मज़दूर आन्दोलन में मौजूद किन प्रवृत्तियों के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग का लड़ना ज़रूरी है? 
क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग को अर्थवाद के विरुद्ध निर्मम संघर्ष चलाना होगा! (सातवीं क़िस्त)

शिवानी

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पिछले अंक में हमने देखा कि किस प्रकार अर्थवाद की प्रवृत्ति मज़दूर आन्दोलन के भीतर केवल राजनीतिक कार्यभारों के विषय में ही सामने नहीं आती है बल्कि सांगठनिक रूप व कार्यभारों के सन्दर्भ में भी दिखलाई पड़ती है। लेनिन ने इसको ही सांगठनिक मामलों में अर्थवादियों का नौसिखुआपन या आदिमता कहा था और साथ ही इसे सांगठनिक मसलों में भी सचेतनता के बरक्स स्वतःस्फूर्तता को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति बतलाया था। चूँकि मज़दूर वर्ग की सम्पूर्ण क्रान्तिकारी राजनीति ट्रेड यूनियन राजनीति के दायरे तक सिमटी नहीं होती है, इसलिए सांगठनिक रूप भी इसके अनुसार ही बदलते हैं और इसलिए जन संगठन और पार्टी संगठन के बीच फ़र्क होता है और होना ही चाहिए। जो लोग इस बुनियादी लेनिनवादी शिक्षा को नहीं समझते हैं, वे अकसर इन दोनों के बीच के फ़र्क को गड्डमड्ड करते हैं और जन संगठन से पार्टी का काम लेते हैं और पार्टी को एक जन संगठन में तब्दील कर देते हैं! ऐसे लोग सांगठनिक मसलों में भी दरअसल अर्थवादी होते हैं, जैसा कि स्वयं लेनिन ने बताया।

लेनिन क्या करें? में स्पष्ट करते हैं कि नौसिखुआपन या आदिमता केवल व्यावहारिक प्रशिक्षण के अभाव के कारण ही पैदा नहीं होती है। बल्कि इसका अर्थ होता है क्रान्तिकारी कार्य के क्षेत्र को आम तौर पर संकीर्ण बनाने की मानसिकता और इसी संकीर्णता को उचित ठहराने के लिए उसे ऊँचा उठाकर एक विशेषसिद्धान्तमें बदलना  और फिर इसे ही स्वतःस्फूर्तता की पूजा तक ले जाना। लेनिन यह भी बताते हैं कि यह नौसिखुआपन घनिष्ठ रूप से अर्थवाद से जुड़ा हुआ है और जब तक हम अर्थवाद को आम तौर पर दूर नहीं करते तब तक हम सांगठनिक कार्य की इस संकीर्णता को भी अलग से दूर नहीं कर सकेंगे। यह एक ज़रूरी लेनिनवादी शिक्षा है जिसे क्रान्तिकारी सर्वहारा को भली-भाँति समझने की आवश्यकता है।

लेनिन बताते हैं कि रूसी मज़दूर आन्दोलन में सांगठनिक मामलों में नौसिखुएपन की इस प्रवृत्ति की अभिव्यक्तियाँ मोटे तौर पर दो तरह से प्रकट हुई। एक तरफ़ वे थे जिन्होंने कहा कि अभी तक चूँकि आम मज़दूरों ने उन व्यापक तथा जुझारू राजनीतिक कार्यभारों को ख़ुद पेश नहीं किया है जिनको क्रान्तिकारी लोग उन पर “लादने” की कोशिश कर रहे हैं इसलिए फ़िलहाल मज़दूरों को तात्कालिक  राजनीतिक माँगों के लिए लड़ते जाना चाहिए, उन्हें मालिकों तथा सरकार के ख़िलाफ़ आर्थिक संघर्ष जारी रखना चाहिए और इस “आसानी से समझ आने वाले” संघर्ष के अनुरूप ही एक ऐसा संगठन बनाना चाहिए जिसे एकदम अप्रशिक्षित नौजवान भी “आसानी से समझ सकें”। वहीं दूसरी तरफ़ वे लोग थे जो अब कहने लगे थे कि “राजनीतिक क्रान्ति करना” सम्भव और आवश्यक है लेकिन इसके लिए सर्वहारा को दृढ़ और अटल संघर्ष की प्रशिक्षा देने वाला क्रान्तिकारियों का कोई मज़बूत संगठन बनाने की ज़रूरत नहीं है बल्कि कुछ उत्तेजना पैदा करने वाली आतंकवादी गतिविधियों के ज़रिये मज़दूर आन्दोलन को स्फूर्ति प्रदान करनी चाहिए। लेनिन के अनुसार ये दोनों ही प्रवृतियाँ, अवसरवादी औरक्रान्तिवादीनौसिखुएपन के आगे शीश नवाती हैं और दोनों ही आन्दोलन प्राथमिक और सबसे आवश्यक कार्यभार के तौर पर क्रान्तिकारी हिरावल पार्टी की ज़रूरत को नकारती है।

दरअसल लेनिन यहाँ जिस बात को रेखांकित कर रहे हैं उसकी चर्चा हम पहले भी कर चुके हैं और वह है उस दौर के रूसी सामाजिक जनवादी आन्दोलन में कम्युनिस्टों और सिद्धान्तकारों (जिसमें कि ख़ुद सामाजिक जनवादी/कम्युनिस्ट  मज़दूर भी शामिल हैं) का जनता के स्वतःस्फूर्त उभार के मुकाबले पिछड़ते जाना। मार्तिनोव जैसे अर्थवादी जब स्वतःस्फूर्तता के समर्थन में क़सीदे पढ़ रहे थे और जब दैनिक आर्थिक संघर्षों को ही राजनीतिक संघर्ष के सबसे वांछनीय रूप के तौर पर प्रचारित कर रहे थे तब वे वास्तव में, लेनिन के अनुसार, सांगठनिक मामलों में भी नौसिखुएपन और आदिमता के ही गीत गा रहे थे और इसका समर्थन कर रहे थे। देखें लेनिन ऐसे अर्थवादी मतावलम्बियों के बारे में क्या लिखते हैं, जिसकी अनुगूँजें भारत के मज़दूर आन्दोलन में भी अकसर सुनाई पड़ती हैं:

“जो लोग तिरस्कार के साथ नाक-भौं सिकोड़े बिना “सिद्धान्तकार” शब्द का उच्चारण नहीं कर सकते, जो लोग प्रचलित पिछड़ेपन और प्रशिक्षण के भाव के आगे शीश नवाने को “जीवन की वास्तविकताओं की समझ” कहते हैं, उनके व्यवहार से प्रकट होता है कि वे हमारे सबसे आवश्यक व्यावहारिक  कार्यभारों को भी नहीं समझते। जो पिछड़े हुए हैं, उनसे ये लोग चिल्लाकर कहते हैं: क़दम मिलाकर चलो! आगे मत भागो! जो सांगठनिक काम में क्रियाशीलता तथा पहलक़दमी नहीं दिखा पाते, जो व्यापक एवं साहसी कार्यों की “योजनाएँ” नहीं बना पाते, उनको ये लोग “प्रक्रिया-के-रूप-में-कार्यनीति” के उपदेश सुनाते हैं! हमारा सबसे बड़ा गुनाह यह है कि हम अपने राजनीतिक और सांगठनिक कार्यभारों को रोज़मर्रा के आर्थिक संघर्ष के तात्कालिक, “ठोस”, “स्पर्शनीयहितों के स्तर पर उतार लाते हैं; परन्तु ये लोग हमें बारबार वही पुराना गीत सुनाते रहते हैं: आर्थिक संघर्ष को ही राजनीतिक रूप दें! हम फिर कहते हैं: इस तरह के व्यवहार से “जीवन की वास्तविकताओं की समझ” उतनी ही प्रकट होती है, जितनी एक प्रचलित लोक-कथा के उस नायक में थी, जिसने किसी की अन्त्येष्टि के समय शोक मनानेवालों  से कहा कि “भगवान करे, यह दिन आपके लिए बार-बार आये!”

यह बात भारत के मज़दूर आन्दोलन पर भी एक हद तक लागू होती है। कई ऐसे ग्रुप हैं जो अपने कार्यकर्ताओं को इसी प्रकार के सिद्धान्त से रिक्त तात्कालिक, ठोस “व्यावहारिक” कामों की अन्धी गली में घुमाते रहते हैं और जहाँ सिद्धान्त या सैद्धान्तिक बहस का मसला आता है वहाँ “व्यवहार” की दुहाई देने लगते हैं। ऐसे लोग वास्तव में अर्थवादी भटकाव का शिकार ही होते हैं। आजकल इस तरह के लोगों में पंजाब के ‘ललकार-प्रतिबद्ध’ ग्रुप के नेतृत्व का नाम अग्रणी है। वर्ष 2019 में पंजाबी राष्ट्रवाद और भाषाई अस्मितावाद के गड्ढ़े में गिरने के साथ ही इस ग्रुप के नेतृत्व के क्रान्तिकारी मार्क्सवाद से भी विपथगमन की प्रक्रिया शुरू होती चली गयी। “व्यवहार” पर इस प्रकार का ग़ैर-द्वंद्वात्मक ज़ोर दरअसल अपनी सैद्धान्तिक व विचारधारात्मक कमज़ोरियों को ही छिपाने का एक तरीक़ा होता है। कारण यह है कि क्रान्तिकारी सिद्धान्त भी किसी एक व्यक्ति या ग्रुप के व्यवहार से पैदा नहीं होता है। क्रान्तिकारी सिद्धान्त वर्ग संघर्ष के ऐतिहासिक अनुभवों के वैज्ञानिक अमूर्तन, सामान्यीकरण और समाहार के आधार पर अस्तित्व में आता है। यानी क्रान्तिकारी सिद्धान्त मज़दूर वर्ग और मेहनतकश जनता द्वारा सदियों से जारी वर्ग संघर्ष के ऐतिहासिक अनुभवों के समाहार से निकलता है। दूसरी अहम बात यह है कि क्रान्तिकारी सिद्धान्त को सही तरीक़े से समझना, सीखना और लागू करना सीखना स्वयं क्रान्तिकारी व्यवहार का ही अंग है, कोई शुद्ध सिद्धान्तवाद नहीं। इसलिए ऐसे लोगों का यह शुद्ध “व्यवहारवाद” उनके विचारधारात्मक दिवालियापन का परिचायक है और अर्थवादी प्रवृत्ति की ही एक अभिव्यक्ति है।

बहरहाल,लेनिन अर्थवाद पर मारक चोट करते हुए कहते हैं कि “मालिकों तथा सरकार के ख़िलाफ़ आर्थिक संघर्ष के ठहरे हुए पानी पर, दुर्भाग्यवश काई जम गयी है, और हम लोगों में कुछ ऐसे लोग पैदा हो गए हैं, जो स्वतःस्फूर्ति के आगे घुटने टेककर प्रार्थना करते हैं और सदा श्रद्धा व विस्मय से रूसी सर्वहारा का “पार्श्वभाग” (प्लेखानोव के शब्दों में जबकि अभी वह मार्क्सवादी थे- लेखिका) निहारते रहते हैं।” लेनिन आगे बताते हैं कि इस सोच से निजात पाने के लिए ज़रूरी है कि हम ऐसे हर सुझाव को उपेक्षा और तिरस्कार के साथ ठुकरा दें जो हमारे राजनीतिक कामों के स्तर को नीचे गिराने और हमारे सांगठनिक कार्य के क्षेत्र को सीमित करने के उद्देश्य से रखा गया हो।

लेनिन यहीं पर पेशेवर क्रान्तिकारियों के संगठन के रूप में हिरावल पार्टी (जिसमें कि स्वयं मज़दूर वर्ग के वे उन्नत तत्व शामिल होते हैं जिन्होंने द्वंद्वात्मक भौतिकवादी दर्शन और ऐतिहासिक भौतिकवादी विज्ञान को आत्मसात किया होता है) और मज़दूर आन्दोलन से उसके सम्बन्ध की बात को स्पष्ट करते हैं। लेनिन कहते  हैं कि अर्थवादी, संगठन और राजनीति दोनों के ही मामलों, में सामाजिक जनवाद से शुद्ध ट्रेड यूनियनवाद की ओर भटक जाते हैं। मालिकों तथा सरकार के ख़िलाफ़ मज़दूरों के आर्थिक संघर्ष के मुकाबले सामाजिक जनवाद का राजनीतिक संघर्ष कहीं अधिक व्यापक और पेचीदा होता है। इसी वजह से एक क्रान्तिकारी सामाजिक जनवादी/कम्युनिस्ट पार्टी का संगठन आर्थिक संघर्ष चलाने के लिए बनाये गये मज़दूरों के संगठनों से अवश्यम्भावी रूप से भिन्न ढंग का होगा। लेनिन लिखते हैं, “मज़दूरों के संगठन को एक तो ट्रेड यूनियन संगठन होना चाहिए; दूसरे उसे अधिक से व्यापक संगठन होना चाहिए; तीसरे उसके लिए ज़रूरी होता है कि वह कम से कम गुप्त हो। इसके विपरीत क्रान्तिकारियों के संगठन को सबसे पहले और मुख्यतया ऐसे लोगों का संगठन होना चाहिए, जिन्होंने क्रान्तिकारी कार्य को अपना पेशा बना लिया हो। और चूंकि यह विशेषता ऐसे संगठन के सभी सदयों में होनी चाहिए, इसलिए यह आवश्यक है कि न केवल मज़दूरों और बुद्धिजीवियों के बीच फ़र्क, बल्कि अलग-अलग व्यवसायों और पेशों का सारा अन्तर भी एकदम ख़त्म कर दिया जाए। ऐसे संगठन के लिए यह ज़रूरी है कि वह बहुत फैला हुआ न हो तथा अधिक से अधिक गुप्त हो।”

जन संगठन और हिरावल पार्टी के बीच लेनिन द्वारा बताये गए इन तीन-सूत्री अन्तरों पर हम चर्चा अगले अंक में जारी रखेंगे। यह चर्चा आम मज़दूरों व क्रान्तिकारी संगठनकर्ताओं के लिए बेहद ज़रूरी है ताकि इस प्रश्न पर एक लेनिनवादी नज़रिया विकसित हो सके। आम तौर पर भी मज़दूर आन्दोलन में इस प्रश्न पर काफ़ी विभ्रम की स्थिति मौजूद है। इसलिए पार्टी संगठन और जन संगठन के बीच के फ़र्क को समझना कोई शुद्ध सैद्धान्तिक कवायद नहीं है बल्कि हमारे रोज़मर्रा के क्रान्तिकारी कार्यों में इसकी विशिष्ट भूमिका है और यह सभी कार्य इसी समझदारी से निर्दिष्ट भी होने चाहिए। इसे समझे बग़ैर क्रान्तिकारी जनदिशा को लागू करना भी असम्भव है।

(अगले अंक में जारी)

       

 

मज़दूर बिगुल, अक्टूबर 2023


 

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