग यह है कि इन अलग-अलग स्वतन्त्र दिहाड़ी मज़दूरों के लिए न्यूनतम मज़दूरी तय की जाये जो ‘राष्ट्रीय तल-स्तरीय न्यूनतम मज़दूरी’ से ऊपर हो। इनके लिए भी आठ घण्टे के काम का दिन तय हो और उससे ऊपर काम कराने पर दुगनी दर से ओवरटाइम का भुगतान किया जाये। रिक्शेवालों, ठेलेवालों के लिए प्रति किलोमीटर न्यूनतम किराया भाड़ा व ढुलाई दरें तय की जायें तथा जीवन-निर्वाह सूचकांक के अनुसार इनकी प्रतिवर्ष समीक्षा की जाये व पुनर्निर्धारण किया जाये। इसके लिए राज्य सरकारों को आवश्यक श्रम क़ानून बनाने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से दिशा-निर्देश जारी किये जायें। दिहाड़ी मज़दूरों से सम्बन्धित नियमों-क़ानूनों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए हर ज़िले में डी.एल.सी. कार्यालय में अलग से पर्याप्त संख्या में निरीक्षक होने चाहिए, जिनकी मदद के लिए निगरानी समितियाँ हों जिनमें दिहाड़ी मज़दूरों के प्रतिनिधि, मज़दूर संगठनों के प्रतिनिधि तथा जनवादी अधिकारों एवं श्रम अधिकारों की हिफाज़त के लिए सक्रिय नागरिक एवं विधिवेत्ता शामिल किये जायें।

मज़दूर माँगपत्रक–2011 क़ी माँग है कि दिहाड़ी मज़दूरों की सभी कल्याणकारी योजनाओं के लिए राज्यों में ऊपर से लेकर ज़िला स्तर तक ‘दिहाड़ी मज़दूर कल्याण बोर्ड’ बनाये जायें। इन योजनाओं के लिए उच्च आय वर्ग के लोगों पर, विलासिता की चीज़ों की ख़रीदारी, भवन-भूखण्ड की ख़रीद तथा हवाई यात्रा आदि पर सेस लगाये जायें। इनके लिए वृद्धावस्था पेंशन, बीमा, पी.एफ., ई.एस.आई. हेतु कोष बनाया जाये जिसमें मुख्य योगदान सरकार का हो और इन मज़दूरों से केवल टोकन राशि ही ली जाये।

”लेबर चौक” पर खड़े होने वाले मज़दूरों को हर मौसम में वहाँ पर घण्टों खड़ा होकर इन्तज़ार करना पड़ता है। उन्हें आये दिन स्थानीय दुकानदारों या निवासियों का विरोध भी झेलना पड़ता है। इसलिए शहरों में (मुख्यत: चौराहों के निकट) स्थान निर्धारित करके स्वतन्त्र दिहाड़ी मज़दूरों के लिए और रिक्शा-ठेला वालों के लिए सुविधाजनक शेड बनाये जाने चाहिए जहाँ पीने के साफ पानी और शौचालय का भी प्रबन्ध हो। यह ज़िम्मेदारी हर शहर की नगरपालिका या नगर निगम द्वारा उठायी जानी चाहिये।

 

मज़दूर बिगुल, जून 2012

 


 

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