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धन्नासेठों के चन्दे पर निर्भर पूँजीवादी संसदीय चुनाव – जिसका खायेंगे उसका गायेंगे

एडीआर की रिपोर्ट से जो यह खुलासा हो पाया, वह भी आगे ना हो पाये, इसका इन्तज़ाम भाजपा सरकार कर रही है। मालूम हो कि कारपोरेट चन्दे से जुड़ी जानकारी हर वित्तीय वर्ष में चुनाव आयोग को देनी होती है। लेकिन अब ऐसे खुलासे आम लोगों तक नहीं पहुँच सकेंगे, क्योंकि एडीआर के संस्थापक प्रोफ़ेसर जगदीप छोकर ने बताया कि वित्त मन्त्री अरुण जेटली ने क़ानून पास करवा दिया है कि अब इलेक्टोरल बॉण्ड की ख़रीद करके कम्पनियों और राजनीतिक दलों को यह बताना ज़रूरी नहीं होगा कि किस कारपोरेट घराने ने किस पार्टी को कितना चन्दा दिया है और किसने कितना लिया है, यह पारदर्शिता के ि‍ख़लाफ़ है।

चॉकलेट उद्योग का ग़ुलाम बचपन

मुनाफ़े की अन्धी हवस में पूँजीपति सस्ते से सस्ता खरीदने और महँगे से महँगा बेचने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। और सस्ता श्रम उन्हें महिलाओं और बच्चों से ही मिल सकता है। इसीलिए वह तमाम मासूमों की ज़िन्दगियाँ दाँव पर लगाकर अकूत मुनाफ़ा बटोर रहे हैं। लूट, शोषण और मुनाफ़े पर टिकी इस आदमख़ोर व्यवस्था को तबाह किये बिना हम बच्चों को बचा नहीं सकते क्योंकि जो व्यवस्था हर हाथ को काम देने के बजाय लगातार बेरोज़गारों की फ़ौज खड़ी करती जा रही है, जो व्यवस्था शिक्षा को खरीद-फ़रोख़्त का सामान बना रही है, उस व्यवस्था के भीतर से बाल मज़दूरों और ग़ुलामों की कतारें पैदा होती रहेंगी।

देश के प्राकृतिक संसाधनों को लूट रहे मोदी सरकार के चहेते

अंबानी-अडानी ग्रुप को हज़ारों एकड़ जमीन एक रुपये की दर पर और तमाम पूँजीपतियों और उनके सेवकों को कौड़ियों के भाव ज़मीनें और प्राकृतिक संसाधन लुटाने वाली सरकार कहती है कि ग़रीबों को मिलने वाली सब्सिडी से अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ता है, उन्हें ख़त्म करना ज़रूरी है। इसीलिए लगातार शिक्षा, स्वास्थ्य के मदों में कटौती कर रही है और मेहनतकशों की हड्डि‍याँ ज़्यादा निचोड़कर पूँजीपतियों की तिजोरियाँ भर रही है ।

कैसी ख़ुशियाँ, आज़ादी का कैसा शोर? राज कर रहे कफ़नखसोट मुर्दाखोर!

तमिलनाडु के वेदर्नयम इलाक़े में सड़क से काफ़ी दूर आदिवासी कालोनी में 200 से भी ज़्यादा परिवार हैं, जो नमक की डलियाँ बनाने का काम करते हैं। समुद्री पानी से भी तीन गुना खारे (नमकीन) पानी में खड़े रहकर नमक को इकट्ठा करते हैं, छानते हैं, फिर सूखने पर उसे प्लास्टिक के पैकेट में पैक करते हैं। दिनभर नमक के दलदलों में 45-50 डिग्री तापमान की चमड़ी झुलसा देने वाली धूप में कमरतोड़ मेहनत के बाद भी उन्हें एक दिन का सिर्फ़ 50-100 रुपया मिलता है, जो न्यूनतम मज़दूरी से भी काफ़ी कम है। ज़्यादातर मज़दूर ठेकेदारों द्वारा दिहाड़ी पर रखे जाते हैं और उनके लिए सुरक्षा और स्वास्थ्य का कोई इन्तज़ाम नहीं है।

मोदी के गुजरात “विकास” का सच

यह सोचना कठिन नहीं है कि गुजरात में “विकास” हुआ है तो किसकी हड्डियों को चूसकर। और मोदी चाहे जितना चिल्ल-पों मचा ले जनता से यह सच्चाई छुपी नहीं है कि चाहे मोदी हो, यूपी सरकार या केन्द्र सरकार, मेहनतकशों के ख़ून से ही कुछ हिस्से को “विकास” का तोहफ़ा मिल रहा है।

भूख से दम तोड़ते असम के चाय बागान मज़दूर

दुनियाभर में मशहूर असम की चाय तैयार करने वाले असम के चाय बागान मज़दूरों के भयंकर शोषण और संघर्ष की ख़बरें बीच-बीच में आती रही हैं, लेकिन पिछले छह महीने से वहाँ के एक चाय बागान में मज़दूरों के साथ जो हो रहा है वह असम राज्य और देश की शासन-व्यवस्था के लिए बेहद शर्मनाक है। असम के 3000 चाय मज़दूर और उनके परिवार, बागान प्रबन्धन के भयंकर शोषण-उत्पीड़न और सरकारी तन्त्र की घनघोर उपेक्षा की वजह से लगातार भुखमरी की हालत में जी रहे हैं। अभी तक कम से कम 14 मज़दूरों की मौत भूख, कुपोषण और ज़रूरी दवा-इलाज के अभाव में हो चुकी है। यह बागान असम के कछार ज़िले में भुवन वैली चाय बागान नाम से जाना जाता है जिस पर कोलकाता की एक निजी कम्पनी का मालिकाना है।

आज की दुनिया में स्त्रियों की हालत को बयान करते आँकड़े

  • विश्व में किए जाने वाले कुल श्रम (घण्टों में) का 67 प्रतिशत हिस्सा स्त्रियों के हिस्से आता है, जबकि आमदनी में उनका हिस्सा सिर्फ़ 10 प्रतिशत है और विश्व की सम्पत्ति में उनका हिस्सा सिर्फ़ 1 प्रतिशत है।
  • विश्वभर में स्त्रियाँ को पुरुषों से औसतन 30-40 प्रतिशत कम वेतन दिया जाता है।
  • विकासशील देशों में 60-80 प्रतिशत भोजन स्त्रियों द्वारा तैयार किया जाता है।
  • प्रबन्धन और प्रशासनिक नौकरियों में स्त्रियों का हिस्सा सिर्फ़ 10-20 प्रतिशत है।
  • विश्वभर में स्कूल न जाने वाले 6-11 वर्ष की उम्र के 13 करोड़ बच्चों में से 60 प्रतिशत लड़कियाँ हैं।
  • विश्व के 80 करोड़ 75 लाख अनपढ़ बालिगों में अन्दाज़न 67 प्रतिशत स्त्रियाँ हैं।

मन्दी की मार झेलते मध्‍य और पूर्वी यूरोप के मजदूर

इस वैश्विक मन्दी की सबसे बुरी मार दुनियाभर की गरीब मेहनतकश आबादी पर ही पड़ रही है। उन्हें ही लगातार महँगाई, बेरोजगारी, छँटनी, तालाबन्दी का सामना करना पड़ रहा है, शिक्षा और स्वास्थ्य से बेदखल किया जा रहा है, आत्महत्या करने पर मजबूर होना पड़ रहा है। पूँजीपतियों को दिये जाने वाले राहत पैकेजों की कीमत भी जनता से टैक्सों के जरिये वसूली जायेगी और उसे तबाही-बर्बादी के नर्ककुण्ड में ढकेलकर विश्व अर्थव्यवस्था को बचाने में वैश्विक डाकू एक हो जायेंगे। लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। आम जनता चुपचाप नहीं बैठी है। इसके खिलाफ हर जगह विरोध प्रदर्शनों का ताँता लग गया है। हंगरी, बुल्गारिया, रूस, लिथुआनिया, लातविया, एस्तोनिया जैसे कई देशों में संसदों पर हिंसक हमले हुए। पिछले साल रूस में पिकोलोवा नामक जगह पर स्थानीय लोगों ने स्त्री मजदूरों के नेतृत्व में रोजगार की माँग को लेकर हाईवे जाम किया। इस जगह सीमेण्ट के चार कारखानों में से तीन बन्द हो गये थे और जो उद्योग चल रहे थे उनमें मजदूरों को तनख्वाह नहीं दी जा रही थी। दुनियाभर में मजदूरों के छोटे-बड़े विरोध प्रदर्शनों ने जता दिया है कि जनता के अन्दर सुलग रहा लावा कभी भी फट सकता है।

पुलिस हिरासत में बढ़ती मौतें

हमारे लिए हमारे साथ होने का दम भरने वाली पुलिस द्वारा कानून-व्यवस्था का नाम लेकर आम सीधो-साधो नागरिकों पर आतंक का जंगलराज कायम किया जाता है। जुल्म और अन्याय के ख़िलाफ आवाज उठाने वालों को पुलिस दमन का शिकार होना पड़ता है। लेकिन सोचने की बात है कि क्या पुलिस के लोग इतने दरिन्दे और वहशी जन्मजात होते हैं या उन्हें वैसा बनाया जाता है। यह व्यवस्था उन्हें वैसा बनाती है, ताकि आम जनता में भय और दहशत फैलाकर निरंकुश पूँजीवादी लूट को बरकरार रखा जा सके। जिस तरह से समाज में आम बेरोजगारों की फौज खड़ी है, उन्हीं में से वेतनभोगियों की नियुक्ति की जाती है और अनुभवी घाघ नौकरशाहों की देखरेख में उन्हें समाज से पूरी तरह काटकर उनका अमानवीकरण कर दिया कर जाता है और इस व्यवस्था रूपी मशीन का नट-बोल्ट बना दिया जाता है।

यूपीए सरकार का सादगी ड्रामा

पूँजीपतियों द्वारा की जा रही जनता की लूट पर पर्दा डालने के लिए ये नेता लोगों को मूर्ख बनाने की फिराक में रहते हैं। लेकिन जनता को हमेशा-हमेशा के लिए मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। एक दिन शोषित-उत्पीड़ित जनता उठेगी और उस मंच को ही उखाड़ फेंकेगी, जिस पर देश के हुक्मरान तरह-तरह के ड्रामे करते रहते हैं।