जॉन रीड : कम्युनिज्‍़म के लक्ष्य को समर्पित बुद्धिजीवी

शिवानी

John_Reed

”मैं दुनिया के मज़दूरों को निस्संकोच सलाह दूँगा कि वे इस पुस्तक को पढ़ें। यह एक ऐसी किताब है, जिसके लिए मैं चाहूँगा कि वह लाखों-करोड़ों प्रतियों में प्रकाशित हो और इसका सभी भाषाओं में अनुवाद किया जाये। सर्वहारा क्रान्ति तथा सर्वहारा अधिनायकत्व वास्तव में क्या है, इसको समझने के लिए जो घटनाएँ इतनी महत्वपूर्ण हैं, उनका इस पुस्तक में सच्चा और जीता-जागता चित्र दिया गया है।”

ये शब्द लेनिन के हैं और वे यहाँ जॉन रीड की पुस्तक ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’ के सन्दर्भ में बात कर रहे हैं। यह पुस्तक अक्टूबर क्रान्ति के शुरुआती दिनों का एक सजीव तथा शक्तिशाली वर्णन प्रस्तुत करती है। लेकिन यह पुस्तक किसी तटस्थ या उदासीन प्रेक्षक द्वारा घटनाओं का ब्योरा भर नहीं है, बल्कि स्वयं एक जुझारू कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी द्वारा उस जनव्यापी क्रान्ति का विस्तृत वर्णन है जो मानव इतिहास में एक मील का पत्थर है। जनता के पक्ष को चुनने वाले इस क्रान्तिकारी बुद्धिजीवी ने अपना पूरा जीवन क्रान्ति और समाजवाद की सेवा में होम कर दिया।

Ten days that shook the world

जॉन रीड वैसे तो पेशे से पत्रकार थे, लेकिन वे शुरू से ही एक ऐसे पत्रकार रहे जिनकी जनता के संघर्षों से नज़दीक़ी थी। उनका जन्म 22 अक्‍टूबर 1887 में अमेरिका के ऑरेगॉन प्रान्त के पोर्टलैण्ड शहर में हुआ था। रीड का जन्म एक सम्भ्रान्त परिवार में हुआ था, हालाँकि उनके पिता चार्ल्स रीड स्वयं एक सुधारवादी थे जो ऑरेगॉन प्रान्त में राजनीतिक और आर्थिक भ्रष्टाचार उन्मूलन की मुहिम से जुड़े थे। 1906 में अपनी स्नातक की शिक्षा के लिए जॉन रीड ने हार्वर्ड कॉलेज में दाख़िला लिया। यही वह समय था जब वे ‘सोशलिस्ट क्लब’ नामक एक समाजवादी मंच की गतिविधियों से जुड़े। कॉलेज की पढ़ाई ख़त्म होने तक रीड पत्रकार बनने का मन बना चुके थे। इसके लिए वे न्यूयॉर्क में ही बस गये जो उस समय पत्रकारिता का केन्द्र माना जाता था। पत्रकारिता के अपने पूरे जीवन में रीड की दिलचस्पी हर-हमेशा मज़दूरों-किसानों और तमाम मेहनतकशों के संघर्षों में रही, चाहे वह पीटरसन में सूती मिल मज़दूरों की हड़ताल हो या फिर कोलोराडो के खनन क्षेत्र में खनन मज़दूरों का संघर्ष हो, रीड ने इन सभी घटनाओं को एक पत्रकार के रूप में महज़ दर्ज ही नहीं किया, बल्कि जनता का पक्ष चुनने वाले एक सक्रिय बुद्धिजीवी की भूमिका भी अदा की। वे इन तमाम संघर्षों में मज़दूरों के हक़ में बोले और सत्ताधारियों से सीधे-सीधे टकराये। इसकी क़ीमत उन्हें जेल जाकर भी चुकानी पड़ी।

1913 में उन्हें ‘मेट्रोपोलिटन’ पत्रिका द्वारा मेक्सिको की क्रान्ति की रिपोर्टिंग करने के लिए मेक्सिको भेजा गया। पांचो विला के नेतृत्व में किसानों की बग़ावत के न सिर्फ़ वे प्रत्यक्षदर्शी थे, बल्कि इसके हिमायती भी थे। मेक्सिको में अमेरिकी हस्तक्षेप का उन्होंने पुरज़ोर विरोध भी किया। इसके बाद 1914 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बतौर युद्ध संवाददाता वे इटली गये। रीड ने अपने अनुभव से जाना कि यह युद्ध सिर्फ़ और सिर्फ़ साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा का नतीजा है और जनता को इससे कुछ नहीं मिल सकता। इस विषय में उन्होंने सितम्बर 1914 में ‘व्यापारियों का युद्ध’ नाम से एक लेख भी लिखा, जिसमें रीड ने स्पष्ट शब्दों में कहा ”यह युद्ध हमारा युद्ध नहीं है।” साम्राज्यवादी युद्ध के बारे में उनके इन विचारों के चलते न्यूयॉर्क की एक अदालत ने उन पर राजद्रोह का अभियोग भी लगाया। इसके बावजूद रीड अपने विचारों पर अडिग रहे।

लेकिन जो घटना रीड के जीवन का मोड़-बिन्दु साबित हुई वह थी 1917 की सोवियत क्रान्ति। 1917 की गर्मियों मे रीड अपनी जीवन साथी लुई ब्रायण्ट के साथ रूस पहुँचे। यही वह समय था जब रूस में मज़दूर क्रान्ति की ज़मीन परिपक्व हो रही थी। वहाँ पहुँचते ही रीड को यह समझने में देर नहीं लगी कि सर्वहारा द्वारा सत्ता पर अधिकार तर्कसंगत भी है और अनिवार्य भी। इसलिए जब रूसी जनसाधारण – मज़दूर तथा किसान – लेनिन की बोल्शेविक पार्टी के नेतृत्व में क्रान्तिकारी संघर्ष में आगे बढ़ रहे थे तब रीड भी उनके साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल रहे थे। वे उस वक़्त होने वाली तमाम घटनाओं के चश्मदीद गवाह थे। यहाँ तक कि जब शीत प्रासाद पर धावा बोला जा रहा था तो उस वक़्त भी रीड वहाँ मौजूद थे। क्रान्ति के इन्हीं शुरुआती दिनों का विवरण अक्‍टूबर क्रान्ति पर उनकी विश्व प्रसिद्ध पुस्तक ‘दस दिन जब दुनिया हिल उठी’ में मिलता है। इस पुस्तक के प्रकाशन की प्रक्रिया भी काफ़ी उथल-पुथल भरी रही। छह बार तो इस पुस्तक की पाण्डुलिपि को चुराने की मंशा से प्रकाशक के कार्यालय का ताला तोड़ा गया। यह अप्रत्याशित था भी नहीं। लोकतन्त्र में अटूट आस्था के अपने तमाम खोखले दावों के बावजूद अमेरिकी शासक वर्ग अपनी असुरक्षा नहीं छिपा पा रहा था। वह क़तई नहीं चाहता था कि ऐसी कोई भी पुस्तक छपे जो अक्‍टूबर क्रान्ति के लक्ष्यों और विचारों को अमेरिकी जनता तक पहुँचाने का काम करे और जिसके लेखक का जीवन इस क्रान्ति से सम्बद्ध हो। अपनी तमाम कोशिशों के बावजूद अमेरिकी हुक्मरान नाकाम रहे। इस पुस्तक को मिली अपार सफलता इसी बात का सबूत है।

अक्‍टूबर क्रान्ति ने रीड के जीवन पर अमिट छाप छोड़ी। अमेरिका वापस लौटने पर रीड पूरी तरह से समाजवाद के प्रचार-प्रसार में जुट गये। इसी उद्देश्य से 1919 में बनी ‘कम्युनिस्ट लेबर पार्टी’ की स्थापना में रीड ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। 1919 के बाद लिखे गये तमाम लेखों में रीड ने सर्वहारा अधिनायकत्व की पुरज़ोर वक़ालत और हिफ़ाज़त की। लेकिन रीड अपने इन प्रयासों को और आगे बढ़ाते, इससे पहले ही 17 अक्‍टूबर 1920 को टाइफ़स बुख़ार के कारण उनकी मृत्यु हो गयी। अत्यधिक परिश्रम के कारण पहले ही उनका शरीर काफ़ी कमज़ोर हो चुका था। मृत्यु के बाद रीड को मास्को के लाल चौक में क्रेमलिन की दीवार के साये में दफ़नाया गया। रीड इस सम्मान के सर्वथा योग्य थे। वे केवल एक जनपक्षधर पत्रकार नहीं थे। वे एक कम्युनिस्ट क्रान्तिकारी कार्यकर्ता थे जिन्होंने अपना पूरा जीवन समाजवाद के लक्ष्य को समर्पित किया।

 

मज़दूर बिगुल, जुलाई 2012
 


 

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